Media24Media.com: कांकेर जिले में पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं

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कांकेर जिले में पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं

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 बस्तर का स्वागत द्वार कहलाने वाला कांकेर जिला विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्राकृतिक सम्पदाओं के अलावा सांस्कृतिक, पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक धरोहरों को समेटा हुआ है। यहां पर्यटन की अप्रतिम एवं अपार संभावनाएं हैं, जिन्हें संरक्षित एवं विकसित करने की आवश्यकता है। जिले में एक ओर जहां प्राकृतिक जलप्रपात- मलाजकुंडुम (कांकेर) तथा चर्रे-मर्रे (अंतागढ़) स्थित है वहीं जिला मुख्यालय में ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित गढ़िया पहाड़ अपनी नैसर्गिक सुंदरता के लिए विख्यात है। इसके अलावा अनेक प्राकृतिक गुफाएं भी यहां मौजूद है, जिनमें जोगीगुफा, रानीडांगरी, ग्राम उड़कुड़ा एवं गोटीटोला आदि शामिल हैं।


ग्राम गोटीटोला की पहाड़ियों में है अतिप्राचीन शैलचित्र

जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर चारामा विकासखण्ड के ग्राम गोटीटोला के निकट पहाड़ियों के बीच रामगुड़ा नामक विशाल वृत्ताकार शैलखण्ड है, जिसकी परतों पर रहस्यमयी आकृतियां उकेरी गई हैं। यह अपने आप में रहस्यमयी और कौतुहल का विषय है। ये आकृतियां कितनी प्राचीन हैं, यह पुरातात्विक शोध एवं अन्वेषण का विषय है, किन्तु ग्रामीणों को कहना है कि ये अति प्राचीन आकृतियां हैं, जो लगभग 7 से 10 हजार साल पुरानी है। ग्रामीण श्री भूमिलाल मण्डावी ने बताया कि यह गांव वालों के लिए यह आस्था एवं धार्मिक महत्व का क्षेत्र है। वे प्रतिवर्ष कृष्ण जन्माष्टमी और नवरात्रि पर्व में विशेष पूजा करने यहां आते हैं।


इन शैल चित्रों को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि विशाल चट्टान की परत पर मानव की आकृति लाल एवं पीले रंग से उकेरी गई है, इसमें स्त्री, पुरूष एवं निचले हिस्से पर बच्चे भी दिखाई दे रहे हैं। इन आकृतियों के रंग इतने पक्के व अमिट हैं कि इतने हजारों साल भी फीके नहीं हुए हैं। इसके अलावा शैलचित्रों के ऊपरी हिस्से मनुष्य के हाथ के पंजों के निशान परिलक्षित हो रहे हैं। इन मानवाकृतियों की बांयी ओर थोड़े ऊपर में दो और मनुष्यनुमा आकृति बनी हुई है, जो किसी एलियन या यूएफओ की भांति दिख रही है। अर्थात उक्त आकृतियों में पैर से सिर तक विभिन्न अंग दृष्टिगोचर हो रहे हैं, किन्तु इनके सिर के बाल मनुष्य के बालों से बिलकुल ही अलग ही प्रतीत हो रहे हैं तथा पैरों एवं हाथों में तीन-तीन उंगलियां ही दिखाई पड़ रही हैं, जो यूएफओ के जैसी दिख रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग इन चित्रों के अध्ययन के लिए नासा और इसरो की सहायता लेने की योजना बना रहा है।

एलियन्सनुमा आकृतियां शोध का विषय

पुरातत्वविद् के अनुसार, इन चित्रों में दर्शाए गए प्राणी हॉलीवुड और बॉलीवुड फिल्मों में दिखाए गए एलियंस से काफी हद तक मिलते-जुलते हैं। स्थानीय निवासियों के बीच इन चित्रों को लेकर विभिन्न मान्यताएं हैं। कुछ लोग इनकी पूजा करते हैं, जबकि अन्य अपने पूर्वजों से सुनी किंवदंतियों का उल्लेख करते हैं, जिनमें ‘रोहेला’ (छोटे आकार के प्राणी) के बारे में भी जिक्र करते हैं। इन चित्रों में प्राणियों की आकृतियां हथियार जैसी वस्तुएं पकड़े हुए हैं, लेकिन उनकी नाक और मुँह स्पष्ट नहीं हैं। कुछ चित्रों में वे स्पेस सूट पहने हुए प्रतीत होते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि इन चित्रों में दिखाए गए उड़न खटोले पंखे जैसे एंटीना और तीन पैरों वाले स्टैंड के साथ यूएफओ से मिलते-जुलते हैं, जैसा कि फिल्मों में दिखाया जाता है। इन चित्रों के रंग प्राकृतिक हैं, जो हजारों वर्षों के बाद भी फीके नहीं पड़े हैं। हालांकि यह संभव है कि प्रागैतिहासिक मानवों की कल्पना का परिणाम हो, लेकिन इस विषय पर और अधिक शोध की आवश्यकता है।

आलेख- ताराशंकर सिन्हा

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