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भू-कालक्रमिकी तकनीकों पर स्कूल 2025 का उद्घाटन: युवा शोधकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण और ज्ञान संवर्धन

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भू-कालक्रमिकी तकनीकों पर स्कूल – 2025 का MoES सचिव डॉ. एम. रवीचंद्रन द्वारा उद्घाटन

आज पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के सचिव डॉ. एम. रवीचंद्रन ने भू-कालक्रमिकी तकनीकों पर स्कूल – 2025 का उद्घाटन किया। अपने उद्घाटन भाषण में, डॉ. रवीचंद्रन ने प्रशिक्षण स्कूल में भाग ले रहे युवा शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे नमूना तैयारी और आधुनिक उपकरणों में अपनी तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करें, साथ ही केवल डेटा उत्पादन तक सीमित न रहकर वैज्ञानिक निष्कर्षों और अर्थपूर्ण व्याख्याओं की ओर ध्यान दें। उन्होंने जोर दिया कि भारत में पृथ्वी विज्ञान का भविष्य राष्ट्रीय विकासात्मक लक्ष्यों के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें विकसित भारत 2047 की दृष्टि भी शामिल है। इस संदर्भ में, उन्होंने स्वदेशी सुविधाओं, विधियों और डेटा सेट्स के उपयोग के माध्यम से आत्मनिर्भरता बढ़ाने का आह्वान किया, साथ ही सहयोग और सहकर्मी शिक्षण के जरिए राष्ट्रीय ज्ञान आधार का विस्तार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. रवीचंद्रन ने प्रशिक्षण स्कूलों के गुणन प्रभाव (multiplier effect) पर भी जोर दिया और कहा कि युवा शोधकर्ताओं को शिक्षक की भूमिका निभानी चाहिए और अपने संस्थानों में अपनी सीख साझा करनी चाहिए, जिससे राष्ट्रीय ज्ञान आधार मजबूत हो। उन्होंने आश्वस्त किया कि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भू-कालक्रमिकी और संबंधित क्षेत्रों को आगे बढ़ाने वाले पहलों का समर्थन करता रहेगा, और भारत को वैश्विक पृथ्वी विज्ञान अनुसंधान में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में स्थापित करेगा।

उन्होंने रेखांकित किया कि भू-कालक्रमिकी पृथ्वी के इतिहास को समझने, प्राकृतिक संसाधनों का मानचित्रण करने और पर्यावरणीय चुनौतियों, जैसे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गई है।

डॉ. रवीचंद्रन ने अंटार्कटिका पर किए गए अध्ययनों का उल्लेख करते हुए भू-कालक्रमिकी की केंद्रीय भूमिका को उजागर किया। उन्होंने कहा कि ऐसे अध्ययन वैज्ञानिकों को दीर्घकालीन भूवैज्ञानिक परिवर्तनों को वर्तमान चुनौतियों जैसे प्राकृतिक आपदाओं, संसाधन प्रबंधन और जलवायु लचीलापन से जोड़ने में सक्षम बनाते हैं।

कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. एन. खरे, सलाहकार एवं कार्यक्रम प्रमुख, SAGE, MoES, ने IUC की विशेष भूमिका की सराहना की। उन्होंने बताया कि IUC न केवल उन्नत विश्लेषणात्मक सुविधाएँ प्रदान करता है बल्कि युवा शोधकर्ताओं को हाथों-हाथ प्रशिक्षण भी देता है। उन्होंने याद दिलाया कि मंत्रालय की दृष्टि, जो पहले पंचवर्षीय योजना काल से चली आ रही थी, भू-प्रौद्योगिकी और भू-कालक्रमिकी में राष्ट्रीय सुविधाओं की स्थापना थी, और IUC की देखरेख में यह क्षेत्र फल-फूल रहा है। डॉ. खरे ने उल्लेख किया कि अब तक 9,000 से अधिक नमूनों का AMS डेटिंग और अन्य उपकरणों द्वारा विश्लेषण किया जा चुका है, और यह सुविधा पृथ्वी की गतिशीलता, महाद्वीपीय विकास और भू-विज्ञान के अनुप्रयुक्त पहलुओं को समझने में आधारशिला बन गई है।

सचिव ने समानता, न्याय, विविधता और समावेशिता के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि ये मूल्य यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि भू-विज्ञान अनुसंधान के लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचें। उन्होंने युवा प्रतिभागियों को IUAC और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय से संपर्क बनाए रखने और अपने अकादमिक एवं पेशेवर प्रयासों में निरंतर समर्थन प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया।

उद्घाटन सत्र में प्रो. ए.सी. पांडेय, निदेशक, IUAC; डॉ. पंकज कुमार, IUAC; और चैत्य असवाल, IUAC ने भी संबोधन दिया। देशभर से फैकल्टी, वैज्ञानिक और युवा शोधकर्ता इस सप्ताह भर चलने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं।


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