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एक अनोखा गांव जहां मंदिर में शादी करना और दो मंजिला मकान बनाना माना जाता है अशुभ

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मनाव सभ्यताएं हमेशा से ही मान्यताओं पर आधारित रही हैं। देश कितना हा आधुनिकरण की ओर चले जाए लेकिन आज भी ऐसी तमाम मान्यताएं और परंपराएं हैं जो लोग सदियों से मानते आ रहे हैं। ऐसी ही मान्यताओं को अब तक मानते आ रहा है कर्नाटक के बेलागावी जिले का कोहल्ली गांव (Karnataka's kohalli village) । इस गांव में आज तक किसी ने भी दो मंजिला मकान नहीं बनवाया है।





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तकरीबन 5 हजार की आबादी वाले इस गांव में कई किसान परिवार निवासरत है। ज्यादातर ग्रामीण आर्थिक रूप से समृद्ध है, तो ये सवाल जरूर उठता है कि ऐसी क्या वजह से जो गगनचुंबी इमारतों के इस समय में ये ग्रामीण एक मंजील के मकान में गुजर बसर कर रहे हैं। दरअसल इस गांव में एक मंदिर स्थित है। गांव के तमाम घरों की ऊंचाई श्री संगमेश्वर मंदिर से कम है।





ये है वजह





कहा जाता है कि खागोल नाम के एक साधू ने इस गांव में तपस्या की थी। इससे पहले गांव (Karnataka's kohalli village) को शिवपुर के नाम से जाना जाता था। खागोल ने ही गांव का नाम बदलकर कोहल्ली कर दिया था।ग्रामीण ने बताया कि एक बार एक परिवार ने कई मंजिला इमारत बना ली थी, जिसके बाद उन्हें तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ा। बाद में उन्होंने घर तोड़कर उसे एक मंजिला बनाया और उनका जीनव सुख से भर गया।





मंदिर में शादी करना माना जाता है अशुभ (Karnataka's kohalli village)





श्री संगमेश्वर मंदिर को सिर्फ सफेद रंग से रंगा जाता है। मंदिर में शादी करना मना है, क्योंकि उसे अशुभ माना जाता है। यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है कि कोहल्ली गांव के लोग आज भी इन परंपराओं और मान्यताओं को मानते हैं।


इस शहर में किसी को नहीं है मरने की इजाजत, पिछले 7 दशकों में नहीं हुई एक भी मौत

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दुनिया में एक जगह ऐसी भी है जहां लोगों के लिए मरना मना है। ये जानकर थोड़ी हैरानी (Ban on death) तो जरूर हुई होगी, एक देश है जहां के शहर ने लोगों के मरने पर बैन लगाया हुआ है। यहां पिछले 70 साल से एक भी इंसान की मौत नहीं हुई है।





हम बात कर रहे हैं नार्वे देश के छोटे से शहर लॉन्गइयरबेन के बारे में जो बहुत ही खूबसूरत शहर है, लेकिन यहां पर किसी के भी मरने पर मनाही है। करीब 2000 की आबादी वाले इस शहर में पिछले 70 साल से किसी को भी (Ajab gajab news)मरने की (Ban on death) इजाजत नहीं है।





नार्वे और उत्तरी ध्रुव के बीच इस आइसलैंड पर खून जमा देने वाली ठंड पड़ती है। सर्दियों के मौसम में तापमान इतना कम हो जाता है कि जिंदा रहना मुश्किल हो जाता है। ठंड की वजह से यहां डेड बॉडी सालों तक ज्यों की त्यों पड़ी रहती है। वो न तो गलती है और न ही सड़ती है। ऐसे में उसे नष्ट करना मुश्किल हो जाता है।





बीमारी फैलने का था खतरा





ऐसा माना जाता है कि साल 1917 में  एक व्यक्ति की इनफ्लुएंजा की वजह से मौत हो गई थी। उसकी मौत के सालों बाद भी इनफ्लुएंजा का वायरस शरीर में जस के तस था। इससे बीमारी के फैलने का खतरा बना हुआ था। इस खतरे को देखते हुए प्रशासन ने इस शहर में मौत पर पाबंदी लगा दी थी।  जब भी कोई यहाँ पर मरने वाला होता है या कोई इमरजेंसी होती है तो उसे हेलीकॉप्टर से दूसरे देश ले जाया जाता है और मरने के बाद उसका अंतिम संस्कार वहीं कर दिया जाता है।






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