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श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया बसंत पंचमी का पावन पर्व, ज्ञान की देवी मां सरस्वती की हुई आराधना

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शहर में आज बसंत पंचमी का पावन पर्व हर्षोल्लास और भक्ति भाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर पूरा वातावरण पीले रंग की छटा में रंगा नजर आया। बसंत पंचमी को विद्या, ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा का विशेष महत्व है, जिसे लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिला।

प्रातःकाल से ही मंदिरों, विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में सरस्वती पूजा का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष पुष्प, धूप-दीप अर्पित कर विद्या, विवेक और सफलता की कामना की। विद्यार्थियों ने पुस्तकों और वाद्य यंत्रों की भी विधिवत पूजा की।

बसंत पंचमी के साथ ही वसंत ऋतु के आगमन का संदेश भी जुड़ा हुआ है। खेतों में लहलहाती सरसों, खिले फूल और सुहावना मौसम इस पर्व की सुंदरता को और बढ़ा रहे थे। पीले रंग के परिधानों और व्यंजनों ने पर्व को विशेष आकर्षण प्रदान किया।

कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन-कीर्तन और पतंगबाजी का आयोजन किया गया, जिसमें बच्चों और युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आयोजन समितियों और प्रशासन के सहयोग से सभी कार्यक्रम शांतिपूर्ण एवं सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुए।

बसंत पंचमी का यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज में ज्ञान, संस्कृति और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश भी देता नजर आया।


राजिम त्रिवेणी संगम में आयोजित भक्त माता राजिम जयंती महोत्सव में शामिल हुए मुख्यमंत्री साय

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साहू समाज का सामूहिक विवाह कार्यक्रम सामाजिक उत्थान की मिसाल —मुख्यमंत्री साय

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय भक्त माता राजिम जयंती महोत्सव में हुए शामिल

रायपुर- राजिम भक्तिन माता एवं माता कर्मा के बताए संदेश मानव समाज के लिए कल्याणकारी है, हमें उनके संदेशों का अनुसरण करना चाहिए। मुख्यमंत्री विष्णुदेव  साय ने आज राजिम के त्रिवेणी संगम में आयोजित भक्त माता राजिम जयंती महोत्सव को सम्बोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने भगवान राजीव लोचन एवं भक्त माता राजिम की पूजा अर्चना कर प्रदेश और समाज की सुख समृद्धि और खुशहाली की कामना की। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने साहू सृजन पत्रिका का विमोचन किया। साहू समाज द्वारा मुख्यमंत्री का गजमाला पहनाकर स्वागत किया। 



मुख्यमंत्री साय ने राजिम माता भक्ति जयंती की बधाई देते हुए कहा कि साहू समाज समृद्ध और शिक्षित समाज है जो हर दृष्टिकोण से समृद्ध रहा है। साहू समाज का इतिहास भी समृद्ध रहा है। हम सबको दानवीर भामाशाह,बाबा सत्यनारायण जी का आशीर्वाद मिल रहा है। यह समाज निरंतर विकास करें। यही कामना है। जब समाज एक जुट होगा तो केवल समाज ही नहीं प्रदेश और देश भी शक्तिशाली और समृद्ध बनता है। 

मुख्यमंत्री साय ने साहू समाज के सामूहिक विवाह को अनुकरणीय पहल बताते हुए कहा कि राजिम माता ने जिस साहू समाज को अपनी मेहनत और त्याग से संगठित किया, आज वह समाज शिक्षा, कृषि व व्यवसाय सहित सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हम राजिम माता के आशीर्वाद से हर गारंटी को पूरा कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ खनिज, वन, उर्वरा से भरपूर है। अब नक्सलवाद से जवान पूरी ताकत से लड़ रहे हैं। हम सबका संकल्प है कि 31 मार्च तक बस्तर को नक्सल मुक्त कर देंगे। राज्य के विकास में बाधक नक्सलवाद अब खत्मा की ओर है। राज्य को हम सब समृद्धि की दिशा में लेकर जाएंगे। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि आज सिरकट्टी आश्रम में भव्य राम जानकी मंदिर में धर्म ध्वजा की स्थापना की गई। इस पुण्य अवसर पर हमें शामिल होने का सौभाग्य मिला। जैसे अयोध्या धाम में धर्म ध्वजा स्थापना किए हैं, उसी तर्ज पर यहां कुटेना में भी धर्म ध्वजा स्थापित किया गया है। मेरा सौभाग्य है कि एक साल पहले भी इस अवसर पर शामिल होने का अवसर मिला था। 

उप मुख्यमंत्री अरूण साव ने कहा कि साहू समाज एक संगठित समाज के रूप में जाना जाता है। आज हम सभी राजिम माता की जयंती मनाने आये हैं। उन्होंने कहा कि त्रिवेणी संगम के इस पावन धरती से प्रेरणा लेकर जाएंगे और मिलकर समाज के विकास के लिए काम करेंगे। केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने कहा कि माता राजिम भक्तीन की महिमा का बखान करते हुए कहा कि राजिम त्याग, भूमि तपस्या, साधना और श्रम की भूमि है। भगवान को खिचड़ी खिलाने वाले समाज से हमारा समाज का नाता है। हम अपने पुरखों के योगदान को याद करके समाज को आगे ले जा सकते हैं। शिक्षा और संस्कार भी जरूरी है। 

इस अवसर पर साहू समाज के प्रतिनिधिगण सहित अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

छठ पूजा: सूर्य उपासना का पवित्र पर्व, आस्था, पर्यावरण और संस्कृति का संगम

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नई दिल्ली-चार दिनों तक चलने वाला लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। सूर्य देव और छठी मैया की उपासना को समर्पित यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक एकता, पर्यावरण संरक्षण और अनुशासन का प्रतीक भी है।

 पर्व की पौराणिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

छठ पूजा की परंपरा वैदिक काल से जुड़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि सूर्य उपासना के माध्यम से प्रकृति और पंचतत्वों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम और माता सीता ने भी अयोध्या लौटने के बाद छठ व्रत किया था। वहीं महाभारत काल में द्रौपदी और पांडवों ने भी राज्य की समृद्धि के लिए इस व्रत का पालन किया था।

चार दिवसीय अनुष्ठान और उसका महत्व

छठ पूजा चार दिनों तक अत्यंत नियम, संयम और शुद्धता के साथ मनाई जाती है—

  1. नहाय-खाय (पहला दिन): व्रत की शुरुआत पवित्र स्नान और सात्विक भोजन से होती है। इस दिन घर की सफाई और शुद्ध भोजन का विशेष महत्व होता है।

  2. खरना (दूसरा दिन): व्रती पूरे दिन निर्जल उपवास रखकर सूर्यास्त के बाद गुड़ की खीर, रोटी और केला प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

  3. संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन): अस्ताचलगामी सूर्य को नदी, तालाब या घाट पर खड़े होकर अर्घ्य दिया जाता है। लाखों श्रद्धालु पारंपरिक गीतों और लोकसंगीत के साथ यह पूजा संपन्न करते हैं।

  4. उषा अर्घ्य (चौथा दिन): अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रत का समापन किया जाता है। इसे छठ व्रत का सबसे पवित्र क्षण माना जाता है।

आस्था और अनुशासन का अनूठा उदाहरण

छठ पूजा का सबसे बड़ा आकर्षण इसका सामूहिक स्वरूप है। यह पर्व न केवल बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में, बल्कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, छत्तीसगढ़ और देश के कई अन्य हिस्सों में भी पूरे उत्साह से मनाया जाता है। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भी इसे बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं।

व्रती महिलाएँ (और कई पुरुष भी) बिना किसी भोग-विलास के, कठिन तप और आत्मसंयम के साथ व्रत रखते हैं। पूजा में इस्तेमाल होने वाले सभी प्रसाद — जैसे ठेकुआ, केला, नारियल, और गुड़ की खीर — पूरी तरह प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल होते हैं।

पर्यावरण और सामाजिक संदेश

छठ पूजा पर्यावरण के प्रति जागरूकता का भी प्रतीक है। यह पर्व जलाशयों की स्वच्छता, वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों के सम्मान की भावना को बढ़ाता है। कई राज्यों में प्रशासन और स्थानीय समुदाय मिलकर नदी घाटों की सफाई और प्लास्टिक-मुक्त पूजा सुनिश्चित करने के लिए विशेष अभियान चला रहे हैं।

लोक संस्कृति और संगीत की आत्मा

छठ के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत — जैसे “केलवा जरा जरा हो रा…”, “उग हो सूरज देव…” — श्रद्धालुओं के मन में भक्ति और उल्लास का वातावरण बना देते हैं। पारंपरिक वेशभूषा, गीत-संगीत, और घाटों की सजावट इस पर्व को एक लोकसांस्कृतिक उत्सव का रूप देते हैं।

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने दी शुभकामनाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सहित कई राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों ने देशवासियों को छठ पूजा की शुभकामनाएँ दी हैं। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि “छठी मैया की कृपा से सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य आए।”

निष्कर्ष

छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, अनुशासन और सामूहिकता का उत्सव है। यह पर्व हमें सिखाता है कि मनुष्य और प्रकृति का संबंध परस्पर सम्मान और संतुलन पर आधारित होना चाहिए। इस वर्ष भी देशभर के घाटों पर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते श्रद्धालुओं की आस्था यह संदेश दे रही है कि भारत की परंपराएँ आज भी जीवंत हैं — आधुनिकता के साथ संतुलन बनाते हुए।


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