Media24Media.com: छत्तीसगढ़ की संस्कृति में रचा-बसा है सुआ नृत्य, अंचल में मची धूम

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छत्तीसगढ़ की संस्कृति में रचा-बसा है सुआ नृत्य, अंचल में मची धूम

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आरंग। इन दिनों अंचल में सुआ नृत्य की धूम मची है। दीपावली के नजदीक आते ही बालिकाएं और महिलाएं समूह में घर-घर, गली-मोहल्ले में पहुंचकर सुआ गीतों के साथ नृत्य कर रही हैं।इस नृत्य में धार्मिक और सामाजिक संदेश से भरे गीत गाए जाते हैं।


बालिकाएं गोल घेरा बनाकर तालियों की थाप पर थिरकती हैं। यह विशुद्ध समूह नृत्य है, जिसमें किसी वाद्ययंत्र की आवश्यकता नहीं होती। कुछ बालिकाएं गीत की टेक उठाती हैं और शेष उसे दोहराते हुए नाचती हैं। समापन पर सुआ के लिए अन्न-धन मांगा जाता है और अन्न-धन मिलने पर आशीर्वाद गीत गाकर आशीष दिया जाता है।

हमर गांव हमर संस्कृति,,हमर पहचान,सुवा नृत्य लखौली

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जानकारों के अनुसार सुआ नृत्य की परंपरा कब से चली आ रही है, इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं है। सुआ एक शाकाहारी पक्षी है जो हूबहू मनुष्य की आवाज निकाल सकता है। मान्यता है कि पहले युवतियां अपने मन की बातें सुआ पक्षी के सामने प्रकट करती थीं, जो धीरे-धीरे गीत और बाद में नृत्य का रूप ले लीं। वहीं संस्कृति प्रेमी शिक्षक महेन्द्र पटेल का कहना है कि सुआ नृत्य छत्तीसगढ़ की संस्कृति में रचा-बसा है।

दीपावली नजदीक आते ही बालिकाएं इसके लिए उत्साहित रहती हैं। यह नृत्य दीपावली के साथ-साथ तीजा, पोला, छेरछेरा और शरद पूर्णिमा पर भी विशेष रूप से किया जाता है। आजकल गांव-गांव में सुआ नृत्य प्रतियोगिताएं भी आयोजित होने लगी हैं, जो हमारी लोक-संस्कृति को सहेजने का सुंदर प्रयास है।

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