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डीएससी ‘ए 23’ का शुभारंभ: भारतीय नौसेना की क्षमता में होगा विस्तार

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कोलकाता: भारतीय नौसेना के लिए डाइविंग सपोर्ट क्राफ्ट (DSC) परियोजना के तहत चौथे जहाज DSC A 23 का 19 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित टिटागढ़ में भव्य समारोह के साथ शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर दीपा शिवकुमार ने जहाज को लॉन्च किया, जबकि समारोह में वाइस एडमिरल बी. शिवकुमार (चीफ ऑफ मटेरियल) सहित नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

यह आयोजन पारंपरिक नौसैनिक रीति-रिवाजों और गरिमा के साथ संपन्न हुआ, जिसमें Titagarh Rail Systems Limited (TRSL) के प्रतिनिधि भी शामिल थे, जो इस परियोजना का निर्माण कर रही है।

आधुनिक तकनीक से लैस जहाज

लगभग 30 मीटर लंबाई और 380 टन विस्थापन क्षमता वाले इस कैटमरैन-हुल डिजाइन जहाज में बेहतर स्थिरता, विस्तृत डेक क्षेत्र और उत्कृष्ट समुद्री प्रदर्शन की विशेषताएँ हैं। यह जहाज तटीय क्षेत्रों और बंदरगाहों में डाइविंग अभियानों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।

स्वदेशी तकनीक और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को बढ़ावा

इस परियोजना को भारतीय शिपिंग रजिस्टर के मानकों के अनुसार डिजाइन किया गया है और नौसेना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला में व्यापक परीक्षण और विश्लेषण के बाद तैयार किया गया है।
करीब 70% उपकरण स्वदेशी निर्माताओं से लिए गए हैं, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहल को मजबूत करते हैं।

नौसेना की क्षमता में होगा इजाफा

इन जहाजों के शामिल होने से भारतीय नौसेना की डाइविंग सपोर्ट, अंडरवॉटर निरीक्षण, बचाव कार्य (Salvage) और तटीय अभियानों की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

निष्कर्ष

डीएससी ‘ए 23’ का शुभारंभ भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण और स्वदेशी रक्षा उत्पादन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

भारतीय नौसेना ने कमीशन किया INS माहे: स्वदेशी माहे-क्लास एंटी-सबमरीन युद्धपोत से तटीय सुरक्षा मजबूत

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भारतीय नौसेना ने मुंबई स्थित नौसैनिक डॉकयार्ड में 24 नवंबर 2025 को INS माहे को कमीशन किया। यह भारतीय डिजाइन और निर्माण की पहली माहे-क्लास एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) है।

इस समारोह की मेज़बानी वाइस एडमिरल कृष्ण स्वामिनाथन, फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, वेस्टर्न नेवल कमांड ने की, जबकि समारोह की अध्यक्षता चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने की। इसमें वरिष्ठ नौसेना अधिकारी, कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड, कोच्चि के प्रतिनिधि और विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे।

जहाज का विवरण और विशेषताएँ:

INS माहे का नाम मालाबार तट के ऐतिहासिक तटीय शहर माहे से लिया गया है। जहाज के क्रेस्ट में कलरीपयट्टू की लचीली तलवार “उरूमी” को चित्रित किया गया है, जो चपलता, सटीकता और घातक कौशल का प्रतीक है। इसका मास्कॉट चीतल है, जो गति और फोकस का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि “Silent Hunters” का मोट्टो जहाज की गुप्तता, सतर्कता और निरंतर तत्परता को दर्शाता है।

INS माहे को कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा डिज़ाइन और निर्मित किया गया है और यह अपने वर्ग का प्रमुख जहाज है। BEL, L&T Defence, महिंद्रा डिफेंस सिस्टम्स, NPOL और 20 से अधिक MSMEs की विशेषज्ञता पर आधारित, यह परियोजना भारत की नौसैनिक डिजाइन, उपकरण और सिस्टम इंटीग्रेशन क्षमताओं को मजबूत करती है। INS माहे में 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

सैन्य और तकनीकी क्षमता:

INS माहे की कमीशनिंग भारतीय नौसेना की एंटी-सबमरीन क्षमताओं में वृद्धि करेगी, विशेषकर तटीय और उथले जल क्षेत्र में खतरों का मुकाबला करने के लिए। जहाज में उन्नत हथियार, सेंसर और कम्युनिकेशन सिस्टम लगे हैं, जो समुद्र की सतह के नीचे खतरों का पता लगाने, ट्रैक करने और उन्हें समाप्त करने में सक्षम हैं। यह लंबी अवधि तक संचालन कर सकता है और अत्याधुनिक मशीनरी और नियंत्रण प्रणाली से लैस है।

समारोह में संबोधन:

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि INS माहे की कमीशनिंग केवल एक शक्तिशाली नई समुद्री प्लेटफॉर्म की शुरूआत नहीं है, बल्कि यह भारत की जटिल युद्धपोतों को स्वदेशी तकनीक के माध्यम से डिजाइन, निर्माण और परिचालित करने की क्षमता का प्रतीक भी है। उन्होंने कहा कि यह जहाज भारतीय नौसेना की क्षमता को बढ़ाएगा, तटीय सुरक्षा को मजबूत करेगा और भारत के समुद्री हितों की रक्षा सुनिश्चित करेगा।

माहे-क्लास जहाज तटीय रक्षा की पहली पंक्ति बनाएगा और बड़े सतही युद्धपोतों, पनडुब्बियों और विमानन संपत्तियों के साथ मिलकर भारत के समुद्री क्षेत्र पर सतत निगरानी सुनिश्चित करेगा। INS माहे भारतीय नौसेना की “Combat Ready, Cohesive और Aatmanirbhar” स्थिति को पुनः प्रमाणित करता है, जो समृद्ध और विकसित भारत के लिए समुद्र की सुरक्षा करता है।

उप-एडमिरल बी. शिवकुमार, एवीएसएम, वीएसएम ने नौसेना सामग्री प्रमुख (Chief of Materiel) का कार्यभार संभाला

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नई दिल्ली-उप-एडमिरल बी. शिवकुमार, एवीएसएम, वीएसएम ने 1 नवम्बर 2025 को भारतीय नौसेना के 40वें नौसेना सामग्री प्रमुख (Chief of Materiel) के रूप में कार्यभार संभाला।

वे राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के 70वें कोर्स के पूर्व छात्र हैं और उन्होंने 1 जुलाई 1987 को भारतीय नौसेना में एक इलेक्ट्रिकल अधिकारी (Electrical Officer) के रूप में कमीशन प्राप्त किया था।

अधिनायक अधिकारी ने आईआईटी चेन्नई से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर डिग्री, उस्मानिया विश्वविद्यालय से उच्च रक्षा प्रबंधन में स्नातकोत्तर उपाधि, मद्रास विश्वविद्यालय से एम.फिल प्राप्त की है और वे राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज (NDC) के भी पूर्व छात्र हैं।

38 वर्षों से अधिक की अपनी विशिष्ट और गौरवशाली सेवा अवधि में, उन्होंने नौसेना मुख्यालय, एचक्यू एटीवीपी, नौसेना डॉकयार्ड्स और कमांड मुख्यालयों में कई प्रमुख पदों पर कार्य किया है। उन्होंने आईएनएस रंजीत, किर्पाण और अक्षय जैसे अग्रिम पंक्ति के युद्धपोतों पर सेवा दी है और भारतीय नौसेना के प्रमुख विद्युत प्रशिक्षण केंद्र, आईएनएस वालसुरा (INS Valsura) के कमांडिंग ऑफिसर रहे हैं।

एडमिरल को एक दुर्लभ गौरवपूर्ण उपलब्धि प्राप्त है — उन्होंने नौसेना मुख्यालय में हथियार उपकरण (Weapons Equipment) और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग दोनों प्रमुख निदेशालयों का नेतृत्व किया है तथा पूर्वी और पश्चिमी तटों के नौसेना डॉकयार्ड्स में भी सेवा दी है। उन्हें प्रौद्योगिकी, परियोजनाओं और तकनीकी प्रशासन के विविध क्षेत्रों में गहन अनुभव प्राप्त है।

एक ध्वज अधिकारी (Flag Officer) के रूप में उन्होंने प्रोजेक्ट सीबर्ड के अतिरिक्त महानिदेशक (तकनीकी), पश्चिमी नौसेना कमान मुख्यालय (HQWNC) में चीफ स्टाफ ऑफिसर (टेक्निकल) और नौसेना डॉकयार्ड, मुंबई के एडमिरल सुपरिंटेंडेंट के रूप में कार्य किया है।

नौसेना मुख्यालय में सहायक सामग्री प्रमुख (सूचना प्रौद्योगिकी और सिस्टम्स) के रूप में अपने कार्यकाल के पश्चात्, उन्हें उप-एडमिरल के पद पर पदोन्नत किया गया और उन्होंने क्रमशः प्रोग्राम निदेशक, एचक्यू एटीवीपी, कंट्रोलर ऑफ वॉरशिप प्रोडक्शन एंड एक्विज़िशन (CWPA) और महानिदेशक, नौसेना परियोजनाएँ (विशाखापत्तनम) के रूप में कार्य किया।

उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें विशिष्ट सेवा पदक (Vishisht Seva Medal) और अति विशिष्ट सेवा पदक (Ati Vishisht Seva Medal) से सम्मानित किया गया है।

उप-एडमिरल बी. शिवकुमार ने उप-एडमिरल किरण देशमुख, एवीएसएम, वीएसएम से पदभार ग्रहण किया, जिन्होंने 39 वर्षों की गौरवशाली सेवा पूर्ण करने के उपरांत यह दायित्व सौंपा।

उप-एडमिरल किरण देशमुख एक प्रख्यात नेता और भारतीय नौसेना के अत्यंत कुशल अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी व्यावसायिक उत्कृष्टता और नेतृत्व कौशल के माध्यम से भारतीय नौसेना को तकनीकी रूप से भविष्य के लिए सक्षम बनाने में अहम भूमिका निभाई।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नौसेना संसाधनों की उच्चतम तत्परता और दीर्घकालिक तैनाती उनके दूरदर्शी नेतृत्व, योजना और प्रबंधन क्षमता का प्रमाण है।


भारतीय नौसेना का स्वदेशी सर्वेक्षण पोत ‘इक्षक’ 6 नवंबर को कोच्चि नौसेना अड्डे पर होगा शामिल, आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक और बड़ा कदम

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भारतीय नौसेना का स्वदेश निर्मित सर्वेक्षण पोत (लार्ज) ‘इक्षक’ 06 नवंबर 2025 को नौसेना अड्डा कोच्चि में आयोगित (commissioned) किया जाएगा। इस समारोह की अध्यक्षता नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी करेंगे, जो इस अत्याधुनिक पोत के औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल होने का प्रतीक होगा।

इक्षक, अपनी श्रेणी का तीसरा पोत है, जिसकी तैनाती भारतीय नौसेना की इस प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है कि वह स्वदेशी तकनीक और अत्याधुनिक क्षमताओं से युक्त प्लेटफॉर्म के निर्माण के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में निरंतर प्रगति कर रही है। यह स्वदेशी हाइड्रोग्राफिक उत्कृष्टता के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ेगा।

यह पोत कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) लिमिटेड द्वारा, नौसेना पोत निर्माण निदेशालय और वॉरशिप ओवरसीइंग टीम (कोलकाता) की देखरेख में बनाया गया है। इक्षक में 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो भारतीय एमएसएमई के साथ सफल सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की भावना को सशक्त रूप से दर्शाता है।

अपने प्राथमिक हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण कार्यों के अलावा, इक्षक में मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) संचालन की दोहरी क्षमता भी है। आपात स्थितियों में यह पोत अस्पताल पोत के रूप में भी कार्य कर सकता है।

विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि इक्षक अपनी श्रेणी का पहला ऐसा पोत है जिसमें महिला नौसैनिकों के लिए अलग आवासीय सुविधा प्रदान की गई है, जो भारतीय नौसेना के समावेशी और भविष्य के लिए तैयार दृष्टिकोण को दर्शाता है।

‘इक्षक’ नाम का अर्थ है – “मार्गदर्शक”। यह नाम उसकी भूमिका को उपयुक्त रूप से परिभाषित करता है — अज्ञात समुद्री मार्गों का मानचित्रण करना, नाविकों की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करना और भारत की समुद्री शक्ति को सुदृढ़ बनाना।

भारतीय नौसेना में 11वां ACTCM बार्ज LSAM 25 (Yard 135) शामिल

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11वें Ammunition Cum Torpedo Cum Missile (ACTCM) बार्ज, LSAM 25 (Yard 135) का औपचारिक शामिल (Induction) समारोह 17 अक्टूबर 2025 को मुंबई नौसैनिक अड्डे (Naval Dockyard, Mumbai) में आयोजित किया गया। इस अवसर के मुख्य अतिथि कमोडोर सुमीत विष्णु शिदोरे, जीएम (R), एनडी (मुंबई) थे।

मुख्य बिंदु:

  • निर्माण अनुबंध:

    • 11 ACTCM बार्ज के निर्माण और आपूर्ति का अनुबंध M/s सुर्यदिप्ता प्रोजेक्ट्स प्रा. लि., ठाणे के साथ 5 मार्च 2021 को किया गया था।

    • यह एक MSME शिपयार्ड है, जिसने भारतीय शिप डिजाइन फर्म के सहयोग से इन बार्जों को स्वदेशी रूप से डिजाइन किया।

    • डिजाइन का सफल मॉडल परीक्षण नेवल साइंस एंड टेक्नोलॉजिकल लेबोरेटरी, विशाखापत्तनम में किया गया ताकि समुद्र में संचालन की क्षमता सुनिश्चित की जा सके।

  • मानक और गुणवत्ता:

    • ये बार्ज भारतीय रजिस्टर ऑफ शिपिंग (IRS) के नौसेना नियमों और मानकों के अनुसार बनाए गए हैं।

    • ये “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” पहल के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

  • अब तक की उपलब्धि:

    • अब तक 10 ACTCM बार्ज नौसेना को सौंपे जा चुके हैं।

    • शिपयार्ड को हाल ही में भारतीय नौसेना के लिए 4 Sullage Barges के निर्माण का अनुबंध भी प्राप्त हुआ है, जो MSME क्षेत्र को बढ़ावा देने की नौसेना की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

  • संचालन में योगदान:

    • इन बार्जों का शामिल होना भारतीय नौसेना की संचालनात्मक क्षमताओं को और सशक्त करेगा।

    • ये बार्ज जेटी और बाहरी बंदरगाहों पर नौसेना प्लेटफार्मों तक सामग्री और गोला-बारूद के परिवहन, लोडिंग और अनलोडिंग को सुगम बनाएंगे।


SAIL ने INS Androth के लिए आपूर्ति किया विशेष ग्रेड स्टील — भारतीय नौसेना की आधुनिकिकरण में नया मील का पत्थर

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नई दिल्ली-देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की इस्पात निर्माता और महा रत्न कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) ने आज भारतीय नौसेना में INS Androth के कमीशनिंग के अवसर पर आवश्यक सभी विशेष ग्रेड स्टील की आपूर्ति पूरी कर दी। यह भारत की नौसैनिक आधुनिकिकरण यात्रा में एक गौरवपूर्ण उपलब्धि है।

INS Androth एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) कोरवेट्स की श्रृंखला का दूसरा जहाज है, पहला जहाज INS Arnala था, जिसे 18 जून 2025 को कमीशन किया गया था।

SAIL ने INS Arnala और Androth सहित आठ ASW-SWC कोरवेट्स के लिए सभी आवश्यक विशेष ग्रेड स्टील, जिसमें HR शीट्स और प्लेट्स शामिल हैं, की आपूर्ति की है। ये जहाज गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (GRSE) द्वारा निर्मित किए जा रहे हैं। स्टील की आपूर्ति Bokaro, Bhilai और Rourkela के SAIL संयंत्रों से की गई।

INS Androth का कमीशनिंग भारत की बढ़ती समुद्री क्षमताओं और “आत्मनिर्भर भारत” के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। SAIL ने इस राष्ट्रीय प्रयास में समर्थन देने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया और स्थानीय इस्पात उत्पादन के माध्यम से रणनीतिक रक्षा ढांचे को सशक्त बनाने का संकल्प व्यक्त किया।


गहरे समुद्र में भारत की बढ़ती ताकत: कार्ल्सबर्ग रिज में अन्वेषण का विशेष अधिकार

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भारत को अंतरराष्ट्रीय समुद्रतल प्राधिकरण (ISA) से कार्ल्सबर्ग रिज क्षेत्र में पॉलीमेटालिक सल्फ़ाइड (PMS) अन्वेषण के लिए विशेष अधिकार प्राप्त

नई दिल्ली- पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) और अंतरराष्ट्रीय समुद्रतल प्राधिकरण (ISA) के बीच 15 वर्ष की अवधि के लिए एक नया अनुबंध हस्ताक्षरित हुआ है। इस अनुबंध के तहत भारत को हिंद महासागर के कार्ल्सबर्ग रिज में 10,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पॉलीमेटालिक सल्फ़ाइड (PMS) के अन्वेषण के विशेष अधिकार प्राप्त हुए हैं। इसकी घोषणा केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पृथ्वी विज्ञान मंत्री, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने की।

इसके साथ ही भारत दुनिया का पहला देश बन गया है जिसके पास PMS अन्वेषण के लिए ISA के साथ दो अनुबंध हैं। यह उपलब्धि गहरे समुद्र संसाधन अन्वेषण में भारत की अग्रणी भूमिका और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी सामरिक उपस्थिति को दर्शाती है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह नया अनुबंध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए डीप ओशन मिशन की दृष्टि को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह मिशन समुद्रतल खनिज अन्वेषण, खनन प्रौद्योगिकी विकास और भारत की ‘ब्लू इकोनॉमी पहलों’ को सुदृढ़ बनाने पर केंद्रित है। उन्होंने कहा, “कार्ल्सबर्ग रिज में PMS अन्वेषण के विशेष अधिकार प्राप्त कर भारत ने गहरे समुद्री अनुसंधान और अन्वेषण में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका को और मजबूत किया है। यह हमारी समुद्री उपस्थिति को बढ़ाएगा और भविष्य में संसाधनों के उपयोग हेतु राष्ट्रीय क्षमता का निर्माण करेगा।”

पॉलीमेटालिक सल्फ़ाइड में लौह, तांबा, जस्ता, चांदी, सोना और प्लेटिनम जैसे बहुमूल्य धातु पाई जाती हैं। यह समुद्री पर्पटी से निकलने वाले गर्म हाइड्रोथर्मल तरल पदार्थों से बनने वाले अवसाद हैं। इनकी रणनीतिक और व्यावसायिक संभावनाओं ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है और भारत को गहरे समुद्री संसाधन अन्वेषण में अग्रणी बना दिया है।

भारत और ISA की दीर्घकालिक साझेदारी का उल्लेख करते हुए डॉ. सिंह ने याद दिलाया कि अंतरराष्ट्रीय जल में पॉलीमेटालिक नोड्यूल अन्वेषण का क्षेत्र प्राप्त करने वाला पहला देश भारत था और उसे “पायनियर इन्वेस्टर” घोषित किया गया था। अब दो PMS अनुबंधों — सेंट्रल इंडियन रिज एवं साउथवेस्ट इंडियन रिज तथा कार्ल्सबर्ग रिज — के साथ भारत के पास अंतरराष्ट्रीय समुद्रतल में PMS अन्वेषण हेतु सबसे बड़ा क्षेत्र उपलब्ध है।

डॉ. सिंह ने कहा, “ISA के साथ भारत की 30 वर्ष की साझेदारी गर्व का विषय है। ISA की 30वीं वर्षगांठ पर भारत मानवता की साझा धरोहर के हित में ISA के साथ सहयोग को और प्रगाढ़ करने की प्रतिबद्धता दोहराता है।” उन्होंने यह भी घोषणा की कि भारत 8वीं ISA वार्षिक कांट्रैक्टर्स बैठक 18–20 सितम्बर को गोवा में आयोजित करेगा।

इस अवसर पर पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. एम. रविचंद्रन ने कहा कि यह MoES और इसकी स्वायत्त संस्था राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र (NCPOR), गोवा के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने बताया कि “भारत ISA का पहला सदस्य राष्ट्र और सरकारी ठेकेदार है जिसके पास PMS अन्वेषण के लिए दो अनुबंध हैं। साथ ही भारत के पास अब अंतरराष्ट्रीय समुद्रतल में PMS अन्वेषण के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा क्षेत्र है।”

डॉ. रविचंद्रन ने कहा कि भारत, ISA के साथ सहयोग को और मजबूत करते हुए अनछुए समुद्रतल पारिस्थितिक तंत्रों के बारे में अधिक वैज्ञानिक ज्ञान उत्पन्न करने और समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए खनिज संसाधनों का मानवता के हित में उपयोग करने की दिशा में कार्य करेगा।

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