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जब से पहाड़ी कोरवा भोलाराम ने खरीदी स्कूटी,समय पर पहुंच पाता है ड्यूटी

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रायपुर। पहाड़ी कोरवा भोलाराम ने कभी साइकिल भी नहीं चलाई थीं। अपने परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी जंगल जाने की चली आ रही परम्परा के अनुसार वह भी बचपन से जंगल आता जाता रहा। गांव में जब स्कूल खुला तो उन्होंने किसी तरह पहले पांचवीं पास की, फिर 8वीं पास कर जीवनयापन के लिए छोटे से खेत में काम करने लग लग गया। इस बीच शादी हो गई, बच्चे हो गए और पर गरीबी और आर्थिक समस्याओं से घिरे पहाड़ी कोरवा भोला राम परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करने संघर्षों से जूझता रहा। आसपास काम मिल जाने पर मजदूरी करना, तीर-धनुष लेकर जंगल की ओर जाना और घर में छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने मन मसोस कर रखना जिंदगी की दिनचर्या में शामिल होती चली गई। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उसकी किस्मत एक दिन ऐसी करवट बदलेगी कि जिंदगी बदल जायेगी और जंगल जाने वाला, पैदल चलने वाला पहाड़ी कोरवा इतना सक्षम हो जायेगा कि वह घर की जिम्मेदारियां निभा पायेगा, स्कूटी में सफर कर पायेगा।

यह कहानी कोरबा जिले के ग्राम कोरई के पहाड़ी कोरवा भोलाराम की है। बसाहट के कच्चे मकान में जीवन बसर करते आए पहाड़ी कोरवा भोलाराम की तकदीर अब उनके पूर्वजों की तरह नहीं रही। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर जिले के विशेष पिछड़ी जनजाति परिवारों को नौकरी से जोड़कर आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा की गई पहल का परिणाम उनके आर्थिक और पारिवारिक समृद्धि का भी द्वार खोलने लगा है। कलेक्टर अजीत वसंत द्वारा जिले में निवासरत पीवीटीजी के सभी शिक्षित बेरोजगार युवाओं को उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुसार डीएमएफ से जिले के विद्यालयों, अस्पतालों में रिक्त पदों पर नौकरी देने की पहल की गई है।

इसी कड़ी में ग्राम कोरई के पहाड़ी कोरवा भोलाराम की नौकरी भी बांगो एरिया के माचाडोली में स्थित शासकीय उच्चतर विद्यालय में लगी है। उन्होंने बताया कि अपने घर से लगभग तीस किलोमीटर की दूरी होने और इस मार्ग में बसें नहीं मिलने से वह कई बार समय पर स्कूल नहीं पहुंच पाता था। हालांकि उन्होंने माचाडोली में अपने कार्यस्थल के पास भी रहने की व्यवस्था की है, लेकिन अवकाश दिनों और अन्य आवश्यक कार्य पड़ने पर घर से स्कूल तक सफर को आसान बनाने तथा समय पर ड्यूटी पहुंच पाने के लिए अपनी तनख्वाह से कुछ राशि बचत की। इस बीच परिचितों के माध्यम से स्कूटी और बाइक चलाना भी सीख गया। लगभग दस हजार रूपये अग्रिम भुगतान (डाउन पेमेंट) कर उन्होंने किश्त में बैटरी वाली एक स्कूटी खरीद ली।

अब जबकि स्कूटी घर आ गई है, पहाड़ी कोरवा अवकाश दिनों में और अन्य जरूरी कार्य से अपने कर्तव्य स्थल से घर और घर से स्कूल तक आना जाना करता है। माचाडोली के विद्यालय में चतुर्थ पद भृत्य के पद पर नौकरी कर रहे भोलाराम ने बताया कि उनकी पत्नी और बच्चे को लेकर वह घूमने फिरने भी जाता है। उन्होंने बताया कि नौकरी मिलने के बाद जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रही। घर का पूरा सिस्टम बदल गया है। समय पर खाना, समय पर सोना, समय पर स्कूल जाना होता है। घर की जरूरतों और जिम्मेदारियों को भी पूरा करने में नौकरी मददगार बनी है। इसलिए परिवार भी खुश है। भोलाराम का कहना है कि वह बहुत आगे तक नहीं पढ़ाई कर पाया है, क्योंकि वह शिक्षा के महत्व को नहीं जान सका था। आज उनकी नौकरी लगी है तो मालूम हो रहा है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए शिक्षा का कितना महत्व है, इसलिए वह भी अपने समाज के लोगों को जागरूक करते हुए अपने बच्चे को अच्छे से पढ़ाएगा। उनकी पत्नी प्रमिला बाई ने बताया कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि पति के साथ स्कूटी में बैठकर घूमने फिरने जाने का मौका मिलेगा। अब स्कूटी आने पर घर से बाहर कई बार स्कूटी में बैठकर जा चुकी है। गौरतलब है कि कोरबा जिले में पीवीटीजी के 119 युवा बेरोजगार युवाओं को अतिथि शिक्षक,भृत्य,वार्ड बॉय की इस वर्ष जुलाई माह से नौकरी दी गई है। रिक्त पदों पर अभी भी आवेदन लेकर नौकरी देने की प्रक्रिया जारी है। नौकरी के बाद पीवीटीजी के जीवन स्तर में बदलाव आने लगा है।

विकसित भारत संकल्प यात्रा मेरी कहानी मेरी जुबानी : गरीबों के लिये वरदान साबित हो रहा आयुष्मान कार्ड

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रायपुर। धमतरी जिले के गौरव ग्राम कंडेल की रहने वाली संतोषी बताती है, कि उनकी सास देवकुंवर साहू को ब्रेस्ट कैंसर होने की खबर सुनकर वे काफी घबरा गईं थीं, कि इतनी बड़ी बीमारी का ईलाज वे कैसे करायेंगी। मेहनत-मजदूरी कर घर-परिवार का पालन पोषण करने वाली संतोषी को फिर आयुष्मान भारत योजना के तहत निःशुल्क ईलाज की याद आयी। फौरन उन्होंने अपनी सास का इलाज कराना शुरू कर दिया और आयुष्मान कार्ड से ईलाज कराने के बाद वे स्वस्थ हो गईं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का धन्यवाद करते हुए संतोषी कहतीं हैं कि कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे अपनी सास का कैंसर जैसी बड़ी बीमारी का ईलाज आयुष्मान कार्ड की वजह से करा सकेंगी, उनकी सास देवकुंवर साहू ने अपनी जिंदगी की जंग जीत गईं हैं।

उल्लेखनीय है कि शासन द्वारा देश के गरीब एवं मध्यमवर्गीय परिवार को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से आयुष्मान भारत योजना संचालित की जा रही है। इस योजना से गरीब वर्ग के लोगाें को अब स्वास्थ्य खराब होने पर ईलाज की चिंता नहीं रही है। इस योजना का लाभ देश के करोड़ो लोग ले रहे और स्वस्थ्य हो रहे हैं। यह योजना गरीबों के लिए वरदान साबित हो रही है। विकसित भारत संकल्प यात्रा के तहत जिले के विभिन्न विकासखण्डों में प्रतिदिन संकल्प शिविर आयोजित किये जा रहे हैं। इन शिविरों में जहां जिला स्तरीय अधिकारियों द्वारा उपस्थित ग्रामीणों को विभागीय जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देकर पात्र हितग्राहियों को लाभान्वित किया जा रहा है। वहीं योजनाओं से लाभान्वित हितग्राही भी अपनी कहानी सुनाने में पीछे नहीं हट रहे हैं। इस योजना के तहत पात्र बीपीएल परिवारों को 5 लाख रुपये तक एपीएल परिवारों को 50 हजार रूपये का स्वास्थ्य बीमा केंद्र सरकार मुहैया कराती है। परिवार को आयुष्मान गोल्डन कार्ड जारी किया जाता है। इस कार्ड को दिखाकर सूचीबद्ध अस्पतालों में फ्री इलाज कराया जा सकता है।

संघर्षों में बीता विष्णु देव साय का जीवन

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रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को जनसंघ की विरासत अपने दादा स्वर्गीय बुधनाथ साय से मिली। उनके दादा स्वतंत्रता के पश्चात सन् 1947 से 1952 तक तत्कालीन सीपी एंड बरार विधानसभा में मनोनीत विधायक भी रहे। साय का परिवार शुरू से ही जनसंघ से जुड़ा रहा। उनके बड़े पिताजी स्वर्गीय नरहरि प्रसाद साय वर्ष 1977-79 तक जनता पार्टी सरकार में संचार राज्य मंत्री रहे।
                
जिला मुख्यालय जशपुर से 57 किलोमीटर दूर छोटे से आदिवासी बहुल गांव बगिया के निवासी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय किसान परिवार से आते हैं। बगिया की प्राथमिक शाला में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने कुनकुरी के लोयोला मिशनरी स्कूल में एडमिशन लिया। कॉलेज की पढ़ाई के लिए वह अंबिकापुर गए। जब वह प्रथम वर्ष में थे, तभी उनके पिता रामप्रसाद साय का निधन हो गया। घर परिवार की जिम्मेदारी निभाने के लिए वह पढ़ाई छोड़कर गांव वापस आ गए। बगिया में मैनी नदी के तट पर साय परिवार का आवास है। विष्णु देव साय मंत्री, सांसद, विधायक रहे लेकिन वह अपने पैतृक गांव को नहीं छोड़ा। अपने दो भाईयों को पढ़ाकर-लिखाकर उन्होंने काबिल बनाया। उनके एक भाई जयप्रकाश साय भारत हैवी इलेक्ट्रिकल में इंजीनियर हैं। एक भाई ओमप्रकाश साय सरपंच थे। अभी चार माह पूर्व ही उनका असामयिक निधन हुआ।

साय की मां श्रीमती जसमनी देवी ने कहा मेरे बेटे बाबू (विष्णु देव का निकनेम) ने सबसे पहले परिवार की सेवा की, फिर गांव की सेवा की, विधायक, सांसद, मंत्री रहकर क्षेत्र की सेवा की, अब मुख्यमंत्री बनकर राज्य की सेवा करेगा। भावुक होकर उन्होंने कहा कि आज ओमप्रकाश रहता, तो यह खुशी दोगुनी हो जाती।

विष्णु देव साय पढ़ाई के लिए किए गए अपने संघर्ष को अक्सर याद करते हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र में स्कूलों के विकास पर सदैव ध्यान दिया। अपने गांव में जिस सरकारी स्कूल में उन्होंने प्राइमरी की पढ़ाई की थी वह अब हाईस्कूल बन गया है।

खेती-बाड़ी में रुचि रखते हैं सीएम-

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय खेती किसानी में बहुत रुचि रखते हैं। नदी के तट पर अपने घर में वह सब्जियां उगाते हैं। कोरोना काल में वह गांव में सब्जी उगाते रहे और अन्य किसानों को भी प्रेरित करते रहे। उन्होंने मैनी नदी पर पुल बनवाया। नदी की रेत में खीरा, ककड़ी, मूंगफली आदि की खेती के लिए गांव के किसानों को प्रेरित किया। उनके प्रयासों से गांव में कृषि के क्षेत्र में उन्नति हुई है।

जड़ी-बूटियों का है ज्ञान-

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जंगली जड़ी-बूटियों के अच्छे जानकार हैं। वह पथरी की अचूक दवा देते हैं। उनके कई लाभार्थी उनकी दवा की प्रशंसा करते हैं। साय ने जनजाति समाज के विकास के लिए काम किया। कंवरधाम के विकास का श्रेय उन्हें दिया जाता है। जनजाति समाज के आयोजनों में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या अग्रणी भूमिका में रहती हैं। साय की दो पुत्रियों में से बड़ी बेटी निवृत्ति की शादी धमतरी में हुई है। दूसरी पुत्री स्मृति अभी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही हैं। उनके पुत्र तोशेंद्र ने पत्रकारिता व लिट्रेचर की पढ़ाई की है और वर्तमान में रायपुर में फिटनेस इंस्ट्रक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं।

मेजर थैलेसिमिया से पीड़ित मयंक के इलाज का पूरा खर्च उठाएगी सरकार, बोन मेरो ट्रांसप्लांट में 41 लाख रूपए का आएगा खर्च

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रायपुर। छत्तीसगढ़ में अब वो दिन लद गए जब किसी गरीब मरीज को इलाज के लिए पैसे न होने पर जान गंवानी पड़ती थी। प्रदेश की संवेदनशील सरकार की जनमहत्वाकांक्षी योजनाओं ने गरीब से गरीब परिवार में गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीज के इलाज के लिए आर्थिक सहायता का रास्ता खोला है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पहल पर शुरू मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना और डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना के माध्यम से सरकार गंभीर एवं जटिल रोगों के उपचार में लगने वाली बड़ी-बड़ी राशि जरूरतमंदों को प्रदान कर रही है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आज एक पिता के निवेदन पर मेजर थैलेसिमिया से पीड़ित नौ साल के मासूम के बोन मेरो ट्रांसप्लांट के लिए 40 लाख 80 हजार रूपए देने का आश्वासन दिया है। इसमें से 18 लाख रूपए मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना से पहले ही जारी की जा चुकी है।

रायपुर के न्यू राजेन्द्र नगर में रहने वाले रवि गोस्वामी का नौ साल का बेटा मयंक दस माह की उम्र से ही मेजर थैलेसिमिया से पीड़ित है। उसे हर 15 दिनों में खून चढ़ाना पड़ता है। बेंगलुरू के एनएच मजूमदार शॉ मेडिकल सेंटर ने उसकी विस्तृत जांच के बाद बीमारी के इलाज के लिए बोन मेरो ट्रांसप्लांट की सलाह दी है जिसमें करीब 41 लाख रूपए का खर्च आएगा। मजदूरी और गैस चूल्हा सुधारने का काम करने वाले रवि गोस्वामी के लिए इतनी बड़ी राशि का इंतजाम सपना ही था।

गोस्वामी आज गुढ़ियारी में भेंट-मुलाकात कार्यक्रम में पहुंचे और मुख्यमंत्री से अपने बेटे के इलाज के लिए आर्थिक सहायता का निवेदन किया। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना से 18 लाख रूपए उसे मिल चुके हैं, पर लाख कोशिशों के बाद भी वह शेष राशि का इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं। मुख्यमंत्री बघेल ने उनके हालात जानकर तत्काल ही शेष राशि की व्यवस्था का भरोसा दिलाया। रवि गोस्वामी ने इस संवेदनशीलता और सहृदयता के लिए अपने परिवार की ओर से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को धन्यवाद देते हुए आभार व्यक्त किया है।

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