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उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कर्नाटक के श्री वीरभद्रेश्वर मंदिर में राजगोपुरम का उद्घाटन किया

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भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज श्री वीरभद्रेश्वर मंदिर में आयोजित राजगोपुरम उद्घाटन, कलशारोहण और महाकुंभाभिषेक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। यह कार्यक्रम कर्नाटक के बेलगावी जिले के श्री क्षेत्र यादुर में आयोजित हुआ।

मुख्य बातें

  • उपराष्ट्रपति ने इस अवसर को आध्यात्मिक पुनर्जागरण और सभ्यतागत पुनः पुष्टि का क्षण बताया।

  • उन्होंने कहा कि भारत केवल एक राष्ट्र नहीं बल्कि एक जीवंत सभ्यता है, जो सिंधु घाटी से लेकर कन्याकुमारी तक चेतना की निरंतर धारा के रूप में बहती आई है।

  • उन्होंने बताया कि यही वह पवित्र भूमि है जहाँ वेदों का ज्ञान पहली बार सुना गया और जहाँ भगवद् गीता का संदेश आज भी मानवता को साहस से कर्म करने, धर्मपूर्वक जीवन जीने और श्रद्धा से समर्पित होने की प्रेरणा देता है।

हिंदू दर्शन पर विचार

उपराष्ट्रपति ने कहा कि हिंदू चेतना केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवन पद्धति है।
उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम् – पूरी दुनिया एक परिवार है” के सिद्धांत को भारत की आध्यात्मिक दृष्टि का आधार बताया, जो प्रकृति और हर मानव में दिव्यता देखती है।

वीरशैव-लिंगायत परंपरा

उन्होंने वीरशैव लिंगायत परंपरा के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि इस परंपरा ने कर्नाटक और पड़ोसी महाराष्ट्र में आध्यात्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

संतों को श्रद्धांजलि

उपराष्ट्रपति ने शिव योगी श्री कादसिद्धेश्वर स्वामीजी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने इस पवित्र स्थल को पुनः खोजकर और पुनर्जीवित कर सनातन धर्म की ज्योति को फिर से प्रज्ज्वलित किया।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म समय की परीक्षा से गुजर सकता है, लेकिन कभी मिट नहीं सकता।

विकास और विरासत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न “विकास भी, विरासत भी” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत आज तकनीकी रूप से उन्नत, आर्थिक रूप से मजबूत और वैश्विक रूप से प्रभावशाली राष्ट्र बन रहा है, लेकिन साथ ही अपनी सभ्यतागत जड़ों से भी जुड़ा हुआ है।

अन्य गणमान्य लोग

इस अवसर पर कई प्रमुख व्यक्तित्व उपस्थित थे, जिनमें शामिल हैं:

  • थावरचंद गहलोत – कर्नाटक के राज्यपाल

  • एम. बी. पाटिल – कर्नाटक सरकार में मंत्री

  • श्रीशैल जगद्गुरु डॉ. चन्ना सिद्धराम पंडिताराध्य शिवाचार्य स्वामीजी

  • इरन्ना कडाडी– राज्यसभा सांसद

साथ ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु और धार्मिक नेता भी इस समारोह में उपस्थित रहे।



कर्नाटक के बेलगावी में छत्रपति शिवाजी महाराज की 25 फुट ऊँची प्रतिमा का उद्घाटन, राज्य और राष्ट्र गौरव का प्रतीक

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कर्नाटक के बेलगावी जिले के अठाणी में मराठा प्रतिमा छत्रपति शिवाजी महाराज की 25 फुट ऊँची भव्य प्रतिमा का उद्घाटन केंद्रीय संचार एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किया। इस अवसर को ऐतिहासिक बताते हुए मंत्री ने कहा कि यह केवल एक प्रतिमा का अनावरण नहीं है, बल्कि भारत की स्वाभिमान, साहस और हिंदवी स्वराज की चेतना को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का संकल्प है।

सिंधिया ने कहा कि “जय भवानी, जय शिवाजी” का उद्घोष आज भी हर भारतीय में निडरता, राष्ट्रीय कर्तव्य और गर्व की भावना जगाता है। कार्यक्रम में मंजुनाथ भारती स्वामीजी, संभाजी भिड़े गुरुजी, कर्नाटक के मंत्री संतोष लाड और सतीश जरकिहोली, कर्नाटक के पूर्व उपमुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी, कोल्हापुर सांसद शाहू छत्रपति महाराज, पूर्व कर्नाटक मंत्री बी. पाटिल, पीजीआर सिंधे और अन्य गणमान्य नेता उपस्थित थे।

शिवाजी महाराज: हिंदवी स्वराज के निर्माता और राष्ट्रीय कर्तव्य का प्रतीक

केंद्रीय मंत्री ने अपने संबोधन में छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और संघर्षों को याद किया, बताया कि मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्होंने हिंदवी स्वराज की प्रतिज्ञा ली। अद्वितीय साहस, रणनीतिक कुशलता और दूरदर्शी नेतृत्व के माध्यम से उन्होंने आक्रमणकारियों को परास्त किया और भारत के स्वाभिमान की रक्षा की।

सिंधिया ने कहा कि बेलगावी और अठाणी क्षेत्र शिवाजी महाराज की वीरता का साक्षी रहा है। दक्षिण भारत में उनके अभियान के दौरान यह क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह डेक्कन, कोंकण और गोवा को जोड़ने वाले मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करता था। इसी भूमि पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा का उद्घाटन इतिहास, परंपरा और वर्तमान को जोड़ने वाला गर्व का क्षण है।

आधुनिक भारत शिवाजी महाराज से प्रेरित होकर आगे बढ़ रहा है:

केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि भारत के आत्म-सम्मान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में बढ़ते कदमों के बीच छत्रपति शिवाजी महाराज का चरित्र और आदर्श और भी प्रासंगिक हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत और राष्ट्रीय कर्तव्य की भावना देश भर में गहराई से जुड़ी हुई है।

सिंधिया ने कहा कि यह प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती रहेगी कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है, साहस कभी नहीं मिटता और स्वराज की भावना हमेशा जीवित रहती है।

सिंधिया महाराष्ट्र और कर्नाटक के दो दिवसीय दौरे पर थे, जिसमें उन्होंने पहले कोल्हापुर में बॉम्बे जिमखाना के 150 वर्ष पूरे होने पर स्मारक डाक टिकट का विमोचन किया और ग्रामीण डाक सेवक सम्मेलन में भाग लिया। रविवार को बेलगावी में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा के उद्घाटन समारोह में उन्होंने भाग लिया।

संयुक्त सैन्य अभ्यास “मित्र शक्ति–2025” का ग्यारहवां संस्करण बेलगावी, कर्नाटक में प्रारंभ

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संयुक्त सैन्य अभ्यास “मित्र शक्ति–2025” का ग्यारहवां संस्करण आज कर्नाटक के बेलगावी स्थित फॉरेन ट्रेनिंग नोड में प्रारंभ हुआ। यह अभ्यास 10 से 23 नवम्बर 2025 तक आयोजित किया जा रहा है।

भारतीय दल में 170 सैनिक शामिल हैं, जिनका नेतृत्व मुख्य रूप से राजपूत रेजिमेंट कर रही है। श्रीलंका की ओर से 135 सैनिक भाग ले रहे हैं, जिनमें प्रमुख रूप से गजाबा रेजिमेंट के सैनिक शामिल हैं। इसके अलावा भारतीय वायुसेना के 20 और श्रीलंकाई वायुसेना के 10 कर्मी भी इस अभ्यास में भाग ले रहे हैं।

इस अभ्यास का उद्देश्य संयुक्त रूप से संयुक्त राष्ट्र के अध्याय VII के तहत उप-पारंपरिक अभियानों (Sub Conventional Operations) के संचालन का अभ्यास करना है। अभ्यास के दायरे में आतंकवाद-रोधी अभियानों के दौरान संयुक्त प्रतिक्रियाओं का समन्वय शामिल है। दोनों सेनाएं छापामार कार्रवाई, खोज एवं नष्ट करने के मिशन, हेलीबोर्न ऑपरेशन आदि जैसी सामरिक गतिविधियों का अभ्यास करेंगी। इसके अतिरिक्त, अभ्यास पाठ्यक्रम में आर्मी मार्शल आर्ट्स रूटीन (AMAR), कॉम्बैट रिफ्लेक्स शूटिंग और योग भी शामिल हैं।

मित्र शक्ति–2025 में ड्रोन, काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स (Counter-UAS) और हेलीकॉप्टरों का उपयोग भी किया जाएगा। अभ्यास के दौरान दोनों पक्ष मिलकर हेलिपैड की सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी अभियानों में घायल सैनिकों की निकासी (casualty evacuation) जैसी प्रक्रियाओं का भी अभ्यास करेंगे। संयुक्त प्रयासों का लक्ष्य सैनिकों के बीच पारस्परिक संचालन क्षमता (interoperability) को बढ़ाना और संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों के दौरान जीवन एवं संपत्ति के नुकसान के जोखिम को कम करना है।

दोनों सेनाएं युद्धक कौशलों की विस्तृत श्रृंखला पर संयुक्त अभ्यासों के दौरान अपने अनुभव और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करेंगी। इन साझा प्रयासों से भारतीय सेना और श्रीलंकाई सेना के बीच रक्षा सहयोग और अधिक मजबूत होगा। यह अभ्यास दोनों पड़ोसी देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को भी सुदृढ़ करेगा।

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