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संयुक्त राष्ट्र में भारत ने अधिकार-आधारित, समावेशी और जन-केंद्रित विकास दृष्टिकोण को किया रेखांकित

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भारत ने संयुक्त राष्ट्र में “कोपेनहेगन से दोहा तक सामाजिक विकास के दूसरे विश्व शिखर सम्मेलन के परिणामों का उपयोग” विषय पर हुई चर्चा के दौरान अधिकार-आधारित, समावेशी और जन-केंद्रित विकास दृष्टिकोण को रेखांकित किया। भारत की ओर से वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर ने कहा कि सामाजिक न्याय भारत के विकसित भारत@2047 के राष्ट्रीय विज़न का केंद्रबिंदु है।

मंत्री ने स्मरण कराया कि कोपेनहेगन घोषणा ने विकास के केंद्र में लोगों को रखा था और दोहा राजनीतिक घोषणा ने उभरती वैश्विक चुनौतियों के बीच इस प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की। उन्होंने कहा कि भारत का शासन दर्शन “सबका साथ, सबका विकास” संपूर्ण सरकार और संपूर्ण समाज के दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य सभी के लिए गरिमा, समानता और अवसर सुनिश्चित करना है।

सावित्री ठाकुर ने भारत की व्यापक सामाजिक सुरक्षा और समावेशन पहलों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि:

  • 800 मिलियन से अधिक लोग खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के अंतर्गत कवर हैं

  • 550 मिलियन से अधिक नागरिकों को स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों के नेटवर्क के माध्यम से निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएँ मिल रही हैं

  • 16,000 जन औषधि/जन आरोग्य केंद्रों के माध्यम से सस्ती दवाएँ और चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं

  • 14.5 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि स्थानीय शासन में कार्यरत हैं, जो जमीनी स्तर पर लोकतंत्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है

  • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और सुकन्या समृद्धि योजना जैसी प्रमुख योजनाएँ बालिकाओं की शिक्षा और वित्तीय सुरक्षा को सशक्त बना रही हैं

  • श्रम सुधारों के माध्यम से समान वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को बढ़ावा दिया जा रहा है

  • बिना जमानत के ऋण की बड़े पैमाने पर उपलब्धता से लाखों महिलाओं, उद्यमियों और रेहड़ी-पटरी वालों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा गया है

  • SMILE जैसी लक्षित योजनाएँ ट्रांसजेंडर व्यक्तियों और अन्य कमजोर वर्गों के पुनर्वास और समावेशन में सहायता कर रही हैं

उन्होंने यह भी कहा कि भारत की विकास यात्रा में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और नागरिक सहभागिता का समावेश है, जिससे पारदर्शिता और अंतिम छोर तक लाभ की सुनिश्चित डिलीवरी संभव हो पाई है।

भारत की सभ्यतागत भावना “वसुधैव कुटुंबकम” — संपूर्ण विश्व एक परिवार है — को दोहराते हुए मंत्री ने सामाजिक न्याय को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने के लिए साझेदारियों को मजबूत करने और अपने विकास अनुभव साझा करने की भारत की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

इस सत्र में संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य देशों की सक्रिय भागीदारी देखी गई।

सत्र के बाद,सावित्री ठाकुर ने स्वीडन सरकार की सामाजिक सेवा मंत्री, महामहिम कैमिला वाल्टरसन ग्रोनवॉल से शिष्टाचार भेंट भी की।


विश्व ध्यान दिवस समारोह में उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने ध्यान की वैश्विक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज तेलंगाना के कान्हा शांति वनम में आयोजित विश्व ध्यान दिवस समारोह में भाग लिया और आंतरिक शांति, भावनात्मक कल्याण तथा सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने में ध्यान की कालातीत प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।

सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि ध्यान एक सार्वभौमिक अभ्यास है, जो सांस्कृतिक, भौगोलिक और धार्मिक सीमाओं से परे है। उन्होंने इसे मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक स्थिरता और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग बताया तथा कहा कि विश्व ध्यान दिवस आधुनिक जीवन में इसकी बढ़ती महत्ता को पहचानने का अवसर प्रदान करता है।

उपराष्ट्रपति ने 21 दिसंबर को विश्व ध्यान दिवस घोषित करने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव को सह-प्रायोजित करने में भारत की भूमिका का उल्लेख करते हुए इसे मानसिक कल्याण और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देने की ध्यान की शक्ति की वैश्विक स्वीकृति बताया। उन्होंने ध्यान के वैश्विक प्रसार में दाजी के योगदान की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि ध्यान, योग और आध्यात्मिक खोज की सदियों पुरानी परंपराओं के साथ भारत आज भी दुनिया को स्थायी ज्ञान प्रदान कर रहा है।

भारत की सभ्यतागत विरासत पर प्रकाश डालते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि भारत में ध्यान को लंबे समय से मन और आत्मा के प्राचीन विज्ञान के रूप में माना गया है, जिसे ऋषि-मुनियों ने पोषित किया। भगवद् गीता और तमिल आध्यात्मिक ग्रंथ तिरुमंतिरम की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ध्यान के माध्यम से मन पर नियंत्रण आंतरिक सामंजस्य, आत्म-साक्षात्कार और नैतिक जीवन की ओर ले जाता है।

उपराष्ट्रपति ने विकसित भारत@2047 की यात्रा में ध्यान की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय विकास में केवल आर्थिक प्रगति ही नहीं, बल्कि भावनात्मक कल्याण और आध्यात्मिक उत्थान भी शामिल होना चाहिए, और ध्यान शांतिपूर्ण, सशक्त तथा करुणामय समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

मिशन LiFE के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि ध्यान सजगता, उत्तरदायित्व और प्रकृति के साथ सामंजस्य जैसे मूल्यों को विकसित करता है, जो सतत जीवन के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार प्रथाओं को अपनाने और समग्र कल्याण को बढ़ावा देने के लिए कान्हा शांति वनम की सराहना की।

नागरिकों से दैनिक जीवन में ध्यान को अपनाने का आह्वान करते हुए राधाकृष्णन ने व्यक्तियों, परिवारों और समुदायों से उदाहरण प्रस्तुत करने तथा भावी पीढ़ियों को मानसिक शांति, संतुलन और सामंजस्य को बढ़ावा देने वाली प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रेरित करने का आग्रह किया।

तेलंगाना के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा; तेलंगाना सरकार के मंत्री डी. श्रीधर बाबू; हार्टफुलनेस ध्यान के आध्यात्मिक मार्गदर्शक दाजी कमलेश डी. पटेल सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति तथा हजारों प्रतिभागी, जिन्होंने कान्हा शांति वनम में ध्यान सत्र में भाग लिया, इस समारोह में उपस्थित थे।

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