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विश्व पर्यावरण दिवस विशेष : पर्यावरण संरक्षण में मिसाल बनी 'पीपला वेलफेयर फाउंडेशन'

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 आरंग । "सांसें हो रही हैं कम, आओ पेड़ लगाएं हम"—इस ध्येय वाक्य को साकार कर रही है आरंग की सामाजिक संस्था- 'पीपला वेलफेयर फाउंडेशन'। वर्ष 2021 में कोविड-19 महामारी के दौर में अस्तित्व में आयी इस संस्था ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। संस्था ने अब तक 2000 से अधिक पौधों का रोपण किया है, जिनमें से सैकड़ों पौधे अब बड़े होकर आज फल-फूल रहे हैं और लोगों को छाया व ऑक्सीजन प्रदान कर रहे हैं। संस्था की सेवाओं से प्रभावित होकर अनेक सेवाभावी लोग स्वेच्छा से आर्थिक सहयोग और गुप्तदान करके पुण्य कार्य में सहभागिता निभा रहे हैं।

पीपला वेलफेयर फाउंडेशन

पौधारोपण के साथ संरक्षण पर विशेष ध्यान

'पीपला वेलफेयर फाउंडेशन' न केवल पौधारोपण करती है, बल्कि लगाए गए पौधों की प्रतिदिन देखभाल, सिंचाई और संरक्षण भी सुनिश्चित करती है। संस्था का मानना है कि पौधारोपण से अधिक महत्वपूर्ण उनका संरक्षण है। यदि पौधों की समय पर देखभाल न की जाए, तो वे नष्ट हो जाते हैं और पौधारोपण का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। संस्था के सदस्य नियमित रूप से नगर व आसपास के क्षेत्रों में स्वच्छता अभियान, तालाबों की सफाई, पौधारोपण और संरक्षण का कार्य करते हैं।


कोविड काल में अस्तित्व में आयी यह संस्था

कोविड-19 महामारी के दौरान जब लोग ऑक्सीजन के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब कुछ समाजसेवियों ने मिलकर 'पीपला वेलफेयर फाउंडेशन' की नींव रखी। संस्था का प्रतीक चिन्ह चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देने वाले पीपल के पत्ते को बनाया गया। 2021 से अब तक संस्था ने न केवल पौधारोपण किया, बल्कि नगर में 200 से अधिक रचनात्मक कार्य कर अपनी अलग पहचान बनाई है।


जनजागरूकता के लिए निरंतर प्रयास

संस्था पौधारोपण के साथ-साथ लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक भी कर रही है। अखिल भारतीय स्तर पर क्विज प्रतियोगिताओं का आयोजन, पत्र-पत्रिकाओं में लेखों का प्रकाशन, सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार-प्रसार और बरसात के मौसम में हजारों पौधों का नि:शुल्क वितरण—इन सब प्रयासों से संस्था समाज में हरित क्रांति लाने का प्रयास कर रही है। पौधों के संरक्षण के लिए मिट्टी डालकर चबूतरा निर्माण जैसे नवाचार भी किए जा रहे हैं।

इनकी प्रमुख सहभागिता

संस्था के कार्यों में समय-समय पर संरक्षक आनंदराम पत्रकारश्री के मार्गदर्शन में सेवाभावी सर्वश्री कोमल लाखोटी, अभिमन्यु साहू, दूजेराम धीवर, महेन्द्र कुमार पटेल, संजय मेश्राम, रमेश देवांगन, यादेश देवांगन, प्रतीक टोंड्रे,होरीलाल पटेल, राकेश जलक्षत्री, खिलेश देवांगन,मोहन सोनकर, दुर्गेश निर्मलकर, भागवत जलक्षत्री, बसंत साहू, हरीश दीवान, डुमेंद्र साहू, चुमेश्वर देवांगन, शैलेन्द्र चंद्राकर,सूरज सोनकर ,दिना सोनकर,अशोक साहू,छत्रधारी सोनकर ,सियाराम सोनकर,नीरज साहू, रमेश चंद्राकर,होमेन्द्र साहू ,रोशन चंद्राकर सहित सभी सदस्य सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

नवाचारी शिक्षक महेन्द्र कुमार पटेल: पर्यावरण संरक्षण की प्रेरक मिसाल

शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला चरौदा (आरंग) में पदस्थ नवाचारी शिक्षक महेन्द्र कुमार पटेल, जो पीपला फाउंडेशन के उपाध्यक्ष भी हैं, पर्यावरण के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने न केवल अपने गृहग्राम लाफिनकला (महासमुंद), बल्कि विद्यालय परिसर में भी जनसहभागिता के माध्यम से सैकड़ों पौधे रोपित किए हैं। महेन्द्र कुमार पटेल न केवल पौधे लगाते हैं, बल्कि उनकी नियमित देखभाल भी स्वयं करते हैं। उनके संरक्षण में अब तक 100 से अधिक पौधे बड़े होकर छाँव और फल देने लगे हैं।



शिक्षक महेन्द्र कुमार पटेल के मार्गदर्शन में विद्यालय के बच्चे भी पेड़-पौधों की देखभाल में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं, जिससे उनमें भी पर्यावरण के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना विकसित हो रही है। पर्यावरण के प्रति उनकी चिंता इतनी गहरी है कि उन्होंने अपने परिवार को निर्देशित किया है कि उनके निधन के पश्चात उनकी अंत्येष्टि गोबर के कंडों से ही जलाई जाए, ताकि पर्यावरण को न्यूनतम क्षति पहुंचे।

कोविड काल में उन्होंने अपने निजी खर्च पर पर्यावरण संरक्षण पर आधारित प्रेरक गीत तैयार कर सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को जागरूक किया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद भी पौधरोपण जारी रखने हेतु कम से कम 50,000 रुपये डिपॉजिट करने की इच्छा जताई है, जिससे उनके परिवारजन उनकी स्मृति में पौधे लगा सकें।

हर वर्ष अपने जन्मदिन पर वे पीपल का पौधा रोपित करते हैं, ताकि समाज को शुद्ध ऑक्सीजन मिल सके। इसके अतिरिक्त, वे अपने पिता स्वर्गीय शिवचरण पटेल सहित गांव के अन्य दिवंगत बुजुर्गों की स्मृति में भी पौधरोपण कर उनका संरक्षण कर रहे हैं।

महेन्द्र कुमार पटेल का यह समर्पण न केवल पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अनुकरणीय है, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणास्त्रोत भी है। उनकी सोच और कार्यशैली से यह स्पष्ट होता है कि यदि प्रत्येक नागरिक इसी तरह जिम्मेदारी निभाए, तो हमारा पर्यावरण और समाज दोनों ही सुरक्षित और समृद्ध हो सकते हैं।

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