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जमुई की घटना: सिर्फ एक अपराध नहीं, समाज और सिस्टम के लिए बड़ा सबक

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जमुई, बिहार: बिहार के जमुई में 19 सितंबर की शाम दो नाबालिग छात्रों के साथ कथित बदसलूकी, मारपीट और लड़की के साथ यौन उत्पीड़न का वीडियो सामने आने के बाद पूरे देश में चर्चा तेज हो गई है। घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की, कई आरोपियों की पहचान की और गिरफ्तारियां की गईं। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए बिहार के DGP से कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।

लेकिन यह मामला केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। इसने महिला और बाल सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही, सोशल मीडिया की भूमिका, भीड़ की मानसिकता और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

घटना में क्या हुआ?

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 19 सितंबर की शाम जमुई क्षेत्र में दसवीं कक्षा के एक नाबालिग छात्र और छात्रा को रास्ते में कुछ युवकों ने रोक लिया। दोनों को कथित तौर पर घेरा गया, छात्र के साथ मारपीट की गई और छात्रा के साथ बदसलूकी की गई।

घटना का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर सामने आया। रिपोर्टों के मुताबिक वीडियो में कई लोग मौके पर दिखाई दे रहे हैं और छात्रा लोगों से उसे जाने देने की अपील करती नजर आती है। पुलिस ने वीडियो और अन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच शुरू की।

पुलिस के अनुसार मामले में POCSO Act और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया गया। जांच के लिए SIT गठित किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

पुलिस कार्रवाई और मुख्य आरोपी पर कार्रवाई

घटना का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी की कार्रवाई तेज की। शुरुआती रिपोर्टों में तीन गिरफ्तारियों की जानकारी सामने आई, जबकि बाद की रिपोर्ट में मुख्य आरोपी समेत पांच आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई।

मुख्य आरोपी नंदन यादव को पकड़ने के दौरान पुलिस के साथ मुठभेड़ की भी रिपोर्ट सामने आई। पुलिस के अनुसार आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने का प्रयास किया और पुलिस पर हमला किया, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी। इस घटनाक्रम की स्वतंत्र कानूनी जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।

घटना के बाद सोशल मीडिया बना दूसरा मुद्दा

इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह भी है कि नाबालिग पीड़िता से संबंधित वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हुआ।

पुलिस ने कथित तौर पर पीड़िता की पहचान उजागर करने वाले लगभग 120 सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

यहां समाज के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश है:

किसी अपराध का वीडियो शेयर करना न्याय दिलाने का तरीका नहीं है।

वीडियो शेयर करने से पीड़ित की पहचान उजागर हो सकती है, मानसिक आघात बढ़ सकता है और उसके परिवार को सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

POCSO Act की धारा 23 बच्चे की पहचान—नाम, पता, फोटो, परिवार, स्कूल या ऐसी किसी जानकारी के प्रकाशन पर रोक लगाती है जिससे बच्चे की पहचान उजागर हो सकती है।

इसलिए ऐसे मामलों में वीडियो को डाउनलोड करके दोबारा पोस्ट करना, WhatsApp ग्रुप में भेजना या सोशल मीडिया पर वायरल करना मदद नहीं, बल्कि पीड़ित की निजता के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

सबसे बड़ा सवाल: अगर वीडियो वायरल नहीं होता तो?

इस घटना से पुलिस की preventive policing और स्थानीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार घटना के समय पुलिस को तत्काल इसकी जानकारी नहीं मिली और वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने पीड़ितों की पहचान कर कार्रवाई शुरू की। पुलिस अधिकारियों ने क्षेत्र में पेट्रोलिंग व्यवस्था की समीक्षा की बात भी कही है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—पीड़ित या परिवार की शिकायत न आना, पुलिस की जिम्मेदारी को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, खासकर जब मामला सार्वजनिक स्थान पर नाबालिगों के साथ कथित गंभीर अपराध से जुड़ा हो।

POCSO Act की धारा 19 के तहत किसी व्यक्ति को किसी POCSO अपराध की जानकारी होने या आशंका होने पर पुलिस/विशेष किशोर पुलिस इकाई को सूचना देना अनिवार्य है। कानून पुलिस को ऐसी सूचना पर बिना अनावश्यक देरी कार्रवाई करने का दायित्व भी देता है।

समाज को इस घटना से क्या सीखना चाहिए?

1. अपराध देखकर चुप रहना समाधान नहीं

अगर कोई व्यक्ति किसी लड़की या बच्चे के साथ सार्वजनिक स्थान पर हिंसा या यौन दुर्व्यवहार होते देखता है, तो उसे सुरक्षित तरीके से पुलिस या आपातकालीन सेवा को सूचना देनी चाहिए।

भीड़ बनाकर तमाशा देखना या वीडियो बनाना समस्या को और गंभीर कर सकता है।

2. पीड़ित को दोष देना बंद करना होगा

किसी लड़की का किसी लड़के के साथ होना, किसी स्थान पर जाना या देर से घर लौटना किसी भी व्यक्ति को उसके साथ दुर्व्यवहार करने का अधिकार नहीं देता।

अपराध की जिम्मेदारी अपराध करने वाले व्यक्ति की होती है।

3. सोशल मीडिया पर संवेदनशीलता जरूरी है

आज मोबाइल कैमरा अपराध का सबूत जुटाने में मदद कर सकता है, लेकिन वही कैमरा पीड़ित की पहचान सार्वजनिक करके उसकी जिंदगी और मुश्किल बना सकता है।

वीडियो पुलिस को दें, सोशल मीडिया को नहीं।

4. युवाओं में कानून और सहमति की समझ जरूरी

स्कूल और कॉलेज स्तर पर बच्चों को केवल परीक्षा की तैयारी नहीं, बल्कि सहमति, व्यक्तिगत सीमाएं, साइबर सुरक्षा, लैंगिक सम्मान और कानूनी जिम्मेदारियों के बारे में भी शिक्षित किया जाना चाहिए।

क्या कानून में बदलाव की जरूरत है?

जमुई की घटना के आधार पर केवल “सजा और कठोर कर दी जाए” कहना पर्याप्त समाधान नहीं है। भारत में पहले से ही POCSO Act बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए व्यापक कानूनी ढांचा देता है और इसमें अनिवार्य रिपोर्टिंग, विशेष अदालत, बच्चे के अनुकूल प्रक्रिया तथा बंद कमरे में सुनवाई जैसी व्यवस्थाएं हैं।

इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है कि मौजूदा कानून जमीन पर कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से लागू हो रहा है।

फिर भी कुछ क्षेत्रों में सुधार पर विचार किया जा सकता है:

 1. Sensitive areas में mandatory safety audit

स्कूल, कोचिंग सेंटर और छात्र-छात्राओं के नियमित आवागमन वाले सुनसान रास्तों की पुलिस द्वारा नियमित सुरक्षा समीक्षा हो।

 2. POCSO मामलों के लिए तेज response system

नाबालिग से जुड़े गंभीर मामलों में सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस, महिला हेल्पलाइन, बाल संरक्षण इकाई और मेडिकल सहायता के बीच एकीकृत response mechanism मजबूत किया जाए।

3. सोशल मीडिया पर victim-identification रोकने की बेहतर व्यवस्था

प्लेटफॉर्म और पुलिस के बीच ऐसा त्वरित तंत्र होना चाहिए जिससे नाबालिग पीड़ित की पहचान वाले वीडियो को तेजी से हटाया जा सके और मूल uploader/resharer की पहचान की जा सके।

 4. Police accountability को measurable बनाया जाए

सिर्फ घटना के बाद गिरफ्तारी ही सफलता का पैमाना नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाए कि सूचना मिलने के बाद पुलिस ने कितने समय में response दिया, FIR कब दर्ज हुई, पीड़ित को सुरक्षा कब मिली और जांच कितनी जल्दी आगे बढ़ी।

5. Victim support को कानून का केंद्र बनाया जाए

कानूनी कार्रवाई के साथ पीड़ित बच्चे और परिवार को counselling, legal aid, privacy protection और आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराना जरूरी है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस मामले में पीड़ितों की सुरक्षा, कानूनी सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श की जरूरत पर जोर दिया है।

राजनीति से ऊपर उठकर देखने की जरूरत

ऐसी घटनाओं के बाद मामला अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाता है। अलग-अलग नेताओं ने घटना पर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं दी हैं। लेकिन किसी भी पक्ष के राजनीतिक बयान को घटना की जांच के निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

मुख्य सवाल बहुत सीधा है:

क्या पीड़ित को न्याय मिला? क्या आरोपी कानून के अनुसार दंडित होंगे? और क्या ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए व्यवस्था में ठोस सुधार होगा?

इन सवालों का जवाब जांच और अदालत की प्रक्रिया से आना चाहिए।

निष्कर्ष: जमुई सिर्फ एक खबर नहीं, एक चेतावनी है

जमुई की घटना समाज के सामने कई स्तरों पर एक गंभीर चुनौती रखती है।

एक तरफ अपराध करने वालों की जवाबदेही जरूरी है, दूसरी तरफ पुलिस की preventive व्यवस्था मजबूत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके साथ समाज को यह समझना होगा कि किसी लड़की या बच्चे की गरिमा मनोरंजन, भीड़ के तमाशे या सोशल मीडिया कंटेंट का विषय नहीं है।

कानून मौजूद हैं। POCSO बच्चों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट प्रावधान देता है और BNS में भी महिलाओं तथा यौन अपराधों से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं।

अब असली चुनौती है—इन कानूनों का समय पर, निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से पालन।

किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि अपराधी को कितनी सजा मिली; बल्कि इससे भी होती है कि अपराध होने से पहले व्यवस्था ने कितनी सुरक्षा दी, अपराध के बाद पीड़ित को कितना सहारा मिला और समाज ने पीड़ित के साथ कैसा व्यवहार किया।

जमुई की घटना से सबसे बड़ा सबक यही है—अपराध को रोकना केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, लेकिन अपराध होने पर कानून लागू करना निश्चित रूप से राज्य व्यवस्था की जिम्मेदारी है। समाज की जिम्मेदारी है कि वह तमाशबीन नहीं, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बने।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर Google का बड़ा कदम, भारत में सीधे अधिकारियों को दी जाएगी जानकारी

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नई दिल्ली- बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर Google ने भारत में एक अहम कदम उठाने का प्रस्ताव दिया है। कंपनी ने कहा है कि भारत से जुड़े Child Sexual Abuse Material (CSAM) के मामलों में संबंधित जानकारी सीधे Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) को उपलब्ध कराने की व्यवस्था को लागू करने पर सरकार के साथ बातचीत चल रही है।

अब तक ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग की प्रक्रिया में अमेरिका स्थित National Center for Missing & Exploited Children (NCMEC) की भूमिका रही है। Google के अनुसार, उसके प्लेटफॉर्म पर CSAM की पहचान होने पर सामग्री को हटाया जाता है और संबंधित रिपोर्टिंग प्रक्रिया शुरू की जाती है।

भारत सरकार की ओर से टेक कंपनियों से बच्चों से जुड़े गंभीर मामलों की जानकारी भारतीय कानून-प्रवर्तन एजेंसियों तक तेजी से पहुंचाने पर जोर दिया गया है। इसी क्रम में Google ने I4C के साथ सीधे जानकारी साझा करने के प्रस्ताव की पुष्टि की है।

Google का कहना है कि वह ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री की पहचान, उसे हटाने और उसकी रिपोर्टिंग के लिए लगातार काम कर रहा है। यह कदम भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और ऐसे मामलों में कार्रवाई को लेकर टेक कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के बीच सहयोग को और मजबूत कर सकता है।

शिशु संरक्षण माह: स्वस्थ बचपन और सुरक्षित भविष्य का आधार

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धनंजय राठौर

संयुक्त संचालक, जनसंपर्क

शिशु जीवन का वह नाजुक चरण है, जहाँ सही पोषण और स्वास्थ्य देखभाल उनके भविष्य की दिशा तय करती है। भारत जैसे विकासशील देश में 0 से 5 वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण, एनीमिया और विभिन्न संक्रामक बीमारियों की दर को कम करने के उद्देश्य से स्वास्थ्य एवं महिला-बाल विकास विभाग द्वारा 'शिशु संरक्षण माह' का आयोजन किया जाता है। यह एक विशेष स्वास्थ्य अभियान है, जो नवजात और छोटे बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कवच का कार्य करता है। बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण स्तर को सुधारने के लिए चलाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण अभियान है। छत्तीसगढ़ राज्य में इस अभियान का नया चरण 18 अगस्त 2026 से शुरू हो गया है, जिसके तहत 9 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों की विशेष देखभाल की जा रही है। 


अभियान का मुख्य उद्देश्य

इस विशेष माह को मनाने का प्राथमिक लक्ष्य बाल मृत्यु दर और 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में कमी लाना है। इसके साथ ही, बच्चों में समय पर बीमारियों की पहचान करना, उन्हें आवश्यक विटामिन और खनिज प्रदान करना, तथा माताओं को सही पोषण और स्वच्छता के प्रति जागरूक करना इस अभियान के प्रमुख उद्देश्य हैं।

प्रमुख स्वास्थ्य सेवाएं और गतिविधियाँ

शिशु संरक्षण माह के दौरान गांव-गांव और शहरों में स्वास्थ्य केंद्रों व आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से सेवाएं प्रदान की जाती हैं:

विटामिन 'ए' का अनुपूरण: 9 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों को रतौंधी (Night Blindness) जैसी आंखों की बीमारियों से बचाने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए विटामिन 'ए' की खुराक दी जाती है।

•एनीमिया से बचाव: 6 माह से 5 वर्ष तक के बच्चों को खून की कमी (एनीमिया) से सुरक्षित रखने हेतु आयरन एवं फॉलिक एसिड (IFA) सिरप का वितरण किया जाता है।

पूर्ण टीकाकरण: जिन बच्चों के नियमित टीके छूट गए हैं, उन्हें खसरा, रुबेला, पोलिया, काली खांसी और टिटनेस जैसी घातक बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकृत किया जाता है।

कुपोषण की पहचान व उपचार: आंगनवाड़ी स्तर पर सभी बच्चों का वजन और लंबाई नापकर गंभीर रूप से कुपोषित और मध्यम कुपोषित बच्चों को चिह्नित किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर गंभीर बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र भेजा जाता है।

•दस्त नियंत्रण और ओआरएस वितरण: बच्चों में डिहाइड्रेशन रोकने के लिए माताओं को ओआरएस पैकेट और जिंक की गोलियां दी जाती हैं।

जागरूकता एवं परामर्श सत्र

केवल दवाएं देना ही इस अभियान का हिस्सा नहीं है, बल्कि माताओं और परिवारों का व्यवहार परिवर्तन भी इसका महत्वपूर्ण अंग है:

•स्तनपान का महत्व: जन्म के तुरंत बाद (1 घंटे के अंदर) मां का पहला गाढ़ा पीला दूध (कोलस्ट्रम) और शुरुआती 6 माह तक केवल स्तनपान कराने के लिए माताओं को प्रेरित किया जाता है।

•ऊपरी आहार की शुरुआत: 6 माह की आयु पूरी होने के बाद बच्चे को स्तनपान के साथ-साथ सही मात्रा और गुणवत्ता वाला पूरक आहार (ऊपरी आहार) देने की सलाह दी जाती है। 6 से 12 महीने की उम्र के बीच, आपका शिशु पौष्टिक ठोस आहार खाना शुरू कर देगा, लेकिन माँ का दूध फिर भी पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना रहेगा। जब आपका शिशु माँ का दूध या फार्मूला दूध पीना छोड़ दे, तो उसे धीरे-धीरे और धैर्य से खिलाएँ। उसे नए स्वाद चखने दें, लेकिन ज़बरदस्ती न करें।  जब आपका बच्चा ठोस आहार खाना शुरू करे, तो उसे भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर खाने से रोकें ताकि वह गले में न अटके।

•अपने शिशु के मस्तिष्क के विकास में मदद करने के लिए उसे पढ़ें, उससे बातें करें और उसके लिए गाएं।

•अपने शिशु को सोने के पर्याप्त अवसर प्रदान करें - 4 से 12 महीने के शिशुओं के लिए अनुशंसित नींद की मात्रा प्रतिदिन 12 से 16 घंटे (24 घंटे की अवधि में, झपकी सहित) है।

•शिशु को सक्रिय रखना उसके विकास के लिए महत्वपूर्ण है। दिन भर उसके हाथ-पैर हिलाते रहने के लिए उसके साथ शारीरिक गतिविधियाँ करें। ज़मीन पर बैठकर हिलने-डुलने से शिशु मजबूत बनता है और साथ ही वह दुनिया को समझने और जानने की कला सीखता है।

स्वच्छता व सैनिटेशन: हाथ धोने की सही आदत और बच्चे की देखभाल में साफ-सफाई के महत्व पर चर्चा की जाती है, जिससे संक्रमण से बचाव संभव हो सके।

•शिशु को सक्रिय रखना उसके विकास के लिए महत्वपूर्ण है। दिन भर उसके हाथ-पैर हिलाते रहने के लिए उसके साथ शारीरिक गतिविधियाँ करें। ज़मीन पर बैठकर हिलने-डुलने से शिशु मजबूत बनता है और साथ ही वह दुनिया को समझने और जानने की कला सीखता है।

•शिशु को बांधकर रखने वाले उपकरण उसके विकास में बाधा डाल सकते हैं। शिशु को झूले, स्ट्रोलर, बाउंसिंग सीट, एक्सरसाइज़ सॉसर या अन्य किसी भी बांधकर रखने वाले उपकरण में लंबे समय तक न रखें। उन्हें बाहर निकालें और घूमने-फिरने दें।

शिशु संरक्षण माह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह हर परिवार और समाज के लिए अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी का अहसास कराने वाला समय है। जब समाज का हर वर्ग—स्वास्थ्य कार्यकर्ता, मितानिन/आशा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और अभिभावक—एक साथ मिलकर प्रयास करेंगे, तभी हम एक स्वस्थ, कुपोषण-मुक्त और सशक्त पीढ़ी का निर्माण कर सकेंगे।

मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार से मांगी माफी, CSAM और डीपफेक सामग्री पर जताया खेद

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नई दिल्ली- मेटा (Meta) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार के समक्ष कंपनी के प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री (Child Sexual Abuse Material - CSAM), डीपफेक कंटेंट तथा कुछ परिचालन संबंधी त्रुटियों को लेकर खेद व्यक्त करते हुए माफी मांगी है।

यह माफी ऐसे समय में आई है, जब भारत सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अवैध और हानिकारक सामग्री के खिलाफ कड़ा रुख अपना रही है। सरकार ने हाल ही में मेटा से इंस्टाग्राम पर प्रसारित CSAM से संबंधित सामग्री और विज्ञापनों को तत्काल हटाने तथा इस संबंध में विस्तृत स्पष्टीकरण देने को कहा था।

मेटा ने दोहराया कि उसकी CSAM के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' नीति है और कंपनी ऐसे कंटेंट की पहचान कर उसे हटाने के लिए अपनी तकनीकी प्रणालियों और सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत कर रही है।

इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही (Platform Accountability), डीपफेक और अन्य हानिकारक सामग्री पर नियंत्रण तथा 'सेफ हार्बर' (Safe Harbour) प्रावधानों को लेकर बहस तेज हो गई है। सरकार ने संकेत दिया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को भारतीय कानूनों और उपयोगकर्ता सुरक्षा से जुड़े मानकों का सख्ती से पालन करना होगा।

सशक्त बचपन,समृद्ध छत्तीसगढ़-बच्चों के पोषण, संरक्षण और सर्वांगीण विकास का नया अध्याय

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पोषण पखवाड़ा में छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय स्तर पर पहले स्थान पर

रायपुर-  किसी भी राज्य की वास्तविक प्रगति उसके बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा से मापी जाती है। छत्तीसगढ़ ने इसी सोच को आधार बनाकर बच्चों के सर्वांगीण विकास को शासन की सर्वाेच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की दूरदर्शी नीतियों और महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के सक्रिय नेतृत्व में प्रदेश में बच्चों के पोषण, संरक्षण और भविष्य निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल हुई हैं। आईसीडीएस, मिशन वात्सल्य, पोषण अभियान और बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन ने राज्य को बाल विकास के क्षेत्र में नई पहचान दिलाई है।

आंगनबाड़ी केंद्र बन रहे बाल विकास के आधुनिक केंद्र

प्रदेश में 11 हजार 490 आंगनबाड़ी केंद्रों को सक्षम और आकर्षक बनाने का कार्य तेजी से जारी है। इन केंद्रों में बिल्डिंग एज़ लर्निंग एड (BaLA) पेंटिंग, पोषण वाटिका, खेल एवं शिक्षण आधारित गतिविधियों जैसी आधुनिक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं, जिससे बच्चे सीखने के साथ आनंदमय वातावरण में विकसित हो सकें।

मनरेगा अभिसरण के माध्यम से 2 हजार 337 नए आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण को स्वीकृति मिली है। वहीं पीएम जनमन योजना के अंतर्गत 191 नए आंगनबाड़ी केंद्र संचालित किए जा चुके हैं। नियद नेल्ला नार 2.0 के तहत 10 जिलों में 12 हजार 964 आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों तक सेवाएं पहुंचा रहे हैं।

मानव संसाधन सुदृढ़ीकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की संख्या 51 हजार 45 से बढ़कर 52 हजार 258 तथा सहायिकाओं की संख्या 44 हजार 826 से बढ़कर 51 हजार 548 हो गई है, जिससे सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता दोनों में सुधार आया है।

कुपोषण पर प्रभावी प्रहार

छत्तीसगढ़ राज्य में बच्चों में कुपोषण कम करने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। पोषण ट्रैकर ऐप के आंकड़ों के अनुसार 0-5 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में स्टंटिंग में 7.82 प्रतिशत की कमी, वेट में 4.36 प्रतिशत की कमी, अंडरवेट में 2.76 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। दिसंबर 2023 में जहां बौनापन की दर 30.27 प्रतिशत थी, वह जून 2026 तक घटकर 22.45 प्रतिशत रह गई। यह उपलब्धि पोषण प्रबंधन, नियमित मॉनिटरिंग, सामुदायिक सहभागिता और आंगनबाड़ी आधारित सेवाओं के प्रभावी संचालन का परिणाम है।

पोषण अभियान में राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन

राष्ट्रीय पोषण माह और पोषण पखवाड़ा के दौरान छत्तीसगढ़ ने देशभर में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वित्तीय वर्ष 2024-25 में छत्तीसगढ़ राज्य प्रति आंगनबाड़ी गतिविधियों में प्रथम स्थान पर रहा। अप्रैल 2025 के पोषण पखवाड़ा में भी छत्तीसगढ़ ने राष्ट्रीय स्तर पर पहला स्थान प्राप्त किया।

प्रदेश में सितंबर-अक्टूबर 2025 के पोषण माह के दौरान 71 हजार 887 गतिविधियां और अप्रैल 2026 के पोषण पखवाड़ा में 34 लाख 93 हजार 474 गतिविधियां आयोजित की गईं। साथ ही स्थानीय स्तर पर पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए रेडी टू ईट इकाइयों की स्थापना की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल शुरू हो चुकी है।

मिशन वात्सल्य से बच्चों को सुरक्षा और संबल

अनाथ, परित्यक्त और विशेष संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के लिए मिशन वात्सल्य प्रभावी सुरक्षा कवच बनकर उभरा है। राज्य में बाल देखरेख संस्थाओं की संख्या बढ़कर 109 हो गई है।

मुख्यमंत्री बाल उदय योजना के माध्यम से सैकड़ों बच्चों को शिक्षा, देखभाल और पुनर्वास का लाभ मिला है। चाइल्ड हेल्पलाइन में प्राप्त 1 लाख 65 हजार 979 कॉलों पर त्वरित कार्रवाई करते हुए हजारों मामलों का निराकरण किया गया।

बाल संरक्षण सेवाओं के विस्तार का प्रभाव दत्तक ग्रहण और स्पॉन्सरशिप योजनाओं में भी स्पष्ट दिखाई देता है। दत्तक ग्रहण से लाभान्वित बच्चे 42 से बढ़कर 234 और स्पॉन्सरशिप से लाभान्वित बच्चे 767 से बढ़कर 2 हजार 37 हो गए हैं। यह वृद्धि बच्चों को पारिवारिक वातावरण और बेहतर भविष्य उपलब्ध कराने की दिशा में राज्य सरकार की संवेदनशील प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ की ओर मजबूत कदम

राज्य सरकार द्वारा प्रारंभ किए गए बाल विवाह मुक्त छत्तीसगढ़ अभियान ने सामाजिक जागरूकता और प्रशासनिक सक्रियता दोनों को नई दिशा दी है। बाल विवाह प्रतिरोध अधिकारियों की संख्या बढ़कर 1 हजार 382 हो गई है। इसके परिणामस्वरूप रोके गए बाल विवाहों की संख्या 109 से बढ़कर 888 तक पहुंच गई है। यह परिवर्तन केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि बेटियों के शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव का संकेत है।

भविष्य की मजबूत नींव

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में संचालित ये प्रयास छत्तीसगढ़ के लाखों बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षा, शिक्षित और सशक्त भविष्य की ओर अग्रसर कर रहे हैं।

आधुनिक आंगनबाड़ी व्यवस्था, पोषण सुधार, बाल संरक्षण सेवाओं का विस्तार और बाल विवाह उन्मूलन जैसे बहुआयामी प्रयासों ने छत्तीसगढ़ को बाल विकास के क्षेत्र में एक प्रेरणादायी और आदर्श राज्य के रूप में स्थापित किया है।

सशक्त बचपन ही विकसित छत्तीसगढ़ की सबसे मजबूत नींव है और राज्य सरकार उसी नींव को और अधिक मजबूत बनाने के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है।

बेंगलुरु डे-केयर सेंटर में बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार से देश स्तब्ध, पुलिस जांच में जुटी

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बेंगलुरु- बेंगलुरु के एक डे-केयर सेंटर में छोटे बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला सामने आने के बाद पूरे देश में चिंता और आक्रोश का माहौल है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और डे-केयर सेंटर के संचालन व कर्मचारियों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है।

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, डे-केयर सेंटर में मासूम बच्चों के साथ कथित रूप से अमानवीय व्यवहार किए जाने के आरोप लगे हैं। घटना सामने आने के बाद अभिभावकों में भारी नाराजगी है और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

इस मामले ने देशभर में डे-केयर और चाइल्डकेयर केंद्रों की निगरानी तथा सुरक्षा मानकों को और सख्त बनाने की मांग तेज कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे संस्थानों में नियमित निरीक्षण, प्रशिक्षित स्टाफ और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक है ताकि बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।

पुलिस का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है और जांच के आधार पर दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बाद शिक्षा विभाग ने स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा हेतु जारी किए कड़े निर्देश

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स्कूलों में बच्चों को आवारा कुत्तों से बचाने के लिए शिक्षा विभाग की नई व्यवस्था लागू

रायपुर- माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Suo Moto Writ Petition (Civil) No. 05/2025 में दिए गए स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अनुपालन में तथा छत्तीसगढ़ शासन, पशुधन विकास विभाग, मंत्रालय नवा रायपुर के पत्र क्रमांक E-166671 & 153108/LAW-42/1802/2025/1724 दिनांक 13.11.2025 के आधार पर शिक्षा विभाग द्वारा प्रदेश के सभी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए  आदेश जारी किया गया है। 

शिक्षा विभाग द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, अब राज्य के प्रत्येक स्कूल के प्राचार्य या संस्था प्रमुख को नोडल अधिकारी के रूप में नामित किया गया है। नोडल अधिकारी की यह जिम्मेदारी होगी कि स्कूल परिसर या आसपास यदि आवारा कुत्ते दिखाई दें, तो उसकी जानकारी तुरंत संबंधित ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत या नगर निगम के डॉग क्रैचर नोडल अधिकारी को दें। साथ ही स्कूल परिसर में कुत्तों का प्रवेश रोकने के लिए आवश्यक अवरोधक उपाय सुनिश्चित करें। यदि किसी बच्चे के साथ आवारा कुत्ते द्वारा काटे जाने की घटना होती है, तो बच्चे को तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र ले जाने की जिम्मेदारी स्कूल प्रशासन की होगी, ताकि आवश्यक प्राथमिक इलाज समय पर उपलब्ध कराया जा सके।

शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि इन निर्देशों का उद्देश्य प्रदेश के सभी स्कूलों में बच्चों के लिए सुरक्षित, भय-मुक्त और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप तथा पशुधन विकास विभाग के मार्गदर्शन में यह अभियान पूरे प्रदेश में तेजी और संवेदनशीलता के साथ लागू किया जा रहा है।

शिक्षा विभाग ने सभी जिलों के अधिकारियों, बीईओ, बीआरसी, सीआरसी तथा स्कूल प्रबंधन समितियों से अपेक्षा की है कि वे इन दिशा-निर्देशों का कठोरतापूर्वक पालन सुनिश्चित करें और बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

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