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मजुली द्वीप पर 4,000 वर्षों के जलवायु और वनस्पति इतिहास का खुलासा

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मजुली द्वीप पर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने लगभग 4,000 वर्षों के जलवायु, वनस्पति और बाढ़ संबंधी इतिहास का पुनर्निर्माण किया है। यह द्वीप विश्व का सबसे बड़ा आबाद नदी द्वीप है और कई जनजातियों तथा नव-वैष्णव संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है।



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अध्ययन की प्रमुख बातें

  • यह शोध Birbal Sahni Institute of Palaeosciences (BSIP) के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया।

  • वैज्ञानिकों ने मजुली के सकाली आर्द्रभूमि (Sakali Wetland) से 150 सेमी गहरे अवसाद (Sediment Core) एकत्र किए।

  • परागकण (Pollen) और अवसाद कणों (Grain-size) के विश्लेषण के माध्यम से द्वीप के पर्यावरणीय इतिहास का अध्ययन किया गया।

  • अध्ययन ने 4040 से 500 वर्ष पूर्व तक की जलवायु और वनस्पति में हुए परिवर्तनों का आकलन किया।

प्रमुख निष्कर्ष

1. प्रारंभिक गर्म और आर्द्र काल (4040–2260 वर्ष पूर्व)

  • घने जंगलों का विस्तार था।

  • क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा और अनुकूल जलवायु मौजूद थी।

  • 4.2 हजार वर्ष पूर्व के वैश्विक शुष्क जलवायु संकट के दौरान भी पारिस्थितिकी तंत्र अपेक्षाकृत स्थिर रहा।

2. मानसून और बाढ़ में उतार-चढ़ाव

  • समय के साथ मानसूनी गतिविधियों और बाढ़ के पैटर्न में बदलाव देखने को मिला।

  • 1100–500 वर्ष पूर्व का काल अपेक्षाकृत अधिक नम रहा, जो वैश्विक Medieval Climatic Anomaly से मेल खाता है।

3. पिछले 500 वर्षों में बदलाव

  • तापमान और वर्षा में कमी दर्ज की गई।

  • यह परिवर्तन वैश्विक Little Ice Age अवधि के अनुरूप पाया गया।

  • मानव गतिविधियों का प्रभाव बढ़ा और प्राकृतिक वनस्पति का विस्तार घटा।

नदी और बाढ़ संबंधी निष्कर्ष

  • अध्ययन में पाया गया कि ब्रह्मपुत्र नदी तथा उसकी सहायक नदियों की प्रवाह प्रक्रियाओं ने मजुली के भू-आकृतिक विकास को प्रभावित किया।

  • अवसाद विश्लेषण से पता चला कि समय के साथ नदी तंत्र अधिक अस्थिर और ऊर्जावान हुआ।

  • इससे बाढ़, कटाव और भूमि क्षरण की तीव्रता बढ़ी।

अध्ययन का महत्व

  • बाढ़ और नदी कटाव से प्रभावित समुदायों के लिए बेहतर अनुकूलन (Adaptation) रणनीतियाँ तैयार करने में सहायता।

  • आर्द्रभूमि संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और सतत भूमि उपयोग योजना के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

  • ब्रह्मपुत्र बेसिन में आपदा प्रबंधन और नदी प्रबंधन नीतियों को मजबूत बनाने में मदद करेगा।

शोध दल

इस अध्ययन का नेतृत्व आर्या पांडेय और डॉ. स्वाति त्रिपाठी ने किया। इसमें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय  सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों ने सहयोग किया।


प्रधानमंत्री ने दो नए रामसर स्थलों को लेकर जताई खुशी

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नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के एटा जिले स्थित पटना पक्षी विहार और गुजरात के कच्छ क्षेत्र के छारी-ढांड को रामसर स्थल के रूप में मान्यता मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त की है।

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव के एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि देश की जैव विविधता के संरक्षण और महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

प्रधानमंत्री ने इन क्षेत्रों की स्थानीय जनता और आर्द्रभूमि संरक्षण से जुड़े सभी लोगों को बधाई देते हुए कहा कि यह मान्यता उनके प्रयासों का सम्मान है। उन्होंने आशा जताई कि ये आर्द्रभूमियां भविष्य में भी प्रवासी और स्थानीय पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास बनी रहेंगी।

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “यह जानकर प्रसन्नता हुई कि एटा का पटना पक्षी विहार और कच्छ का छारी-ढांड अब रामसर स्थल घोषित किए गए हैं। स्थानीय लोगों और आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए कार्य करने वालों को बधाई। यह मान्यता जैव विविधता संरक्षण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को और मजबूत करती है।”




छत्तीसगढ़ का पहला रामसर साइट बना कोपरा जलाशय

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वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने प्रदेशवासियों को दी बधाई

रायपुर- बिलासपुर जिले का कोपरा जलाशय अब छत्तीसगढ़ का पहला रामसर साइट बन गया है। इसकी घोषणा के बाद पूरे प्रदेश में प्रसन्नता का माहौल है। यह दर्जा उन आर्द्रभूमियों को दिया जाता है जो जैवविविधता, जल संरक्षण और पर्यावरणीय महत्व के लिए वैश्विक स्तर पर अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने इस उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि कोपरा जलाशय की यह सफलता छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि जलाशय की विशिष्ट पारिस्थितिकी, स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की विविधता तथा जल परितंत्र की समृद्धि ने इसे रामसर मान्यता के योग्य बनाया है।

वन मंत्री कश्यप ने राज्य वेटलैंड प्राधिकरण, पर्यावरणविदों, वन विभाग के अधिकारियों, शोधकर्ताओं और स्थानीय समुदायों को भी धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि सभी की संयुक्त मेहनत और संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता से यह उपलब्धि संभव हो सकी है।

मंत्री कश्यप ने बताया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ अंजोर विजन 2047 के अंतर्गत वर्ष 2030 तक 20 वेटलैंड्स को रामसर साइट का दर्जा दिलाने के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि कोपरा जलाशय के रामसर साइट घोषित होने से प्रदेश में वेटलैंड संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और इको-टूरिज्म के नए अवसर भी विकसित होंगे। इससे स्थानीय समुदायों को रोजगार मिलेगा और सतत विकास को बढ़ावा मिलेगा।

वन मंत्री केदार कश्यप ने सभी नागरिकों से अपील की कि वे इस महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर की सुरक्षा और संवर्धन में सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि वेटलैंड्स का संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक मजबूत प्राकृतिक विरासत छोड़ने का संकल्प भी।

कोपरा जलाशय को मिलेगा रामसर स्थल का दर्जा, राज्य वेटलैंड प्राधिकरण ने भेजा प्रस्ताव

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रायपुर- वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के निर्देश पर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित कोपरा जलाशय को राज्य सरकार ने प्रस्तावित रामसर स्थल घोषित करने की दिशा में बड़ी पहल की है। प्राकृतिक और मानव निर्मित विशेषताओं से युक्त यह जलाशय पूरे क्षेत्र के लिए जलसंसाधन, सिंचाई और जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

कोपरा जलाशय के रामसर स्थल बनने से क्षेत्र को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलेगी पहचान

वन मंत्री कश्यप ने उम्मीद जताई है कि कोपरा जलाशय के रामसर स्थल बनने से क्षेत्र को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। गौरतलब है कि कोपरा जलाशय मुख्य रूप से वर्षा जल और आसपास के छोटे नालों से भरता है। यह जलाशय स्थानीय ग्रामीणों की जल आवश्यकताओं को पूरा करता है और किसानों के लिए सिंचाई का प्रमुख स्रोत है। जलाशय के आसपास की भूमि अत्यंत उपजाऊ मानी जाती है, जिससे क्षेत्र के कई गाँवों और छोटे कस्बों की कृषि पूरी तरह इस जलाशय पर निर्भर है।

यहाँ की जैव विविधता मानी जाती है अत्यधिक समृद्ध 

इसके अलावा यह क्षेत्र वर्षभर विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों, जलचर जीवों और वनस्पतियों का सुरक्षित आवास बना रहता है। खासकर प्रवासी पक्षियों की बड़ी संख्या यहाँ हर वर्ष दर्ज की जाती है। जलाशय में मछलियाँ, जलीय पौधे, उभयचर, सरीसृप और अनेक प्रकार के कीट-पतंगे बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे इसकी जैव विविधता अत्यधिक समृद्ध मानी जाती है।

दुर्लभ पक्षियों के संरक्षण के लिए उपयुक्त स्थल

राज्य वेटलैंड प्राधिकरण के अनुसार कोपरा जलाशय रिवर टर्न, कॉमन पोचार्ड और इजिप्शियन वल्चर जैसे दुर्लभ व महत्वपूर्ण पक्षियों के संरक्षण के लिए अत्यंत उपयुक्त स्थान है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह जलाशय रामसर मानदंड संख्या 02, 03 और 05 की पूर्णता करता है, जो इसे एक उत्कृष्ट वेटलैंड इकोसिस्टम का उदाहरण साबित करता है।

स्वीकृति मिलने पर पर्यटन संबंधी महत्व और बढ़ जाएगा

इसी महत्व को देखते हुए राज्य सरकार ने इसे रामसर स्थल घोषित करने के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा है। यदि इस प्रस्ताव को स्वीकृति मिलती है, तो कोपरा जलाशय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण मिलेगा और इसका वैज्ञानिक, पर्यावरणीय तथा पर्यटन संबंधी महत्व और बढ़ जाएगा।

ग्रामीण आजीविका के विकास  को मजबूत करने की तैयारी

सरकारी योजनाओं के तहत इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन तथा ग्रामीण आजीविका विकास से जुड़ी गतिविधियों को और मजबूत करने की तैयारी है, ताकि स्थानीय आबादी और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।

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