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खेत बना आय का केंद्र, नवाचार ने बदली खेती की तस्वीर

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युवा किसान अंकित लकड़ा ने मछली पालन, मुर्गी पालन और बागवानी को जोड़कर तैयार किया एकीकृत कृषि मॉडल

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मिली 8 लाख रुपये की अनुदान सहायता, दो तालाबों में मछली पालन के साथ 1,000 से 1,200 मुर्गियों का कर रहे पालन

रायपुर- खेती में बदलाव केवल नई तकनीक से नहीं, बल्कि नई सोच से भी आता है। जशपुर जिले के ग्राम रतबा के युवा किसान अंकित लकड़ा ने इस बात को अपनी मेहनत और नवाचार से साबित किया है। कभी केवल बारिश के भरोसे धान की खेती करने वाले अंकित ने आज अपने खेत को मछली पालन, मुर्गी पालन, बागवानी और बहुफसली खेती से जोड़कर आय के कई स्रोत तैयार कर लिए हैं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में किसानों को कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों से जोड़कर उनकी आय के अवसर बढ़ाने के लिए संचालित योजनाओं का लाभ अंकित को भी मिला है। योजनाओं से मिली सहायता और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने पारंपरिक खेती को आधुनिक और बहुआयामी कृषि मॉडल में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

धान की खेती से शुरू हुआ सफर, अब खेत में कई गतिविधियां

अंकित लकड़ा बताते हैं कि पहले वे मुख्य रूप से बरसात के मौसम में धान की खेती करते थे। खेती से होने वाली आय को बढ़ाने के लिए उन्होंने कृषि और मत्स्य विभाग से जानकारी ली। इसके बाद उन्होंने अपने खेत में दो तालाब तैयार कराए और मछली पालन शुरू किया।

तालाब बनने के बाद उनके खेत की तस्वीर ही बदल गई। तालाब के पानी का उपयोग गर्मी के मौसम में सिंचाई के लिए होने लगा। इससे वे अब वर्षा ऋतु के अलावा गर्मी में भी खेती कर पा रहे हैं। साथ ही खेत में आम और लीची सहित विभिन्न फलदार पौधे लगाए गए हैं, जिससे आने वाले समय में बागवानी भी उनकी अतिरिक्त आय का माध्यम बनेगी।

एक ही संसाधन से मछली और मुर्गी पालन का नवाचार

अंकित ने अपने दोनों तालाबों के ऊपर मुर्गी पालन के लिए शेड तैयार किया है। शेड की क्षमता करीब 1,000 से 1,200 मुर्गियों की है। उन्होंने मुर्गी पालन और मछली पालन को आपस में जोड़कर संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का तरीका अपनाया है।

मुर्गियों से निकलने वाला अपशिष्ट तालाब में पहुंचकर मछलियों के लिए प्राकृतिक आहार के रूप में उपयोगी होता है। इससे मछली पालन में बाहरी आहार पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिलती है। इस तरह एक ही स्थान पर संचालित दो गतिविधियां एक-दूसरे को सहारा देती हैं और किसान को अतिरिक्त आय के अवसर उपलब्ध कराती हैं।

तालाब की मेड़ पर फलदार पौधे, दोहरा लाभ

अंकित ने तालाब की मेड़ों पर आम सहित अन्य फलदार पौधे भी लगाए हैं। तालाब के पानी से इन पौधों की सिंचाई की जाती है। उनका कहना है कि मेड़ पर पेड़ लगाने से मिट्टी को मजबूती मिलती है और मेड़ के कटाव को रोकने में भी मदद मिलती है। वहीं आम और लीची जैसे फलदार पौधे भविष्य में अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनेंगे।

इस प्रकार अंकित ने खेत के प्रत्येक हिस्से का उपयोग उत्पादन और आय बढ़ाने के लिए किया है। तालाब उनके लिए केवल मछली पालन का साधन नहीं, बल्कि सिंचाई, बागवानी और मुर्गी पालन से जुड़ी गतिविधियों का आधार बन गया है।

8 लाख रुपये की अनुदान सहायता से मिला नवाचार को विस्तार

अंकित को प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मत्स्य पालन के लिए शासकीय सहायता मिली। मत्स्य विभाग से उन्हें करीब 8 लाख रुपये की अनुदान राशि प्राप्त हुई। इसके साथ पॉन्ड लाइनर, पॉलीथिन, बोर, मोटर और मछली आहार जैसी आवश्यक सामग्री की सुविधा भी मिली।

शासकीय योजना से मिली सहायता ने उनके लिए मछली पालन को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने का रास्ता आसान किया। अंकित बताते हैं कि विभागीय अधिकारियों से मिली जानकारी और मार्गदर्शन से उन्हें आधुनिक तरीके से मत्स्य पालन करने में काफी मदद मिली।

बहुफसली खेती से बढ़े आमदनी के अवसर

अंकित अब अपने खेत को केवल एक फसल तक सीमित नहीं रखते। मछली पालन और मुर्गी पालन के साथ वे अलग-अलग मौसम में विभिन्न फसलों की खेती और बागवानी कर रहे हैं। तालाब के पानी की उपलब्धता ने उन्हें गर्मी में भी खेती करने का अवसर दिया है।

इस बहुआयामी मॉडल से उन्हें सालभर अपने खेत से उत्पादन प्राप्त करने और आय के अलग-अलग स्रोत विकसित करने का अवसर मिल रहा है। उनके खेत में कृषि के साथ पशु एवं मत्स्य आधारित गतिविधियों का समन्वय ग्रामीण क्षेत्रों में एकीकृत कृषि प्रणाली की उपयोगिता को भी दर्शाता है।

युवाओं के लिए खेती बना रहे हैं आकर्षक विकल्प

अंकित लकड़ा की कहानी उन ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो खेती को केवल पारंपरिक तरीके से करने के बजाय इसे आधुनिक व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहते हैं। उनका अनुभव बताता है कि उपलब्ध भूमि और पानी जैसे संसाधनों का बेहतर नियोजन, शासकीय योजनाओं की जानकारी और मेहनत के साथ खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।

अंकित की पहल यह संदेश देती है कि खेती में नवाचार, योजनाओं का सही उपयोग और विभिन्न कृषि गतिविधियों का समन्वय किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में प्रभावी कदम साबित हो सकता है। उनका खेत अब सिर्फ फसल उत्पादन की जगह नहीं, बल्कि ग्रामीण उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक मिसाल बन गया है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के कृषि नवाचार को बढ़ावा देने के संकल्प को मिली नई उड़ान, प्रगतिशील किसान भानुप्रताप ने जुगाड़ तकनीक से तैयार की सीड ड्रिल

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राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन योजना से मिली गुणवत्ता युक्त बीज की सौगात

कृषि विभाग के सहयोग से कम लागत में आधुनिक बुवाई का सफल मॉडल बना किसानों के लिए प्रेरणा

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार खेती को अधिक लाभकारी, आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निरंतर कार्य कर रही है। कृषि विभाग द्वारा संचालित योजनाओं के माध्यम से किसानों को उन्नत तकनीक, गुणवत्तायुक्त बीज और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। इसी का सकारात्मक परिणाम गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के ग्राम दरमोहली में देखने को मिला, जहां प्रगतिशील किसान एवं स्थानीय लोक कलाकार भानुप्रताप उर्फ भानु रंगीला ने अपनी सूझबूझ और नवाचार से पारंपरिक कृषि उपकरण को जुगाड़ तकनीक के माध्यम से सीड ड्रिल में परिवर्तित कर मूंगफली की वैज्ञानिक बुवाई का सफल उदाहरण प्रस्तुत किया है। राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन (एनएमईओ-ऑयल) योजना के अंतर्गत कृषि विभाग से प्राप्त 80 किलोग्राम गुणवत्तायुक्त मूंगफली बीज का उपयोग करते हुए भानुप्रताप लगभग दो एकड़ क्षेत्र में बुवाई कर रहे हैं। उन्होंने स्थानीय संसाधनों और अपनी तकनीकी समझ का उपयोग करते हुए कम लागत में सीड ड्रिल तैयार की, जिससे कम समय में समान दूरी पर व्यवस्थित बुवाई संभव हो सकी। इस नवाचार से श्रम की बचत होने के साथ-साथ बीज का संतुलित उपयोग और बेहतर अंकुरण की संभावना भी बढ़ी है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के मंशा के अनुरूप कृषि विभाग किसानों को केवल योजनाओं का लाभ ही नहीं पहुंचा रहा, बल्कि उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों और स्थानीय नवाचारों को अपनाने के लिए भी प्रेरित कर रहा है। कृषि विभाग का उद्देश्य खेती की लागत कम करना, उत्पादन बढ़ाना और किसानों की आय में निरंतर वृद्धि सुनिश्चित करना है। ग्राम दरमोहली के किसान का यह प्रयास इस सोच को साकार करने वाला प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आया है। उप संचालक कृषि श्री सत्यजीत कंवर ने बताया कि स्थानीय स्तर पर विकसित ऐसे नवाचार खेती को अधिक किफायती और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कृषि विभाग किसानों को आधुनिक तकनीकों के साथ-साथ ऐसे उपयोगी स्थानीय प्रयोगों को अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है, ताकि कम संसाधनों में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन योजना के अंतर्गत जिले में किसानों को गुणवत्तायुक्त बीज, तकनीकी मार्गदर्शन तथा आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे तिलहनी फसलों का रकबा और उत्पादन बढ़ने के साथ किसानों की आय में भी निरंतर वृद्धि हो रही है।

जिला प्रशासन और कृषि विभाग के संयुक्त प्रयासों से संचालित योजनाएं अब किसानों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन रही हैं। प्रगतिशील किसान भानुप्रताप उर्फ भानु रंगीला का यह नवाचार इस बात का प्रमाण है कि सरकारी योजनाओं का प्रभावी लाभ, किसानों की रचनात्मक सोच और स्थानीय संसाधनों का समुचित उपयोग मिलकर कृषि को नई दिशा दे सकते हैं। यह मॉडल अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रहा है और आत्मनिर्भर एवं समृद्ध कृषि की ओर बढ़ते छत्तीसगढ़ की सशक्त तस्वीर प्रस्तुत करता है।

भारत–अर्जेंटीना कृषि सहयोग को नई मजबूती: ICAR और INTA के बीच 2025–27 कार्ययोजना पर हस्ताक्षर

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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और अर्जेंटीना के राष्ट्रीय कृषि प्रौद्योगिकी संस्थान (INTA) के बीच कृषि अनुसंधान, क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान को सुदृढ़ करने के लिए कार्ययोजना 2025–2027 पर हस्ताक्षर किए गए। आज इस हस्ताक्षरित ICAR–INTA कार्ययोजना का आदान-प्रदान कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव एवं ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट और भारत में अर्जेंटीना के राजदूत एच.ई. मारियानो ऑगस्टिन काउसीनो के बीच हुआ। यह पहल भारत–अर्जेंटीना के द्विपक्षीय कृषि सहयोग को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कदम है।

इस कार्ययोजना के तहत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, सतत कृषि (जीरो टिलेज, यंत्रीकरण, माइक्रो-इरिगेशन और फर्टिगेशन), फसल एवं पशु जैव-प्रौद्योगिकी, पशुधन सुधार, समशीतोष्ण एवं उष्णकटिबंधीय फसलों की उत्पादन तकनीक, डिजिटल कृषि, जैव-सुरक्षा और फाइटोसैनिटरी उपाय, तथा मूल्य श्रृंखला विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग स्थापित किया जाएगा। इसका क्रियान्वयन संयुक्त अनुसंधान, जर्मप्लाज्म आदान-प्रदान, विशेषज्ञ सहभागिता और संरचित प्रशिक्षण व अध्ययन दौरों के माध्यम से किया जाएगा।

प्रस्तावित अध्ययन भ्रमण और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में ग्रीनहाउस सब्जी उत्पादन, फ्लोरीकल्चर एवं समशीतोष्ण फल, पोस्ट-हार्वेस्ट फिज़ियोलॉजी, फंक्शनल फूड विकास, पशु चिकित्सा निदान, प्रिसिजन पशुपालन, वेस्ट-टू-वेल्थ तकनीक, माइक्रोबियल फीड संवर्धन, डिजिटल कृषि तथा सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी प्रणालियाँ शामिल हैं। जर्मप्लाज्म आदान-प्रदान में सोयाबीन, सूरजमुखी, मक्का, ब्लूबेरी, साइट्रस, जंगली पपीता प्रजातियाँ, अमरूद और चुनिंदा सब्जी फसलें शामिल होंगी।

इसके अलावा, दोनों देश तेलहन और दलहन मूल्य श्रृंखलाओं, कृषि यंत्रीकरण (जीरो-टिलेज, कपास कटाई मशीनरी और ड्रोन), तथा बागवानी मूल्य श्रृंखला विकास (इन्फ्रास्ट्रक्चर और रोपण सामग्री का आदान-प्रदान) में सहयोग को और गहरा करेंगे। पौध एवं पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्षेत्र-विशिष्ट खुरपका-मुंहपका (FMD) उन्मूलन रणनीतियाँ तथा टिड्डी निगरानी और प्रबंधन पर तकनीकी सहयोग और सर्वोत्तम प्रथाओं का साझा करना भी शामिल है।

दोनों पक्षों ने भारत–अर्जेंटीना वैज्ञानिक साझेदारी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और प्रभावी क्रियान्वयन एवं प्रगति सुनिश्चित करने के लिए वार्षिक निगरानी और समीक्षा पर सहमति व्यक्त की।


ड्रिप तकनीक से बदली खेती की तस्वीर: धान–मिर्ची की फसल से किसान मुकेश चौधरी को सालाना लाखों की आमदनी

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नवाचार खेती से बने सफल कृषि उद्यमी, पड़ोसी गांवों के किसानों के लिए प्रेरणा

रायपुर- सारंगढ-बिलाईगढ़ जिले के विकासखंड बरमकेला अंतर्गत ग्राम नवापाली के प्रगतिशील किसान मुकेश चौधरी ने नवाचार और आधुनिक कृषि तकनीक को अपनाकर खेती की पारंपरिक सोच को नई दिशा दी है। ड्रिप पद्धति से धान और मिर्ची की खेती कर वे प्रतिवर्ष लाखों रुपये की आमदनी प्राप्त कर रहे हैं और आज एक सफल कृषि उद्यमी के रूप में पहचान बना चुके हैं।

चौधरी ने बताया कि वर्ष 2011 में उन्होंने दो एकड़ भूमि पर मिर्ची की खेती पारंपरिक विधि से प्रारंभ की थी। इसी दौरान उद्यान रोपणी केंद्र नदीगांव के तत्कालीन वरिष्ठ उद्यान अधीक्षक सुरेन्द्र पटेल से मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, जिससे उन्हें ड्रिप पद्धति से खेती करने की जानकारी मिली। इसके पश्चात वर्ष 2013 में बरमकेला ब्लॉक में पहली बार ड्रिप तकनीक से खेती की शुरुआत की।

ड्रिप पद्धति के अंतर्गत खेतों की गहरी जुताई कर मेड निर्माण, लेटरल पाइप बिछाना एवं मल्चिंग का उपयोग करते हुए मिर्ची की रोपाई की गई। ड्रिप के माध्यम से संतुलित मात्रा में सिंचाई, खाद एवं दवा देने से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और मिर्ची की उपज लगभग दोगुनी हो गई। बेहतर परिणाम मिलने पर चौधरी ने धान की खेती का रकबा कम कर मिर्ची की खेती को बढ़ाया और वर्तमान में लगभग 12 एकड़ भूमि पर मिर्ची की खेती कर रहे हैं। इससे उन्हें प्रतिवर्ष लाखों रुपये की आय हो रही है।

अन्य किसानों के लिए बने प्रेरणास्रोत

किसान मुकेश चौधरी की सफलता को देखकर क्षेत्र के खिंचरी, बांजीपाली, बेंद्रापारा, रिसोरा, नूनपानी, लिंजिर और प्रधानपुर सहित आसपास के गांवों के अनेक किसान भी धान के साथ मिर्ची एवं साग-सब्जी की खेती ड्रिप पद्धति से करने लगे हैं।

डॉ. खूबचंद बघेल कृषक रत्न पुरस्कार से मिला सम्मान

खेती-किसानी में नवाचार, जैविक एवं समन्वित खेती को अपनाने के लिए वर्ष 2021 में राज्य सरकार द्वारा मुकेश चौधरी को डॉ. खूबचंद बघेल कृषक रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने धान की खेती में जैविक खाद के साथ-साथ दलहन–तिलहन फसलों में उड़द, मूंग एवं मिर्ची की खेती की। पुरस्कार स्वरूप उन्हें प्रशस्ति पत्र, मोमेंटो एवं दो लाख रुपये का चेक प्रदान किया गया। इस सम्मान से उनका उत्साह बढ़ा और कृषि कार्यों में और अधिक विस्तार हुआ।

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, बीआरसी के रूप में मिली जिम्मेदारी

इस वर्ष कृषि विभाग द्वारा मुकेश चौधरी को प्राकृतिक खेती हेतु बीआरसी नियुक्त किया गया है। उनके साथ टिकेश्वरी महापात्र (जलाकोना) और खेल कुमारी (धौंरादरहा) को भी बीआरसी बनाया गया है। विभाग द्वारा रायपुर एवं बरगढ़ (ओडिशा) में प्रशिक्षण दिलाकर अब ये तीनों बीआरसी जलाकोना, धौंरादरहा, करपी, जामदलखा सहित दर्जनों गांवों के किसानों को प्राकृतिक संसाधनों से खाद निर्माण एवं बीज उपचार की जानकारी प्रदान कर रहे हैं।

कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि किसान मुकेश चौधरी द्वारा मिर्ची की खेती के साथ प्राकृतिक खेती लगातार की जा रही है और उन्हें राज्य सरकार द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। उनकी यह पहल क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणादायक साबित हो रही है।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ICAR–मक्का अनुसंधान संस्थान का दौरा किया, नए प्रशासनिक भवन का उद्घाटन और किसानों से की बातचीत

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केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज पंजाब के लुधियाना स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIMR) का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने संस्थान के नए निर्माणाधीन प्रशासनिक भवन का उद्घाटन किया और मक्का के हितधारकों, किसानों, ग्रामीण विकास योजनाओं के लाभार्थियों तथा महिला स्व-सहायता समूह (SHG) के सदस्यों से संवाद किया। केंद्रीय मंत्री ने पत्रकारों से भी बात की और पंजाब में कृषि और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में केंद्रीय सरकार की प्रमुख पहलों और विकास कार्यक्रमों के बारे में जानकारी साझा की।

इस अवसर पर कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भगीरथ चौधरी, रेलवे एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री रवीनीत सिंह बिट्टू, और पंजाब कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुदियन भी उपस्थित थे।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय सरकार के प्रमुख उद्देश्य हैं अन्न उत्पादन बढ़ाना, उत्पादन लागत कम करना और किसानों की आय बढ़ाना। उन्होंने कहा कि भारत गेहूँ और चावल में पूरी तरह आत्मनिर्भर है, लेकिन कृषि में विविधीकरण आवश्यक है। उन्होंने कहा, “गेहूँ और चावल के बाद मक्का हमारे देश की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण फसल है। यह केवल खाद्य फसल नहीं है, बल्कि इसके कई औद्योगिक उपयोग भी हैं। मक्का धान का सतत् विकल्प बन सकता है, जिससे जल की बचत होगी और किसानों को बेहतर लाभ मिलेगा।”

केंद्रीय मंत्री ने भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान के महत्व पर भी जोर दिया, कहा कि संस्थान का कार्य मक्का उत्पादन बढ़ाने और कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की कि केंद्रीय सरकार ने पंजाब में फसल हानि के लिए गेहूँ के बीज मुफ्त वितरण हेतु ₹74 करोड़ जारी किए हैं। सरसों और अन्य बीज किस्मों के लिए भी धन स्वीकृत किया गया है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan Samman Nidhi) योजना के तहत 11.09 लाख किसानों के खातों में अग्रिम रूप से ₹222 करोड़ पहले ही स्थानांतरित किए जा चुके हैं। समग्र बागवानी विकास मिशन (MIDH) के तहत भी प्रभावित किसानों को सहायता प्रदान की जाएगी।

पंजाब की पुनर्वास और लचीलेपन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए,शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान को लेकर गहन चिंता व्यक्त कर रहे हैं। केंद्रीय सरकार ने बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए ₹1,600 करोड़ का पैकेज मंजूर किया है। उन्होंने बताया कि 36,703 क्षतिग्रस्त घरों के पुनर्निर्माण के लिए प्रति परिवार ₹1.60 लाख स्वीकृत किए गए हैं, जिसमें ₹1.20 लाख घर निर्माण के लिए और ₹40,000 श्रम एवं शौचालय सुविधाओं के लिए हैं।

शिवराज सिंह चौहान ने नागरिकों से भारतीय निर्मित (स्वदेशी) उत्पादों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया, कहा कि इससे स्थानीय कारीगर सशक्त होंगे, धन देश में रहेगा और भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। उन्होंने कहा, “स्वदेशी उत्पादों का समर्थन कर हम न केवल आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों की समृद्धि सुनिश्चित करते हैं।”


केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पंजाब के किसानों से की बातचीत, पराली प्रबंधन और मधुमक्खी पालन केंद्र का किया दौरा

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किसान चौपाल में किसानों से मिले केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, कृषि मशीनरी का लिया अवलोकन और ‘समन्यू हनी’ मधुमक्खी पालन केंद्र का दौरा किया

पंजाब के दौरे के दौरान केंद्रीय कृषि, किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लुधियाना के नूरपुर बेट गाँव में आयोजित किसान चौपाल में किसानों से संवाद किया, कृषि मशीनरी के लाइव डेमोंस्ट्रेशन का अवलोकन किया और दोराहा गाँव में स्थित ‘समन्यू हनी’ मधुमक्खी पालन केंद्र का दौरा किया।

नूरपुर बेट में शिवराज चौहान ने सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SSMS) युक्त कॉम्बाइन हार्वेस्टर का लाइव प्रदर्शन देखा, जो धान की कटाई के लिए उपयोग किया जाता है, और हैप्पी स्मार्ट सीडर मशीन का अवलोकन किया, जो गेहूँ की बुआई के लिए डिज़ाइन की गई है।

मीडिया से बातचीत में केंद्रीय मंत्री ने नूरपुर बेट के किसानों की सराहना करते हुए कहा कि यह गाँव 2017 से पराली जलाने से बच रहा है और इसके बजाय सतत् अवशेष प्रबंधन तकनीकों को अपनाया है। उन्होंने बताया कि कॉम्बाइन का उपयोग करने के बाद पराली खेत में समान रूप से फैली रहती है, जिससे उसका प्रबंधन आसान हो जाता है। शिवराज चौहान ने कहा कि हैप्पी स्मार्ट सीडर आधुनिक तकनीक का उदाहरण है, जो पराली को ढकते हुए मिट्टी को संपीड़ित करता है और बीज की सही मात्रा सुनिश्चित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक कृषि मशीनों के उपयोग से किसानों का श्रम, समय और लागत बचती है।

केंद्रीय मंत्री ने आगे बताया कि सही पराली प्रबंधन और डायरेक्ट सीडिंग तकनीक अपनाने से मिट्टी की उर्वरता समय के साथ बढ़ती है। उन्होंने कहा, “दो वर्षों के भीतर मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाएगी, जिससे यूरिया की आवश्यकता घटेगी और प्रति एकड़ फसल की उपज लगभग दो क्विंटल बढ़ जाएगी।” उन्होंने सभी किसानों से अपील की कि वे पराली जलाने से बचें और फसल अवशेष का जिम्मेदारी से प्रबंधन करें।

इसके बाद, केंद्रीय मंत्री ने दोराहा में ‘समन्यू हनी’ मधुमक्खी पालन केंद्र का दौरा किया, जहाँ उन्होंने स्थानीय किसानों से बातचीत की और मधुमक्खी पालन में नई मॉडलों और नवाचारों की समीक्षा की। उन्होंने मधुमक्खी पालन और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी विभिन्न सरकारी योजनाओं पर चर्चा की और ऐसे सतत् आय-सृजन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार के निरंतर समर्थन का आश्वासन दिया।


छत्तीसगढ़ में जूट की खेती को बढ़ावा देने की तैयारी

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 जूट की खेती पर एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण सह किसान सम्मेलन आयोजित

रायपुर- छत्तीसगढ़ में जूट की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने हेतु विगत दिवस इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, में एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण सह वैज्ञानिक किसान सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह प्रशिक्षण छत्तीसगढ़ में जूट की उन्नत खेती और उत्पादन विधियों पर आयोजित किया गया। यह प्रशिक्षण जूट की खेती परियोजना के तहत आईबीआईटीएफ द्वारा वित्त पोषित और आईआईटी भिलाई के सहयोग से आयोजित किया गया। 

इस प्रशिक्षण में राष्ट्रीय जूट बोर्ड के वैज्ञानिक डॉ. नीलेन्दु भौमिक और तकनीकी सहायक ने जूट से यांत्रिक फाइबर निष्कर्षण पर व्याख्यान दिया है। उन्होंने बारीक निष्कर्षण को आसान बनाने के लिए एक रिबनर मशीन का प्रदर्शन किया है। आईआईटी भिलाई के निदेशक डॉ. राजीव प्रकाश और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान संचालक डॉ. विवेक त्रिपाठी ने प्रशिक्षण को और अधिक प्रभावी बनाया। डॉ. राजीव प्रकाश ने रेशेदार फसलों के पारिस्थितिक महत्व के बारे में जानकारी देते हुए किसानों को संबोधित किया। उन्होंने रेशे की गुणवत्ता पर रेटिंग प्रक्रिया के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों से छत्तीसगढ़ में पूर्व की तरह जूट की खेती फिर से शुरू करने का आह्वान किया। डॉ. विवेक त्रिपाठी ने किसानों से खरीफ के लिए चावल के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार करने को कहा। उन्होंने कहा कि किसान खरीफ में चावल उगाने से पहले ग्रीष्मकालीन फसल के रूप में जूट की खेती कर सकते हैं। इससे किसानों को पारिश्रमिक मिलेगा और उनकी आजीविका में सुधार होगा। 

जूट परियोजना की सह अन्वेषक डॉ. प्रज्ञा पांडे ने जूट की उन्नत खेती की पद्धतियों पर व्याख्यान दिया। डॉ. अरुण उपाध्याय ने एंजाइमेटिक रेटिंग तकनीक पर व्याख्यान दिया। इस सम्मेलन में धमतरी और रायपुर के 30 किसानों ने कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लिया और व्याख्यान, मशीन प्रदर्शन और जूट के अवलोकन के माध्यम से जूट उत्पादन के बारे में जानकारी प्राप्त की। इस खरीफ मौसम में धमतरी जिले में 4 एकड़ भूमि पर जूट की खेती चल रही है। किसानों ने आगामी वर्ष में जूट का क्षेत्र विस्तार करने पर सहमति व्यक्त की।


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