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विश्व हाथी दिवस 2026: विशाखापत्तनम में राष्ट्रीय समारोह, हाथी संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण पहल जारी

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विशाखापत्तनम- विश्व हाथी दिवस 2026 के अवसर पर आज विशाखापत्तनम में राष्ट्रीय स्तर के समारोह का आयोजन किया गया। समारोह की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने की। आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री कोनिडेला पवन कल्याण समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए।

कार्यक्रम में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव  तन्मय कुमार, महानिदेशक (वन) एवं विशेष सचिव सुशील कुमार अवस्थी, अपर महानिदेशक (वन्यजीव) रमेश पांडे सहित मंत्रालय, आंध्र प्रदेश वन विभाग, भारतीय रेल, विभिन्न राज्यों के वन विभागों, वैज्ञानिक संस्थानों और अन्य संबंधित पक्षों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान से हाथी संरक्षण पर जोर

समारोह को संबोधित करते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत हाथियों के लिए एक टिकाऊ भविष्य सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। इसके लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रिमोट सेंसिंग और जियोस्पेशियल मैपिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़ा जा रहा है।

उन्होंने कहा कि मानव–हाथी संघर्ष (Human-Elephant Conflict) को कम करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वय, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यक है। साथ ही, संरक्षण प्रयासों में स्थानीय समुदायों के कल्याण को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सिंह ने कहा कि हाथी संरक्षण भारत के लिए केवल एक नीतिगत प्राथमिकता नहीं, बल्कि देश की सभ्यतागत विरासत और पारिस्थितिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि भारत में वर्तमान में 33 हाथी रिजर्व और वैज्ञानिक रूप से चिन्हित 150 हाथी गलियारे (Elephant Corridors) हैं। भारत में दुनिया की लगभग 60 प्रतिशत जंगली एशियाई हाथी आबादी पाई जाती है।

उन्होंने कहा कि मानव–हाथी संघर्ष एक जटिल समस्या है और इसके समाधान के लिए विभिन्न हितधारकों को साथ लाकर, जमीनी स्तर पर सत्यापित वैज्ञानिक आंकड़ों का उपयोग करना जरूरी है।

‘Conflict to Coexistence’ होगा आंध्र प्रदेश का मंत्र

मुख्य वक्तव्य देते हुए आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने कहा कि मानव–हाथी संघर्ष के मामलों से निपटने के लिए राज्य सरकार का मंत्र ‘Conflict to Coexistence’ यानी ‘संघर्ष से सह-अस्तित्व की ओर’ है।

उन्होंने कहा कि मानव–हाथी संघर्ष राज्यों की प्रशासनिक सीमाओं तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि इसे साझा जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।

पवन कल्याण ने आंध्र प्रदेश सरकार की H.A.N.U.M.A.N. (Healing And Nurturing Units for Monitoring, Aid and Nursing of Wildlife) पहल की जानकारी भी दी। उन्होंने बताया कि राज्य में वन्यजीव संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक के उपयोग के साथ स्थानीय समुदायों को जोड़ा जा रहा है और वन विभाग के अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

‘गज गौरव पुरस्कार 2026’ प्रदान किए गए

विश्व हाथी दिवस समारोह के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने हाथी संरक्षण और प्रबंधन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों को ‘गज गौरव पुरस्कार 2026’ प्रदान किए।

‘30 Giant Steps’ का विमोचन

कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण ‘30 Giant Steps’ का विमोचन रहा। इसमें वर्ष 2020 से 2026 के बीच प्रोजेक्ट एलिफेंट के तहत हासिल की गई 30 प्रमुख उपलब्धियों, महत्वपूर्ण पड़ावों और संरक्षण पहलों को रेखांकित किया गया है।

प्रोजेक्ट एलिफेंट की शुरुआत वर्ष 1992 में केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में हुई थी। तीन दशकों से अधिक समय से यह योजना हाथियों, उनके आवास और गलियारों के संरक्षण, मानव–हाथी संघर्ष को कम करने तथा बंदी हाथियों के कल्याण की दिशा में काम कर रही है।

दक्षिण भारत के लिए क्षेत्रीय कार्ययोजना जारी

समारोह में ‘Regional Action Plan for Comprehensive Understanding and Management of Human–Elephant Conflict in Southern India’ भी जारी की गई। यह कार्ययोजना कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में मानव–हाथी संघर्ष के व्यापक और समन्वित प्रबंधन पर केंद्रित है।

प्रोजेक्ट एलिफेंट के तहत दक्षिणी हाथी क्षेत्र वाले राज्यों, वैज्ञानिक संस्थानों और विशेषज्ञों के परामर्श से तैयार इस योजना में 500 करोड़ रुपये के भारत सरकार के सहयोग का प्रावधान है।

योजना में हाथी आवासों की कनेक्टिविटी, गलियारों का संरक्षण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, संघर्ष कम करने के लिए बुनियादी ढांचा, आवास पुनर्स्थापन, सामुदायिक भागीदारी, अनुसंधान एवं निगरानी, त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र, क्षमता निर्माण तथा राज्यों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया गया है।

हाथी संरक्षण पर विशेष प्रकाशन जारी

समारोह में Journal of Wildlife Science का विशेष अंक भी जारी किया गया, जो भारत में हाथी संरक्षण के तीन दशकों को समर्पित है। इसमें पिछले तीन दशकों में हाथी संरक्षण से संबंधित वैज्ञानिक ज्ञान और अनुसंधान को संकलित किया गया है।

इसके अलावा ‘Asian Elephants in Central India Before 1947’ नामक मोनोग्राफ भी जारी किया गया। इसमें वर्ष 1947 से पहले मध्य भारत में हाथियों के वितरण, स्थिति और मानव–हाथी संबंधों का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया गया है।

प्रोजेक्ट एलिफेंट की 23वीं संचालन समिति की बैठक

विशाखापत्तनम में प्रोजेक्ट एलिफेंट की 23वीं संचालन समिति की बैठक भी आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने की।

बैठक में हाथी संरक्षण एवं प्रबंधन से जुड़े मौजूदा मुद्दों पर चर्चा की गई। इस दौरान ‘The Trumpet’ के Volume VI Issue 01, Nilgiri Elephant Reserve के लिए Model Elephant Conservation Plan, ‘Captive Elephant Husbandry: Science, Welfare and Practice’ तथा मानव–हाथी संघर्ष अध्ययन के दूसरे चरण से जुड़ी पहलें जारी की गईं।

मानव–हाथी संघर्ष पर राष्ट्रीय कार्यशाला

विश्व हाथी दिवस समारोह के तहत ‘Human–Elephant Conflict: Varying Scenarios Across India’ विषय पर कार्यशाला भी आयोजित की गई। इसमें हाथी बहुल राज्यों के नियामक प्राधिकरणों, वैज्ञानिक संस्थानों और मैदानी एजेंसियों ने हिस्सा लिया।

कार्यशाला में मानव–हाथी संघर्ष की स्थिति, रुझानों और विभिन्न क्षेत्रों में इसके अलग-अलग स्वरूपों की वैज्ञानिक आंकड़ों और मैदानी अनुभवों के आधार पर समीक्षा की गई। चर्चा में विद्युत करंट से हाथियों की मौत रोकने, रेलवे से होने वाली हाथी मृत्यु को कम करने, पशु चिकित्सा हस्तक्षेप, आवास एवं गलियारा प्रबंधन और एकीकृत लैंडस्केप दृष्टिकोण जैसे विषयों पर जोर दिया गया।

21,450 स्कूलों के 20 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने लिया हिस्सा

विश्व हाथी दिवस के अवसर पर प्रोजेक्ट एलिफेंट और National Museum of Natural History के समन्वय से देशभर में व्यापक जन-जागरूकता अभियान भी चलाया गया।

इस अभियान में 21,450 स्कूलों के 20 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। बच्चों को हाथियों के पारिस्थितिक और सांस्कृतिक महत्व तथा उनके आवासों के संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए चित्रकला एवं मुखौटा निर्माण प्रतियोगिताएं, रैलियां, नुक्कड़ नाटक, जागरूकता कार्यक्रम और शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किए गए।

देशभर के विद्यार्थियों ने हाथियों के संरक्षण और सुरक्षा की शपथ लेते हुए स्वयं को वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण के युवा दूत के रूप में आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

हाथियों के सुरक्षित भविष्य के लिए भारत की प्रतिबद्धता

विशाखापत्तनम में आयोजित विश्व हाथी दिवस 2026 समारोह ने हाथियों के संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को फिर दोहराया। विज्ञान और तकनीक के उपयोग, हाथी आवास एवं गलियारों के संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों के माध्यम से भारत का लक्ष्य हाथियों की स्वस्थ आबादी और मजबूत वन परिदृश्य को सुरक्षित रखना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए देश की इस राष्ट्रीय धरोहर प्रजाति का भविष्य सुरक्षित रह सके।

हाथीदांत तस्करी पर वन विभाग की बड़ी कार्रवाई

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वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत तीन आरोपी गिरफ्तार, न्यायिक हिरासत में भेजे गए

रायपुर- वन मंत्री केदार कश्यप के निर्देशन में संगठित वन अपराध और वन्यजीव तस्करी पर रोक लगाने के लिए वन विभाग लगातार सख्त कार्रवाई कर रहा है। इसी अभियान के तहत बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में हाथीदांत तस्करी के मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।

वन मंडलाधिकारी आलोक वाजपेयी के मार्गदर्शन में 3 अगस्त 2026 को मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (मध्य क्षेत्र, भोपाल), राज्य उड़न दस्ता रायपुर और वनमंडल बलरामपुर की संयुक्त टीम ने रामानुजगंज स्थित एक धर्मशाला में छापेमारी की।

धर्मशाला के कमरे से तीन हाथीदांत (जबड़े) बरामद

संयुक्त टीम ने आमंत्रण धर्मशाला के कमरा नंबर 205 की तलाशी ली। जांच के दौरान एक बैग से हाथी के जबड़े के तीन हाथीदांत बरामद किए गए। मौके पर तीन संदिग्ध व्यक्ति भी मौजूद थे, जिन्हें तुरंत हिरासत में ले लिया गया।

गिरफ्तार आरोपियों में झारखंड के पलामू जिले के संतोष कुमार विश्वकर्मा (42 वर्ष) तथा बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के अजय कुमार गुप्ता (49 वर्ष) और सतेन्द्र कुमार (50 वर्ष) शामिल हैं।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई

आरोपियों के खिलाफ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। भारतीय जंगली हाथी अनुसूची-1 के तहत संरक्षित वन्य प्राणी है, इसलिए इस मामले को गंभीर वन अपराध माना गया है।

वन विभाग ने जब्त किए गए हाथीदांत को अपने कब्जे में लेकर सभी आरोपियों को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, रामानुजगंज की अदालत में प्रस्तुत किया। अदालत ने तीनों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।

वन्यजीव तस्करी पर सख्त निगरानी

वन परिक्षेत्राधिकारी, रामानुजगंज ने बताया कि मामले की विस्तृत जांच जारी है और तस्करी से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि वन्यजीव तस्करी में शामिल किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

एआई तकनीक से हाथी-मानव संघर्ष पर लगी लगाम, सुरक्षित हुए गांव और वन्यजीव

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वन विभाग की अभिनव पहल बनी लोगों के लिए सुरक्षा कवच

रायपुर- छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सशक्त नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार वन विभाग आधुनिक तकनीक का उपयोग कर वन्यजीव संरक्षण और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में लगातार प्रभावी कार्य कर रहा है। इसी कड़ी में शुरू किया गया एआई आधारित 'एलीफेंट अलर्ट सिस्टम' हाथी-मानव संघर्ष को कम करने में बड़ी सफलता साबित हुआ है। इस अभिनव पहल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली है और प्रतिष्ठित एमआईटी टेक्नोलॉजी रिव्यू ने भी इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया है।


समय पर मिल रही सूचना, बढ़ी ग्रामीणों की सुरक्षा

हाथी प्रभावित क्षेत्रों में वन विभाग थर्मल सेंसर युक्त इन्फ्रारेड ड्रोन की मदद से दिन-रात हाथियों की गतिविधियों पर नजर रख रहा है। घने जंगल और अंधेरे में भी यह तकनीक हाथियों का सटीक पता लगा लेती है। जैसे ही हाथियों का दल किसी गांव की ओर बढ़ता है, नियंत्रण कक्ष से ग्रामीणों और वन अमले को एसएमएस, फोन कॉल और व्हाट्सएप के माध्यम से तुरंत सूचना भेज दी जाती है।

पहले से सतर्क होकर टल रही दुर्घटनाएं

इस व्यवस्था के माध्यम से लगभग 5 से 10 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों को पहले ही सतर्क कर दिया जाता है। सूचना मिलते ही ग्रामीण सुरक्षित स्थानों पर पहुंच जाते हैं। वहीं वन विभाग की टीम भी समय पर मौके पर पहुंचकर हाथियों को जंगल की ओर वापस भेजने का प्रयास करती है। इससे हाथी-मानव संघर्ष की घटनाओं में कमी आई है और जनहानि का खतरा भी घटा है।

तकनीक और संवेदनशील प्रशासन का सफल मॉडल

वन विभाग की इस पहल से ग्रामीणों में सुरक्षा की भावना मजबूत हुई है। साथ ही हाथियों के संरक्षण को भी नई मजबूती मिली है। आधुनिक तकनीक और त्वरित सूचना प्रणाली के कारण वन्यजीवों तथा लोगों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हुआ है।

दूसरे राज्यों के लिए बना प्रेरणास्रोत

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के दूरदर्शी नेतृत्व और वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ का यह नवाचार आज देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। एआई आधारित एलीफेंट अलर्ट सिस्टम यह साबित करता है कि आधुनिक तकनीक, प्रभावी प्रशासन और जनभागीदारी के माध्यम से वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ लोगों की सुरक्षा भी सफलतापूर्वक सुनिश्चित की जा सकती है। आज यह पहल छत्तीसगढ़ को वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में नई पहचान दिला रही है।

रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मृत्यु कम करने के लिए राष्ट्रीय कार्यशाला

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पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के प्रोजेक्ट एलीफेंट डिवीजन ने वन्यजीव संस्थान, देहरादून (Wildlife Institute of India – WII) के सहयोग से 10-11 मार्च 2026 को देहरादून में “रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मृत्यु को कम करने हेतु नीति कार्यान्वयन” विषय पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यक्रम में लगभग 40 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें MoEFCC के प्रोजेक्ट एलीफेंट डिवीजन, रेल मंत्रालय, हाथी क्षेत्र वाले राज्यों के वन विभागों और प्रमुख संरक्षण वैज्ञानिकों के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल थे। कार्यशाला में ईस्ट सेंट्रल रेलवे, ईस्ट कोस्ट रेलवे, नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे, नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे, नॉर्दर्न रेलवे, साउथ ईस्टर्न रेलवे, साउदर्न रेलवे और साउथ वेस्टर्न रेलवे के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

भारत में विश्व की कुल एशियाई हाथी आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पाया जाता है। इनके प्रमुख आवास पूर्वी, उत्तर-पूर्वी, दक्षिणी और मध्य भारत में फैले हुए हैं। लेकिन आवासों के खंडित होने और हाथी क्षेत्रों में रेलवे नेटवर्क के विस्तार के कारण कई राज्यों—असम, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़ और झारखंड—में रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मृत्यु के मामलों में वृद्धि हुई है। इस कार्यशाला का उद्देश्य संरक्षण और अवसंरचना क्षेत्रों के बीच समन्वय को मजबूत करना तथा वैज्ञानिक आधार पर समाधान विकसित करना था।

वन्यजीव मृत्यु की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए MoEFCC ने WII और रेल मंत्रालय के सहयोग से हाथी क्षेत्रों में 110 संवेदनशील रेलवे खंड तथा दो बाघ क्षेत्रों में 17 अतिरिक्त खंडों की पहचान की है। प्रोजेक्ट एलीफेंट, WII, राज्य वन विभागों और भारतीय रेल की संयुक्त टीमों द्वारा किए गए विस्तृत फील्ड सर्वेक्षणों में प्रत्येक स्थान की पारिस्थितिक परिस्थितियों का अध्ययन कर स्थान-विशिष्ट समाधान सुझाए गए।

कुल 127 रेलवे खंडों (3,452.4 किमी) के विस्तृत आकलन के आधार पर 14 राज्यों में 77 खंड (1,965.2 किमी) को प्राथमिकता दी गई है, जहां वन्यजीवों की आवाजाही और दुर्घटना जोखिम को देखते हुए विशेष उपाय किए जाएंगे। इन प्राथमिक खंडों के लिए 705 शमन संरचनाओं की सिफारिश की गई है, जिनमें 503 रैंप और लेवल क्रॉसिंग, 72 पुलों का विस्तार या संशोधन, 39 फेंसिंग/ट्रेंच संरचनाएं, 4 एग्जिट रैंप, 65 नए अंडरपास और 22 ओवरपास शामिल हैं, ताकि वन्यजीव सुरक्षित रूप से रेलवे लाइन पार कर सकें।

कई नई रेलवे परियोजनाओं और ट्रैक विस्तार योजनाओं में भी वन्यजीव-अनुकूल संरचनाएं शामिल की गई हैं। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ के अचनाकमार-अमरकंटक हाथी कॉरिडोर से गुजरने वाली गेवरा रोड–पेंड्रा रोड रेलवे लाइन, महाराष्ट्र की दरेकासा–सालेकासा ट्रैक ट्रिपलिंग परियोजना, नागभीड–इतवारी गेज परिवर्तन परियोजना और वडसा–गडचिरोली रेलवे लाइन (जो कान्हा–नवेगांव–ताडोबा–इंद्रावती टाइगर कॉरिडोर को काटती है) में ऐसे प्रावधान किए गए हैं।

असम के अजारा–कामाख्या रेलवे खंड के 3.5 किमी लंबे संवेदनशील हिस्से में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप प्रस्तावित है। यह हिस्सा रानी–गढ़भंगा–दीपोर बील हाथी कॉरिडोर से गुजरता है, जहां पहले कई हाथियों की मृत्यु हुई है। इस क्षेत्र में रेलवे लाइन को ऊंचा (एलीवेटेड) बनाया जाएगा ताकि हाथी सुरक्षित रूप से कॉरिडोर पार कर सकें।

तकनीकी समाधानों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में Distributed Acoustic System (DAS) आधारित Intrusion Detection System (IDS) लगाया जा रहा है, जो हाथियों की गतिविधि का पता लगाकर चेतावनी देता है। इसका पायलट प्रोजेक्ट नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर रेलवे के चार खंडों में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है, जो असम में कुल 64.03 किमी हाथी कॉरिडोर और 141 किमी रेलवे ब्लॉक सेक्शन को कवर करता है। इस प्रणाली को अब उत्तर बंगाल और ओडिशा के संवेदनशील रेलवे क्षेत्रों में भी लागू किया जा रहा है।

इसके अलावा तमिलनाडु के मदुक्करई क्षेत्र में एक AI आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली भी लागू की गई है। इसमें 12 टावरों पर लगे थर्मल और मोशन-सेंसिंग कैमरे हाथियों की गतिविधि को ट्रैक करते हैं और ट्रैक से 100 मीटर के भीतर हाथियों के आने पर वन और रेलवे अधिकारियों को तुरंत सूचना देते हैं, जिससे ट्रेन की गति कम की जा सके और हाथियों को सुरक्षित पार करने का अवसर मिल सके।

कार्यशाला में हाथियों की पारिस्थितिकी, अवसंरचना योजना और जैव विविधता संरक्षण पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। प्रतिभागियों ने राज्यों के आंकड़ों, केस स्टडी और दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों—जैसे आवास विखंडन, भूमि उपयोग परिवर्तन, तेज ट्रेन गति, रात में संचालन और हाथियों की मौसमी आवाजाही—पर चर्चा की।

क्षेत्रीय कार्य समूहों ने विभिन्न परिदृश्यों (शिवालिक-गंगा मैदान, मध्य भारत एवं पूर्वी घाट, उत्तर-पूर्व भारत और पश्चिमी घाट) में चल रहे प्रयासों की समीक्षा की और क्षेत्र-विशिष्ट रणनीतियां सुझाईं। बेहतर प्रथाओं में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सेंसर और AI आधारित पहचान तकनीक, GIS निगरानी और सामुदायिक चेतावनी एवं गश्त नेटवर्क शामिल रहे।

कार्यशाला में रेलवे प्राधिकरणों, वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया गया। साथ ही जोखिम मूल्यांकन, निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए मानकीकृत प्रोटोकॉल विकसित करने तथा डेटा साझाकरण को मजबूत करने की सिफारिश की गई। प्रतिभागियों ने AI आधारित पहचान, रिमोट सेंसिंग और अन्य शोध क्षेत्रों को भी प्राथमिकता देते हुए प्रोजेक्ट एलीफेंट और रेल मंत्रालय के तहत एक राष्ट्रीय रोडमैप तैयार करने का सुझाव दिया, ताकि वैज्ञानिक और सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से हाथी-ट्रेन टकराव की घटनाओं को कम किया जा सके।

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