Media24Media.com: विनोद तिवारी

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'मुझे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं’ की शानदार सांगीतिक प्रस्तुति

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रायपुर। मुक्तिबोध की 58वीं पुण्यतिथि पर आयोजित व्याख्यान में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और ख्यात आलोचक विनोद तिवारी ने कहा कि अस्तित्व रक्षा और स्थिति रक्षा के संघर्ष से तो हर मनुष्य को गुजरना पड़ता है, मगर मुक्तिबोध ने जीवन दृष्टि और जीवन विवेक के निरंतर परिष्कार का जैसा संघर्ष किया वह हम लोगों के लिए एक मिसाल है। उन्होंने कहा कि जीवन में दोहरापन, दुराव-छिपाव और छल-छद्म बढ़ते जाने के हमारे दौर में मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ जैसी कविताओं की जरूरत बढ़ती जा रही है।


 

विनोद तिवारी ने कहा कि लगातार आत्मनिरीक्षण और आत्मसंघर्ष से गुजरने के कारण ही मुक्तिबोध के लेखन में एक पूरी तैयारी दिखती है। मुक्तिबोध की खासियत थी कि वे किसी बने-बनाए सत्य या पहले से सिद्ध की गई बात से काम नहीं चलाते थे, बल्कि अपने प्रश्नों और खोज के जरिए नया संधान करते थे। मुक्तिबोध की रचनात्मक प्रवृति के केंद्र में आलोचनात्मक विवेक है। 

विनोद तिवारी ने अपने करीब एक घंटे के सुगठित और सुलझे हुए व्याख्यान में कहा कि मुक्तिबोध कबीर, गालिब और निराला की परंपरा के रचनाकार थे, जो अपने मूल्यों और सिद्धांतों के लिए कोई जोखिम उठाने से पीछे नहीं हटते थे। उन्होंने मुक्तिबोध की तुलना शार्पनर से छिलने वाली पेंसिल से करते हुए कहा कि मुक्तिबोध ने लहुलुहान होकर ही अपनी तीक्ष्णता हासिल की थी। 

विनोद तिवारी ने कहा कि मुक्तिबोध ने आत्मनिरीक्षण और आत्मसंघर्ष की पीड़ा से गुजरते हुए अपना जीवन विवेक सृजित किया था। इसीलिए मुक्तिबोध की रचनाएं हमें अपनी तरफ इतना खींचती हैं। मुक्तिबोध किसी समय के साहित्य को समझने के लिए उस समय के सांस्कृतिक इतिहास को जानने की जरूरत रेखांकित करते थे। 

विनोद तिवारी ने कहा कि मुक्तिबोध की रचना एक साहित्यिक की डायरी अपने समय और बाद की भी कई आलोचना पुस्तकों की तुलना में बहुत आगे की रचना है। यह सृजनात्मक यातना से उबरने और सृजन सत्यों से संवाद करने वाली रचना है। 

अपने अध्यक्षीय संबोधन में आलोचक व विचारक जयप्रकाश ने कहा कि मुक्तिबोध को पढ़ना आज पहले की तुलना में आज और ज्यादा जरूरी हो गया है क्योंकि हमारी सभ्यता तेजी से निर्विवेकीकरण का शिकार हो रही है। मुक्तिबोध आज भी हमें राह दिखाते हैं, क्योंकि उनके जीने और रचने में कोई द्वैत नहीं है, उनके जीवन-विवेक और साहित्य-विवेक में कोई फांक नहीं है। 

कार्यक्रम के शुरू में संगीतकार व गायक अजुल्का सक्सेना और वसु गंधर्व द्वारा की गई मुक्तिबोध की कविता ‘मुझे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं’ की शानदार सांगीतिक प्रस्तुति को श्रोताओं ने खुले मन से सराहा। 

मुक्तिबोध परिवार और साहित्य अकादमी द्वारा मुक्तिबोध की स्मृति में आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में रायपुर व छत्तीसगढ़ के दूसरे नगरों से आए साहित्यकार व संस्कृतिकर्मी शामिल थे। कार्यक्रम में दिवाकर मुक्तिबोध, गिरीश मुक्तिबोध, संजीव बख्शी, सुशील त्रिवेदी, त्रिलोक महावर, सुभाष मिश्रा, आनंद हर्षुल, नवल शुक्ल, आलोक वर्मा, मोइज कपासी, निर्मल आनंद, अरुण काठोटे, आनंद बहादुर, राजकुमार सोनी, उर्मिला शुक्ल, राहुल कुमार सिंह, सुधीर शर्मा, संजय शाम, प्रकाश उदय, राजेश गनोदवाले सहित कई साहित्यकारों व संस्कृतिकर्मियों ने हिस्सा लिया।

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