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भारत में ग्रीन यूरिया उत्पादन की दिशा में बड़ा कदम, उर्वरक विभाग ने आयोजित की प्री-ईओआई बैठक

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सतत कृषि, कार्बन न्यूट्रैलिटी और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उर्वरक विभाग (Department of Fertilizers - DoF) ने भारत में ग्रीन यूरिया संयंत्रों की स्थापना के लिए प्री-एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (Pre-EOI) की उच्चस्तरीय बैठक का सफल आयोजन किया। यह बैठक प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (PDIL), नोएडा में आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता उर्वरक विभाग के संयुक्त सचिव एवं PDIL के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. के.के. पाठक ने की।

इस सप्ताह की शुरुआत में उर्वरक विभाग ने भारत में ग्रीन यूरिया संयंत्र स्थापित करने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया था। प्री-ईओआई बैठक में NTPC, सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI), ग्रीन अमोनिया एवं यूरिया प्रौद्योगिकी प्रदाता, प्रमुख उर्वरक कंपनियां, इलेक्ट्रोलाइजर निर्माता, ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया क्षेत्र की कंपनियां सहित सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के अनेक हितधारकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन भाग लिया। बड़ी संख्या में भागीदारी इस महत्वाकांक्षी पहल को साकार करने की व्यापक रुचि को दर्शाती है।

प्रमुख नीतिगत और परिचालन बिंदु

1. विभिन्न मंत्रालयों का समन्वित सहयोग

ग्रीन यूरिया उत्पादन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए कई मंत्रालयों की वित्तीय सहायता सुनिश्चित की गई है।

  • नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ग्रीन ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करने के लिए 19,744 करोड़ रुपये उपलब्ध कराएगा।

  • उर्वरक विभाग (DoF) ग्रीन अमोनिया को देश की उर्वरक उत्पादन प्रणाली में शामिल करने के लिए आवश्यक नीतिगत एवं संस्थागत ढांचा तैयार करेगा।

2. निर्माताओं के लिए सब्सिडी व्यवस्था

ग्रीन अमोनिया का उत्पादन फिलहाल पारंपरिक ग्रे अमोनिया की तुलना में महंगा है। इसे प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार विशेष सब्सिडी व्यवस्था लागू करेगी।

  • SECI ग्रीन अमोनिया उत्पादकों से खरीदकर उर्वरक कंपनियों को ग्रे अमोनिया के बाजार मूल्य पर उपलब्ध कराएगा।

  • उर्वरक विभाग दोनों कीमतों के बीच का अंतर वहन करेगा, जिससे उर्वरक कंपनियों पर अतिरिक्त लागत का बोझ नहीं पड़ेगा।

3. उत्पादकों को वित्तीय प्रोत्साहन

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के तहत ग्रीन अमोनिया उत्पादकों को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता दी जाएगी।

  • प्रतिवर्ष 7.24 लाख मीट्रिक टन ग्रीन अमोनिया की खरीद का लक्ष्य।

  • SECI द्वारा पारदर्शी ई-रिवर्स नीलामी के माध्यम से आवंटन।

  • नए ग्रीनफील्ड और निर्माणाधीन परियोजनाओं को सहायता।

  • व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने के बाद नकद प्रोत्साहन।

  • 10 वर्षों के लिए दीर्घकालिक खरीद समझौते (GAPA/GASA) के माध्यम से बाजार की सुनिश्चितता।

पुडिमाडका पायलट परियोजना बनी मॉडल

बैठक में आंध्र प्रदेश के पुडिमाडका स्थित 150 टन प्रतिदिन क्षमता वाले ग्रीन यूरिया पायलट प्लांट पर भी चर्चा हुई। NTPC की अनुसंधान इकाई NETRA द्वारा विकसित यह संयंत्र कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCUS) तथा वॉटर इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक का उपयोग करता है। यह परियोजना कार्बोनेटेड फ्लाई ऐश, फूड-ग्रेड उत्पादों और सिंथेटिक ईंधन जैसे उपयोगों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

ग्रीन यूरिया उत्पादन के लिए भारत की रणनीति

भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत ग्रीन हाइड्रोजन के माध्यम से ग्रीन अमोनिया उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, ग्रीन यूरिया के निर्माण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की भी आवश्यकता होती है।

इसके लिए तापीय बिजलीघर, सीमेंट और इस्पात संयंत्रों से प्राप्त कैप्चर की गई CO₂ का उपयोग किया जाएगा।

  • 12.7 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले एक विश्वस्तरीय यूरिया संयंत्र को हर वर्ष लगभग 10 लाख मीट्रिक टन CO₂ की आवश्यकता होगी।

  • भारत वर्तमान में हर वर्ष लगभग 1 करोड़ मीट्रिक टन यूरिया आयात करता है।

  • देश के कई मौजूदा यूरिया संयंत्र 30 वर्ष से अधिक पुराने हो चुके हैं, इसलिए नई उत्पादन क्षमता विकसित करना आवश्यक है।

ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को मिलेगा बल

नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर, ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया उत्पादन को एकीकृत करने वाली परियोजनाएं भारत की ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों को मजबूत करेंगी।

NTPC जैसी संस्थाएं, जिनके पास बिजली उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और उर्वरक क्षेत्र का अनुभव है, इन परियोजनाओं के नेतृत्व के लिए उपयुक्त मानी जा रही हैं।

सरकार ने निवेशकों से राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और विकसित हो रहे कार्बन कैप्चर ढांचे का लाभ उठाकर एकीकृत ग्रीन यूरिया परियोजनाएं विकसित करने का आह्वान किया है।

यह पहल भारत को स्वच्छ ऊर्जा आधारित उर्वरक उत्पादन, तकनीकी आत्मनिर्भरता, कार्बन उत्सर्जन में कमी और सतत कृषि की दिशा में एक नई पहचान दिलाने की क्षमता रखती है।

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: भारत में ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल के मानक अधिसूचित

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भारत सरकार ने राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए 27 फरवरी 2026 को भारत के लिए ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल के मानक अधिसूचित किए हैं। ये मानकनवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालयद्वारा जारी किए गए हैं। इन मानकों में उत्सर्जन की सीमा और पात्रता शर्तें निर्धारित की गई हैं, जिन्हें पूरा करने पर अमोनिया और मेथनॉल को “ग्रीन” माना जाएगा, अर्थात् वे नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग करके उत्पादित किए गए हों।

ग्रीन अमोनिया के लिए मानक

भारत के लिए निर्धारित मानक के अनुसार ग्रीन अमोनिया में कुल गैर-जैविक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन—जो ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन, अमोनिया संश्लेषण, शुद्धिकरण, संपीड़न और ऑन-साइट भंडारण से उत्पन्न होता है—0.38 किलोग्राम CO₂ समतुल्य प्रति किलोग्राम अमोनिया (kg CO₂ eq/kg NH₃) से अधिक नहीं होना चाहिए। यह गणना पिछले 12 महीनों के औसत के आधार पर की जाएगी।

ग्रीन मेथनॉल के लिए मानक

इसी प्रकार, ग्रीन मेथनॉल के लिए कुल गैर-जैविक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन—जो ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन, मेथनॉल संश्लेषण, शुद्धिकरण और ऑन-साइट भंडारण से उत्पन्न होता है—0.44 किलोग्राम CO₂ समतुल्य प्रति किलोग्राम मेथनॉल (kg CO₂ eq/kg CH₃OH) से अधिक नहीं होना चाहिए। यह भी पिछले 12 महीनों के औसत के आधार पर निर्धारित किया जाएगा।

कार्बन डाइऑक्साइड के स्रोत

अधिसूचना के अनुसार ग्रीन मेथनॉल के उत्पादन के लिए उपयोग की जाने वाली कार्बन डाइऑक्साइड निम्न स्रोतों से प्राप्त की जा सकती है:

  • जैविक (Biogenic) स्रोत

  • Direct Air Capture (DAC)

  • मौजूदा औद्योगिक स्रोत

मंत्रालय समय-समय पर कार्बन डाइऑक्साइड के पात्र स्रोतों में संशोधन कर सकता है। ऐसे संशोधन भविष्य में लागू होंगे और उपयुक्त ग्रैंडफादरिंग प्रावधानों के साथ लागू किए जाएंगे।

नवीकरणीय ऊर्जा की परिभाषा

ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल के उत्पादन में प्रयुक्त नवीकरणीय ऊर्जा में वह बिजली भी शामिल होगी जो नवीकरणीय स्रोतों से उत्पन्न होकर ऊर्जा भंडारण प्रणाली में संग्रहीत की गई हो या लागू नियमों के अनुसार ग्रिड के साथ बैंक की गई हो।

निगरानी और प्रमाणन

अधिसूचना में यह भी कहा गया है कि मापन, रिपोर्टिंग, निगरानी, ऑन-साइट सत्यापन और प्रमाणन के लिए विस्तृत कार्यप्रणाली नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा अलग से जारी की जाएगी।

पहले से जारी निविदाएँ

अधिसूचना से पहले जारी की गई किसी भी टेंडर, बोली प्रक्रिया या निविदा पर उस समय लागू नियम और शर्तें लागू रहेंगी। हालांकि, यदि संभव हो और दोनों पक्ष सहमत हों, तो ऐसी निविदाओं को नए मानकों के अनुरूप भी बनाया जा सकता है।

उद्योग और निर्यात के लिए महत्व

ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल के मानकों की यह अधिसूचना उद्योग, निवेशकों और अन्य हितधारकों को स्पष्ट दिशा प्रदान करेगी। यह उर्वरक, शिपिंग, बिजली और भारी उद्योग जैसे क्षेत्रों के डीकार्बोनाइजेशन को बढ़ावा देने में सहायक होगी और भारत को ग्रीन ईंधनों के विश्वसनीय उत्पादक और निर्यातक के रूप में मजबूत बनाएगी।

भारतीय ग्रीन हाइड्रोजन डेवलपर्स ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल के लिए निर्यात बाजारों को लक्ष्य बना रहे हैं। इन मानकों के जारी होने से भारत ने नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत ग्रीन हाइड्रोजन और उसके उत्पादों के लिए अपने नियामक ढांचे को और मजबूत किया है।

IREDA ने नववर्ष 2026 के अवसर पर आयोजित किया कर्मचारी मिलन समारोह, नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में सशक्त भूमिका निभाने का संकल्प दोहराया

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इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी लिमिटेड (IREDA) ने 1 जनवरी 2026 को इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में नववर्ष 2026 के उपलक्ष्य में एक विशेष न्यू ईयर गेट-टुगेदर का आयोजन किया। यह आयोजन कर्मचारियों के बीच एकता, सहयोग और नववर्ष में नई ऊर्जा के साथ कार्य करने के संकल्प को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से किया गया।

इस अवसर पर नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के सचिव संतोष कुमार सारंगी, संयुक्त सचिव जे.वी.एन. सुब्रमण्यम, IREDA के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक प्रदीप कुमार दास, निदेशक (वित्त) डॉ. विजय कुमार मोहंती, HUDCO के CMD संजय कुलश्रेष्ठ सहित मंत्रालय और IREDA के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संतोष कुमार सारंगी ने टीम निर्माण के महत्व पर जोर दिया और युवा पेशेवरों को भविष्य के नेतृत्व के लिए तैयार करने की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने IREDA की बढ़ती भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि MSME क्षेत्र, प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना जैसी प्रमुख पहलों के अंतर्गत वित्तीय सहायता को और सुदृढ़ किया जाना आवश्यक है। उन्होंने IREDA की विकास यात्रा में MNRE के निरंतर समर्थन का आश्वासन भी दिया।

इस अवसर पर सभी कर्मचारियों को नववर्ष की शुभकामनाएँ देते हुए IREDA के CMD प्रदीप कुमार दास ने बताया कि 1 जनवरी 2025 को 168 कर्मचारियों की संख्या बढ़कर 2026 में 227 हो गई है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि IREDA में महिला कर्मचारियों की भागीदारी लगभग 23% है, जो केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (CPSEs) के औसत 9.5% से कहीं अधिक है। यह प्रगति सुदृढ़ कॉर्पोरेट गवर्नेंस और वित्तीय अनुशासन के कारण संभव हो सकी है, जिसे आगे भी जारी रखा जाएगा।

दास ने IREDA के मजबूत वित्तीय प्रदर्शन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 31 दिसंबर 2025 (अनंतिम) तक

  • कुल ऋण स्वीकृतियाँ: ₹2,78,016 करोड़

  • कुल ऋण वितरण: ₹1,80,988 करोड़

  • ऋण पुस्तिका (Loan Book): ₹87,975 करोड़ रही है।

उन्होंने वित्त वर्ष 2024–25 में ₹1,699 करोड़ के अब तक के सर्वाधिक शुद्ध लाभ (PAT) तथा S&P ग्लोबल रेटिंग्स द्वारा अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग उन्नयन जैसे महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को भी याद किया।

कार्यक्रम के अंत में निदेशक (वित्त) डॉ. विजय कुमार मोहंती ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कर्मचारियों के सामूहिक प्रयासों की सराहना की और उन्हें उच्च स्तर के शासन, पारदर्शिता और दक्षता बनाए रखने के लिए प्रेरित किया।

यह नववर्ष समारोह IREDA की नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में देश की अग्रणी वित्तीय संस्था के रूप में भूमिका को और मजबूत करने के संकल्प का प्रतीक बना।

भारत में हरित हाइड्रोजन मिशन: उत्पादन बढ़ाने और लागत घटाने के लिए महत्वपूर्ण कदम

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नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) को लागू कर रहा है, जिसका उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन और इसके व्युत्पन्न उत्पादों के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है।

भारत की हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता 2030 तक प्रति वर्ष 5 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँचने की संभावना है।

हरित हाइड्रोजन की लागत को कम करने के लिए NGHM के तहत महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है:

i. इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण के लिए प्रोत्साहन योजना के तहत, 15 कंपनियों को कुल 3,000 मेगावाट प्रति वर्ष की उत्पादन क्षमता के लिए पुरस्कृत किया गया है। कुल प्रोत्साहन राशि ₹4440 करोड़ है।

ii. हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए प्रोत्साहन योजना के तहत, 18 कंपनियों को कुल 8,62,000 टन प्रति वर्ष की उत्पादन क्षमता के लिए पुरस्कृत किया गया है।

iii. रिफाइनरी के लिए हरित हाइड्रोजन की खरीद के लिए प्रोत्साहन योजना के तहत, 2 कंपनियों को कुल 20,000 टन प्रति वर्ष की क्षमता के लिए पुरस्कृत किया गया है।

हरित हाइड्रोजन की लागत को कम करने हेतु उठाए गए अन्य कदम निम्नलिखित हैं:

i. जो हरित हाइड्रोजन/हरित अमोनिया संयंत्र 31.12.2030 तक चालू किए जाते हैं और जो हरित हाइड्रोजन या हरित अमोनिया के उत्पादन के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करते हैं, उन्हें परियोजना के कमीशनिंग की तारीख से 25 वर्षों की अवधि के लिए अंतर-राज्यीय संचरण प्रणाली (ISTS) शुल्क से छूट दी गई है।

ii. SEZ अधिनियम, 2005 की धारा 26 के तहत ड्यूटी लाभ उन इकाइयों को दिए गए हैं जो नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों की स्थापना और संचालन एवं रखरखाव (O&M) के लिए केवल इकाई की स्व-उपभोग हेतु इसका उपयोग करती हैं।

MNRE एक अनुसंधान और विकास परियोजना ‘पेरोव्स्काइट टैंडम सोलर सेल का पैमाना बढ़ाना (Phase-I)’ का समर्थन कर रहा है, जिसका कुल परियोजना खर्च ₹83.19 करोड़ है, ताकि पेरोव्स्काइट टैंडम सोलर सेल तकनीक का पैमाना बढ़ाया जा सके और देश में इसका विकास किया जा सके।

यह जानकारी केंद्रीय राज्य मंत्री, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा, श्रीपाद यसो नाइक ने आज राज्यसभा में लिखित उत्तर में प्रस्तुत की।

भारत ने गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का 50% हासिल किया, MNRE ने सौर निर्माण में आत्मनिर्भरता पर जोर दिया

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भारत ने पहले ही अपने स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से हासिल कर लिया है, जो पेरिस समझौते के तहत अपनी राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्य से पांच साल पहले है।

31 अक्टूबर 2025 तक, गैर-जीवाश्म स्रोतों से स्थापित क्षमता लगभग 259 गीगावाट (GW) है, जिसमें चालू वित्तीय वर्ष (अक्टूबर 2025 तक) में 31.2 GW की नई क्षमता जुड़ी है।

कई जगह यह रिपोर्ट किया जा रहा है कि नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने वित्तीय संस्थानों को नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए नए वित्त पोषण को रोकने का परामर्श जारी किया है, जिससे अत्यधिक अधिशक्ति (overcapacity) को लेकर चिंता जताई जा रही है।

यह स्पष्ट किया जाता है कि MNRE ने किसी भी वित्तीय संस्था को नवीकरणीय ऊर्जा विद्युत परियोजनाओं या नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण निर्माण सुविधाओं के लिए वित्त पोषण रोकने का कोई परामर्श नहीं दिया है।

हालांकि, MNRE ने विभागीय वित्तीय सेवाओं और एनबीएफसी जैसे PFC, REC और IREDA को सौर पीवी (Solar PV) निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों में वर्तमान घरेलू स्थापित उत्पादन क्षमताओं की स्थिति भेजी है, जिसमें सौर मॉड्यूल, अपस्ट्रीम स्तर जैसे सौर सेल, इंट, वेफर, पॉलीसिलिकॉन और सहायक उपकरण जैसे सौर ग्लास और एल्युमिनियम फ्रेम शामिल हैं। इसका उद्देश्य वित्तीय संस्थाओं को प्रस्तावों का मूल्यांकन करते समय संतुलित और सूचित दृष्टिकोण अपनाने में मदद करना है, ताकि वे केवल सौर मॉड्यूल निर्माण तक सीमित न रहें, बल्कि सौर पीवी निर्माण के अपस्ट्रीम स्तर और सहायक उपकरणों में भी अपने पोर्टफोलियो का विस्तार कर सकें।

भारत सरकार सौर पीवी निर्माण में आत्मनिर्भर बनने और देश को वैश्विक मूल्य श्रृंखला में प्रमुख खिलाड़ी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस प्रतिबद्धता को कई पहल के माध्यम से समर्थन प्राप्त है, जिसमें उच्च दक्षता सौर पीवी मॉड्यूल के लिए PLI योजना और भारतीय निर्माताओं के लिए समान अवसर प्रदान करने के उपाय शामिल हैं।

इन पहलों के प्रभाव से सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता में वृद्धि हुई है, जो 2014 में केवल 2.3 GW थी और आज MNRE की Approved List of Models and Manufacturers (ALMM) में लगभग 122 GW तक पहुंच चुकी है। यह वृद्धि भारत के सौर पीवी निर्माण की सफलता और उद्योग, विभिन्न राज्य सरकारों और भारत सरकार के संयुक्त प्रयासों को दर्शाती है।

यह कदम यह भी सुनिश्चित करता है कि भारत 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन घटाने में सार्थक योगदान देने के अपने लक्ष्य की दिशा में अग्रसर है। MNRE भविष्य में भी सौर निर्माण इकोसिस्टम को नीति समर्थन, अवसंरचना विकास और नवाचार के माध्यम से मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। मंत्रालय हितधारकों के साथ लगातार संवाद जारी रखेगा ताकि भारत की सौर ऊर्जा यात्रा समान, प्रतिस्पर्धी और भविष्य-तैयार बनी रहे।

एसईसीआई और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1200 MWh BESS और 50 MW हाइब्रिड सोलर परियोजना के लिए सरकारी आदेशों का आदान-प्रदान किया

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Solar Energy Corporation of India Limited (SECI), जो नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE), भारत सरकार के अंतर्गत एक नवरत्न सीपीएसयू है, ने आज आंध्र प्रदेश सरकार के साथ 1200 MWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के नंद्याल में विकास तथा 50 मेगावाट हाइब्रिड सोलर प्रोजेक्ट के लिए सरकारी आदेशों (GOs) का आदान-प्रदान किया।

यह आदान-प्रदान विशाखापट्टनम में आयोजित आंध्र प्रदेश पार्टनरशिप समिट 2025 के ऊर्जा सत्र के दौरान हुआ, जिसे आंध्र प्रदेश सरकार के उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग ने CII के साथ मिलकर आयोजित किया था।

परियोजना अनुमोदन और कार्यान्वयन

बिजली मंत्रालय ने 23 जनवरी 2025 के आदेश के माध्यम से 1200 MWh BESS परियोजना को मार्केट-बेस्ड ऑपरेशंस मोड के तहत लागू करने के लिए SECI को नामित किया था।

यह परियोजना SECI बोर्ड के अध्यक्ष संतोष कुमार सारंगी द्वारा 22 अक्टूबर 2025 को अनुमोदित की गई। MNRE लगातार दोनों परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा कर रहा है।

CAPEX मोड के तहत परियोजनाओं का विकास करेगा SECI

दोनों—BESS और हाइब्रिड सोलर प्रोजेक्ट—CAPEX मोड में विकसित किए जाएंगे, जिसमें SECI पूरी निवेश ज़िम्मेदारी निभाएगा।

आंध्र प्रदेश के ऊर्जा मंत्री गोट्टिपाटी रवि कुमार ने SECI प्रतिनिधियों को सरकारी आदेश सौंपे। इस अवसर पर आंध्र प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव के. विजयानंद और NREDCAP के उपाध्यक्ष एम. कमलाकर बाबू उपस्थित रहे।

SECI की ओर से शिवकुमार वेंकट वेपाकोंमा और  रोहित चौबे मौजूद थे।

भारत के स्वच्छ ऊर्जा इकोसिस्टम को मजबूती

इन सरकारी आदेशों का आदान-प्रदान आंध्र प्रदेश की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इन परियोजनाओं से—

  • राज्य की ग्रीन एनर्जी स्टोरेज क्षमता बढ़ेगी

  • एक सक्षम और लचीला ग्रीन ग्रिड तैयार होगा

  • भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में तेजी आएगी

SECI ने राज्यों और केंद्र सरकार के साथ मिलकर भारत के ऊर्जा भविष्य को अधिक हरित और सक्षम बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई।


भारत की ग्रीन हाइड्रोजन क्रांति: सतत और आत्मनिर्भर भविष्य की ओर

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  • भारत का लक्ष्य: 2030 तक हर साल 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन
  • भारत का पहला पोर्ट-आधारित ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट व.ओ. चिदंबरनार पोर्ट पर शुरू
  • 10 मार्गों पर 37 हाइड्रोजन वाहनों के साथ मोबिलिटी पायलट लॉन्च
  • मिशन से ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आकर्षित होने और ₹1 लाख करोड़ से अधिक की जीवाश्म ईंधन आयात में कमी की उम्मीद

परिचय

भारत अपनी ऊर्जा परिवर्तन यात्रा के निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है — जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाते हुए स्वदेशी स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ा रहा है। यह भारत के 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने और 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने के विज़न के अनुरूप है। इस परिवर्तन में ग्रीन हाइड्रोजन एक स्वच्छ, टिकाऊ और स्केलेबल ईंधन के रूप में उभर रहा है, जो कठिन-से-कठिन औद्योगिक क्षेत्रों का डीकार्बोनाइजेशन करने में सक्षम है।

भारत सरकार ने 2023 में राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य एक संपूर्ण ग्रीन हाइड्रोजन पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना और इस क्षेत्र में अवसरों व चुनौतियों का समाधान करना है।

मुख्य उद्देश्य

यह मिशन केवल एक ऊर्जा पहल नहीं है, बल्कि औद्योगिक प्रतिस्पर्धा, आयात में कमी और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक रणनीतिक मार्ग है — जो आत्मनिर्भरता के साथ सतत विकास को जोड़ता है।

ग्रीन हाइड्रोजन क्या है?

ग्रीन हाइड्रोजन वह हाइड्रोजन है जो नवीकरणीय ऊर्जा (सौर या पवन ऊर्जा) की मदद से उत्पादित होती है, न कि जीवाश्म ईंधन से। इस प्रक्रिया में जल का विद्युत अपघटन (Electrolysis) करके उसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। यदि इस प्रक्रिया से प्रति किलोग्राम हाइड्रोजन पर अधिकतम 2 किलोग्राम CO₂ समतुल्य उत्सर्जन होता है, तो उसे “ग्रीन” माना जाता है।

ग्रीन हाइड्रोजन को बायोमास (जैसे कृषि अपशिष्ट) से भी बनाया जा सकता है, बशर्ते उत्सर्जन सीमा के भीतर रहे।

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM)

इस मिशन का लक्ष्य 2030 तक भारत को ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में वैश्विक नेता बनाना है।
इसके तहत —

  • 125 GW नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता ग्रीन हाइड्रोजन के लिए समर्पित होगी,

  • ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आएगा,

  • 6 लाख से अधिक रोजगार सृजित होंगे,

  • 50 MMT ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी होगी,

  • और ₹1 लाख करोड़ से अधिक जीवाश्म ईंधन आयात में कमी होगी।

मिशन के चार प्रमुख स्तंभ

  1. नीति और नियामक ढांचा

  2. मांग सृजन

  3. अनुसंधान, नवाचार और विकास (R&D)

  4. इन्फ्रास्ट्रक्चर और पारिस्थितिकी तंत्र विकास

प्रमुख योजनाएँ

(i) SIGHT योजना (Strategic Interventions for Green Hydrogen Transition)

₹17,490 करोड़ के प्रोत्साहन के साथ इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा।

(ii) ग्रीन हाइड्रोजन हब विकास

तीन प्रमुख बंदरगाह —

  • दीendayal (गुजरात)

  • व.ओ. चिदंबरनार (तमिलनाडु)

  • परेदीप (ओडिशा)
    को ग्रीन हाइड्रोजन हब घोषित किया गया है।

(iii) ग्रीन हाइड्रोजन सर्टिफिकेशन योजना (GHCI)

अप्रैल 2025 में लॉन्च की गई यह योजना सुनिश्चित करती है कि केवल नवीकरणीय ऊर्जा से बने, और निर्धारित उत्सर्जन सीमा के भीतर आने वाले हाइड्रोजन को ही “ग्रीन” कहा जाए।
BEE (ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी) इस योजना का नोडल प्राधिकरण है।

(iv) Strategic Hydrogen Innovation Partnership (SHIP)

सरकार और उद्योग के बीच साझेदारी के माध्यम से अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने की पहल।
₹400 करोड़ की आरएंडडी योजना के तहत 23 अग्रणी परियोजनाएँ पहले से चल रही हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग

औद्योगिक क्षेत्र

  • उर्वरक उत्पादन: ₹55.75 प्रति किलोग्राम की दर से 7.24 लाख मीट्रिक टन/वर्ष ग्रीन अमोनिया की आपूर्ति हेतु निविदा जारी।

  • पेट्रोलियम रिफाइनिंग: रिफाइनरियों में जीवाश्म-आधारित हाइड्रोजन के स्थान पर ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग।

  • इस्पात उद्योग: 5 पायलट प्रोजेक्ट शुरू, जिनका उद्देश्य हाइड्रोजन-आधारित इस्पात उत्पादन की तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन है।

परिवहन क्षेत्र

  • सड़क परिवहन: 10 मार्गों पर 37 हाइड्रोजन वाहनों (बस और ट्रक) के साथ पायलट प्रोजेक्ट — ₹208 करोड़ का निवेश।

  • शिपिंग: व.ओ. चिदंबरनार पोर्ट पर भारत का पहला पोर्ट-आधारित ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट (₹25 करोड़)।

  • उच्च ऊँचाई मोबिलिटी: एनटीपीसी द्वारा लेह (3,650 मीटर) में विश्व का सबसे ऊँचा ग्रीन हाइड्रोजन मोबिलिटी प्रोजेक्ट।

कौशल विकास और वैश्विक सहयोग

  • अब तक 5,600 से अधिक प्रशिक्षुओं को हाइड्रोजन क्षेत्र में प्रमाणित किया गया है।

  • EU-India, UK-India और Germany (H2Global) के साथ साझेदारी के तहत तकनीकी सहयोग और निर्यात अवसरों का विस्तार।

  • Singapore के साथ ग्रीन हाइड्रोजन हब के विकास हेतु MoU साइन।

निष्कर्ष: स्वच्छ विकास की दिशा में अग्रसर भारत

  • ग्रीन हाइड्रोजन भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन का केंद्र है।
  • राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन न केवल देश की ऊर्जा स्वतंत्रता को सुदृढ़ करता है, बल्कि वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा नेतृत्व की दिशा में भारत की स्थिति को भी मजबूत करता है।

यह मिशन भारत को एक सतत, सुरक्षित और आत्मनिर्भर भविष्य की ओर ले जा रहा है।


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