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सरगुजा संभाग के 850 श्रद्धालु भारत गौरव ट्रेन से रामलला एवं बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए रवाना

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रामलला दर्शन योजना से बुजुर्गों, महिलाओं एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों का वर्षों पुराना सपना हो रहा है साकार

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार जनआस्था, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक पर्यटन को जनकल्याण से जोड़ते हुए प्रदेशवासियों के वर्षों पुराने सपनों को साकार कर रही है। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में पर्यटन विभाग द्वारा संचालित रामलला दर्शन योजना प्रदेश के हजारों श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा, सेवा और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन चुकी है। इसी कड़ी में अम्बिकापुर रेलवे स्टेशन से सरगुजा संभाग के 850 श्रद्धालुओं को लेकर भारत गौरव ट्रेन अयोध्या धाम में प्रभु श्री रामलला तथा श्री काशी विश्वनाथ धाम के दर्शन के लिए श्रद्धा और उत्साह के वातावरण में रवाना हुई।

रेलवे स्टेशन पर सुबह से ही भक्ति और उल्लास का अनूठा वातावरण देखने को मिला। श्रद्धालु भगवान श्रीराम के जयघोष के साथ स्टेशन पहुंचे। पूरा परिसर जय श्रीराम, हर-हर महादेव और जय सियाराम के उद्घोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं के चेहरों पर अपने आराध्य के दर्शन का उत्साह और भावनात्मक खुशी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। अनेक परिवार पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे, जहां परिजनों ने तिलक लगाकर और पुष्पवर्षा कर यात्रियों को शुभ यात्रा की मंगलकामनाओं के साथ विदा किया।

भारत गौरव ट्रेन को जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर मंजूषा भगत (महापौर), हरविंदर सिंह टिनी (सभापति), नीरूपा सिंह (जिला पंचायत अध्यक्ष) सहित अन्य जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल, जिला प्रशासन तथा भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने श्रद्धालुओं का आत्मीय स्वागत करते हुए यात्रा की शुभकामनाएं दीं।


दर्शन योजना के अंतर्गत श्रद्धालुओं को श्री अयोध्या धाम में प्रभु श्री रामलला के दिव्य दर्शन तथा श्री काशी विश्वनाथ धाम में बाबा विश्वनाथ के दर्शन एवं पूजन का सौभाग्य प्राप्त होगा। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और सम्मान का विशेष ध्यान रखा गया है। पूरी यात्रा का संचालन पर्यटन विभाग एवं आईआरसीटीसी के समन्वय से सुव्यवस्थित रूप से किया जा रहा है।

यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को आरामदायक रेल यात्रा, स्वच्छ एवं सुरक्षित आवास, पौष्टिक शुद्ध शाकाहारी भोजन, पेयजल, स्थानीय परिवहन, चिकित्सा सहायता, सुरक्षा व्यवस्था तथा अनुभवी एस्कॉर्ट दल की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं तथा दिव्यांग यात्रियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विशेष सहायता की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है, ताकि प्रत्येक श्रद्धालु बिना किसी असुविधा के अपनी आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण कर सके।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सोच है कि आर्थिक स्थिति किसी भी श्रद्धालु की आस्था के मार्ग में बाधा नहीं बननी चाहिए। इसी भावना के अनुरूप रामलला दर्शन योजना के माध्यम से प्रदेश के हजारों श्रद्धालुओं को निःशुल्क धार्मिक यात्रा का अवसर प्रदान किया जा रहा है। यह योजना केवल दर्शन कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेशवासियों को उनकी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन गई है।

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने श्रद्धालुओं के लिए संदेश देते हुए कहा कि रामलला दर्शन योजना मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के संवेदनशील नेतृत्व की ऐसी जनकल्याणकारी पहल है, जिसके माध्यम से प्रदेश के श्रद्धालुओं को भगवान श्रीराम और बाबा विश्वनाथ के पावन दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। यह यात्रा केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक मूल्यों और सामाजिक समरसता को सशक्त बनाने का अभियान है। मैं सभी श्रद्धालुओं से प्रार्थना करता हूं कि वे प्रभु श्रीराम और बाबा विश्वनाथ से छत्तीसगढ़ की सुख-समृद्धि, खुशहाली और सभी नागरिकों के कल्याण की कामना करें तथा यात्रा से लौटकर अपने अनुभव समाज के साथ साझा करें, ताकि अधिक से अधिक लोग इस योजना का लाभ लेने के लिए प्रेरित हों।यात्रा पर रवाना होने वाले श्रद्धालुओं ने भी भावुक होकर राज्य सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया। अनेक बुजुर्ग श्रद्धालुओं ने कहा कि जीवनभर इच्छा होने के बावजूद आर्थिक परिस्थितियों के कारण अयोध्या और काशी की यात्रा संभव नहीं हो पाई थी, लेकिन मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की इस योजना ने उनका वर्षों पुराना सपना पूरा कर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने उन्हें सम्मानपूर्वक भगवान श्रीराम और बाबा विश्वनाथ के दर्शन का अवसर देकर उनके जीवन की सबसे बड़ी मनोकामना पूर्ण कर दी है।

एक महिला श्रद्धालु ने कहा कि हमने कभी नहीं सोचा था कि इतनी अच्छी व्यवस्था के साथ अयोध्या और काशी की यात्रा करने का अवसर मिलेगा। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने हम जैसे सामान्य परिवारों की भावनाओं का सम्मान किया है। हम सभी उनके प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।

एक वरिष्ठ श्रद्धालु ने कहा कि सरकार ने हमारी पूरी यात्रा की चिंता अपने ऊपर ले ली है। भोजन, आवास, सुरक्षा और चिकित्सा जैसी सभी व्यवस्थाएं होने से हम पूरी निश्चिंतता और श्रद्धा के साथ यात्रा कर रहे हैं। यह योजना वास्तव में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व तथा पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के सतत प्रयासों से संचालित रामलला दर्शन योजना आज प्रदेशवासियों की आस्था को सम्मान देने वाली एक ऐतिहासिक पहल के रूप में स्थापित हो चुकी है। यह योजना श्रद्धालुओं को केवल धार्मिक स्थलों के दर्शन ही नहीं करा रही, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक एकात्मता से भी जोड़ रही है। सरगुजा संभाग से रवाना हुई भारत गौरव ट्रेन इसी जनसेवा, सुशासन और जनआस्था के सशक्त समन्वय का प्रेरक उदाहरण है।

महानदी के तट पर आस्था का महाकुंभ: बनारस की तर्ज पर गूंजे वैदिक मंत्र

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20 करोड़ से दिव्य बनेगा रुद्रेश्वर धाम

​रायपुर- सावन के पहले सोमवार की संध्या धमतरी की चित्रोत्पला महानदी का तट केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और अध्यात्म का सजीव संगम बन गया। काशी की तर्ज पर जब 108 दीपों की स्वर्णिम आभा के बीच पहली बार भव्य ‘महानदी गंगा आरती’ का शुभारंभ हुआ, तो शंखनाद, वैदिक मंत्रों और घंटियों की गूंज से पूरा रुद्री घाट अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। धमतरी युवा ब्रिगेड और रुद्रेश्वर महादेव परिवार के इस ऐतिहासिक प्रयास ने नगर की सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा दी है। अब जनआस्था का यह पावन पर्व सावन के प्रत्येक सोमवार को महानदी के तट पर सजने जा रहा है।

भक्ति के इस आध्यात्मिक वातावरण के बीच धमतरी के लिए एक और बड़ी खुशखबरी की शुरुआत हुई है। प्रदेश सरकार के संस्कृति एवं पर्यटन विभाग ने प्राचीन रुद्रेश्वर महादेव मंदिर परिसर के कायाकल्प के लिए 20 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी योजना को धरातल पर उतारने का संकल्प लिया है। इस परियोजना के माध्यम से रुद्रेश्वर धाम को एक ऐसे आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा, जो छत्तीसगढ़ की धरोहर को राष्ट्रीय पहचान दिलाएगा।

​तीन चरणों में बदलेगा रुद्रेश्वर धाम का स्वरूप

यह मास्टर प्लान प्राचीन स्थापत्य कला और आधुनिक जनसुविधाओं का बेहतरीन संतुलन प्रस्तुत करता है। मंदिर की पारंपरिक भारतीय स्थापत्य शैली को संरक्षित रखते हुए भव्य मुख्य प्रवेश द्वार, आकर्षक शिखर, तोरण, दीप स्तंभ और विशाल नंदी प्रतिमा का निर्माण किया जाएगा।श्रद्धालुओं के लिए चौड़े पैदल मार्ग, विश्राम गृह, प्रसाद व स्मृति केंद्र, फूड कोर्ट, सुरक्षित घाट और डिजिटल सूचना प्रणाली की व्यवस्था होगी। परिसर में स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ एआई (AI) आधारित हेल्थ कियोस्क भी स्थापित किए जाएंगे। इसी तरह परिसर में उद्यान, सांस्कृतिक मंडप, रिवर फ्रंट कॉटेज, ओपन एयर स्टेज और भविष्य की 'मैरीन ड्राइव' की तर्ज पर एक सुरम्य तट विकसित किया जाएगा।पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सौर ऊर्जा पार्किंग, ईवी (EV) चार्जिंग स्टेशन, वर्षा जल संचयन और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन लागू किया जाएगा।

विधायकओंकार साहू, महापौर जगदीश रामू रोहरा, कलेक्टर और पूर्व विधायक रंजना साहू सहित कई गणमान्य नागरिकों की गरिमामयी उपस्थिति में शुरू हुआ यह आयोजन धमतरी के सामाजिक और आर्थिक विकास के नए युग का प्रतीक है। महानदी गंगा आरती की अविरल धारा और रुद्रेश्वर धाम का समग्र विकास मिलकर न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देंगे, बल्कि स्थानीय व्यापार, रोजगार और जनसहभागिता को भी एक नया आयाम देंगे।

सावन: शिव भक्ति, हरियाली और भारतीय संस्कृति का उत्सव

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"रिमझिम बरसती फुहारें, मिट्टी की सौंधी खुशबू, पेड़ों पर झूलों की मस्ती और 'हर-हर महादेव' के जयघोष..." यही है सावन की पहचान। श्रावण मास केवल हिंदू धर्म का एक पवित्र महीना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, प्रकृति और लोकजीवन का जीवंत उत्सव है।


बरसात की पहली बूंद जब धरती को स्पर्श करती है, तो सूखी वसुंधरा हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। खेतों में नई फसल की उम्मीद अंकुरित होती है, नदियां और तालाब जीवन से भर उठते हैं और प्रकृति अपनी अनुपम छटा बिखेर देती है। यही कारण है कि सावन को नवजीवन, समृद्धि और उल्लास का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। तब से सावन का महीना भगवान भोलेनाथ की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। श्रद्धालु शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि तथा विश्व कल्याण की कामना करते हैं। सावन के सोमवार और कांवड़ यात्रा इस आस्था को और अधिक प्रगाढ़ बनाते हैं।

सावन भारतीय लोक संस्कृति का भी सबसे रंगीन अध्याय है। गांवों में पेड़ों पर झूले पड़ते हैं, महिलाएं और युवतियां हरे परिधानों में सजकर कजरी और सावनी गीत गाती हैं। हरियाली तीज, नाग पंचमी और रक्षाबंधन जैसे पर्व सामाजिक सौहार्द, पारिवारिक प्रेम और सांस्कृतिक परंपराओं को नई ऊर्जा देते हैं। यह महीना रिश्तों में अपनापन और जीवन में सकारात्मकता का संदेश लेकर आता है।

आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है, तब सावन हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। हरियाली तभी बचेगी, जब हम पेड़ लगाएंगे, जल स्रोतों का संरक्षण करेंगे और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। भगवान शिव स्वयं प्रकृति के देवता माने जाते हैं, इसलिए पर्यावरण की रक्षा करना भी उनकी सच्ची आराधना है।

सावन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का महीना नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, सेवा, प्रेम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। आइए, इस पावन मास में भगवान शिव से यही प्रार्थना करें कि हमारे जीवन में शांति, समाज में सद्भाव और प्रकृति में सदैव हरियाली बनी रहे।

हर-हर महादेव! जय भोलेनाथ!

कचना धुरवा मंदिर – आस्था, इतिहास और वीरता का अद्भुत संगम

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कचना धुरवा मंदिर छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का एक अत्यंत प्रसिद्ध, ऐतिहासिक और पूजनीय देवस्थल है। यह मंदिर रायपुर–गरियाबंद राष्ट्रीय मार्ग पर बारूका (छुरा प्रवेश मार्ग) के समीप मुख्य सड़क के किनारे स्थित है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह स्थान केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी लोकगाथाओं, आदिवासी संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के कारण भी विशेष पहचान रखता है। प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए पहुँचते हैं और अपनी मनोकामनाएँ लेकर कचना धुरवा देव के चरणों में शीश नवाते हैं।

कचना धुरवा – आदिवासी समाज के आराध्य देव

कचना धुरवा को आदिवासी समाज एवं स्थानीय ग्रामीण अपने इष्टदेव, वन देवता और रक्षक देव के रूप में पूजते हैं। सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि इस क्षेत्र के घने जंगलों, पहाड़ियों और दुर्गम रास्तों से यात्रा करने वाले लोग सबसे पहले कचना धुरवा मंदिर में माथा टेककर सुरक्षित यात्रा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से कचना धुरवा देव की पूजा करता है, उसकी यात्रा सफल होती है तथा जीवन की अनेक बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसी आस्था के कारण आज भी राहगीर और वाहन चालक यहाँ रुककर पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर परिसर में सफेद घोड़े पर सवार वीर राजा धुरवा की भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा उनके शौर्य, साहस, न्यायप्रियता और जनकल्याणकारी व्यक्तित्व का प्रतीक मानी जाती है। दूर से ही यह प्रतिमा श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है और मंदिर की विशेष पहचान बन चुकी है।

अमर प्रेम और वीरता की लोकगाथा

कचना धुरवा मंदिर का इतिहास केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमर प्रेम, त्याग और अदम्य वीरता की लोककथा से भी जुड़ा हुआ है।

लोकमान्यताओं के अनुसार बिंद्रानवागढ़ के वीर राजकुमार धुरवा अपनी वीरता और पराक्रम के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। कहा जाता है कि उनके पिता की हत्या शत्रु राजा द्वारा कर दी गई थी। अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए राजकुमार धुरवा ने दुश्मन राजा के विरुद्ध लगातार संघर्ष किया।

कहा जाता है कि उन्होंने अपने शत्रु से 46 बार युद्ध किया और हर बार असाधारण साहस का परिचय दिया। उनकी वीरता की चर्चा पूरे अंचल में होने लगी। किंतु जब युद्ध में विजय प्राप्त करना कठिन हो गया, तब शत्रु राजा ने छल का सहारा लिया।

लोककथा के अनुसार अंतिम युद्ध के दौरान राजकुमार धुरवा अपने सफेद घोड़े पर सवार होकर नदी पार कर रहे थे। उसी समय उनके घोड़े का एक पैर जल (नदी) में तथा दूसरा पैर थल (भूमि) पर था। इसी अवसर का लाभ उठाकर शत्रु ने धोखे से उन पर प्रहार कर दिया। इस विश्वासघाती हमले में राजकुमार धुरवा वीरगति को प्राप्त हुए।

उनके बलिदान से पूरा क्षेत्र शोक में डूब गया। लोगों ने उनकी वीरता, न्यायप्रियता और जनसेवा को अमर बनाने के लिए उन्हें देवतुल्य मानकर पूजा आरंभ कर दी। समय के साथ विभिन्न स्थानों पर उनके स्मृति-स्थल और मंदिर स्थापित किए गए, जिनमें गरियाबंद का कचना धुरवा मंदिर सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध माना जाता है।

राजकुमारी कचना और अमर प्रेम की कथा

स्थानीय लोककथाओं में राजकुमार धुरवा के साथ राजकुमारी कचना का भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि दोनों का प्रेम त्याग, निष्ठा और समर्पण का अद्भुत उदाहरण था। धुरवा की वीरगति के बाद राजकुमारी कचना ने भी अपने प्रेम और समर्पण की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जिसे आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाता है।

इसी कारण इस देवस्थल को "कचना धुरवा" के नाम से जाना जाता है। यह स्थान प्रेम, विश्वास, साहस और बलिदान का प्रतीक माना जाता है।

अखंड ज्योति एवं नवरात्रि का भव्य मेला

कचना धुरवा मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, लेकिन चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि के अवसर पर यहाँ का वातावरण अत्यंत भव्य और आध्यात्मिक हो जाता है।

इन पावन दिनों में मंदिर परिसर में अखंड ज्योति कलश स्थापित किए जाते हैं। श्रद्धालु पूरे नौ दिनों तक माता और कचना धुरवा देव की आराधना करते हैं। मंदिर परिसर दीपों की रोशनी, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों से गूंज उठता है।

नवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों सहित पड़ोसी राज्यों से भी हजारों श्रद्धालु पहुँचते हैं। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मंदिर परिसर में नारियल बाँधते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।

मंदिर परिसर में स्थित अन्य देवी-देवताओं के मंदिर

कचना धुरवा मंदिर परिसर केवल एक देवस्थल नहीं, बल्कि अनेक देवी-देवताओं की आराधना का प्रमुख केंद्र भी है। यहाँ श्रद्धालुओं को एक ही स्थान पर कई देवस्थलों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

मुख्य मंदिर के अतिरिक्त परिसर में निम्नलिखित देवस्थल स्थित हैं—

  • ग्राम देवी रूपई माता मंदिर

  • बंजारी माता मंदिर

  • सोनई माता मंदिर

इन सभी देवी-देवताओं की पूजा स्थानीय ग्रामीण एवं श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ करते हैं।

लोक आस्था और मान्यताएँ

कचना धुरवा मंदिर के संबंध में अनेक लोकमान्यताएँ प्रचलित हैं। लोगों का विश्वास है कि—

  • सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है।

  • यात्रा प्रारंभ करने से पहले यहाँ दर्शन करने से यात्रा सुरक्षित रहती है।

  • मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु नारियल, ध्वज और प्रसाद अर्पित करते हैं।

  • संकट और कठिनाइयों से मुक्ति के लिए लोग विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।

  • यह स्थान वन, प्रकृति और मानव के बीच गहरे आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक माना जाता है।

प्राकृतिक सौंदर्य

मंदिर चारों ओर से हरियाली, पहाड़ियों और प्राकृतिक वातावरण से घिरा हुआ है। शांत वातावरण, शुद्ध हवा और धार्मिक आस्था का संगम इस स्थान को और भी आकर्षक बनाता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि प्रकृति की गोद में आध्यात्मिक शांति का भी अनुभव करते हैं।

सांस्कृतिक महत्व

कचना धुरवा मंदिर आदिवासी संस्कृति, लोकपरंपरा और छत्तीसगढ़ की गौरवशाली विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यहाँ आयोजित धार्मिक अनुष्ठान, लोकगीत, लोकनृत्य और मेले इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखते हैं। यह मंदिर आने वाली पीढ़ियों को वीरता, त्याग, प्रेम और लोकआस्था की प्रेरणा देता है।

निष्कर्ष

कचना धुरवा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि वीरता, प्रेम, त्याग, लोकविश्वास और आदिवासी संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यहाँ की ऐतिहासिक लोकगाथाएँ, सफेद घोड़े पर विराजमान वीर धुरवा की प्रतिमा, नवरात्रि का विशाल मेला, अखंड ज्योति, प्राकृतिक वातावरण और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था इस स्थान को छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण देवस्थलों में शामिल करती हैं।

जो भी श्रद्धालु इस पवित्र धाम में श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुँचता है, वह आध्यात्मिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और कचना धुरवा देव का आशीर्वाद लेकर लौटता है। यही कारण है कि गरियाबंद जिले का यह पावन देवस्थल आज भी लाखों लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

कड़ी सुरक्षा के बीच अमरनाथ यात्रा 2026 का पहला जत्था रवाना, श्रद्धालुओं में उत्साह

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जम्मू- वार्षिक अमरनाथ यात्रा 2026 का पहला जत्था गुरुवार को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच जम्मू के भगवती नगर यात्री निवास से पवित्र गुफा के लिए रवाना हुआ। श्रद्धालुओं में बाबा बर्फानी के दर्शन को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला।

यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है। मार्ग पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों, जम्मू-कश्मीर पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की व्यापक तैनाती की गई है। इसके अलावा, सीसीटीवी निगरानी, ड्रोन सर्विलांस, चिकित्सा सुविधाओं और आपदा प्रबंधन की विशेष व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है।

प्रशासन ने श्रद्धालुओं से यात्रा संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करने, मौसम की जानकारी पर नजर रखने तथा निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने की अपील की है। अधिकारियों ने विश्वास जताया कि सभी आवश्यक व्यवस्थाओं के साथ इस वर्ष की अमरनाथ यात्रा सुरक्षित और सुचारु रूप से संपन्न होगी।

तेंदुवा धाम में श्रीराम कथा का भव्य शुभारंभ: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने लिया संतों का आशीर्वाद

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छत्तीसगढ़ “धान का कटोरा” होने के साथ-साथ सेवा, समर्पण और आस्था की भूमि - मुख्यमंत्री साय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आज जांजगीर-चांपा जिले के शिवरीनारायण स्थित राम मिलेंगे आश्रम, तेंदुवा धाम कुरियारी में आयोजित 9 दिवसीय श्रीराम कथा में शामिल हुए। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी कौशल्या साय के साथ आश्रम पहुंचकर विधिवत पूजा-अर्चना की तथा प्रदेशवासियों की सुख, समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की। इस दौरान उन्होंने पद्म विभूषण से सम्मानित जगद्गुरु रामभद्राचार्य महाराज से आशीर्वाद प्राप्त किया।

मुख्यमंत्री साय ने अपने संबोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ की पावन भूमि सदैव भगवान श्रीराम के चरणों से धन्य रही है। उन्होंने वनवास काल में भगवान श्रीराम के आगमन और माता शबरी की अद्भुत भक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि इस धरती ने आस्था, समर्पण और विश्वास की अनूठी परंपरा को सहेज कर रखा है। उन्होंने कहा कि तेंदुवाधाम आज धार्मिक और सांस्कृतिक जागरण का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है, जहां हजारों श्रद्धालु एक साथ श्रीराम कथा का श्रवण कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने इस अवसर को अत्यंत सौभाग्यशाली बताते हुए कहा कि एक ही मंच से अनेक संतों का सान्निध्य और आशीर्वाद प्राप्त होना विशेष अनुभव है। उन्होंने आश्रम परिसर में हरिवंश औषधालय एवं पंचकर्म केंद्र, श्री राम-जानकी मंडपम, हरिवंश वैदिक पाठशाला, मां दुर्गा गौ मंदिर और हनुमत प्रवेश द्वार सहित विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों के लोकार्पण पर आश्रम प्रबंधन और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ “धान का कटोरा” होने के साथ-साथ सेवा, समर्पण और आस्था की भूमि भी है। उन्होंने अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर निर्माण के दौरान छत्तीसगढ़ से 11 ट्रक चावल और चिकित्सकों की टीम के वहां पहुंचने का उल्लेख करते हुए इसे प्रदेशवासियों की गहरी श्रद्धा का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि लगभग 500 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भगवान श्रीराम भव्य मंदिर में विराजमान हुए हैं, जो देश की सांस्कृतिक एकता और गौरव का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि श्रीरामलला दर्शन योजना के माध्यम से हजारों श्रद्धालु अयोध्या धाम के दर्शन कर लाभान्वित हो रहे हैं।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन और जवानों के अदम्य साहस से आज प्रदेश से नक्सलवाद समाप्त हो चुका है तथा राज्य में शांति, विकास और सामाजिक समरसता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने कहा कि “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” यहां की संस्कृति और जीवन मूल्यों की सच्ची पहचान है।

इस अवसर पर परमपूज्य वासुदेवनंद सरस्वती महाराज, किन्नर अखाड़ा प्रमुख मां टीना सहित अनेक संत-महात्माओं की गरिमामयी उपस्थिति में विभिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक परियोजनाओं का लोकार्पण किया गया।

राघव सेवा समिति के प्रमुख डॉ. अशोक हरिवंश ने बताया कि यह स्थल माता शबरी की जन्मभूमि शिवरीनारायण में स्थित है, जहां ‘कलिंग शैली’ में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। आश्रम में औषधालय, वैदिक विद्यालय, गौ मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर, गीता वाटिका, शबरी रसोई और निर्धन कन्या विवाह जैसी अनेक सामाजिक-धार्मिक पहल संचालित हो रही हैं। कार्यक्रम के तहत विभिन्न वर्गों - दिव्यांगजन, रक्तदाता, कुष्ठ रोगी और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों - को समर्पित विशेष दिवस भी आयोजित किए जा रहे हैं।

कार्यक्रम में सांसद कमलेश जांगड़े, महंत रामसुंदर दास सहित अन्य जनप्रतिनिधि, अधिकारी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

हज 2026 की शुरुआत 18 अप्रैल से, 1.75 लाख से अधिक जायरीन करेंगे पवित्र यात्रा

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नई दिल्ली: भारत से हज यात्रा 2026 की शुरुआत 18 अप्रैल से होने जा रही है। पहले जत्थे के जायरीन देश के विभिन्न एंबार्केशन प्वाइंट्स से सऊदी अरबके लिए रवाना होंगे। इस वर्ष कुल 1,75,025 श्रद्धालु हज यात्रा पर जाने वाले हैं।

केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने सभी हज यात्रियों को शुभकामनाएं देते हुए सुरक्षित और सुगम यात्रा सुनिश्चित करने की सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने हज कमेटी ऑफ इंडिया, अन्य केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और सऊदी अधिकारियों के साथ मिलकर व्यापक तैयारियां की हैं, ताकि यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

हज 2026 के लिए कई नई पहलें शुरू की गई हैं, जिनमें हज सुविधा ऐप के माध्यम से डिजिटल सेवाएं, यात्रियों के लिए स्मार्ट रिस्टबैंड, पहली बार लगभग 20 दिनों की शॉर्ट-ड्यूरेशन हज सुविधा, और प्रति यात्री लगभग 6.25 लाख रुपये का बीमा कवर शामिल है।

इसके अलावा, करीब 60,000 यात्री मक्का और मदीना के बीच हाई-स्पीड ट्रेन सेवा का लाभ उठा सकेंगे, जिससे यात्रा अधिक तेज, सुरक्षित और आरामदायक होगी। स्वास्थ्य सेवाओं, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, शिकायत निवारण और आवास-परिवहन सुविधाओं को भी बेहतर बनाया गया है।

देशभर में 17 एंबार्केशन प्वाइंट्स—जैसे दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, हैदराबाद, कोलकाता, बेंगलुरु और श्रीनगर—से हज संचालन किया जाएगा।

सरकार ने यात्रियों को सभी दिशा-निर्देशों और स्वास्थ्य सलाहों का पालन करने की सलाह दी है, ताकि उनकी यात्रा सुरक्षित और सफल हो सके।


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