Media24Media.com: चावल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र का बड़ा फैसला: OMSS के तहत बिक्री का लक्ष्य दोगुना कर 50 लाख टन किया

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चावल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र का बड़ा फैसला: OMSS के तहत बिक्री का लक्ष्य दोगुना कर 50 लाख टन किया

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नई दिल्ली- देश में चावल की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति को लेकर चिंताओं के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ओपन मार्केट सेल स्कीम (डोमेस्टिक) यानी OMSS (D) के तहत चावल बेचने का लक्ष्य 25 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 50 लाख मीट्रिक टन कर दिया है। इसका उद्देश्य बाजार में चावल की उपलब्धता बढ़ाना, कीमतों को स्थिर रखने में मदद करना और जमाखोरी पर अंकुश लगाना है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 6 नवंबर को इन उपायों की जानकारी दी।

क्या है सरकार का नया फैसला?

केंद्र सरकार ने OMSS (D) के तहत निजी कारोबारियों को ई-नीलामी के माध्यम से बेचे जाने वाले चावल की मात्रा का लक्ष्य दोगुना कर दिया है।

  • पहले बिक्री का लक्ष्य: 25 लाख मीट्रिक टन

  • नया बिक्री लक्ष्य: 50 लाख मीट्रिक टन

  • 31 अक्टूबर 2026 तक बिक्री: 25 लाख मीट्रिक टन

  • पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में बिक्री: 11 लाख मीट्रिक टन

इसका मतलब है कि चालू वित्त वर्ष में 31 अक्टूबर तक पिछले साल की समान अवधि की तुलना में OMSS के माध्यम से काफी अधिक चावल बाजार में पहुंचाया जा चुका है।

क्या है OMSS और इससे आम लोगों को क्या फायदा होगा?

OMSS यानी Open Market Sale Scheme केंद्र सरकार की एक व्यवस्था है, जिसके तहत भारतीय खाद्य निगम (FCI) अपने उपलब्ध खाद्यान्न भंडार से चावल और गेहूं जैसी उपज खुले बाजार में बेचता है।

इस योजना के तहत चावल की ई-नीलामी की जाती है और निजी खरीदार इसमें हिस्सा ले सकते हैं। सरकार का उद्देश्य जरूरत के समय बाजार में अनाज की अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध कराना है।

इससे संभावित रूप से:

  • बाजार में चावल की उपलब्धता बढ़ सकती है।

  • थोक बाजार में आपूर्ति का दबाव कम हो सकता है।

  • चावल की कीमतों में तेजी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

  • कारोबारियों के पास अतिरिक्त स्टॉक उपलब्ध होने से आपूर्ति बेहतर हो सकती है।

  • उपभोक्ताओं को कीमतों में स्थिरता का लाभ मिल सकता है।

हालांकि, इसका असर खुदरा कीमतों पर कितनी जल्दी और कितना होगा, यह स्थानीय आपूर्ति, मांग, चावल की किस्म और व्यापारियों की कीमतों पर भी निर्भर करेगा।

चावल की कीमतों पर क्यों बढ़ रही है चिंता?

चावल की कीमतों में तेजी के पीछे कमजोर और असमान मानसूनी बारिश को एक महत्वपूर्ण कारण बताया जा रहा है। बारिश की कमी और फसल के पकने के दौरान मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों से उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है।

Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल भारत के चावल उत्पादन में पिछले करीब एक दशक में पहली बार गिरावट आने की आशंका जताई गई है। हालांकि, यह उत्पादन संबंधी अनुमान है, अंतिम सरकारी आंकड़ा नहीं।

Business Standard की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2026 में खुदरा चावल महंगाई सालाना आधार पर 8.25 प्रतिशत रही, जबकि अगस्त में यह 5.89 प्रतिशत थी। रिपोर्ट में औसत खुदरा कीमत लगभग 48.23 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई। कुछ दक्षिण भारतीय किस्मों की कीमतों में इससे भी अधिक तेजी दर्ज की गई।

कारोबारियों और मिल मालिकों को हर शुक्रवार देना होगा स्टॉक का ब्यौरा

सरकार ने केवल चावल की बिक्री का लक्ष्य नहीं बढ़ाया है, बल्कि जमाखोरी और बाजार में कृत्रिम कमी रोकने के लिए स्टॉक रिपोर्टिंग को भी अनिवार्य कर दिया है।

6 नवंबर 2026 को जारी आदेश के अनुसार, देशभर के व्यापारियों, थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं, बड़ी रिटेल चेन, प्रोसेसर और राइस मिल मालिकों को अपने चावल और धान के स्टॉक की जानकारी देनी होगी।

स्टॉक की जानकारी छह श्रेणियों में देनी होगी:

  1. बासमती चावल

  2. गैर-बासमती प्रीमियम चावल

  3. गैर-बासमती चावल

  4. पारबॉयल्ड यानी उसना चावल

  5. टूटा हुआ चावल

  6. धान

सभी संबंधित इकाइयों को हर शुक्रवार सरकारी Food Stock Portal पर स्टॉक की जानकारी अपडेट करनी होगी। गलत जानकारी देने या नियमों का उल्लंघन करने पर आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 6 और 7 के तहत कार्रवाई हो सकती है।

पांच दक्षिणी राज्यों को स्टॉक लिमिट लगाने की अनुमति

चावल की उपलब्धता बनाए रखने और जमाखोरी पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने पांच दक्षिणी राज्यों को धान और चावल पर स्टॉक लिमिट लागू करने की सहमति दी है।

इन राज्यों में शामिल हैं:

  • आंध्र प्रदेश

  • कर्नाटक

  • केरल

  • तमिलनाडु

  • तेलंगाना

राज्य सरकारें आवश्यकता के अनुसार अपने नियंत्रण आदेशों के जरिए स्टॉक सीमा लागू कर सकती हैं। ये सीमाएं 31 जनवरी 2027 तक प्रभावी रह सकती हैं।

इस कदम का उद्देश्य बाजार में चावल की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना और जमाखोरी तथा कालाबाजारी को रोकना है।

भारत चावल की उपलब्धता भी बढ़ाई जाएगी

सरकार ने आम उपभोक्ताओं तक किफायती चावल पहुंचाने के लिए भारत चावल की अतिरिक्त मात्रा उपलब्ध कराने का फैसला किया है।

इसके लिए तीन एजेंसियों को अतिरिक्त स्टॉक आवंटित किया जा रहा है:

  • नैफेड (NAFED)

  • एनसीसीएफ (NCCF)

  • केंद्रीय भंडार (Kendriya Bhandar)

इन एजेंसियों को वितरण के अधिक से अधिक माध्यम तलाशने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों में भारत चावल की उपलब्धता बढ़ाई जा सके।

आम आदमी और किसानों पर क्या पड़ेगा असर?

सरकार के इन फैसलों का सीधा उद्देश्य उपभोक्ताओं को उचित कीमतों पर चावल उपलब्ध कराना है।

आम उपभोक्ताओं के लिए: बाजार में आपूर्ति बढ़ने से कीमतों में तेजी को रोकने में मदद मिल सकती है। भारत चावल की अतिरिक्त उपलब्धता से किफायती विकल्प भी बढ़ सकते हैं।

व्यापारियों के लिए: स्टॉक की नियमित जानकारी देना अनिवार्य होगा। नियमों का पालन नहीं करने पर कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

किसानों के लिए: बाजार में धान की कीमतों और सरकारी खरीद पर इन फैसलों का अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, OMSS के तहत चावल बेचने का निर्णय अपने आप में किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या सरकारी खरीद व्यवस्था में बदलाव नहीं है।

निष्कर्ष

चावल की बढ़ती कीमतों और संभावित उत्पादन दबाव के बीच केंद्र सरकार ने बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के लिए कई कदम एक साथ उठाए हैं। OMSS के तहत बिक्री का लक्ष्य 50 लाख मीट्रिक टन करना, कारोबारियों के लिए साप्ताहिक स्टॉक रिपोर्टिंग अनिवार्य बनाना, पांच दक्षिणी राज्यों को स्टॉक लिमिट की अनुमति देना और भारत चावल की उपलब्धता बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन फैसलों का असर आने वाले दिनों में थोक और खुदरा बाजार में चावल की कीमतों पर कितना पड़ता है।


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