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अमेरिका से 2.2 MTPA एलपीजी आयात हेतु भारत का ऐतिहासिक अनुबंध: ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम

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एक ऐतिहासिक उपलब्धि में, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आज घोषणा की कि भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने अनुबंध वर्ष 2026 के लिए अमेरिका के गल्फ कोस्ट से लगभग 2.2 एमटीपीए एलपीजी आयात के लिए एक वर्ष का संरचित अनुबंध सफलतापूर्वक कर लिया है। यह भारत के वार्षिक एलपीजी आयात का लगभग दस प्रतिशत है और भारतीय बाजार के लिए अमेरिका से होने वाला पहला ऐसा संरचित एलपीजी अनुबंध है। मंत्री ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए कहा कि दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते एलपीजी बाजारों में से एक अब संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए खुल गया है।

मंत्री ने बताया कि भारत किफायती और भरोसेमंद एलपीजी आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लगातार अपने स्रोतों में विविधता ला रहा है। इसी प्रयास के तहत, इंडियनऑयल, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) के अधिकारियों की एक टीम 21 से 24 जुलाई 2025 तक संयुक्त राज्य अमेरिका गई थी, जहाँ उन्होंने प्रमुख अमेरिकी उत्पादकों से बातचीत की। माउंट बेलवियू को एलपीजी खरीद का बेंचमार्क मानते हुए ये वार्ताएँ सफलतापूर्वक पूरी हुईं और अनुबंध को अंतिम रूप दिया गया।

पुरी ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पीएसयू तेल कंपनियों ने देशभर में घर–घर तक सबसे कम वैश्विक कीमतों पर एलपीजी उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया है। पिछले वर्ष वैश्विक एलपीजी कीमतों में 60% से अधिक वृद्धि होने के बावजूद उज्ज्वला लाभार्थियों को अब भी लगभग ₹500–550 में सिलेंडर मिल रहे थे, जबकि वास्तविक लागत ₹1100 से अधिक थी। भारत सरकार ने इस आर्थिक बोझ को वहन करते हुए केवल पिछले वर्ष ही ₹40,000 करोड़ से अधिक राशि खर्च की, ताकि विशेषकर माताओं और बहनों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों की वृद्धि से सुरक्षित रखा जा सके।

मंत्री ने जोर देकर कहा कि 2026 के लिए यह नया सोर्सिंग अरेंजमेंट भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है, जिससे करोड़ों परिवारों तक स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन की सस्ती उपलब्धता सुनिश्चित होगी।

भारत–दक्षिण कोरिया समुद्री साझेदारी को नई गति: हरदीप सिंह पुरी का रणनीतिक दौरा

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केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आज दक्षिण कोरिया के जियोजे स्थित हैंवा ओशियन (Hanwha Ocean) के विस्तृत जहाज निर्माण परिसर का दौरा किया।

यह दौरा 13–15 नवंबर 2025 तक कोरिया गणराज्य में मंत्री की चल रही औपचारिक यात्राओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका उद्देश्य समुद्री सहयोग को गहरा करना तथा जहाज निर्माण, बेड़े के विकास और ऊर्जा परिवहन में नई साझेदारियों को बढ़ावा देना है। ये प्रयास भारत की मैरिटाइम अमृत काल विज़न 2047 का प्रमुख हिस्सा हैं, जिसके तहत भारत की वाणिज्यिक जहाज बेड़े की क्षमता में बड़ी वृद्धि, घरेलू शिपबिल्डिंग अवसंरचना का विस्तार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सुधार का लक्ष्य रखा गया है।

हैंवा ओशियन की यात्रा के दौरान मंत्री को कंपनी की जहाज निर्माण क्षमताओं, उन्नत जहाज निर्माण प्रक्रियाओं और समुद्री प्रौद्योगिकी नवाचारों की जानकारी दी गई।मंत्री पुरी ने कहा कि भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र की तीव्र वृद्धि साझेदारी के बड़े अवसर तैयार कर रही है। उन्होंने बताया कि भारत की ऊर्जा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ प्रतिवर्ष लगभग 5–8 अरब अमेरिकी डॉलर का माल भाड़ा खर्च करती हैं, और तुरंत लगभग 59 जहाजों की आवश्यकता है। यह वैश्विक कंपनियों, जैसे हैंवा ओशियन, के लिए भारत में जहाज निर्माण साझेदारी का बड़ा अवसर है।

मंत्री ने कहा कि जहाँ दक्षिण कोरिया के पास जहाज निर्माण की तकनीकी विशेषज्ञता है, वहीं भारत के पास मजबूत मांग, कुशल कार्यबल और सक्षम नीतिगत ढांचा है। उन्होंने मेक इन इंडिया पहल को रेखांकित करते हुए कहा कि यह सहयोग मॉडल न केवल भारत की घरेलू आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है, बल्कि वैश्विक बाजारों के लिए भी जहाजों के निर्माण को बढ़ावा दे सकता है। उन्होंने दोहराया कि सहयोग के तहत निर्मित जहाज पाँच वर्षों में लागत वसूल करने में सक्षम होंगे और भारत को वैश्विक समुद्री केंद्र के रूप में स्थापित करेंगे।

उन्होंने आगे बताया कि भारत सरकार ने घरेलू शिपबिल्डिंग को प्रोत्साहित करने के लिए कई मजबूत नीतिगत उपाय लागू किए हैं—

  • भारत में निर्मित जहाजों पर 15–25% पूंजी सहायता,

  • जहाज पुनर्चक्रण गतिविधियों के लिए अतिरिक्त 5% प्रोत्साहन,

  • इक्विटी फंडिंग के लिए मरीन डेवलपमेंट फंड,

  • 3% ब्याज सबवेंशन योजना,

  • नए ग्रीनफील्ड शिपयार्ड और समुद्री क्लस्टरों के लिए आधारभूत संरचना सहायता।

उन्होंने कहा कि ये प्रोत्साहन जहाज निर्माताओं और निवेशकों के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं और भारत की दीर्घकालिक समुद्री आत्मनिर्भरता रणनीति के अनुरूप हैं।

हैंवा ओशियन के यार्ड दौरे से पहले मंत्री ने सियोल में कंपनी के अध्यक्ष और सीईओ किम ही-चुल से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं ने जहाज निर्माण और समुद्री प्रौद्योगिकियों में सहयोग तथा भारत के शिपबिल्डिंग लक्ष्यों में योगदान देने वाले संभावित निवेशों पर चर्चा की।

अपनी कोरिया यात्रा के दौरान मंत्री पुरी ने देश की प्रमुख शिपिंग कंपनियों के प्रमुखों से भी गहन चर्चा की, जिनमें शामिल थे—

  • कोरिया ओशन बिज़नेस कॉरपोरेशन (KOBC) के सीईओ आन ब्यंग गिल,

  • एसके शिपिंग के सीईओ किम सुंग इक,

  • एच-लाइन शिपिंग के सीईओ सियो म्युंग डिओक,

  • पैन ओशन के वाइस प्रेसिडेंट सुंग जे योंग।

इस दौरान मंत्री पुरी ने कहा कि जहाज निर्माण तकनीक में कोरिया की अग्रणी भूमिका और भारत का मजबूत विनिर्माण आधार तथा लागत लाभ, दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारियों के लिए मजबूत नींव प्रदान करते हैं।

मंत्री ने कल उल्सान स्थित अत्याधुनिक HD Hyundai Heavy Industries के 1,680 एकड़ में फैले विश्व के सबसे बड़े शिपयार्ड का भी दौरा किया। उन्होंने कहा कि भारत, एक बड़े ऊर्जा आयातक के रूप में, हर वर्ष भारी मालभाड़ा खर्च करता है और भारतीय पीएसयू अकेले ही 59 कच्चे तेल, एलएनजी और एथेन जहाजों की खरीद कर सकते हैं।

इसके अलावा मंत्री ने सेओंगनाम स्थित कंपनी के ग्लोबल R&D सेंटर में HD Hyundai के चेयरमैन चुंग की-सुन से भी मुलाकात की, जहाँ उन्नत जहाज डिजाइन और स्मार्ट शिपयार्ड संचालन प्रणालियों की जानकारी दी गई।

दक्षिण कोरिया की यह यात्रा भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है कि वह जहाज निर्माण और शिपिंग में वैश्विक नेताओं के साथ मजबूत समुद्री साझेदारियाँ स्थापित करना चाहता है, जिससे भारत की बेड़े की क्षमता, समुद्री अवसंरचना और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।


भारत का ऊर्जा और नौवहन क्षेत्र राष्ट्रीय विकास के सशक्त स्तंभ: ‘इंडिया मैरीटाइम वीक 2025’ में बोले केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी

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पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मुंबई में आयोजित ‘रिवाइटलाइजिंग इंडिया’s मैरीटाइम मैन्युफैक्चरिंग कॉन्फ्रेंस’ को संबोधित किया, जो इंडिया मैरीटाइम वीक 2025 का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि भारत की तीव्र आर्थिक वृद्धि ऊर्जा और नौवहन क्षेत्रों की प्रगति से गहराई से जुड़ी हुई है, जो राष्ट्रीय विकास के दो सशक्त स्तंभ हैं।

मंत्री ने बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और वर्तमान में जीडीपी लगभग 4.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के आसपास है। इसमें से लगभग आधा हिस्सा निर्यात, आयात और प्रेषण जैसी बाह्य गतिविधियों से आता है, जो यह दर्शाता है कि भारत की आर्थिक प्रगति में व्यापार — और इसलिए नौवहन — कितना महत्वपूर्ण है।

ऊर्जा क्षेत्र के बारे में बोलते हुए मंत्री पुरी ने कहा कि भारत वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 5.6 मिलियन बैरल कच्चे तेल का उपभोग करता है, जो साढ़े चार साल पहले 5 मिलियन बैरल था। मौजूदा वृद्धि दर पर, देश जल्द ही 6 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच जाएगा। उन्होंने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, आने वाले दो दशकों में वैश्विक ऊर्जा मांग में होने वाली वृद्धि का लगभग 30 प्रतिशत योगदान भारत से होगा, जो पहले 25 प्रतिशत का अनुमान था। यह बढ़ती ऊर्जा आवश्यकता स्वाभाविक रूप से भारत की जहाजरानी की मांग को भी बढ़ाएगी, ताकि तेल, गैस और अन्य ऊर्जा उत्पादों को दुनिया भर में पहुंचाया जा सके।

मंत्री ने जानकारी दी कि 2024–25 के दौरान भारत ने लगभग 300 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए और 65 मिलियन मीट्रिक टन का निर्यात किया। तेल और गैस क्षेत्र भारत के कुल व्यापार के लगभग 28 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, जो बंदरगाहों द्वारा संभाले जाने वाला सबसे बड़ा एकल वस्तु क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि भारत वर्तमान में अपनी 88% कच्चे तेल और 51% गैस की आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए नौवहन उद्योग कितना आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि माल ढुलाई (फ्रेट) की लागत कुल आयात बिल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां (OMCs) अमेरिका से कच्चा तेल लाने में लगभग 5 डॉलर प्रति बैरल और मध्य पूर्व से 1.2 डॉलर प्रति बैरल का भुगतान करती हैं। पिछले पाँच वर्षों में IOCL, BPCL और HPCL जैसी भारतीय सार्वजनिक उपक्रम कंपनियों ने जहाज चार्टर करने पर लगभग 8 बिलियन डॉलर खर्च किए हैं — जो भारतीय स्वामित्व वाले नए टैंकरों के एक बेड़े के निर्माण के बराबर राशि है।

मंत्री पुरी ने बताया कि भारत के व्यापारिक माल का केवल 20 प्रतिशत हिस्सा ही भारतीय ध्वज या भारतीय स्वामित्व वाले जहाजों द्वारा ले जाया जाता है। उन्होंने कहा कि यह भारत के लिए एक चुनौती के साथ-साथ एक अवसर भी है — जहाज निर्माण और स्वामित्व क्षमता बढ़ाने का। सरकार PSU कार्गो मांग को एकत्रित करने, Ship Owning and Leasing (SOL) मॉडल को बढ़ावा देने, Maritime Development Fund के माध्यम से जहाजों के लिए सस्ती वित्त व्यवस्था उपलब्ध कराने और Shipbuilding Financial Assistance Policy 2.0 लागू करने जैसे कदम उठा रही है, जिसमें LNG, एथेन और प्रोडक्ट टैंकरों के लिए अधिक समर्थन दिया जाएगा।

मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 11 वर्षों में भारत के नौवहन क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं। बंदरगाह क्षमता 2014 में 872 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष से बढ़कर 1,681 मिलियन मीट्रिक टन हो गई है, जबकि माल ढुलाई 581 मिलियन टन से बढ़कर लगभग 855 मिलियन टन हो गई है। उन्होंने कहा कि कार्यकुशलता में भी सुधार हुआ है — जहाजों के टर्नअराउंड समय में 48% की कमी और निष्क्रिय समय में 29% की कमी आई है। सागरमाला कार्यक्रम के तहत बंदरगाहों के आधुनिकीकरण और तटीय क्षेत्रों को जोड़ने के लिए 5.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं शुरू की गई हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के कोचीन शिपयार्ड, मझगांव डॉक, जीआरएसई कोलकाता, एचएसएल विशाखापत्तनम और गोवा व गुजरात के निजी शिपयार्ड अब विश्व-स्तरीय जहाज बना रहे हैं। कोचीन शिपयार्ड, एलएंडटी और डेऊ (Daewoo) के बीच LNG और एथेन कैरियर्स के लिए साझेदारी और मित्सुई OSK लाइन्स जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ सहयोग से भारत के शिपयार्डों में उन्नत तकनीक लाई जा रही है।

उन्होंने कहा कि जहाज निर्माण उद्योग को लंबे समय तक चलने वाली योजना और स्थिर आदेशों की आवश्यकता होती है ताकि ढांचा और कुशल जनशक्ति बनी रहे। चूंकि कई वैश्विक शिपयार्ड अगले छह वर्षों तक बुक हैं, भारत को उन्हें निवेश करने और देश में ही जहाज बनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

भविष्य की ओर देखते हुए उन्होंने कहा कि 2047 तक भारत का समुद्री क्षेत्र लगभग ₹8 ट्रिलियन का निवेश आकर्षित करेगा और करीब 1.5 करोड़ रोजगार के अवसर सृजित करेगा। उन्होंने यह भी बताया कि भारत India–Middle East–Europe Economic Corridor और International North–South Transport Corridor जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक व्यापार मार्गों को आकार देने में एक प्रमुख भूमिका निभा रहा है, जो भारतीय बंदरगाहों को यूरोप, मध्य एशिया और अफ्रीका से जोड़ता है।

अपने संबोधन का समापन करते हुए  मंत्री पुरी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपने महासागरों को बाधा नहीं बल्कि विकास और समृद्धि के मार्ग के रूप में देखता है। देश बंदरगाहों का आधुनिकीकरण कर रहा है, अधिक जहाज बना रहा है, हरित नौवहन को बढ़ावा दे रहा है और युवाओं के लिए रोजगार सृजित कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक साझेदारों के साथ मिलकर समुद्री क्षेत्र को विकसित और आत्मनिर्भर भारत के प्रमुख प्रेरक बल के रूप में आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।

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