Media24Media.com: पुरातात्विक

Responsive Ad Slot


 

Showing posts with label पुरातात्विक. Show all posts
Showing posts with label पुरातात्विक. Show all posts

हर-हर महादेव से गूंज उठा भोरमदेव : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा कर हजारों कांवड़ियों का किया भव्य स्वागत

No comments Document Thumbnail

रायपुर। सावन मास के तीसरे सोमवार को छत्तीसगढ़ के प्राचीन, धार्मिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के तीर्थ स्थल बाबा भोरमदेव मंदिर में भक्ति और श्रद्धा की गूंज उस समय चरम पर पहुँच गई जब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने हजारों कांवड़ियों और शिवभक्तों पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा कर भव्य स्वागत और अभिनंदन किया। इस शुभ अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, उपमुख्यमंत्रीद्वय विजय शर्मा और अरुण साव उपस्थित थे।

यह लगातार दूसरा वर्ष है जब मुख्यमंत्री स्वयं श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए पुष्पवर्षा कर रहे हैं। पुष्पवर्षा के पश्चात् मुख्यमंत्री साय ने बाबा भोरमदेव मंदिर पहुंचकर मंत्रोच्चारण, विशेष पूजा-अर्चना और रुद्राभिषेक किया तथा प्रदेश की समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की।

मुख्यमंत्री साय ने मंदिर परिसर में उपस्थित कांवड़ियों एवं श्रद्धालुओं से भेंट कर उनका हालचाल जाना और पूरे आत्मीय भाव से अभिनंदन किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज सावन मास के तीसरे सोमवार को बाबा भोरमदेव की पावन धरती पर शिवभक्तों के साथ जुड़ना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य और गर्व का विषय है। हजारों श्रद्धालु सैकड़ों किलोमीटर की पदयात्रा कर भगवान भोलेनाथ के दर्शन हेतु यहां पहुंचे हैं—यह हमारी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत मिसाल है।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने अमरकंटक से 151 किलोमीटर पदयात्रा कर भोरमदेव मंदिर में जलाभिषेक करने वाली पंडरिया विधायक श्रीमती भावना बोहरा को भगवा वस्त्र और श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में स्वदेश दर्शन योजना 2.0 के अंतर्गत भोरमदेव कॉरिडोर विकास के लिए 146 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी दी गई है। यह परियोजना न केवल मंदिर परिसर का कायाकल्प करेगी, बल्कि मड़वा महल, छेरकी महल, रामचुवा से लेकर सरोदा जलाशय तक एक समग्र धार्मिक-पर्यटन कॉरिडोर के रूप में विकसित की जाएगी।

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ से अमरकंटक जाने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मध्यप्रदेश के अनूपपुर में 5 एकड़ भूमि आबंटन की प्रक्रिया जारी है, जहाँ एक भव्य श्रद्धालु भवन का निर्माण प्रस्तावित है। मुख्यमंत्री ने सभी श्रद्धालुओं को सावन मास की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आज हेलीकॉप्टर से की गई पुष्पवर्षा इस पुण्य अवसर की महत्ता को और भी अभूतपूर्व बना गई है।

पौराणिक परंपरा का गौरव: भक्ति से सराबोर हुआ बाबा भोरमदेव परिसर

सावन मास में भगवान शिव—देवों के देव—के जलाभिषेक की परंपरा सदियों से चली आ रही है। कवर्धा से 18 किलोमीटर दूर ग्राम चौरा में स्थित 11वीं शताब्दी का यह भोरमदेव मंदिर ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है। श्रावण मास में छत्तीसगढ़ के कबीरधाम, मुंगेली, बेमेतरा, खैरागढ़, राजनांदगांव सहित मध्यप्रदेश के अमरकंटक से हजारों श्रद्धालु पदयात्रा कर बाबा भोरमदेव, बूढ़ा महादेव और डोंगरिया के प्राचीन जलेश्वर शिवलिंग में जलाभिषेक करने आते हैं। श्रद्धालु माँ नर्मदा से जल भरकर नंगे पाँव और भगवा वस्त्रों में 150 किलोमीटर से अधिक की दुर्गम यात्रा कर “बोल बम” के जयघोष और भजनों के साथ भोरमदेव, जलेश्वर महादेव और पंचमुखी बूढ़ा महादेव मंदिर पहुँचते हैं।


ऐतिहासिक नगरी सिरपुर की प्रसिद्धि को मिल रही अंतर्राष्ट्रीय पहचान : अकबर

No comments Document Thumbnail

रायपुर। पुरातात्विक स्मारकों, समृद्ध परम्परा, सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध सिरपुर में आयोजित तीन दिवसीय विश्व संगीति कार्यक्रम का शुभारम्भ 7 सितम्बर को वन, आवास एवं पर्यावरण मंत्री मोहम्मद अकबर ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता नागार्जुन फाउंडेशन सिरपुर के अध्यक्ष पूज्य भदन्त आर्य नागार्जुन सुरेई ससाई एवं कल्चरल सेंटर ऑफ एच. एच. दलाई लामा तिब्बत हाउस के डायरेक्टर गेशे दोरजी दामदुल ने किया।

सी एस आई डी के अध्यक्ष नंदकुमार साय , पुरातत्वविद, नागपुर महाराष्ट्र लेखक डॉ. सत्यजीत चन्द्रिकापुरे, ट्रेव्हल एंड टूरिज्म विभाग महाराष्ट्र डायरेक्टर डॉ. प्रियदर्शी एम. खोब्रागड़े के विशिष्ट आतिथ्य में शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर अतिथियों का सिरपुर विकास प्रधिकरण के अध्यक्ष सतीश जग्गी ने स्वागत किया। विश्व संगीति कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्री मोहम्मद अकबर ने कहा कि सिरपुर एक ऐतिहासिक पुरातात्विक नगरी है। यहां विश्व संगीति कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन से सिरपुर की प्रसिद्धि देश-विदेश तक जाएगी।

उन्होंने कहा कि यहां बौद्ध समाज के अनुयायी उपस्थित है, उनका स्वागत है। उन्होंने कहा कि सिरपुर के विकास के लिए सिरपुर विकास प्राधिकरण के माध्यम से पर्याप्त धनराशि की व्यवस्था सरकार द्वारा की गई है। इससे क्षेत्र के विकास और पर्यटन के मानचित्र में सिरपुर का नाम दर्ज होगा। उन्होंने कहा कि प्राधिकरण के माध्यम से सिरपुर के विकास को पुनर्जीवित करने का कार्य हमारी सरकार द्वारा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक नगरी सिरपुर सहित क्षेत्र के विकास के लिए हर संभव पहल की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि यह वनक्षेत्र है इसलिए ग्राम सभा के प्रस्ताव पर सामुदायिक विकास के लिए एक हेक्टेयर जमीन दी जा सकती है। उन्होंने बताया कि इसके अंतर्गत 17 ग्राम पंचायत के 34 ग्राम शामिल है।

कार्यक्रम में सीएसआईडी के अध्यक्ष नंद कुमार साय ने कहा कि सिरपुर हमारे प्राचीन इतिहास का प्रतिबिंब है। सिरपुर के तट पर ही ऐतिहासिक वैभव और संस्कृति का पूरा संसार है। कई साल पहले से ही दुनिया भर के लोग यहां आते जाते रहे हैं। आज श्रीपुर का वैभव देश-दुनिया में चमक रहा है। कार्यक्रम में सिरपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष सतीश जग्गी ने कहा कि यह कार्यक्रम सिरपुर के ऐतिहासिक महत्व को देश-दुनिया तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण आयोजन है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप सिरपुर के विकास में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। हम सिरपुर को वर्ल्ड हेरिटेज की ओर मान्यता दिलाने में आगे बढ़ रहे हैं।

इस दौरान संगीति कार्यक्रम में अंचल सहित देश के विभिन्न स्थानो से अतिथि लोग पहुंचे हैं। कार्यक्रम 9 सितंबर तक जारी रहेगा। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दूसरे दिन 8 सितम्बर को राज्यसभा सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे के मुख्य आतिथ्य में तथा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अध्यक्षता में व दीपक बैज सांसद तथा श्यामजी चौहान निज मंदिर खाटूजी राजस्थान के विशिष्ट आतिथ्य में कार्यक्रम आयोजित होगा। कार्यक्रम के तृतीय दिवस समारोह का समापन होगा।

रामकथा की कलात्मक प्रस्तुति के सबसे आरंभिक दृश्य रायगढ़ की ओंगना पहाड़ियों में राष्ट्रीय रामायण महोत्सव में होगा रामायण का विराट मंचन

No comments Document Thumbnail

रायगढ़। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल रायगढ़ में राष्ट्रीय रामायण महोत्सव का आयोजन करा रहे हैं इसके माध्यम से देश-विदेश में प्रचलित रामायण के विविध रूपों और भगवान राम के आदर्श की झलक महोत्सव के माध्यम से देखने मिलेगी। मुख्यमंत्री द्वारा की जा रही यह पहल उस विशिष्ट परंपरा को ऊंचाई देने की दिशा में सार्थक पहल है जिसकी सबसे पहले शुरूआत उन शैलचित्रों से हुई जो रायगढ़ के ओंगना में दिखते हैं। यहां लोकअनुश्रुति है कि ओंगना की पहाड़ियों में रामकथा का चित्रण है। यहाँ दस सिरों वाले एक व्यक्ति का युद्ध एक युवक से होता दिखाया गया है। लोक अनुश्रुति है कि दस सिर वाला व्यक्ति रावण है और उनसे युद्ध कर रहे व्यक्ति राम। इस  तरह रामकथा की कलात्मक प्रस्तुति का जो बीज ओंगना में शैल चित्रकारों ने रोपा, अब उसकी विशिष्ट कलात्मक प्रस्तुति रामायण महोत्सव के रूप में होगी।

संस्कृतिधानी रायगढ़ अपने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहर के लिए प्रदेश ही नहीं पूरे देश में विशिष्ट स्थान रखता है। रायगढ़ कला की नगरी है। यहां के मूर्धन्य कला साधकों ने देश विदेश के कला क्षितिज पर अपनी प्रतिभा से विशेष लालिमा बिखेरी है। रायगढ़ में रामायण को कहे और सुने जाने के साथ रामलीला मैदान में उसके जीवंत मंचन की एक समृद्ध परंपरा रही है। कला का यह स्वरूप रायगढ़ के इतिहास से भी जुड़ाव रखता है। रायगढ़ की ख्याति यहां की पहाड़ियों में हजारों वर्षाे पूर्व के बने शैल चित्रों के लिए भी है। जो तत्कालीन समाज के जीवनशैली से परिचय कराते हैं। शैल चित्रों की इन्हीं श्रृंखला के बीच रायगढ़ जिले के सुदूर वनांचल में बसे धरमजयगढ़ विकासखंड से 8 किमी दूर ओंगना पहाड़ी स्थित है। यहां पर भी कई शैल चित्र बने हुए हैं। जिनमें एक चित्र है जिसमें दस सर वाला व्यक्ति अंकित है जो दूसरे व्यक्ति से युद्ध करता दिखाई देता है। पास ही एक महिला खड़ी है। जनश्रुतियों के अनुसार यह रामायण के राम रावण युद्ध प्रसंग से समानता रखता है।

शैल चित्र प्राचीन कालीन समाज और जीवनशैली का जीवंत पुलिंदा है। हजारों वर्ष पूर्व बने ओंगना पहाड़ी के इन शैलाश्रयों में बने चित्र जनश्रुतियों के अनुसार तब के समाज में रामायण के प्रभाव को प्रदर्शित करते हैं। रामायण की गाथा पीढ़ियों से कही और सुनी जा रही है। देश के विभिन्न भागों में इसके विभिन्न स्वरूप प्रचलित हैं। किंतु पुरातात्विक अवशेषों के रूप में रामायण प्रसंग का उल्लेख दुर्लभ है। छत्तीसगढ़ की धरा से भगवान के राम के जुड़ाव के कई प्रसंग मिलते हैं। छत्तीसगढ़ को भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि माना जाता है। इस नाते उन्हें छत्तीसगढ़ में भांजे का दर्जा प्राप्त है। प्रदेश में माता कौशल्या भी आराध्य हैं। चंदखुरी में देश का इकलौता कौशल्या माता का मंदिर निर्मित है। वनवास के दौरान भी भगवान राम छत्तीसगढ़ के विभिन्न स्थानों से गुजरे थे। जिन्हें चिन्हांकित कर राम वन गमन परिपथ के रूप में विकसित किया जा रहा है।

रायगढ़ से रामायण के जुड़ाव की इस अमूल्य विरासत को आगे बढ़ाने के क्रम में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की विशेष पहल पर रायगढ़ के रामलीला मैदान में 01 से 03 जून तक प्रदेश का पहला राष्ट्रीय रामायण महोत्सव का भव्य आयोजन होने जा रहा है। जिसमें देश विदेश की मंडलियां रामायण के अरण्य काण्ड पर प्रस्तुति देंगी। इस विराट आयोजन की तैयारियां जोर-शोर से की जा रही हैं। रामायण प्रसंग के मंचन के साथ ही कार्यक्रम में हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ और केलो महाआरती व दीपदान का कार्यक्रम भी आयोजित है।

ग्राम सोंड्रा में मिली पांडुवंशी काल की बुद्ध प्रतिमा

No comments Document Thumbnail

रायपुर। रायपुर से बिलासपुर मार्ग पर स्थित ग्राम सोंड्रा में गृह निर्माण के लिए किये जा रहे उत्खनन कार्य के दौरान पांडुवंशी काल की प्राचीन बुद्ध प्रतिमा सहित अन्य पुरातात्विक प्रतिमाएं मिलने से गांव में हर्ष व्याप्त है। गौरतलब है कि ग्राम सोंड्रा में श्री दिलेन्द्र बंछोर द्वारा गृह निर्माण हेतु किए जाने वाले उत्खनन कार्य के दौरान बुद्ध की प्रतिमा प्राप्त हुई है। इस संबंध में जानकारी मिलते ही पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय विभाग के संचालक श्री विवेक आचार्य के निर्देश पर पुरातत्व विभाग की टीम डॉ. पी.सी. पारख, डॉ. वृषोत्तम साहू तथा डॉ. राजीव मिंज के द्वारा स्थल निरीक्षण किया गया।


पुरातत्व एवं अभिलेखागार विभाग के अधिकारियों ने बताया कि रायपुर से बिलासपुर मुख्य मार्ग में 16 किलोमीटर की दूरी पर सांकरा से 2 किलोमीटर पश्चिम दिशा में स्थित ग्राम सोंड्रा (अक्षांश 21°21’53.5“N देशान्तर 81°38’19.4 E) है। उक्त स्थल से खारुन नदी लगभग 3 किलोमीटर पश्चिम दिशा पर स्थित है। प्रतिमा प्राप्ति स्थल ग्राम के सबसे ऊंचाई वाले भाग पर स्थित है और यहाँ प्राचीन टीला होने के साक्ष्य दिखाई देते हैं। श्री दिलेन्द्र बंछोर के व्यक्तिगत आवास परिसर में ही भवन के विस्तार के लिए कालम हेतु किए गए उत्खनन के दौरान भूमि की सतह से लगभग 3 फीट की गहराई से बुद्ध की प्रतिमा का ऊपरी भाग प्राप्त हुआ।

अधिकारियों ने बताया कि स्थानीय बालुए पत्थर में निर्मित इस प्रतिमा की चौड़ाई 74X ऊंचाई 87X मोटाई 40 सेंटीमीटर है। बुद्ध की इस विशाल प्रस्तर प्रतिमा के माथे पर ऊर्णा (तिलक चिन्ह) का अंकन इसे अनोखा रूप प्रदान करती है और इस आधार पर इसके ध्यानी बुद्ध होने की संभावना अधिक प्रतीत होती है। बुद्ध की यह आवक्ष प्रतिमा अपूर्ण है, जिस पर छेनी के चिन्ह साफ दिखाई दे रहे हैं। त्रि-स्तरीय निर्माण तकनीक में बनी बुद्ध प्रतिमा का यह ऊपरी भाग है। इस तकनीक का प्रयोग बालुए पत्थर की विशाल प्रतिमाओं के निर्माण हेतु किया जाता था जिसमें किसी प्रतिमा को तीन प्रस्तर खंडों में योजना के अनुरूप स्तरों में निर्मित कर लम्बवत स्थापित किया जाता था। इस तकनीक की बनी बुद्ध प्रतिमा के उदाहरण छत्तीसगढ़ के सिरपुर व राजिम और बिहार के बोधगया में देखे जा सकते हैं ।

अधिकारियों ने बताया कि स्थल निरीक्षण करनें पर यहाँ अन्य प्रतिमाओं के होने की भी जानकारी प्राप्त हुई है, जो कि निकट ही में स्थित मंदिर में तथा मंदिर के बगल में बने चबूतरे पर स्थापित हैं। प्रतिमाओं में भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध, उपासक, अज्ञात स्थानक प्रतिमा, योगिक ध्यानी मुद्रा में बुद्ध, ललितासन मुद्रा तारा, स्थानक बोधिसत्त्व के साथ ही 4 शिवलिंग, 4 खण्डित पायदार सीलबट्टे, 1 प्रणाल युक्त प्रतिमा पीठ, कुछ खण्डित प्रतिमाएँ व स्थापत्य खंड प्राप्त हुये हैं। उक्त स्थल के पुरावशेष पांडुवंशी काल के (6वीं से 9वीं शताब्दी ई.) प्रतीत हो रहा है।

 

मुख्यमंत्री बघेल ने ‘तिरोहित तितुरघाट’ पुस्तक का किया विमोचन

No comments Document Thumbnail

रायपुर। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आज शाम अपने निवास कार्यालय में ‘तिरोहित तितुरघाट’ पुस्तक का विमोचन किया। यह पुस्तक धमधा के तितुरघाट में दो दर्जन से अधिक सती स्तंभों के पुरातात्विक साक्ष्य और उनकी विशेषता पर आधारित है। इसका संपादन गोविन्द पटेल ने किया है तथा भूमिका पुरातत्विद् प्रभात सिंह ने लिखी है। धर्मधाम गौरवगाथा समिति ने तितुरघाट के तिरोहित (भुला दिये गए) तालाब को फिर से ढूंढा और श्रमदान व जनसहयोग से उसकी फिर से खुदाई की। इस स्थान की प्राचीनता व ऐतिहासिकता के साथ ही तालाब के महत्व को दर्शाने इस पुस्तक का प्रकाशन किया गया है।

इस पुस्तक में शिवनाथ नदी के किनारे स्थित 500 साल पुराने चतुर्भुजी तितुरघाट गांव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बताई गई है। यह गांव अब वहां से उजड़ गई है, परन्तु गांव का ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व दर्शाने वाले सौ से अधिक शिलाखंड, स्थापत्य खंड वहां बिखरे पड़े हैं। जिनमें तीन शिलालेख और दो दर्जन सती स्तंभ मिले हैं। यहां एक मंदिर और तालाब भी थी। धर्मधाम गौरवगाथा समिति ने इस विलुप्त तालाब का पुनर्निर्माण करवाया। पटेल इसके पूर्व टमाटर की बंपर पैदावार, तकदीर बदल सकते हैं सुनहरे दाने, छत्तीसगढ़ को तंदुरुस्त बना सकती है भाजी और छह कोरी छह आगर तरिया अऊ बूढ़वा नरवा नाम की पुस्तिका का प्रकाशन कर चुके हैं। इस अवसर पर धर्मधाम गौरवगाथा समिति के संयोजक वीरेंद्र देवांगन, ईश्वरी निर्मल, अशोक देवांगन, सामर्थ्य ताम्रकार उपस्थित थे।

विशेष लेख : अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर छत्तीसगढ़ का सिरपुर ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्ता के कारण है आकर्षण का केंद्र

No comments Document Thumbnail

रायपुर। अंतराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर सिरपुर अपनी ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्ता के कारण आकर्षण का केंद्र हैं। यह पांचवी से आठवीं शताब्दी के मध्य दक्षिण कोसल की राजधानी थी। सिरपुर में सांस्कृतिक एंव वास्तुकौशल की कला का अनुपम संग्रह हैं।

भारतीय इतिहास में सिरपुर अपने धार्मिक मान्यताओ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण आकर्षण का केन्द्र था और वर्तमान में भी ये देश विदेश के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

सिरपुर महोत्सव का आयोजन

सिरपुर के एतिहासिक महत्व को देखते हुए छत्तीसगढ़ शासन की तरफ से प्रत्येक वर्ष यहां पर सिरपुर महोत्सव का आयोजन किया जाता है।  छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल सिरपुर में माघ पूर्णिमा के अवसर पर होने वाले तीन दिवसीय सिरपुर महोत्सव का हर किसी को इंतजार रहता है। रविवार को खाद्य एवं संस्कृति मंत्री श्री अमरजीत भगत ने तीन दिवसीय सिरपुर महोत्सव का शुभारंभ करते हुए सभी प्रदेश वासियों को माघी पूर्णिमा सिरपुर महोत्सव की शुभकामनाएं दी हैं।

गंधेश्वर महादेव का मंदिर

सिरपुर का एक अन्य मंदिर गंधेश्वर महादेव का है। यह महानदी के तट पर स्थित है। इसके दो स्तम्भों पर अभिलेख उत्कीर्ण हैं। कहा जाता है कि चिमणाजी भौंसले ने इस मन्दिर का जीर्णोद्वार करवाया था। सिरपुर से बौद्धकालीन अनेक मूर्तियाँ भी मिली हैं। जिनमें तारा की मूर्ति सर्वाधिक सुन्दर है। सिरपुर का तीवरदेव के राजिम-ताम्रपट्ट लेख में उल्लेख है। 14वीं शती के प्रारम्भ में, यह नगर वारंगल के ककातीय नरेशों के राज्य की सीमा पर स्थित था। 310 ई. में अलाउद्दीन खलिजी के सेनापति मलिक काफूर ने वारंगल की ओर कूच करते समय सिरपुर पर भी धावा किया था, जिसका वृत्तान्त अमीर खुसरो ने लिखा है।

आधुनिकता के दौर में बौद्ध विरासत, लोककला एवं संस्कृति का केंद्र  

सिरपुर महोत्सव  आधुनिकता के दौर में भी अपनी प्राचीन संस्कृति और भव्यता को बनाये हुए है। युवा पीढ़ी को यहाँ की बौद्ध विरासत तथा लोककला एवं संस्कृति को जानने का अवसर मिलता है। सिरपुर लोगों की आस्था और श्रद्धा का केन्द्र है जिसे देखने और महसूस  करने के लिए देश विदेश से लोग यहां पहुंचते हैं। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में राज्य में हर तरफ विकास के काम हो रहे हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य के लोक कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए योजना बनायी है जिससे स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन मिल रहा है।

Don't Miss
© Media24Media | All Rights Reserved | Infowt Information Web Technologies.