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जल जीवन मिशन 2.0 के तहत यूपी के साथ अहम MoU

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ग्रामीण पेयजल प्रबंधन में संरचनात्मक सुधारों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, जल जीवन मिशन (JJM) 2.0 के तहत उत्तर प्रदेश राज्य के साथ एक सुधार-आधारित समझौता ज्ञापन (MoU) आज हस्ताक्षरित किया गया। इसके साथ ही राज्य ने मिशन के सुधार-आधारित कार्यान्वयन ढांचे में औपचारिक रूप से प्रवेश किया। जल जीवन मिशन 2.0 को 10 मार्च 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी दी गई थी।

यह MoU केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल की उपस्थिति में हस्ताक्षरित हुआ, जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कार्यक्रम में शामिल हुए। जल शक्ति राज्य मंत्री वी. सोमन्ना तथा उत्तर प्रदेश के जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।

यह MoU जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग (DDWS) की संयुक्त सचिव (जल) स्वाति मीणा नाइक और उत्तर प्रदेश सरकार के नमामि गंगे एवं ग्रामीण जल आपूर्ति विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अनुराग श्रीवास्तव के बीच हस्ताक्षरित और आदान-प्रदान किया गया।

इस अवसर पर DDWS के सचिवअशोक के. के. मीणा, अतिरिक्त सचिव एवं राष्ट्रीय जल जीवन मिशन (NJJM) के मिशन निदेशक कमल किशोर सोअन, यूपी जल निगम के प्रबंध निदेशक डॉ. राज शेखर सहित कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि जल जीवन मिशन 2.0 अब सुनिश्चित सेवा वितरण, जवाबदेही और दीर्घकालिक स्थिरता पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं और इनका समय पर उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के प्रति सरकार की शून्य-सहनशीलता नीति को भी दोहराया।

मंत्री ने बताया कि SBI रिसर्च के अनुसार, जल जीवन मिशन के तहत लगभग 9 करोड़ महिलाओं को रोजाना पानी लाने के कठिन कार्य से राहत मिली है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अध्ययन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सुरक्षित पेयजल की सार्वभौमिक पहुंच से प्रतिदिन करीब 5.5 करोड़ घंटे की बचत हो सकती है और दस्त से होने वाली लगभग 4 लाख वार्षिक मौतों को रोका जा सकता है।

उन्होंने जल संरक्षण और जन भागीदारी पर भी जोर देते हुए कहा कि जल संचय, वर्षा जल संचयन और स्रोत की स्थिरता पर समान ध्यान देना आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जल जीवन मिशन से पहले राज्य के बहुत कम गांवों में पाइप से पेयजल उपलब्ध था। उन्होंने विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों का उल्लेख किया और बताया कि अब स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता सुविधाओं के कारण मृत्यु दर लगभग शून्य के करीब आ गई है।

उन्होंने यह भी कहा कि स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों में पेयजल और शौचालय सुविधाएं उपलब्ध होने से छात्राओं के ड्रॉपआउट में कमी आई है। राज्य सरकार अब नियमित और गुणवत्तापूर्ण जल आपूर्ति सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

इस MoU में 11 प्रमुख सुधार क्षेत्रों को शामिल किया गया है, जिनमें पेयजल प्रबंधन की संस्थागत संरचना, तकनीकी अनुपालन, जल गुणवत्ता, डिजिटल डेटा प्रबंधन, जन भागीदारी, क्षमता निर्माण और वित्तीय स्थिरता शामिल हैं।

MoU के तहत ग्राम पंचायत आधारित, सेवा-उन्मुख और समुदाय केंद्रित जल प्रबंधन मॉडल को लागू किया जाएगा। साथ ही, पूर्ण हो चुकी योजनाओं को “जल अर्पण” प्रक्रिया के तहत ग्राम पंचायतों और समुदायों को सौंपा जाएगा।

इसमें डिजिटल योजना प्लेटफॉर्म (DSS), “जल सेवा आंकलन”, “मेरी पंचायत” ऐप और “जल उत्सव” जैसे अभियानों का भी प्रावधान है। राष्ट्रीय जल महोत्सव 2026 की शुरुआत 8 मार्च 2026 को हुई और यह 22 मार्च 2026 (विश्व जल दिवस) तक चलेगा।

जल जीवन मिशन को दिसंबर 2028 तक बढ़ाया गया है, जिसका उद्देश्य हर ग्रामीण घर तक पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित पेयजल की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना है, साथ ही जन भागीदारी और संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से दीर्घकालिक जल सुरक्षा को मजबूत करना है।

यह पहल ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार और “विकसित भारत @2047” के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

NH-160A हाईवे परियोजना को मंजूरी, 3,320 करोड़ रुपये की लागत से महाराष्ट्र में सड़क नेटवर्क को बड़ी मजबूती

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCEA) ने महाराष्ट्र में घोटी–त्र्यंबकेश्वर (मोखाडा)–जवाहर–मनोऱ–पालघर खंड (NH-160A) के पुनर्वास और उन्नयन परियोजना को मंजूरी दे दी है। इस परियोजना की कुल लंबाई 154.635 किलोमीटर है और इसकी कुल पूंजीगत लागत 3,320.38 करोड़ रुपये है।

यह परियोजना इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) मोड पर लागू की जाएगी।

नासिक और मुंबई क्षेत्र को मिलेगा वैकल्पिक मार्ग

नासिक के पश्चिमी क्षेत्र, विशेषकर अंबाड और सतपुर औद्योगिक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में उद्योग इकाइयाँ हैं, जिससे भारी मालवाहक यातायात उत्पन्न होता है। वर्तमान में यह यातायात नासिक शहर से होकर गुजरता है, जिससे शहरी सड़कों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।

NH-160A के उन्नयन से औद्योगिक क्षेत्रों को त्र्यंबकेश्वर के माध्यम से वैकल्पिक मार्ग मिलेगा, जिससे नासिक शहर में यातायात जाम में कमी आएगी।

4-लेन हाईवे और बेहतर कनेक्टिविटी

  • वर्ष 2028 के बाद इस कॉरिडोर पर यातायात 10,000 PCU प्रतिदिन से अधिक होने का अनुमान है, जिससे इसे 4-लेन हाईवे में विकसित किया जाएगा।

  • त्र्यंबकेश्वर से पालघर और मनोऱ तक का मार्ग दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, NH-48 और पश्चिमी तटीय क्षेत्रों को जोड़ेगा।

  • शहरी क्षेत्रों में यातायात को सुगम बनाने के लिए मनोऱ–पालघर खंड को 4-लेन किया जाएगा।

PM गति शक्ति योजना के तहत विकास

यह परियोजना पीएम गति शक्ति सिद्धांतों के अनुरूप प्रस्तावित है और महाराष्ट्र में:

  • 6 आर्थिक नोड्स

  • 7 सामाजिक नोड्स

  • 8 लॉजिस्टिक्स नोड्स
    को जोड़ेगी।
    इससे देश के लॉजिस्टिक परफॉर्मेंस इंडेक्स (LPI) में भी सुधार होगा।

आर्थिक विकास और रोजगार को बढ़ावा

इस परियोजना से:

  • यात्रा समय में कमी आएगी

  • वाहन परिचालन लागत घटेगी

  • आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास होगा

  • क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा

परियोजना से लगभग:

  • 19.98 लाख व्यक्ति-दिन का प्रत्यक्ष रोजगार

  • 24.86 लाख व्यक्ति-दिन का अप्रत्यक्ष रोजगार
    उत्पन्न होने का अनुमान है।

परियोजना का विवरण

  • परियोजना नाम: घोटी–त्र्यंबकेश्वर–जवाहर–मनोऱ–पालघर (NH-160A) उन्नयन

  • कुल लंबाई: 154.635 किमी

  • कुल लागत: ₹3,320.38 करोड़

  • मोड: EPC

  • प्रमुख एक्सप्रेसवे कनेक्शन: दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, समृद्धि महामार्ग

  • प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग: NH-848, NH-48

  • प्रमुख शहर: त्र्यंबकेश्वर, जवाहर, मनोऱ, पालघर, मुंबई, नासिक


प्रधानमंत्री ने असम को दी बड़ी सौगात: काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर का भूमि पूजन, विकास और संरक्षण का अद्भुत संगम

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज असम के कालियाबोर में लगभग ₹6,950 करोड़ की लागत से बनने वाले काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना (एनएच-715 के कालियाबोर–नुमालीगढ़ खंड के 4-लेनिंग कार्य) का भूमि पूजन किया। इस अवसर पर विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने लोगों के स्नेह और आशीर्वाद के लिए आभार व्यक्त किया तथा कहा कि काजीरंगा की यात्रा हमेशा उन्हें विशेष आनंद और आत्मीयता से भर देती है।

प्रधानमंत्री ने काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में अपने पूर्व प्रवास को याद करते हुए कहा कि यहां बिताया गया समय उनके जीवन के सबसे यादगार क्षणों में से एक रहा है। हाथी सफारी के दौरान उन्होंने काजीरंगा की प्राकृतिक सुंदरता को बहुत निकट से अनुभव किया था। उन्होंने असम को वीरों की धरती बताते हुए कहा कि यहां के लोग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने हाल ही में गुवाहाटी में आयोजित बागुरुंबा द्वौ उत्सव का उल्लेख करते हुए कहा कि 10,000 से अधिक कलाकारों की ऊर्जा, खाम की लय और सिफुंग की मधुर ध्वनि ने पूरे देश को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने बोडो समाज की बेटियों सहित सभी कलाकारों को इस ऐतिहासिक प्रस्तुति के लिए बधाई दी और सोशल मीडिया व मीडिया के योगदान की भी सराहना की।

विकास भी, विरासत भी का सशक्त उदाहरण

प्रधानमंत्री ने कहा कि असम में लगातार हो रहे विकास कार्य सरकार के “विकास भी, विरासत भी” के संकल्प को सशक्त करते हैं। उन्होंने हाल ही में गुवाहाटी एयरपोर्ट के नए टर्मिनल और नामरूप में अमोनिया-यूरिया संयंत्र की आधारशिला का भी उल्लेख किया।

कालियाबोर के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह वही भूमि है जहां से वीर योद्धा लाचित बोरफुकन ने मुगलों के विरुद्ध रणनीति बनाई थी। आज वही कालियाबोर आधुनिक कनेक्टिविटी और विकास का केंद्र बन रहा है।

काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर: पर्यावरण और प्रगति का संतुलन

प्रधानमंत्री ने बताया कि 86 किलोमीटर लंबी इस परियोजना में 35 किलोमीटर का एलिवेटेड वाइल्डलाइफ कॉरिडोर शामिल है, जिससे वाहन ऊपर से गुजरेंगे और नीचे वन्यजीवों की निर्बाध आवाजाही बनी रहेगी। यह परियोजना गैंडों, हाथियों और बाघों के पारंपरिक मार्गों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष कम होगा, सड़क सुरक्षा बढ़ेगी और यात्रा समय घटेगा।

यह परियोजना नागांव, कार्बी आंगलोंग और गोलाघाट जिलों से होकर गुजरेगी तथा अपर असम, विशेषकर डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया की कनेक्टिविटी को मजबूती देगी। जाखलबंधा और बोकाखाट में बाइपास निर्माण से शहरी यातायात सुगम होगा और लोगों के जीवन की गुणवत्ता बेहतर होगी।

रेल कनेक्टिविटी को नई गति

कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने दो नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों को हरी झंडी दिखाई—गुवाहाटी (कामाख्या)–रोहतक और डिब्रूगढ़–लखनऊ (गोमती नगर)। इसके साथ ही गुवाहाटी–कोलकाता वंदे भारत स्लीपर ट्रेन की घोषणा भी की गई। इन सेवाओं से उत्तर पूर्व और उत्तर भारत के बीच संपर्क मजबूत होगा, व्यापार, शिक्षा और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।

प्रधानमंत्री ने बताया कि पिछले वर्षों में असम के लिए रेल बजट में पांच गुना वृद्धि की गई है, जिससे नई रेल लाइनें, दोहरीकरण और विद्युतीकरण संभव हुआ है।

प्रकृति संरक्षण और पर्यटन को बढ़ावा

प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार के प्रयासों से 2025 में एक भी गैंडे के अवैध शिकार की घटना नहीं हुई, जो असम की बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने “वन दुर्गा” जैसी पहलों और आधुनिक निगरानी व्यवस्था की सराहना की। साथ ही कहा कि प्रकृति के संरक्षण से पर्यटन बढ़ा है और स्थानीय युवाओं को होमस्टे, गाइड सेवा और हस्तशिल्प के माध्यम से रोजगार मिल रहा है।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री ने कहा कि असम और पूरा उत्तर पूर्व अब विकास की मुख्यधारा में मजबूती से जुड़ चुका है। काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं यह प्रमाण हैं कि भारत आज दुनिया को दिखा रहा है कि अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी साथ-साथ आगे बढ़ सकती हैं। अंत में उन्होंने असमवासियों को इन ऐतिहासिक परियोजनाओं के लिए बधाई दी।

इस अवसर पर असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, पबित्र मार्गेरिटा सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

भारत के सेतु: इंजीनियरिंग कौशल, संकल्प और कनेक्टिविटी की मिसाल

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उफनती नदियों, गहरी खाइयों और अशांत समुद्रों के ऊपर फैले भारत के पुल देश की इंजीनियरिंग महत्वाकांक्षा के मूक साक्षी हैं। ये केवल शहरों और क्षेत्रों को ही नहीं, बल्कि लोगों, संस्कृतियों और अर्थव्यवस्थाओं को भी जोड़ते हैं—अक्सर उन स्थानों पर, जहाँ भौगोलिक परिस्थितियों ने लंबे समय तक अलगाव तय किया था। भारत भर में पुल रोज़मर्रा की ज़िंदगी को ऐसे आकार देते हैं, जिन पर हम अक्सर ध्यान नहीं देते। ये उन दूरियों को कम करते हैं जिन्हें पार करने में कभी कई दिन लगते थे, दूर-दराज़ के इलाकों तक पहुँच खोलते हैं और प्रकृति की कठोरतम चुनौतियों का सामना करते हैं। देशभर में फैले असंख्य पुलों में से कुछ प्रमुख पुल भारत की अवसंरचना के पैमाने और दृष्टि को विशेष रूप से दर्शाते हैं। हर पुल की अपनी कहानी है—साहसी डिज़ाइन, कठिन मौसम और दुर्गम भूभाग पर विजय पाने के मानव संकल्प की कहानी।

भारत की कनेक्टिविटी को परिभाषित करने वाले पुल

अटल बिहारी वाजपेयी सेवरी–न्हावा शेवा अटल सेतु

अरब सागर के ऊपर शहर के कैनवास पर खिंची एक साहसी रेखा की तरह फैला अटल सेतु, जिसे मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक (MTHL) भी कहा जाता है, मुंबई के लिए ट्रैफिक और समय की सीमाओं से मुक्त भविष्य की ओर बड़ा कदम है। इसे मुंबई के द्वीपीय शहर पर पड़ने वाले भारी यातायात दबाव को कम करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। उन्नत निर्माण और सुरक्षा प्रणालियों से निर्मित यह पुल खाड़ी के पार तेज़ और सुरक्षित मार्ग प्रदान करता है, जिससे दुर्घटनाओं का जोखिम घटता है और यात्रियों का दैनिक सफ़र बेहतर होता है।
परिवहन से आगे, MTHL ने मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा दिया है तथा व्यापार और उद्योग की कनेक्टिविटी सुदृढ़ कर स्थानीय अर्थव्यवस्था के विकास में योगदान दिया है। समुद्र के ऊपर 16.5 किलोमीटर और ज़मीन पर 5.5 किलोमीटर की लंबाई के साथ, ₹17,843 करोड़ की लागत से स्वीकृत यह परियोजना भारत का सबसे लंबा समुद्री पुल है। कोविड-19 महामारी जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों के बावजूद, परियोजना समय पर पूरी हुई।

चेनाब ब्रिज

चेनाब ब्रिज के पूर्ण होने के साथ भारत की इंजीनियरिंग क्षमता ने नया शिखर छू लिया है। यह दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे आर्च ब्रिज है और देश के इंजीनियरों व श्रमिकों की दक्षता और प्रतिबद्धता का प्रमाण माना जाता है। दुर्गम भूभाग, चरम मौसम और पहाड़ों से गिरते पत्थरों जैसी कठिन चुनौतियों के कारण इसका निर्माण अत्यंत कठिन था।

जहाँ लाखों लोग एफिल टॉवर देखने पेरिस जाते हैं, वहीं चेनाब ब्रिज उससे 35 मीटर ऊँचा खड़ा है—इसे एक महत्वपूर्ण अवसंरचनात्मक परिसंपत्ति के साथ-साथ उभरते पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित करता है। चेनाब नदी से 359 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह पुल उधमपुर–श्रीनगर–बारामुला रेल लिंक (USBRL) का अहम हिस्सा है। वंदे भारत ट्रेनों के संचालन से क

टरा से श्रीनगर का सफ़र लगभग तीन घंटे में पूरा हो सकेगा।
1,315 मीटर लंबी स्टील आर्च संरचना 260 किमी/घंटा तक की हवा झेलने में सक्षम है और इसकी अनुमानित आयु 120 वर्ष है। ₹1,486 करोड़ की लागत से बना यह पुल भारत की महत्वाकांक्षा, तकनीकी उत्कृष्टता और उन्नत अवसंरचना क्षमताओं का प्रतीक है।

नया पंबन ब्रिज

रामेश्वरम को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला नया पंबन ब्रिज भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट रेलवे समुद्री पुल है और वैश्विक मंच पर आधुनिक भारतीय अवसंरचना का सशक्त प्रतीक बनकर उभरा है। ₹700 करोड़ से अधिक की लागत से निर्मित 2.07 किमी लंबे इस पुल में 72.5 मीटर का वर्टिकल लिफ्ट सेक्शन है, जो 17 मीटर ऊपर उठ सकता है—इससे जहाज़ बिना ट्रेन रोके सुरक्षित निकल सकते हैं।
निर्माण के दौरान उग्र समुद्री परिस्थितियाँ, तेज़ हवाएँ, चक्रवात, भूकंपीय जोखिम और सीमित ज्वार-खिड़कियों में भारी सामग्री की ढुलाई जैसी चुनौतियाँ सामने आईं। नवोन्मेषी इंजीनियरिंग और उन्नत तकनीक के ज़रिये समुद्र में 1,400 टन से अधिक फैब्रिकेशन, लिफ्ट-स्पैन लॉन्च, 99 गर्डर तथा ट्रैक और विद्युतीकरण कार्य बिना किसी दुर्घटना के पूरे किए गए।

स्टेनलेस सुदृढ़ीकरण, उच्च-प्रदर्शन सुरक्षात्मक कोटिंग और पूर्ण वेल्डेड जॉइंट्स के साथ यह पुल अधिक टिकाऊ है और रखरखाव कम होगा। भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए दूसरी रेलवे लाइन की व्यवस्था भी की गई है। कठोर तटीय परिस्थितियों से बचाव के लिए विशेष पॉलीसिलॉक्सेन फिनिश दी गई है।

ढोला–सादिया ब्रिज

ढोला–सादिया ब्रिज, जिसे भूपेन हजारिका सेतु भी कहा जाता है, असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह उत्तरी असम और पूर्वी अरुणाचल प्रदेश के बीच पहला स्थायी सड़क संपर्क प्रदान करता है। बीम ब्रिज के रूप में निर्मित यह पुल ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदी लोहित के ऊपर से होकर गुजरता है और तिनसुकिया जिले के ढोला को उत्तर में सादिया से जोड़ता है।

9.15 किलोमीटर लंबा यह पुल 60 टन तक के सैन्य टैंकों—भारतीय सेना के अर्जुन और टी-72 सहित—का भार सहन करने में सक्षम है, जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है।

अंजी खड्ड ब्रिज

अंजी खड्ड ब्रिज हिमालयी परिदृश्य में अद्वितीय सौंदर्य और पैमाने के साथ उभरता है। यह भारत का पहला केबल-स्टे रेल पुल है और उधमपुर–श्रीनगर–बारामुला रेल लाइन के कटरा–बनिहाल खंड की एक प्रमुख कड़ी है। जम्मू से लगभग 80 किलोमीटर दूर, बर्फ़ से ढकी चोटियों की पृष्ठभूमि में स्थित यह पुल अंजी नदी घाटी से 331 मीटर ऊपर उठता है और 725 मीटर की खाई को पार करता है।
इसकी पहचान 193 मीटर ऊँचे उल्टे Y-आकार के पाइलन से है, जिसे 96 उच्च-तन्यता केबल्स सहारा देती हैं। 8,200 मीट्रिक टन से अधिक संरचनात्मक स्टील इसे भूकंपीय गतिविधियों के प्रति सक्षम बनाता है।

निर्माण के दौरान चर्टी लाइमस्टोन संरचनाएँ और अस्थिर मलबा जैसी कठिन भू-स्थितियाँ सामने आईं। पर्वतीय पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए व्यापक ढलान-स्थिरीकरण उपाय अपनाए गए। तकनीकी उत्कृष्टता से परे, केवल 11 महीनों में पूर्ण हुआ यह पुल दृढ़ संकल्प और दूरदृष्टि का प्रतीक है। कश्मीर घाटी को शेष भारत से जोड़ने वाली इस रेल कड़ी के तहत यह यात्रा दक्षता बढ़ाएगा, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी मजबूत करेगा और नए आर्थिक अवसर खोलेगा।

निष्कर्ष

भारत के पुल केवल अवसंरचना नहीं, बल्कि इरादों की घोषणा हैं—ऐसे देश को जोड़ते हुए जिसकी पहचान विशालता और विविधता से है। ये पहाड़ों से उठते हैं, मानसूनी बादलों को चीरते हैं और उपमहाद्वीप के सबसे उग्र जल पर तैरते से प्रतीत होते हैं। देश के हर कोने में फैले पुल भारत की गति और संकल्प को प्रतिबिंबित करते हैं।
असम में ब्रह्मपुत्र पर बने बोगीबील और नए सरायघाट पुल सड़क और रेल—दोनों को वहन कर कनेक्टिविटी मजबूत करते हैं। बिहार का दीघा–सोनपुर पुल गंगा पर अपने रेल-सह-सड़क डिज़ाइन से आवागमन बढ़ाता है। इनके साये में नवाचार, धैर्य और उन जटिल भूदृश्यों की कहानियाँ छिपी हैं जिन्हें जीतने का साहस किया गया।
ये पुल अर्थव्यवस्थाओं को रूपांतरित करते हैं, नक्शों को नया आकार देते हैं और लोगों के चलने-बसने व सपने देखने के तरीक़े को पुनर्कल्पित करते हैं। हर नया स्पैन केवल इंजीनियरिंग प्रगति नहीं, बल्कि सीमाओं—क्षेत्र, समय और इतिहास—से आगे बढ़ने की राष्ट्रीय इच्छाशक्ति का प्रतीक है। जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ता है, उसके पुल देश की गतिशीलता के सबसे सशक्त प्रतीक बने रहेंगे—हमेशा आगे बढ़ते हुए, हमेशा अपना रास्ता स्वयं बनाते हुए।

बिहार को मिली नई सौगात: साहेबगंज-अरेराज-बेतिया NH-139W परियोजना को मिली मंजूरी

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आज आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग-139W के साहेबगंज-अरेराज-बेतिया खंड को 4-लेन बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। यह परियोजना हाइब्रिड एन्‍युइटी मोड (HAM) पर विकसित की जाएगी, जिसकी कुल लंबाई 78.942 किमी और कुल पूंजी लागत ₹3,822.31 करोड़ होगी।

प्रस्तावित 4-लेन ग्रीनफील्ड परियोजना का उद्देश्य राज्य की राजधानी पटना को बेतिया से जोड़ते हुए उत्तर बिहार के जिलों वैशाली, सारण, सिवान, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण और पश्चिम चंपारण तक, भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र तक बेहतर संपर्क प्रदान करना है। यह परियोजना लंबी दूरी के माल परिवहन को समर्थन देगी, प्रमुख अवसंरचना तक पहुँच को सुगम बनाएगी और कृषि क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों एवं सीमा-पार व्यापार मार्गों से संपर्क सुधारकर क्षेत्रीय आर्थिक विकास को गति देगी।

यह परियोजना 7 पीएम गति शक्ति आर्थिक नोड्स, 6 सामाजिक नोड्स, 8 लॉजिस्टिक नोड्स और 9 प्रमुख पर्यटन एवं धार्मिक केंद्रों को जोड़ेगी। इसके माध्यम से बिहार की प्रमुख धरोहरों और बौद्ध पर्यटन स्थलों तक पहुँच सुधरेगी, जिनमें केसरिया बुद्ध स्तूप (साहेबगंज), सोमेश्वरनाथ मंदिर (अरेराज), जैन मंदिर और विश्व शांति स्तूप (वैशाली) तथा महावीर मंदिर (पटना) शामिल हैं। इससे बौद्ध परिपथ (Buddhist Circuit) और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन की संभावनाएँ मजबूत होंगी।

एनएच-139W को उच्च गति वाले कनेक्टिविटी मार्ग के रूप में विकसित किया जाएगा, जो वर्तमान में जामग्रस्त और ज्यामितीय रूप से कमजोर वैकल्पिक मार्गों का स्थान लेगा। यह परियोजना एनएच-31, एनएच-722, एनएच-727, एनएच-27 और एनएच-227A से महत्वपूर्ण संपर्क प्रदान करेगी।

प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एलाइनमेंट औसतन 80 किमी/घंटा की वाहन गति को समर्थन देगा (डिजाइन गति 100 किमी/घंटा है)। इससे साहेबगंज से बेतिया के बीच की यात्रा अवधि 2.5 घंटे से घटकर मात्र 1 घंटा रह जाएगी। यह यात्री और माल वाहनों के लिए तेज, सुरक्षित और निर्बाध कनेक्टिविटी सुनिश्चित करेगा।

78.94 किमी लंबी इस प्रस्तावित परियोजना से करीब 14.22 लाख मानव-दिवस का प्रत्यक्ष रोजगार और 17.69 लाख मानव-दिवस का अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न होगा। परियोजना के आस-पास आर्थिक गतिविधि बढ़ने से अतिरिक्त रोजगार अवसर भी पैदा होंगे।

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