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शेडनेट पद्धति से साल भर की जा सकती है फूलों की खेती

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रायपुर। शेडनेट पद्धति ऐसी तकनीक है जिससे साल भर फूलों की खेती की जा सकती है। इस तकनीक के इस्तेमाल से किसानों को फूलों की खेती से साल भर नियमित रूप से अच्छी आमदनी मिलती है। छत्तीसगढ़ के किसान न केवल फूलों की खेती के लिए आकर्षित हो रहे बल्कि आधूनिक तकनीक शेडनेट, पॉली हाऊस, ड्रिप एवं मल्चिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं, इससे उन्हें भरपूर उत्पादन मिल रहा है। हैदराबाद, अमरावती, नागपुर और भुवनेश्वर जैसे बड़े शहरों में फूलों की मांग के कारण उन्हें अच्छी आमदनी मिल रही है।

फूलों की खेती के लिए शेड नेट पद्धति बहुत कारगर है, इससे फसल कीड़े एवं बीमारी से सुरक्षित रहती है। लंबे समय तक फसल के लगे रहने से किसानों को दुगुना मुनाफा होता है। ऐसी फसल जो गर्मी के मौसम में नहीं ले सकते उसके लिए यह पद्धति उपयोगी है। इससे साल भर फूलों की खेती की जा सकती है। वहीं बरसात के मौसम में थरहा सुरक्षित रहता है और नुकसान नहीं होता। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत संरक्षित खेती के लिए 50 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है। जिसके अंतर्गत 710 प्रति वर्ग मीटर पर 355 वर्ग मीटर में अनुदान का प्रावधान है। किसान अधिकतम 4000 वर्गमीटर में शेडनेट लगा सकते हैं।

राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ विकासखंड के ग्राम कोलिहापुरी के प्रगतिशील किसान गिरीश देवांगन गुलाब, जरबेरा एवं रजनीगंधा इत्यादि की खेती कर रहे हैं। जिससे उन्हें सालाना करीब 10 लाख रूपये की आमदनी हो रही है, उन्होंने बताया कि फ्लावर डेकोरेशन के लिए इन फूलों की मार्केट में बहुत अच्छी डिमांड  है। यहां के फूल स्थानीय स्तर पर बिक्री के साथ ही हैदराबाद, अमरावती, नागपुर, भुवनेश्वर जैसे शहरों में भेज रहे हैं। उन्होंने बताया कि खेतों में शानदार शिरडी गुलाब की वेरायटी लगाई है। वहीं पॉली हाऊस में जरबेरा की वेरायटी अंकुर, सिल्वेस्टर, दून, दानाएलन, व्हाइट हाऊस एवं फोर्ब्स भी लगाई है।

देवांगन ने बताया कि राष्ट्रीय बागवानी मिशन अंतर्गत पॉली हाऊस निर्माण के लिए 16 लाख 88 हजार रूपए और संरक्षित खेती के लिए 14 लाख रूपए का अनुदान मिला है। साथ ही उन्हें शेडनेट हाऊस के लिए 7 लाख 10 हजार रूपए की अनुदान राशि भी मिली है, जहां उन्होंने ड्रिप एवं मल्चिंग विधि से गेंदा लगाया है। उन्होंने बताया कि शेडनेट पद्धति का उपयोग कर रजनीगंधा के फूल लगाए हैं।

फूलों की खेती से महका महिलाओं का जीवन

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रायपुर। परम्परागत् खेती की जगह आधुनिक खेती फायदे का सौदा साबित हो रही हैं। इससे कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत तुड़गे के गौठान में काम कर रही महिलाओें की जिन्दगी भी अब महकने लगी है। शीतला स्व-सहायता समूह की इन महिलाओं ने तुड़गे के गौठान की महज 04 डिसमिल भूमि में कृषि विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन एवं सहयोग से पहली बार गेंदा फूल के टेनिस बॉल किस्म की खेती शुरू की है।

पहली बार में ही महिलाओं को अच्छा मुनाफा हो रहा है। समूह की महिलाएं औसतन 100 रुपए प्रति किलो की दर से गेंदा फूल की बिक्री कर रही हैं। उन्होंने अब तक 150 किलोग्राम फूल बेच कर 15 हजार रुपए कमाए हैं। महिलाओं ने बताया कि करीब 300 किलोग्राम से अधिक फूलों का उत्पादन होने की संभावना है, जिससे समूह को अच्छी आमदनी मिलेगी। इस सफलता से इन महिलाओं के चेहरे की खुशी दोगुनी हो गई है।

महिला समूह की सक्रिय सदस्य सुलोचना रावटे, शांति नेताम, मालती नरेटी, मंगतीन नेताम, बृजबत्ती, गिरजा बाई और विमला ने बताया कि गौठान में वर्मी खाद उत्पादन के अलावा पहली बार ट्रायल के रूप में गेंदा फूल की खेती  की जा रही है। खेती के लिए टेनिस बॉल नाम के गेंदा फूल की हाइब्रिड वैरायटी के बीज को मंगवाया गया है। इसके लिए पहले नर्सरी तैयार की गई तथा रोपाई के बाद फूलों की हार्वेस्टिंग की गई। उन्होंने बताया कि फूलों की खेती में खास बात यह है कि इससे कम पानी, कम लागत और कम मेहनत में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। गेंदा फूल की मांग भी वर्षभर बनी रहती है। उन्होंने अपने नए रोजगार एवं हो रही आमदनी के लिए राज्य सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया है।

कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया गया कि टेनिस बॉल गेंदा फूल पौधे की हाइट 3 से 4 फुट की होती है। तीन माह में फूल आना शुरू हो जाता है और पैदावार भी अधिक होती है। गेंदा फूल की खेती में अधिक मुनाफा है, इसकी डिमांड भी अच्छी है। उन्होंने बताया कि गोधन न्याय योजना के तहत बनाए गए गौठानों के माध्यम से स्व-सहायता समूहों के महिलाओं को आजीविका गतिविधियों एवं स्वरोजगार से जोड़कर आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा रहा है। महिला समूह भी वर्मी-कम्पोस्ट खाद उत्पादन के साथ गेंदा फूल की खेती में काफी रूचि ले रही हैं।

पलाश के फूलों से महकेगी बस्तर की होली, दरभा की महिलाएं बना रही हैं प्राकृतिक गुलाल

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जगदलपुर। दरभा के अल्वा गांव में पटेलपारा की महिलाएं पलाश के फूलों से होली के लिए गुलाल तैयार कर रही हैं। इनके समूह का नाम गेंदा फूल स्व-सहायता समूह है। लगभग 12 महिलाओं के इस समूह ने अब तक 50 किलो के आस-पास गुलाल तैयार कर लिया है। जिन्हें ग्राम पंचायत के माध्यम से सीमार्ट तक पहुंचाया जा रहा है जहां से आम नागरिक केमिकल फ्री गुलाल खरीद सकेंगे।

इन रंगों को तैयार करने के लिए पलाश के फूलों को सुखाकर पाउडर बनाया गया, जिसके बाद इसमें मक्के का आटा मिलाकर चिकना किया गया। इन्हें रंगीन बनाने के लिए भी प्राकृतिक चीजों का ही इस्तेमाल किया गया है। जैसे लाल रंग के लिए लाल भाजी, पीला रंग के लिए हल्दी और हरे रंग के लिए मेथी और हरे रंग की भाजियों का इस्तेमाल किया गया है। समूह की सदस्य सावित्री मंडावी का कहना है कि उन्हें 1 क्विंटल गुलाल बनाने का ऑर्डर मिला था, जिसे उनके समूह की महिलाएं बड़ी मेहनत से तैयार कर रही हैं। सावित्री बताती हैं कि उनका यह गुलाल केमिकल फ्री होने की वजह से स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक नहीं है।

इसे बच्चे-बूढ़े सभी उपयोग कर सकते हैं। स्थानीय बाजारों में भी ये महिलाएं अपने प्राकृतिक गुलाल को बेचेंगी। प्राकृतिक गुलाल बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पलाश के फूल के कई नाम हैं। इसे टेसू, ढाक, परसा, केशुक, और केसू भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि ऋतुराज वसंत की सुंदरता पलाश के बिना पूरी नहीं होती है। पलाश के फूल को वसंत का श्रृंगार माना जाता है।

स्किन और हेल्थ के लिए अच्छा है प्राकृतिक गुलाल

होली के लिए आजकल बाजारों में मिलने वाल चटक और आकर्षक रंग केमिकलयुक्त होते हैं। जिससे स्किन को नुकसान पहुंचता है। यही नहीं बाजार में मिलने वाले ये रंग बच्चों के स्किन के लिए भी नुकसानदायक होते हैं। सांस के माध्यम से भी केमिकलयुक्त रंग हमारे शरीर में पहुंचकर फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं इसीलिए विशेषज्ञ ये सलाह देते हैं कि होली के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रंग केमिकल फ्री होने चाहिए। बिहान की इन महिलाओं द्वारा तैयार किए जा रहे प्राकृतिक गुलाल पूरी तरह से केमिकल फ्री हैं इसीलिए ये गुलाल बाजार में मिलने वाले रंगों की जगह अच्छा विकल्प साबित होंगे।

कटफ्लावर, पिनसुटिया, इंडोर प्लांट सहित बर्ड ऑफ प्राईड, पम्पास जैसे अनेक फूल बिखेरेंगे अपनी छठा

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रायपुर। राजधानी में तीन दिनों तक मौसमी तथा विशेष प्रजाति के फूलों, फलों तथा सब्जियों का संगम होगा। गांधी उद्यान में 7 से 9 जनवरी तक तीन दिवसीय विशेष फल, फूल एवं सब्जियों की प्रदर्शनी लगायी जाएगी। इसमें विशेष रूप से कट फ्लावर, पिनसुटिया विशेष रूप से प्रदर्शित किए जाएंगे। साथ ही विशेष इंडोर प्लांट, एरीका पॉम, स्नेक प्लॉन्ट्स का भी शामिल रहेंगे। इस प्रदर्शनी में 5 से 50 वर्ष तक के आयु के बोनसाई आकर्षण के केन्द्र रहेंगे।

यह प्रदर्शनी उद्यानिकी विभाग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, नगर निगम रायपुर और निजी संस्था प्रकृति की ओर सोसायटीकी संयुक्त तत्वाधान में आयोजित की जाएगी। इस कार्यक्रम में उत्कृष्ट किस्मों के फल, फूल एवं सब्जियों के लिए किसानों को पुरस्कृत भी किए जाएंगे। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 7 जनवरी को शाम 5 बजे इस तीन दिवसीय प्रदर्शनी का उद्घाटन करेंगे तथा खाद्य मंत्री अमरजीत भगत कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि होंगे। प्रदर्शनी का समापन 9 जनवरी को नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया के मुख्य आतिथ्य में होगा। प्रदर्शनी में जशपुर में किए गए चाय,

रायगढ़ में काजू, बस्तर और रायगढ़ में ऑयल पॉम की खेती, दुर्ग, राजनांदगांव, रायपुर और महासमुंद की किए जाने वाले ड्रेगन फ्रूट के किसान अपनी फसलों को प्रदर्शित करेंगे। प्रकृति की ओर सोसायटीके सचिव मोहन वार्ल्यानी से दी गई जानकारी के अनुसार इस तीन दिवसीय प्रदर्शनी में प्रदेश के प्रकृति प्रेमियों को विभिन्न प्रकार के विशेष फूल डच गुलाब, गेन्दा, ग्लेेडोलाई, सेंवती, डेहलिया के अतिरिक्त जरबेरा, फ्लाक्स बर्बीना, कारनेशन, एनथोरियम, एलकोनिया, लीली, बर्ड ऑफ प्राइड, पम्पास, बटन बॉमस, इत्यादि किस्मों के मौसमी फूलों की झलक मिलेगी।

प्रदेश के किसानों द्वारा उन्नत किस्मों के फलों और सब्जियों के पौधे एवं बीज विक्रय के लिए उपलब्ध होगी। साथ ही इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा गमलों एवं छत पर सब्जी उगाने की विधि एवं जानकारी दी जाएगी। इसके अलावा रोपण योग्य पौधे न्यूनतम मूल्य पर विक्रय के लिए उपलब्ध होगी। इस प्रदर्शनी में स्टॉलों में औषधीय पौधों का प्रदर्शन एवं उनके औषधीय गुणों की जानकारी के साथ-साथ औषधीय पौधे निःशुल्क प्रदान की जाएगी।यहां स्टॉलों में कृषि उत्पाद, गृह वाटिका के लिए आवश्यक उपकरण, खाद, बीज और पौधे भी खरीद जा सकते है।

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