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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा मंत्रालय में सैन्य और असैन्य एकीकरण को और मजबूत करने पर दिया जोर

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नई दिल्ली- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय सशस्त्र बल जब अधिक संयुक्तता (Jointness) की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में रक्षा मंत्रालय के सैन्य एवं असैन्य (सिविल) घटकों के बीच बेहतर समन्वय और गहरा एकीकरण अत्यंत आवश्यक है। इससे बदलती सुरक्षा और तकनीकी चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सकेगा तथा संस्थागत अनुभव, स्थिरता और नियमों के बेहतर अनुपालन को भी सुनिश्चित किया जा सकेगा।

नई दिल्ली में 85वें सशस्त्र बल मुख्यालय (AFHQ) सिविलियन सर्विसेज दिवस समारोह को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि वर्दीधारी और सिविल सेवाएं दोनों ही "राष्ट्र प्रथम" की भावना से कार्य करती हैं। जब लक्ष्य एक होता है, तो व्यवस्था का प्रत्येक अंग राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित हो जाता है।

उन्होंने कहा कि सैन्य और प्रशासनिक एकीकरण अलग-अलग रास्तों पर नहीं चल सकते। जैसे-जैसे संयुक्त और एकीकृत संरचनाएं विकसित होंगी, नीति निर्माण, प्रशासन, मानव संसाधन प्रबंधन, वित्तीय प्रक्रियाओं, लॉजिस्टिक्स तथा संस्थागत ज्ञान जैसे क्षेत्रों में निरंतरता और विशेषज्ञता की आवश्यकता और बढ़ेगी।

रक्षा मंत्री ने सैन्य और सिविल अधिकारियों के बीच संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा क्रॉस-एक्सपोजर को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सैन्य अधिकारी युद्ध संचालन और कमान का अनुभव लेकर आते हैं, जबकि सिविल अधिकारी प्रशासनिक निरंतरता, नीतिगत अनुभव, सरकारी प्रक्रियाओं की समझ और संस्थागत स्मृति प्रदान करते हैं। इन दोनों की संयुक्त क्षमता निर्णय प्रक्रिया को अधिक संतुलित, प्रभावी और सशक्त बनाती है।

साइबर युद्ध और रक्षा अनुसंधान पर विशेष जोर

राजनाथ सिंह ने साइबर युद्ध (Cyber Warfare) का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि AFHQ सिविलियन सर्विसेज के अधिकारी अपनी विशेषज्ञता का उपयोग कर रक्षा क्षेत्र के लिए विशेष साइबर उपकरण विकसित करें, तो यह सशस्त्र बलों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।

उन्होंने भारतीय सैन्य इतिहास के अध्ययन के लिए एक विशेष मंच विकसित करने का भी सुझाव दिया, जहां सिविल दृष्टिकोण से अध्ययन कर नए विचार और रणनीतिक सोच विकसित की जा सके। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि AFHQ सिविलियन सर्विसेज अपनी विशेषज्ञता के माध्यम से रक्षा क्षेत्र में और अधिक सार्थक योगदान दे सकती है।

"रक्षा प्रबंधन का रणनीतिक मस्तिष्क बने AFHQ"

रक्षा मंत्री ने AFHQ सिविलियन सर्विसेज से आह्वान किया कि वह भारत की रक्षा प्रबंधन व्यवस्था का "रणनीतिक मस्तिष्क (Strategic Brain)" बने। इसके लिए रक्षा क्षेत्र की व्यापक समझ विकसित करनी होगी, संयुक्त वातावरण में प्रभावी ढंग से कार्य करना होगा तथा उभरती चुनौतियों के अनुरूप अपनी विशेषज्ञता को निरंतर बढ़ाना होगा।

उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध तकनीकी नवाचारों पर आधारित है, इसलिए अब केवल सेवा नियमों और आदेशों के पालन तक सीमित रहने के बजाय रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान, भू-रणनीतिक सोच और नवाचार पर भी विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

उन्होंने कहा, "किसी भी सेना की शक्ति केवल उसके हथियारों और गोला-बारूद से नहीं, बल्कि उन हजारों अदृश्य हाथों से भी आती है जो हर समय उसके साथ खड़े रहते हैं। AFHQ सिविलियन सर्विसेज भी ऐसी ही एक महत्वपूर्ण और निर्णायक शक्ति है।"

कई डिजिटल पहल की शुरुआत

समारोह के दौरान रक्षा मंत्री ने संयुक्त सचिव एवं मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (JS & CAO) कार्यालय की कई डिजिटल पहलों तथा संशोधित विजन एवं मिशन स्टेटमेंट का शुभारंभ किया। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—

  • इंटरनेट आधारित आवास प्रबंधन प्रणाली (IBAMS) पोर्टल।

  • eHRMS का TULIP 2.0 प्रणाली से एकीकरण।

  • वेतन एवं भत्तों के ऑनलाइन प्रसंस्करण हेतु CAO कार्यालय का TULIP 2.0 से एकीकरण।

  • स्मार्ट परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट रिकॉर्डिंग ऑनलाइन विंडो (SPARROW) पोर्टल पर ऑनबोर्डिंग।

इस अवसर पर रक्षा मंत्री ने 'संवाद' पत्रिका के 34वें अंक का भी विमोचन किया, जिसमें सेवा मुख्यालयों एवं अंतर-सेवा संगठनों में कार्यरत कर्मचारियों द्वारा लिखे गए यात्रा-वृत्तांत, निबंध, लेख और कविताएं प्रकाशित की गई हैं।

उन्होंने खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले AFHQ कर्मियों तथा शैक्षणिक उपलब्धियां हासिल करने वाले कर्मचारियों के बच्चों को सम्मानित भी किया।

कार्यक्रम में रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एन. एस. राजा सुब्रमणि, नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन, थल सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह सहित रक्षा मंत्रालय के अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

AFHQ दिवस का महत्व

हर वर्ष 1 अगस्त को AFHQ दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य रक्षा मंत्रालय के तीनों एकीकृत सेवा मुख्यालयों, मुख्यालय इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ तथा 24 अंतर-सेवा संगठनों में कार्यरत उन असैन्य कर्मचारियों के योगदान को सम्मान देना है, जो सशस्त्र बलों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की रक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। AFHQ कैडर की स्थापना 1 अगस्त 1942 को की गई थी।


रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘कलाम एंड कवच 3.0’ में आत्मनिर्भरता और संयुक्तता पर दिया जोर

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा— “किसी भी राष्ट्र की शक्ति इस बात पर निर्भर करेगी कि उसकी सेना, प्रयोगशालाएं और उद्योग कितनी तेजी से एक साथ सोच और काम कर सकते हैं,” उन्होंने आत्मनिर्भरता और जॉइंटनेस के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि उभरती सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए रणनीतिक स्वायत्तता आवश्यक है। वे 14 मई 2026 को नई दिल्ली स्थित मानेकशॉ सेंटर में आयोजित रक्षा रणनीतिक संवाद “कलाम एंड कवच 3.0” के दौरान वीडियो संदेश के माध्यम से नीति निर्माताओं, सैन्य नेतृत्व, रक्षा उद्योग, राजनयिकों, स्टार्टअप्स, अकादमिक जगत और रणनीतिक विशेषज्ञों को संबोधित कर रहे थे।

रक्षा मंत्री ने कहा कि आने वाले समय का युद्धक्षेत्र उन लोगों का साथ देगा जो विचार, प्रोटोटाइप और उसके वास्तविक उपयोग के बीच के समय को कम कर सकेंगे। उन्होंने वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों, चल रहे संघर्षों, साइबर खतरों, आपूर्ति-श्रृंखला की कमजोरियों और हाइब्रिड युद्ध के नए स्वरूपों को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को पुराने सिद्धांतों पर आधारित नहीं रखा जा सकता।

उन्होंने आत्मनिर्भरता को केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता बताया और कहा कि जो देश महत्वपूर्ण रक्षा क्षमताओं के लिए दूसरों पर अत्यधिक निर्भर रहता है, वह संकट के समय असुरक्षित हो जाता है। उन्होंने कहा कि प्रमुख प्रणालियों को देश के अपने पारिस्थितिकी तंत्र में ही विकसित, उत्पादित, मेंटेन और अपग्रेड करना होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक युद्ध अब साइलो में काम नहीं करता, बल्कि भूमि, समुद्र, वायु, साइबर और अंतरिक्ष—इन सभी क्षेत्रों में समन्वय की आवश्यकता है, साथ ही प्रयोगशालाओं, उद्योगों, स्टार्टअप्स, नीति-निर्माताओं और सैन्य संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग जरूरी है।

उद्घाटन संबोधन में रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने “कलाम एंड कवच” को एक ऐसा मंच बताया जहाँ विचार राष्ट्रीय उद्देश्य के साथ मिलते हैं। उन्होंने कहा कि “कलाम” ज्ञान, विज्ञान और नवाचार का प्रतीक है, जबकि “कवच” सुरक्षा और राष्ट्र रक्षा का प्रतिनिधित्व करता है।

उन्होंने बदलते युद्ध परिदृश्य का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के खतरे पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़ चुके हैं और पूर्वानुमान आधारित तैयारी आवश्यक है। उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत JAI (Jointness, Aatmanirbharta & Innovation) की अवधारणा को भारत की भविष्य की सुरक्षा संरचना का आधार बताया।

उन्होंने हालिया ऑपरेशनल उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए “ऑपरेशन सिंदूर” को भारत की क्षमताओं का उदाहरण बताया और कहा कि यह आत्मनिर्भर प्रणालियों, तेज प्रतिक्रिया और संयुक्त सैन्य समन्वय का प्रतीक है।

उन्होंने बताया कि पिछले दशक में भारत का रक्षा निर्यात ₹686 करोड़ से बढ़कर ₹38,424 करोड़ तक पहुंच गया है, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा उत्पादन ₹1.54 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। सरकार का लक्ष्य 2029-30 तक ₹50,000 करोड़ रक्षा निर्यात और ₹3 लाख करोड़ रक्षा उत्पादन हासिल करना है।

एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने अपने विशेष संबोधन में स्वदेशी नवाचार को भारत की रणनीतिक भविष्य सुरक्षा का आधार बताया।

“कलाम एंड कवच 3.0” में AI आधारित युद्ध, स्वायत्त प्रणाली, हाइपरसोनिक तकनीक, क्वांटम C4ISR, रक्षा उत्पादन विस्तार और रणनीतिक साझेदारियों जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम में रक्षा मंत्रालय, सशस्त्र बलों, वैज्ञानिकों, उद्योग जगत, स्टार्टअप्स और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की भागीदारी रही।

भारतीय नौसेना का प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए दीर्घ दूरी प्रशिक्षण तैनाती पर रवाना

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भारतीय नौसेना के प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (First Training Squadron – 1TS) के जहाज — आईएनएस तिर, शार्दुल, सुजाता और आईसीजीएस सारथी — 110वें एकीकृत अधिकारी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम (Integrated Officers’ Training Course – IOTC) के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के अंतर्गत दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए दीर्घ दूरी प्रशिक्षण तैनाती (Long Range Training Deployment – LRTD) पर प्रस्थान करेंगे।

इस तैनाती के तहत स्क्वाड्रन सिंगापुर, इंडोनेशिया और थाईलैंड में बंदरगाह यात्राएं करेगा। इस तैनाती का उद्देश्य अधिकारी प्रशिक्षुओं को व्यापक परिचालन और अंतर-सांस्कृतिक अनुभव प्रदान करना है, साथ ही भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ तथा मुक्त, खुले और समावेशी हिंद महासागर क्षेत्र की परिकल्पना के अनुरूप दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ भारत की सतत समुद्री सहभागिता को सुदृढ़ करना है।

इन बंदरगाह यात्राओं के दौरान मेजबान नौसेनाओं और समुद्री एजेंसियों के साथ विभिन्न पेशेवर संवाद, प्रशिक्षण अभ्यास और सहयोगात्मक गतिविधियाँ आयोजित की जाएंगी। इनमें संरचित प्रशिक्षण आदान-प्रदान, क्रॉस-डेक विज़िट, विषय विशेषज्ञों के साथ संवाद और संयुक्त समुद्री साझेदारी अभ्यास शामिल होंगे।

इन गतिविधियों का उद्देश्य आपसी संचालनात्मक समन्वय (इंटरऑपरेबिलिटी), पारस्परिक विश्वास और समझ को और अधिक मजबूत करना है, साथ ही समुद्र में श्रेष्ठ प्रथाओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।

110वें एकीकृत अधिकारी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में छह अंतरराष्ट्रीय अधिकारी प्रशिक्षु भी शामिल हैं, जो मित्र देशों के कार्मिकों के क्षमता निर्माण और व्यावसायिक प्रशिक्षण के प्रति भारतीय नौसेना की सतत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

इसके अतिरिक्त, इस तैनाती के लिए भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना के कार्मिक भी जहाजों पर सवार हैं, जिससे तीनों सेनाओं के बीच संयुक्तता और आपसी समन्वय को और अधिक मजबूती मिलेगी।

यह दीर्घ दूरी प्रशिक्षण तैनाती प्रशिक्षण उत्कृष्टता पर भारतीय नौसेना के विशेष जोर को रेखांकित करती है, साथ ही क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा के लिए समुद्री कूटनीति, सद्भावना और सहयोगात्मक दृष्टिकोण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।



त्रि-सेवा एकता और “ऑपरेशन सिंदूर” पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का संबोधन

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ऑपरेशन सिंदूर के दौरान त्रि-सेवा सहयोग ने एक संयुक्त, वास्तविक समय में संचालित ऑपरेशनल तस्वीर तैयार की। इससे कमांडरों को समय पर निर्णय लेने की शक्ति मिली, स्थिति की समझ बेहतर हुई और मित्रविनाश (fratricide) का जोखिम कम हुआ। यह संयुक्त कार्यप्रणाली का जीवंत उदाहरण है और इसकी सफलता को भविष्य के सभी अभियानों के लिए मानक बनाना चाहिए,” ऐसा कहा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 30 सितंबर 2025 को नई दिल्ली स्थित सुब्रतो पार्क में भारतीय वायुसेना द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में।

उन्होंने भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) की भी महत्वपूर्ण भूमिका उजागर की, जो भारतीय सेना के आकाशतीर और भारतीय नौसेना के त्रिगुण के साथ मिलकर ऑपरेशन के दौरान एक मजबूत संयुक्त संचालन आधार तैयार करता है।

संगोष्ठी का उद्देश्य

संगोष्ठी का विषय था –

‘Fostering Greater Jointness - Synergy through Shared Learning in the domain of Inspection and Audits, Aviation Standards and Aerospace Safety’,
जो भारत की सशस्त्र सेनाओं में गहन एकीकरण को अपनाने और आधुनिक युद्ध की मांगों के अनुरूप रक्षा तैयारियों को अधिकतम करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि युद्ध का बदलता स्वरूप और परंपरागत एवं गैर-पारंपरिक खतरों की जटिलता संयुक्त कार्यप्रणाली को केवल विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बनाती है। उन्होंने स्पष्ट किया:

“संयुक्तता आज हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा और संचालन क्षमता के लिए मूलभूत आवश्यकता बन गई है। जबकि हमारी सेवाओं में स्वतंत्र रूप से प्रतिक्रिया देने की क्षमता है, भूमि, समुद्र, वायु, अंतरिक्ष और साइबरस्पेस की परस्पर जुड़ी प्रकृति में सहयोगी शक्ति ही वास्तविक सफलता की गारंटी है।”

उन्होंने हाल ही में कोलकाता में आयोजित कंबाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस का स्मरण कराया, जहाँ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी त्रि-सेवा संयुक्तता और एकीकरण की महत्ता पर जोर दिया। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह सरकार की स्पष्ट प्रतिबद्धता को दर्शाता है कि हमारी सेनाएँ मानवीय मूल्य और परंपराओं में श्रेष्ठ होने के साथ-साथ भविष्य-तैयार प्रणालियों की अग्रणी भी हों।

डिजिटल और लॉजिस्टिक सुधार

रक्षा मंत्री ने सैनिकों के लॉजिस्टिक्स प्रबंधन में डिजिटल सुधार की सराहना की। उन्होंने निम्नलिखित प्रणालियों का उदाहरण दिया:

  • सेना का कम्प्यूटरीकृत इन्वेंट्री कंट्रोल ग्रुप (CICG)

  • वायुसेना की इंटीग्रेटेड मटेरियल मैनेजमेंट ऑनलाइन सिस्टम (IMMOLS)

  • नौसेना की इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट सिस्टम

उन्होंने घोषणा की कि त्रि-सेवा लॉजिस्टिक्स एप्लीकेशन पर कार्य शुरू हो गया है, जो इन प्रणालियों को एकीकृत कर साझा स्टॉक दृश्यता, संसाधनों का अनुकूलन और गैर-आवश्यक खरीद को कम करेगा।

अनुभव और ज्ञान का साझा करना

रक्षा मंत्री ने कहा कि दशकों से प्रत्येक सेवा ने अपने भौगोलिक और ऑपरेशनल अनुभव के आधार पर निरीक्षण और ऑडिट प्रणाली विकसित की है, लेकिन यह ज्ञान अक्सर एक ही सेवा तक सीमित रह गया।

“यदि सेना ने कुछ विकसित किया, तो वह केवल सेना तक सीमित रहा। यदि नौसेना या वायुसेना ने कुछ विकसित किया, तो वह केवल उनकी सेवा में ही रहा। इस प्रकार मूल्यवान अनुभवों का क्रॉस-शेयरिंग सीमित रहा।”

उन्होंने कहा कि आज के सुरक्षा माहौल में इस सीमितकरण को समाप्त कर खुला साझा सीखने और सहयोग की संस्कृति अपनाना आवश्यक है।

संयुक्त कार्यप्रणाली और एकीकृत मानक

रक्षा मंत्री ने चेताया कि एविएशन सुरक्षा और साइबर युद्ध जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मानकों में भिन्नता खतरनाक हो सकती है।

“निगरानी में मामूली त्रुटि भी व्यापक प्रभाव पैदा कर सकती है। अगर हमारी साइबर सुरक्षा प्रणालियाँ सेवाओं के बीच अलग हैं, तो विरोधी इसका फायदा उठा सकते हैं। हमें इन कमजोरियों को दूर करने के लिए मानकों का सामंजस्य स्थापित करना होगा।”

साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एकीकरण के दौरान प्रत्येक सेवा की विशिष्टता का सम्मान किया जाएगा।

मानसिकता और नेतृत्व परिवर्तन

रक्षा मंत्री ने कहा कि संयुक्तता केवल संरचनात्मक सुधार नहीं बल्कि मानसिकता में बदलाव भी मांगती है।

“हमें संवाद, समझ और परंपराओं के सम्मान के माध्यम से इन बाधाओं को पार करना होगा। प्रत्येक सेवा को महसूस होना चाहिए कि अन्य सेवाएँ उनकी चुनौतियों को समझती हैं।”

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं का अध्ययन करने और उन्हें भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और आवश्यकताओं के अनुसार अपनाने का आह्वान किया।

सरकार की प्रतिबद्धता

रक्षा मंत्री ने कहा कि सरकार हर संभव तरीके से त्रि-सेवा संयुक्तता को समर्थन देगी और सभी सेवाओं तथा संस्थाओं जैसे ICG, BSF और DGCA को इस दिशा में निर्णायक कदम उठाने का निर्देश दिया।

“केवल जब हमारी सशस्त्र सेनाएँ एक साथ, सामंजस्यपूर्ण और पूर्ण समन्वय में कार्य करेंगी, तभी हम सभी क्षेत्रों में विरोधियों का मुकाबला कर सकेंगे और भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जा सकेंगे।”

संगोष्ठी के प्रमुख निष्कर्ष

  • निरीक्षण प्रक्रियाओं में अधिक समानता की आवश्यकता

  • सेवा के बीच अंतर-संचालन क्षमता (interoperability) बढ़ाने के अवसरों की खोज

  • संयुक्त एयरोस्पेस सुरक्षा के लिए साझा दृष्टिकोण का महत्व

  • विशेषज्ञता के आदान-प्रदान और सहयोग को बढ़ावा देना

संगोष्ठी ने अधिक सहयोग और अनुभव साझा करने की दिशा में एक प्रमुख कदम के रूप में समापन किया।

उपस्थिति

संगोष्ठी में उपस्थित प्रमुख गणमान्य व्यक्ति:

  • चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान

  • नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी

  • वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह

  • निदेशक जनरल (निरीक्षण और सुरक्षा) एयर मार्शल मकरंद रानडे

  • ICG, BSF, DGCA के वरिष्ठ अधिकारी एवं पूर्व सैनिक

रक्षा मंत्री ने संगोष्ठी से पहले टेरेरियल आर्मी के निदेशक जनरल लेफ्टिनेंट जनरल राजू बैजल को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिनका निधन उसी दिन हुआ।

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