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आठ साल बाद वर्षा ने सुनी माँ की आवाज, ‘कका‘ कहकर मुख्यमंत्री को दिया धन्यवाद

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रायपुर। ‘‘मां ने मुझे जन्म दिया, पिता ने अभयदान, उनके प्यार दुलार को सुनने कका, तुमने मुझको दिया जीवनदान‘‘ इन भावुकतापूर्ण शब्दों से ज़ाहिर होती भावनाएं उस आठ साल की बिटिया वर्षा की हैं, जिसने श्रवण बाधित होने की वजह से जन्म से कभी अपनी मां की आवाज़ ही नहीं सुनी थी। मगर अब नन्हीं वर्षा के जीवन मे खामोशी नहीं स्वर गूंज रहे हैं।

आज वर्षा का भावुक परिवार विधानसभा पहुंचा था। उनके पास मुख्यमंत्री को धन्यवाद देने के लिए शब्द नहीं सूझ रहे थे। बिटिया ने समस्या स्वतः ही हल कर दी। बिटिया ने अपनी मीठी आवाज में कहा, धन्यवाद कका। मुख्यमंत्री ने बिटिया को खूब दुलारा। इस बिटिया को अपनी आवाज काक्लियर इम्प्लांट से वापस मिल गई है।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर एम्स रायपुर में वर्षा बिटिया का सफल इंप्लांट हुआ है। नन्ही वर्षा जीवन में पहली बार अपने माता पिता की आवाज़ सुन रही है। माता को पहली बार मां बुला रही है और छोटे भाई को बाबू कह रही है। इसी खुशी को जाहिर करने वर्षा का परिवार आज विधानसभा पहुंचा और मुख्यमंत्री का आभार जताया। जब पहली बार आवाजों की दुनिया को महसूस कर रही वर्षा बिटिया ने मुख्यमंत्री को ‘कका‘ कहकर पुकारा तो मुख्यमंत्री भावविभोर होकर बिटिया को खूब आशीर्वाद दिया। वर्षा के परिवार ने आभार जताते हुए मुख्यमंत्री का पोट्रेट उन्हें भेंट किया और कहा कि वे ज़िंदगी भर इस सहयोग को नहीं भूलेंगे। मुख्यमंत्री ने परिवार को आश्वस्त किया कि स्पीच थेरेपी से बिटिया को नए शब्द सीखने और भाषाज्ञान कराने में भी हरसंभव मदद की जाएगी।

एक मां के लिए इससे बड़ी दुःख की बात क्या हो सकती है कि पिछले 8 सालों से उसकी बेटी ने उसकी आवाज ही नहीं सुनी और शायद उस मां का यह दुःख जीवन भर बना रहता, यदि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भेंट मुलाकात के दौरान कोरिया ना आते और परिवार अपने मुखिया के सामने अपना दुःख साझा न कर पाते। इसी का परिणाम हुआ कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर वर्षा की कॉक्लियर इंप्लांट सर्जरी हुई और आज वर्षा अपनी मां और दुनिया की हर आवाज को सुन सकती है और उसे महसूस कर सकती है। दरअसल 8 साल की वर्षा को बचपन से ही सुनने और बोलने की तकलीफ थी, जिससे उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। वर्षा के परिवार ने उसका बहुत इलाज कराया, लेकिन तकलीफ दूर नहीं हुई।

कोरिया में भेंट-मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री बघेल के सामने परिवार ने अपनी बात रखी और आग्रह किया कि बेटी के इलाज में सहयोग करें। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तत्काल जिला प्रशासन के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वर्षा के इलाज में पूरी सहायता करें। वर्षा के पिता मुकेश मिश्रा ने बताया कि वर्षा को प्रशासन के सहयोग से रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया और कुशल चिकित्सकों के द्वारा वर्षा की सफल कॉक्लियर इंप्लांट सर्जरी की गई। पिता मिश्रा बताते हैं कि वर्षा अब सुनने लगी है और आवाज सुनकर प्रतिक्रिया दे रही है। अब वह धीरे-धीरे बोलना भी सीख रही है। वर्षा के माता-पिता और परिजनों ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल बहुत संवेदनशील हैं और आज उनके सहयोग से ही वर्षा को नया जीवन मिला है। इस अवसर पर संसदीय सचिव चन्द्रदेव राय, विधायक विनय जायसवाल, कुलदीप जुनेजा तथा मुकेश मिश्रा, श्रीमती ज्योति मिश्रा सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

देश में हर 4 मिनट में जा रही एक व्यक्ति की जान, आपको ये दिक्कत तो नहीं?

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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर एम.वी. पद्मा श्रीवास्तव ने गुरुवार को कहा कि स्ट्रोक भारत में मौत का दूसरा सबसे आम कारण है, यह देश में हर 4 मिनट में एक व्यक्ति की जान लेता है। सर गंगा राम अस्पताल में आयोजित एक समारोह में पद्मश्री से सम्मानित न्यूरोलॉजिस्ट ने कहा, "भारत में हर साल स्ट्रोक के लगभग 1,85,000 मामले आते हैं, जिसमें लगभग हर 40 सेकंड में स्ट्रोक का एक मामला आता है।


ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) के अनुसार, भारत में स्ट्रोक की 68.6 प्रतिशत घटनाएं होती हैं, 70.9 प्रतिशत मौतें स्ट्रोक से होती हैं और 77.7 प्रतिशत विकलांगता समायोजित जीवन वर्ष (डीएएलवाई) खो चुके हैं।

श्रीवास्तव ने कहा कि ये आंकड़े भारत के लिए खतरनाक हैं, खासतौर पर खराब संसाधन सेटिंग में रहने वाले लोगों के लिए। इसके अलावा, स्ट्रोक का मामला युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोगों में अधिक होता है। जीबीडी विश्लेषण से यह भी पता चला है कि 20 वर्ष से कम आयु के लगभग 52 लाख (31 प्रतिशत) बच्चों में स्ट्रोक के मामले पाए गए।

श्रीवास्तव ने कहा कि इन खतरनाक आंकड़ों के बावजूद कई भारतीय अस्पतालों में स्ट्रोक के रोगियों का त्वरित और कुशलता से इलाज करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे की कमी है और पर्याप्त स्ट्रोक देखभाल प्रदान नहीं करते हैं। उन्होंने कहा, "देश भर में, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पतालों में स्ट्रोक के इलाज के कई पहलुओं में कमी है।"

स्ट्रोक घातक हो सकता है या पक्षाघात का कारण बन सकता है और जितनी जल्दी हो सके, इलाज किया जाना चाहिए। स्ट्रोक के इलाज के लिए 'सुनहरी खिड़की' का इस्तेमाल 4-5 घंटे तक की जाती है। इसके बाद कुछ उपचार न्यूरॉन्स के नुकसान को दूर करने में मदद नहीं करेंगे।

जब समय पर स्ट्रोक-रोगी की देखभाल की बात आती है, तो भारत को शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच बुनियादी ढांचागत अंतर का सामना करना पड़ता है। उन्होंने सुझाव दिया कि टेलीमेडिसिन स्थितियों को सुधारने में मदद कर सकता है।

श्रीवास्तव ने कहा, "भारत में अमीर और गरीब संसाधन व्यवस्था में कमी के समाधान के लिए टेलीस्ट्रोक मॉडल को अपनाया जाता है। टेलीमेडिसिन/टेलीस्ट्रोक सुविधाओं का कार्यान्वयन समाज के आर्थिक और भौगोलिक रूप से विकलांग और वंचित वर्गो के बीच खाई को पाटने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।"

जर्नल न्यूरोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चलता है कि अवसाद स्ट्रोक से जुड़ा हो सकता है। जिन लोगों में अवसाद के लक्षण होते हैं, उनमें स्ट्रोक होने का जोखिम बढ़ सकता है। स्ट्रोक के बाद डिप्रेशन भी रिकवरी को खराब कर सकता है।

इसके अलावा कोविड को स्ट्रोक के बढ़े हुए स्तर से भी जोड़ा गया है। अमेरिका में थॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, कोविड वाले लोगों में प्रतिकूल परिणाम होने और स्ट्रोक के बाद ठीक होने में कठिनाई का सामना करने की संभावना 2.5 गुना अधिक पाई गई।


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