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भारत सरकार ने समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाए, अंडमान-निकोबार को ब्लू इकोनॉमी हब बनाने की दिशा में पहल

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भारत सरकार अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह को ब्लू इकोनॉमी के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती और समुद्री मत्स्य पालन को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रही है। इस दिशा में वैज्ञानिक तथा संस्थागत स्तर पर कई महत्त्वपूर्ण पहल की जा रही हैं।

परिषद् वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान (CSIR) के अंतर्गत केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (CSMCRI) द्वारा “अंडमान तट पर व्यावसायिक समुद्री शैवाल की पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन एवं पायलट स्तर पर खेती” परियोजना को लागू किया गया है। इस परियोजना के तहत समुद्री शैवाल खेती के लिए 25 विभिन्न स्थानों का विस्तृत अध्ययन किया गया, जिससे सर्वाधिक अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों और पोषक तत्वों वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सके।

इस अध्ययन के अंतर्गत Gracilaria edulis, Gracilaria debilis, Gracilaria salicornia तथा Kappaphycus alvarezii प्रजातियों का परीक्षण फ्लोटिंग बांस राफ्ट, ट्यूब नेट, नेट बैग और मोनो-लाइन जैसी तकनीकों से किया गया। इसके परिणामस्वरूप हाठी टापू (दक्षिण अंडमान), मायाबंदर (मध्य अंडमान) और दिगलीपुर (उत्तर अंडमान) में Gracilaria edulis और Kappaphycus alvarezii के साथ व्यावसायिक समुद्री शैवाल खेती सफलतापूर्वक स्थापित की गई है।

इसके अतिरिक्त, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) ने अंडमान सागर में पहली बार खुले समुद्र में समुद्री मत्स्य पालन और गहरे पानी में समुद्री शैवाल खेती की परियोजना प्रारंभ की है। साथ ही, CSIR द्वारा शुरू किए गए “सीवीड मिशन” का उद्देश्य समुद्री शैवाल खेती को लाभकारी, पर्यावरण-अनुकूल, टिकाऊ और बड़े पैमाने पर अपनाने योग्य बनाना है।

सीवीड मिशन के अंतर्गत तमिलनाडु में 800 से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने Kappaphycus की खेती को आजीविका के रूप में अपनाया है। इस शोध एवं विकास के परिणामस्वरूप एक नया समुद्री शैवाल उद्योग विकसित हुआ है, जिससे रोजगार के नए अवसर और अतिरिक्त आय के स्रोत सृजित हुए हैं। समुद्री शैवाल आधारित तकनीकों को 12 कंपनियों को व्यावसायीकरण के लिए हस्तांतरित किया गया है। अब तक लगभग 5,000 मछुआरों को तमिलनाडु, गुजरात और आंध्र प्रदेश में विभिन्न योजनाओं के तहत प्रशिक्षण दिया जा चुका है।

सरकार ने महिलाओं के नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने के लिए लक्षित वित्तीय और संस्थागत सहायता उपलब्ध कराई है। राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) के माध्यम से प्रशिक्षण, प्रदर्शन, मूल्य संवर्धन, स्थानीय प्रसंस्करण और विपणन के लिए सहायता दी जा रही है। मत्स्य विभाग (DoF) द्वारा बीज/रोपण सामग्री के आयात और उत्पादन से संबंधित तकनीकी दिशानिर्देश भी जारी किए गए हैं, जिनमें मछुआर परिवारों और महिला SHGs को प्राथमिक लाभार्थी के रूप में मान्यता दी गई है।

सरकार ने वर्ष 2030 तक समुद्री शैवाल उत्पादन को 11.2 लाख टन तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसे मुख्यतः प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत लागू किया जा रहा है। इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए ₹194.09 करोड़ का निवेश किया गया है, जिसमें तमिलनाडु में बहुउद्देशीय सीवीड पार्क और दमन एवं दीव में सीवीड ब्रूड बैंक की स्थापना शामिल है। इसके तहत 46,095 सीवीड राफ्ट और 65,330 मोनो-लाइन ट्यूब नेट की स्वीकृति दी जा चुकी है।

केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI), मंडपम केंद्र को समुद्री शैवाल खेती के लिए उत्कृष्टता केंद्र और नाभिकीय प्रजनन केंद्र (Nucleus Breeding Centre) के नोडल संस्थान के रूप में नामित किया गया है। इससे 20,000 से अधिक किसानों को लाभ और 5,000 से अधिक रोजगार अवसर सृजित होने की संभावना है। पिछले पाँच वर्षों में CMFRI द्वारा 5,268 राफ्ट और 112 मोनो-लाइन ट्यूब नेट स्थापित किए गए तथा 14,000 से अधिक हितधारकों के लिए 169 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।

यह जानकारी पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने 5 फरवरी 2026 को राज्यसभा में दी।

भारत ने EEZ में सतत मत्स्य पालन के लिए नए नियम अधिसूचित, मछुआरों और समुद्री निर्यात को मिलेगा मजबूती

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04 नवंबर 2025 को भारत सरकार ने “सतत मत्स्य संसाधनों के उपयोग के लिए एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) नियम” को अधिसूचित किया। यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत के समुद्री क्षेत्र की अछूती संभावनाओं को सशक्त करने और सतत और समावेशी ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल वित्तीय वर्ष 2025–26 के बजट में घोषित संकल्प का पालन करती है, जिसमें अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप द्वीपसमूह पर विशेष ध्यान के साथ EEZ और उच्च समुद्री क्षेत्रों से सतत मत्स्य संसाधन उपयोग के लिए सक्षम ढांचे का निर्माण करने का वादा किया गया था।

सहकारी समितियों और समुदाय आधारित मॉडल को प्राथमिकता

नए नियमों के तहत मछुआरा सहकारी समितियों और फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (FFPOs) को गहरे समुद्री मत्स्य पालन और तकनीकी रूप से उन्नत जहाजों के संचालन के लिए प्राथमिकता दी गई है। EEZ नियम गहरे समुद्री मत्स्य पालन को सुसज्जित करेंगे और सीफ़ूड निर्यात को बढ़ाने के लिए मूल्य संवर्धन, ट्रेसबिलिटी और प्रमाणन पर जोर देंगे।

मदर-एंड-चाइल्ड जहाजों की अवधारणा के तहत मध्य-सागर में ट्रांसशिपमेंट को RBI के निगरानी तंत्र के साथ अनुमति दी जाएगी। अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप में यह व्यवस्था उच्च गुणवत्ता वाली मछली के निर्यात को बढ़ावा देगी।

समग्र सहायता और क्षमता निर्माण

सरकार मछुआरों और उनकी सहकारी समितियों/FFPOs को प्रशिक्षण, अंतरराष्ट्रीय अनुभव यात्राएं और क्षमता निर्माण कार्यक्रम प्रदान करेगी। मूल्य श्रृंखला के सभी पहलुओं जैसे प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, विपणन, ब्रांडिंग और निर्यात में सहायता दी जाएगी। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) और Fisheries & Aquaculture Infrastructure Development Fund (FIDF) के माध्यम से आसान और किफायती ऋण भी उपलब्ध कराया जाएगा।

हानिकारक प्रथाओं पर रोक और सतत मत्स्य पालन

नए नियम LED लाइट फिशिंग, पेयर ट्रॉवलिंग और बुल ट्रॉवलिंग जैसी हानिकारक मत्स्य पालन प्रथाओं पर रोक लगाते हैं। जैव विविधता संरक्षण के लिए मछली प्रजातियों के लिए न्यूनतम कानूनी आकार निर्धारित किया जाएगा और Fisheries Management Plans राज्य सरकारों और हितधारकों के साथ मिलकर विकसित किए जाएंगे।

सी-केज फार्मिंग और समुद्री शैवाल खेती जैसी मारिकल्प्चर प्रथाओं को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे तटीय क्षेत्रों में मछली पकड़ने पर दबाव कम होगा और उत्पादन बढ़ेगा। ये उपाय विशेष रूप से लघु मछुआरों और उनकी सहकारी समितियों के लिए लाभकारी होंगे।

डिजिटल और पारदर्शी एक्सेस पास तंत्र

EEZ नियमों के तहत मेकैनिकाइज्ड और बड़े मोटरयुक्त जहाजों के लिए एक्सेस पास अनिवार्य होगा, जो ReALCRaft पोर्टल के माध्यम से नि:शुल्क ऑनलाइन प्राप्त किया जा सकता है। पारंपरिक और छोटे मछुआरे इस पास से मुक्त रहेंगे।

ReALCRaft पोर्टल MPEDA और EIC के साथ एकीकृत किया गया है ताकि फिश कैच और स्वास्थ्य प्रमाण पत्र डिजिटल रूप से जारी किए जा सकें, जिससे ट्रेसबिलिटी, स्वास्थ्य अनुपालन और ईको-लेबलिंग सुनिश्चित होगी और भारतीय सीफ़ूड का वैश्विक प्रतिस्पर्धा में स्तर बढ़ेगा।

नियामक सुधार, समुद्री सुरक्षा और तटीय सुरक्षा

EEZ में मत्स्य संसाधनों को ‘भारतीय मूल’ के रूप में मान्यता दी जाएगी, ताकि निर्यात के समय उन्हें आयात के रूप में न माना जाए। Illegal, Unreported, and Unregulated (IUU) Fishing रोकने के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की जाएगी।

मछुआरों और उनके जहाजों की सुरक्षा के लिए ट्रांसपोंडर का अनिवार्य उपयोग किया जाएगा और QR-कोडित आधार कार्ड/मछुआरा पहचान कार्ड की पहचान अनिवार्य होगी। ReALCRaft पोर्टल Nabhmitra एप्लिकेशन के साथ जुड़ा हुआ है, जिससे सुरक्षित नेविगेशन और तटीय सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

समुद्री मत्स्य पालन का आधुनिकीकरण

ये सुधार समुद्री मत्स्य पालन के शासन को आधुनिक बनाने, सहकारी और समुदाय आधारित मॉडल को सशक्त करने और डिजिटल नवाचार और पारदर्शिता के माध्यम से ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण मील का पत्थर हैं।

प्रमुख तथ्य

  • भारत की 11,099 किमी की लंबी तटरेखा और 23 लाख वर्ग किमी से अधिक EEZ में 50 लाख से अधिक मछुआरे समुदाय रहते हैं।

  • भारत का EEZ अभी तक गहरे समुद्र में उच्च मूल्य वाले संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाया था।

  • बजट 2025–26 में घोषणा की गई थी कि भारत दूसरे स्थान का विश्व मत्स्य उत्पादन देश है और सीफ़ूड निर्यात ₹60,000 करोड़ का है।

ReALCRaft पोर्टल के बारे में

ReALCRaft पोर्टल मछुआरों और तटीय राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए नागरिक-केंद्रित ऑनलाइन सेवाएं प्रदान करता है, जैसे मछली पकड़ने के जहाजों का पंजीकरण, लाइसेंसिंग, स्वामित्व हस्तांतरण आदि। वर्तमान में 2.38 लाख जहाज पोर्टल पर पंजीकृत हैं।

  • मोटरयुक्त जहाज: ~1.32 लाख

  • गैर-मोटरयुक्त पारंपरिक जहाज: 40,461

  • एक्सेस पास अनिवार्य जहाज: 64,187


मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिक्‍ही ने महाराष्ट्र के रायगढ़ में मत्स्य सहकारी क्लस्टर का किया दौरा, सहकारी मॉडल से मत्स्य क्षेत्र के एकीकृत विकास पर बल

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मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य विभाग (Department of Fisheries - DoF) के केंद्रीय सचिव डॉ. अभिलक्ष लिक्‍ही ने आज महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित मत्स्य सहकारी क्लस्टर (Fisheries Cooperative Cluster) का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने परियोजना की प्रगति की समीक्षा की और सहकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद किया।

यह क्लस्टर मत्स्य मूल्य श्रृंखला के एकीकृत विकास (Integrated Fisheries Value Chain Development) के एक मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस दौरे का उद्देश्य जमीनी स्तर की चुनौतियों का आकलन करना और सहकारी मॉडल के माध्यम से मत्स्य आधारित आजीविकाओं को मजबूत करने के अवसरों की पहचान करना था।

डॉ. लिक्‍ही ने इस अवसर पर रायगढ़ जिले की 156 प्राथमिक मत्स्य सहकारी समितियों (Primary Fisheries Cooperative Societies) और 9 फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशनों (FFPOs) का प्रतिनिधित्व करने वाले 251 सदस्यों से मुलाकात की।

सहकारी विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता

डॉ. लिक्‍ही ने कहा कि मत्स्य क्लस्टर गतिविधियों को प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) और मत्स्य अवसंरचना विकास कोष (FIDF) जैसी प्रमुख राष्ट्रीय योजनाओं के साथ जोड़ना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि मत्स्य विभाग और सहकारिता मंत्रालय के बीच एक संयुक्त कार्यबल (Joint Task Force) गठित किया गया है, जो देशभर में मत्स्य सहकारी समितियों को सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

डॉ. लिक्‍ही ने कहा कि सहकारी समितियाँ, सरकार की “सहकार से समृद्धि (Sahkar Se Samriddhi)” और मत्स्य समुदाय की समृद्धि की दृष्टि के केंद्र में हैं।

उन्होंने राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) को निर्देश दिया कि वह रायगढ़ जिले के सभी तालुकों में जागरूकता, प्रशिक्षण और शिकायत निवारण शिविरों का आयोजन करे ताकि योजनाओं का अधिक व्यापक प्रचार-प्रसार और प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सके।

उन्होंने कहा कि क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण से मत्स्य क्षेत्र में समग्र विकास संभव है — जिससे निर्यात में वृद्धि, अवसंरचना सुदृढ़ीकरण, वित्तीय पहुंच में सुधार, और बाज़ार संपर्क को मजबूत किया जा सकेगा।

वरिष्ठ अधिकारियों के वक्तव्य

  • सागर मेहरा, संयुक्त सचिव (अंतर्देशीय मत्स्यपालन), ने कहा कि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए विभिन्न मंत्रालयों और योजनाओं में कन्वर्जेंस (Convergence) सुनिश्चित करना आवश्यक है।

  • नीतू कुमारी, संयुक्त सचिव (सामुद्रिक मत्स्यपालन), ने हार्बर प्रबंधन के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) के विकास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इन पहलों को सहकारिता मंत्रालय, NCDC और अन्य भागीदार संस्थानों के साथ समन्वय में लागू किया जा रहा है।

  • डॉ. बी.के. बेहरा, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) ने रायगढ़ की मत्स्य संरचना पर प्रस्तुति दी और अगले पाँच वर्षों की प्रमुख योजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिनमें अवसंरचना विकास, कोल्ड चेन, प्रसंस्करण, बाज़ार संपर्क और कल्याणकारी उपाय शामिल हैं।

हितधारकों की भागीदारी

बैठक में समुद्री, अंतर्देशीय और खारे पानी के मत्स्यपालन से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
उन्होंने जेटी, आइस प्लांट, कोल्ड स्टोरेज और ड्रेजिंग सुविधाओं की आवश्यकता पर बल दिया।
महिला मत्स्य कर्मियों के लिए स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छता सुविधाएँ और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की भी मांग की गई।
प्रतिभागियों ने आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के दौरे का सुझाव दिया ताकि सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) से सीख ली जा सके।

वित्तीय संस्थानों ने सहकारी प्रयासों को मजबूत करने के लिए सतत समर्थन का आश्वासन दिया।
बैठक में यह सहमति बनी कि PMMSY फेज़ 2 में स्थानीय जरूरतों के अनुसार हस्तक्षेपों को शामिल किया जाएगा ताकि एक मजबूत, समावेशी और आत्मनिर्भर मत्स्य क्षेत्र का निर्माण किया जा सके।

रायगढ़ मत्स्य क्लस्टर का उद्देश्य

रायगढ़ सहित देश के 34 मत्स्य सहकारी क्लस्टर, जो प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत अधिसूचित हैं,
का उद्देश्य है —

  • मत्स्य आधारित उद्यमों को सशक्त बनाना,

  • जलीय कृषि, समुद्री मत्स्यपालन और गहरे समुद्र मछली पकड़ने की गतिविधियों को एकीकृत करना,

  • प्रतिस्पर्धी, संगठित और सतत मत्स्य क्षेत्र को बढ़ावा देना।

इन क्लस्टर्स को ब्लू इकॉनॉमी (Blue Economy) के स्तंभ के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो रोज़गार सृजन, आय वृद्धि, उद्यमिता और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देंगे।

भागीदारी

बैठक में रायगढ़ के जिलाधिकारी किशन राव जवाले,
मत्स्य आयुक्त, महाराष्ट्र किशोर तवाड़े,
सहकारिता मंत्रालय, NCDC, NFDB, MPEDA, NABARD, ICAR सहित
कई राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों और हितधारकों ने भाग लिया।


डॉ. अभिलक्ष लखी ने मुंबई में FSI और CIFNET की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप द्वीपों में मत्स्य क्षमता निर्माण पर दिया जोर

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मछलीपालन विभाग (DoF), मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के सचिव डॉ. अभिलक्ष लखी ने आज मुंबई में एक हाइब्रिड समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें मछली सर्वेक्षण भारत (FSI) और केंद्रीय मत्स्य नौवहन एवं इंजीनियरिंग प्रशिक्षण संस्थान (CIFNET) द्वारा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप द्वीप समूह में किए गए जनसंपर्क और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की समीक्षा की गई।

अपने संबोधन में, डॉ. लखी ने क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की सहयोगात्मक योजना और अधीनस्थ कार्यालयों के बीच समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि परिणाम अधिक प्रभावशाली और समेकित हों। उन्होंने कहा कि लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भारत की समुद्री मत्स्य विकास रणनीति में विशेष रूप से टूना मत्स्य क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने स्थानीय मछुआरों के कौशल विकास, आधुनिक मत्स्य तकनीकों को अपनाने, और कटाई पश्चात् प्रबंधन तकनीकों में सुधार के लिए लक्षित हस्तक्षेपों की आवश्यकता पर जोर दिया। डॉ. लखी ने सुझाव दिया कि इन क्षेत्रों के अत्यधिक प्रेरित और कुशल मछुआरों को उच्च गुणवत्ता वाले टूना (सशीमी-ग्रेड) के हैंडलिंग, प्रोसेसिंग और कोल्ड-चेन संरक्षण तकनीकों में विदेशी उन्नत प्रशिक्षण का अवसर दिया जाए।

उन्होंने कहा कि ऐसे कदम कटाई पश्चात् हानियों को कम करने और भारतीय समुद्री उत्पादों की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में सहायक होंगे। साथ ही, उन्होंने FSI और CIFNET की भूमिका को द्वीपीय क्षेत्रों में समुद्री क्षमता सुदृढ़ करने में रणनीतिक बताया।

बैठक के दौरान FSI और CIFNET ने लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में चल रही गतिविधियों और जनसंपर्क पहलों पर विस्तृत प्रस्तुतियाँ दीं। समीक्षा में मछुआरों और मत्स्य कर्मियों की तकनीकी दक्षताओं को बढ़ाने, प्रायोगिक प्रशिक्षण, फील्ड-स्तरीय प्रदर्शन, और तकनीकी प्रसार गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय मत्स्य समुदायों की आजीविका सुधारने के उपायों पर भी चर्चा की गई।

इस समीक्षा बैठक में NFDB, ICAR, MPEDA, NABARD, NCDC, महाराष्ट्र सरकार के मत्स्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, द्वीप प्रशासन के प्रतिनिधि, और अन्य हितधारक उपस्थित रहे।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुंबई में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत ‘डीप सी फिशिंग वेसल्स’ का किया शुभारंभ, सहकारिता आधारित मत्स्य क्षेत्र को मिलेगा बढ़ावा

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केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने आज मुंबई के मझगांव डॉक में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana) के तहत ‘डीप सी फिशिंग वेसल्स’ का शुभारंभ किया। इस अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उपमुख्यमंत्री अजित पवार और केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोळ भी उपस्थित रहे।

अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह कदम भारत के समुद्री मत्स्य क्षेत्र के आधुनिकीकरण और तटीय क्षेत्रों में सहकारिता आधारित विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को साकार करने और ब्लू इकॉनमी को सशक्त बनाने के लिए सहकारिता की भावना के साथ कार्य कर रही है।

अमित शाह ने बताया कि आज जिन दो ट्रॉलरों का शुभारंभ किया गया है, वे भारत की मत्स्य संपदा की संभावनाओं को और अधिक बढ़ाने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करेंगे कि मछली उद्योग का लाभ मेहनती मछुआरों के घर तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि अब तक मत्स्य ट्रॉलरों पर काम करने वाले लोग वेतन पर काम करते थे, लेकिन सहकारिता आधारित मत्स्य पालन के तहत ट्रॉलरों का पूरा लाभ सीधे मछुआरों तक पहुंचेगा।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि फिलहाल 14 ट्रॉलर प्रदान किए जा रहे हैं, और निकट भविष्य में केंद्र सरकार, सहकारिता मंत्रालय एवं मत्स्य विभाग की ओर से और अधिक ट्रॉलर मछुआरों को सहकारी मॉडल पर दिए जाएंगे। ये ट्रॉलर गहरे समुद्र में 25 दिनों तक रह सकते हैं और 20 टन तक मछलियां ले जा सकते हैं। इसके साथ ही बड़े जहाजों के माध्यम से समुद्र से तट तक मछलियों के परिवहन की भी व्यवस्था की जाएगी।

अमित शाह ने कहा कि लगभग 11,000 किलोमीटर लंबी भारतीय समुद्री तटरेखा पर मछली पकड़कर आजीविका चलाने वाले गरीब भाइयों और बहनों के लिए आने वाले दिनों में एक बड़ी योजना बनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि देश की वास्तविक समृद्धि तभी संभव है जब ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाला गरीब व्यक्ति आर्थिक रूप से सशक्त बने। केवल जीडीपी वृद्धि को विकास का पैमाना मानने से वास्तविक विकास नहीं होता, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से प्रत्येक परिवार की समृद्धि सुनिश्चित करनी होती है।

अमित शाह ने कहा कि मत्स्य क्षेत्र में सहकारिता अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन रही है। भविष्य में मछलियों के प्रसंस्करण, निर्यात और बड़े संग्रहण पोतों की तैनाती की योजनाएं बनाई जा रही हैं। उन्होंने बताया कि ये प्रसंस्करण केंद्र और चिलिंग यूनिट मछुआरों के स्वामित्व में होंगे, और निर्यात भी बहु-राज्य सहकारी समितियों के माध्यम से किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई मत्स्य योजनाओं के सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। वर्ष 2014-15 में भारत का कुल मत्स्य उत्पादन 102 लाख टन था, जो अब बढ़कर 195 लाख टन हो गया है। इसमें समुद्री मत्स्य उत्पादन 35 लाख टन से बढ़कर 48 लाख टन हुआ है, जबकि मीठे पानी की मत्स्य उत्पादन में 119 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

अमित शाह ने कहा कि महाराष्ट्र की शुगर मिलों ने गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है, और गुजरात में अमूल ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। अमूल के माध्यम से आज लगभग 80,000 करोड़ रुपये का कारोबार ग्रामीण महिलाओं के हाथों में है। यही सहकारिता की भावना है, जो भारत की आत्मा और विकास की दिशा है।

इस अवसर पर श्री शाह ने कहा कि सहकारिता के माध्यम से ही भारत मानव-केंद्रित आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है — यही “विकसित भारत” की सच्ची परिकल्पना है।

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