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विदेशी पर्यटकों को आकर्षित कर रहा छत्तीसगढ़ का ग्रामीण पर्यटन मॉडल

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लमना विलेज स्टे में ब्रिटेन के अतिथियों ने ग्रामीण जीवन, स्थानीय संस्कृति और हाट-बाजार का लिया अनुभव

लमना में दिखी संस्कृति और अपनत्व की खूबसूरत तस्वीर

रायपुर- छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, ग्रामीण जीवनशैली, लोक संस्कृति और आत्मीय आतिथ्य अब देश ही नहीं, बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित कर रहा है। पर्यटन के बदलते स्वरूप में अब पर्यटक केवल बड़े शहरों और प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे गांवों की मिट्टी की खुशबू, स्थानीय खान-पान, परंपराओं, हस्तशिल्प और ग्रामीण जीवन को करीब से अनुभव करने में भी रुचि ले रहे हैं। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के लमना विलेज स्टे में ब्रिटेन से पहुंचे पर्यटकों का प्रवास इसी बदलती पर्यटन तस्वीर की जीवंत मिसाल है।

ब्रिटेन से आए फ्रैंक रोजर मार्सटन और जेनिफर मार्गरेट रेनफ्रू मार्सटन का लमना गांव पहुंचने पर ग्रामीणो ने पारंपरिक आत्मीयता के साथ तिलक लगाकर तथा ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच स्वागत किया। विदेशी अतिथियों ने भी ग्रामीणों के इस आत्मीय स्वागत का आनंद लिया और स्थानीय लोगों के साथ सहजता से घुल-मिलकर छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति को करीब से महसूस किया।

लमना विलेज स्टे में अतिथियों का  अनुभव केवल ठहरने तक सीमित नहीं रहा। उन्हें गांव की गलियों, खेत-खलिहानों, पारंपरिक परिवेश और स्थानीय जीवन से परिचित कराने के लिए ‘विलेज वॉक’ कराया गया। इस दौरान अतिथियों ने ग्रामीणों से संवाद किया, स्थानीय जीवनशैली को समझा और गांव के सहज वातावरण का आनंद लिया।  अतिथियों ने ग्रामीण परिवारों, बच्चों, महिलाओं और स्थानीय लोगों के साथ आत्मीय संवाद भी किया। 

ग्रामीण हाट बना खास आकर्षण

लमना प्रवास के दौरान स्थानीय ग्रामीण हाट का भ्रमण विदेशी मेहमानों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। हाट में उन्होंने स्थानीय दुकानदारों और ग्रामीणों से बातचीत की तथा मिट्टी के बर्तन, बांस से बने सामान, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, स्थानीय खाद्य सामग्री, सब्जियों और अन्य ग्रामीण उत्पादों को करीब से देखा। ग्रामीण बाजार की चहल-पहल, स्थानीय उत्पादों की विविधता और लोगों के सहज व्यवहार ने अतिथियों को भारतीय गांव के वास्तविक जीवन का अनुभव कराया।  

ग्रामीण जीवन से सीधे जुड़ने का अनुभव

लमना विलेज स्टे की खासियत यह है कि यहां पर्यटक केवल किसी स्थान को देखने नहीं आते, बल्कि स्थानीय जीवन का हिस्सा बनकर उसे महसूस करते हैं। ब्रिटिश अतिथियों ने ग्रामीण परिवेश में समय बिताया, स्थानीय लोगों के साथ बैठकर बातचीत की और पारंपरिक ग्रामीण वातावरण को नजदीक से जाना। गांव की सादगी, प्राकृतिक परिवेश और लोगों की सहज आत्मीयता ने उनके प्रवास को एक अलग तरह का अनुभव दिया।

छत्तीसगढ़ के पर्यटन पहचान में जुड़ रहा नया अध्याय

छत्तीसगढ़ में पर्यटन अब प्रकृति और दर्शनीय स्थलों से आगे बढ़कर अनुभव आधारित पर्यटन की ओर विस्तार कर रहा है। छत्तीसगढ़ में प्रकृति, जनजातीय संस्कृति, हस्तशिल्प, होमस्टे और इको-टूरिज्म को पर्यटन अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं। इससे स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार और उद्यमिता के अवसरों को जोड़ने वाले पर्यटन मॉडल को महत्व मिल रहा है। 

प्रकृति, संस्कृति और ग्रामीण आतिथ्य का संगम है लमना

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में मैकल पर्वत श्रृंखला, जंगल, जलप्रपात, धार्मिक स्थल और प्राकृतिक पर्यटन की विविध संभावनाएं मौजूद हैं। शिवघाट मनौरा, जलेश्वर धाम, लक्ष्मणधारा, झोजा जलप्रपात और धनपुर सहित अनेक प्राकृतिक एवं धार्मिक स्थल शामिल हैं।  लमना विलेज स्टे जैसे ग्रामीण पर्यटन केंद्र पर्यटकों को  प्रकृति और स्थानीय जीवन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

बस्तर से लमना तक—छत्तीसगढ़ में अनुभव आधारित पर्यटन की बढ़ती तस्वीर

पर्यटक अब केवल पर्यटन स्थलों के दर्शन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्थानीय जीवन, खान-पान, हस्तशिल्प, लोक संस्कृति और समुदाय के साथ जुड़ने वाले अनुभवों को भी महत्व दे रहे हैं। होमस्टे और ग्रामीण पर्यटन इस बदलाव की महत्वपूर्ण कड़ी बन रहे हैं। 

लमना में ब्रिटेन के पर्यटकों का अनुभव इसी सोच को आगे बढ़ाता दिखाई देता है। यहां विदेशी मेहमानों ने किसी पर्यटन स्थल को दूर से देखने के बजाय गांव के बीच जाकर लोगों से मुलाकात की, ग्रामीण हाट में स्थानीय गतिविधियों को समझा और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन की सहजता को महसूस किया।

विदेशी मेहमानों के लिए यादगार बना छत्तीसगढ़ का अपनापन

लमना प्रवास के दौरान फ्रैंक रोजर मार्सटन और जेनिफर मार्गरेट रेनफ्रू मार्सटन ग्रामीणों के साथ तस्वीरें खिंचवाते, बच्चों से बातचीत करते और स्थानीय परिवारों के साथ समय बिताते नजर आए।  वे ग्रामीण महिलाओं और बच्चों के साथ आत्मीयता से मिले । 

विदेशी पर्यटकों का गांवों तक पहुंचना इस बात का संकेत है कि छत्तीसगढ़ में पर्यटन की संभावनाएं अब नए क्षेत्रों और नए अनुभवों तक विस्तार पा रही हैं।

ग्रामीण पर्यटन के विस्तार से स्थानीय परिवारों, छोटे व्यवसायों, हस्तशिल्पकारों, ग्रामीण बाजारों, स्थानीय गाइडों और होमस्टे संचालकों के लिए आय एवं रोजगार के नए अवसर तैयार हो रहे हैं। 

लमना में ब्रिटेन के मेहमानों की यह यात्रा छत्तीसगढ़ के उस पर्यटन मॉडल की खूबसूरत झलक है, जहां प्रकृति के साथ संस्कृति, गांव के साथ आतिथ्य और पर्यटन के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है। छत्तीसगढ़ की यही सहज, आत्मीय और जीवंत पहचान देश-दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

कचना धुरवा मंदिर – आस्था, इतिहास और वीरता का अद्भुत संगम

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कचना धुरवा मंदिर छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का एक अत्यंत प्रसिद्ध, ऐतिहासिक और पूजनीय देवस्थल है। यह मंदिर रायपुर–गरियाबंद राष्ट्रीय मार्ग पर बारूका (छुरा प्रवेश मार्ग) के समीप मुख्य सड़क के किनारे स्थित है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह स्थान केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी लोकगाथाओं, आदिवासी संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के कारण भी विशेष पहचान रखता है। प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए पहुँचते हैं और अपनी मनोकामनाएँ लेकर कचना धुरवा देव के चरणों में शीश नवाते हैं।

कचना धुरवा – आदिवासी समाज के आराध्य देव

कचना धुरवा को आदिवासी समाज एवं स्थानीय ग्रामीण अपने इष्टदेव, वन देवता और रक्षक देव के रूप में पूजते हैं। सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि इस क्षेत्र के घने जंगलों, पहाड़ियों और दुर्गम रास्तों से यात्रा करने वाले लोग सबसे पहले कचना धुरवा मंदिर में माथा टेककर सुरक्षित यात्रा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से कचना धुरवा देव की पूजा करता है, उसकी यात्रा सफल होती है तथा जीवन की अनेक बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसी आस्था के कारण आज भी राहगीर और वाहन चालक यहाँ रुककर पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर परिसर में सफेद घोड़े पर सवार वीर राजा धुरवा की भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा उनके शौर्य, साहस, न्यायप्रियता और जनकल्याणकारी व्यक्तित्व का प्रतीक मानी जाती है। दूर से ही यह प्रतिमा श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है और मंदिर की विशेष पहचान बन चुकी है।

अमर प्रेम और वीरता की लोकगाथा

कचना धुरवा मंदिर का इतिहास केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमर प्रेम, त्याग और अदम्य वीरता की लोककथा से भी जुड़ा हुआ है।

लोकमान्यताओं के अनुसार बिंद्रानवागढ़ के वीर राजकुमार धुरवा अपनी वीरता और पराक्रम के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। कहा जाता है कि उनके पिता की हत्या शत्रु राजा द्वारा कर दी गई थी। अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए राजकुमार धुरवा ने दुश्मन राजा के विरुद्ध लगातार संघर्ष किया।

कहा जाता है कि उन्होंने अपने शत्रु से 46 बार युद्ध किया और हर बार असाधारण साहस का परिचय दिया। उनकी वीरता की चर्चा पूरे अंचल में होने लगी। किंतु जब युद्ध में विजय प्राप्त करना कठिन हो गया, तब शत्रु राजा ने छल का सहारा लिया।

लोककथा के अनुसार अंतिम युद्ध के दौरान राजकुमार धुरवा अपने सफेद घोड़े पर सवार होकर नदी पार कर रहे थे। उसी समय उनके घोड़े का एक पैर जल (नदी) में तथा दूसरा पैर थल (भूमि) पर था। इसी अवसर का लाभ उठाकर शत्रु ने धोखे से उन पर प्रहार कर दिया। इस विश्वासघाती हमले में राजकुमार धुरवा वीरगति को प्राप्त हुए।

उनके बलिदान से पूरा क्षेत्र शोक में डूब गया। लोगों ने उनकी वीरता, न्यायप्रियता और जनसेवा को अमर बनाने के लिए उन्हें देवतुल्य मानकर पूजा आरंभ कर दी। समय के साथ विभिन्न स्थानों पर उनके स्मृति-स्थल और मंदिर स्थापित किए गए, जिनमें गरियाबंद का कचना धुरवा मंदिर सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध माना जाता है।

राजकुमारी कचना और अमर प्रेम की कथा

स्थानीय लोककथाओं में राजकुमार धुरवा के साथ राजकुमारी कचना का भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि दोनों का प्रेम त्याग, निष्ठा और समर्पण का अद्भुत उदाहरण था। धुरवा की वीरगति के बाद राजकुमारी कचना ने भी अपने प्रेम और समर्पण की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जिसे आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाता है।

इसी कारण इस देवस्थल को "कचना धुरवा" के नाम से जाना जाता है। यह स्थान प्रेम, विश्वास, साहस और बलिदान का प्रतीक माना जाता है।

अखंड ज्योति एवं नवरात्रि का भव्य मेला

कचना धुरवा मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, लेकिन चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि के अवसर पर यहाँ का वातावरण अत्यंत भव्य और आध्यात्मिक हो जाता है।

इन पावन दिनों में मंदिर परिसर में अखंड ज्योति कलश स्थापित किए जाते हैं। श्रद्धालु पूरे नौ दिनों तक माता और कचना धुरवा देव की आराधना करते हैं। मंदिर परिसर दीपों की रोशनी, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों से गूंज उठता है।

नवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों सहित पड़ोसी राज्यों से भी हजारों श्रद्धालु पहुँचते हैं। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मंदिर परिसर में नारियल बाँधते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।

मंदिर परिसर में स्थित अन्य देवी-देवताओं के मंदिर

कचना धुरवा मंदिर परिसर केवल एक देवस्थल नहीं, बल्कि अनेक देवी-देवताओं की आराधना का प्रमुख केंद्र भी है। यहाँ श्रद्धालुओं को एक ही स्थान पर कई देवस्थलों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

मुख्य मंदिर के अतिरिक्त परिसर में निम्नलिखित देवस्थल स्थित हैं—

  • ग्राम देवी रूपई माता मंदिर

  • बंजारी माता मंदिर

  • सोनई माता मंदिर

इन सभी देवी-देवताओं की पूजा स्थानीय ग्रामीण एवं श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ करते हैं।

लोक आस्था और मान्यताएँ

कचना धुरवा मंदिर के संबंध में अनेक लोकमान्यताएँ प्रचलित हैं। लोगों का विश्वास है कि—

  • सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है।

  • यात्रा प्रारंभ करने से पहले यहाँ दर्शन करने से यात्रा सुरक्षित रहती है।

  • मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु नारियल, ध्वज और प्रसाद अर्पित करते हैं।

  • संकट और कठिनाइयों से मुक्ति के लिए लोग विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।

  • यह स्थान वन, प्रकृति और मानव के बीच गहरे आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक माना जाता है।

प्राकृतिक सौंदर्य

मंदिर चारों ओर से हरियाली, पहाड़ियों और प्राकृतिक वातावरण से घिरा हुआ है। शांत वातावरण, शुद्ध हवा और धार्मिक आस्था का संगम इस स्थान को और भी आकर्षक बनाता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि प्रकृति की गोद में आध्यात्मिक शांति का भी अनुभव करते हैं।

सांस्कृतिक महत्व

कचना धुरवा मंदिर आदिवासी संस्कृति, लोकपरंपरा और छत्तीसगढ़ की गौरवशाली विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यहाँ आयोजित धार्मिक अनुष्ठान, लोकगीत, लोकनृत्य और मेले इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखते हैं। यह मंदिर आने वाली पीढ़ियों को वीरता, त्याग, प्रेम और लोकआस्था की प्रेरणा देता है।

निष्कर्ष

कचना धुरवा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि वीरता, प्रेम, त्याग, लोकविश्वास और आदिवासी संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यहाँ की ऐतिहासिक लोकगाथाएँ, सफेद घोड़े पर विराजमान वीर धुरवा की प्रतिमा, नवरात्रि का विशाल मेला, अखंड ज्योति, प्राकृतिक वातावरण और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था इस स्थान को छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण देवस्थलों में शामिल करती हैं।

जो भी श्रद्धालु इस पवित्र धाम में श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुँचता है, वह आध्यात्मिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और कचना धुरवा देव का आशीर्वाद लेकर लौटता है। यही कारण है कि गरियाबंद जिले का यह पावन देवस्थल आज भी लाखों लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

मैनपाट में 'नाशपाती' की मिठास : एग्री-टूरिज्म का नया गढ़ बना छत्तीसगढ़ का शिमला मैनपाट

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नाशपाती से चमकी किसान मनोज यादव की किस्मत

रायपुर- छत्तीसगढ़ के शिमला के रूप में मशहूर पर्यटन स्थल मैनपाट अब एग्री-टूरिज्म (कृषि पर्यटन) के एक नए केंद्र के रूप में उभर रहा है। यहाँ की अनुकूल जलवायु और राज्य शासन के उद्यानिकी विभाग की कल्याणकारी नीतियां स्थानीय किसानों के लिए आर्थिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। पारंपरिक खेती को छोड़कर यहाँ के प्रगतिशील किसान अब फलोद्यान की ओर रुख कर सफलता की नई इबारत लिख रहे हैं। ऐसी ही एक प्रेरक सफलता की कहानी मैनपाट के ग्राम बारिमा निवासी कृषक मनोज यादव की है, जिन्होंने ग्राम कुदारीडीह (मेहता पॉइंट के पास) में नाशपाती का सफल बागान तैयार कर शानदार मुनाफा कमाया है।

सरकारी मदद से बंजर जमीन पर खड़े किए 170 फलदार वृक्ष

कृषक मनोज यादव ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2017-18 में मैनपाट के कमलेश्वरपुर स्थित शासकीय उद्यान रोपणी से नाशपाती के पौधे हासिल किए थे। उन्होंने अपनी 0.500 हेक्टेयर गोड़ा जमीन (पठारी और खाली पड़ी भूमि) पर लगभग 200 पौधे रोपे थे। कुछ पौधे प्राकृतिक कारणों से नष्ट जरूर हुए, लेकिन वर्तमान में उनके पास 170 पूरी तरह से फलदार पेड़ मौजूद हैं। मनोज ने अपनी इस सफलता का श्रेय उद्यानिकी विभाग को देते हुए बताया कि कमलेश्वरपुर उद्यान विभाग के अधिकारी-कर्मचारी समय-समय पर बागान का निरीक्षण करते हैं और खाद की मात्रा से लेकर पौधों के रखरखाव के लिए निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

मौसम की मार के बाद भी कमाया 1.5 लाख का शुद्ध मुनाफा

इस वर्ष ओलावृष्टि और बाजार में बिक्री में हुई थोड़ी देरी के बावजूद, मनोज यादव के बागान से लगभग 2.5 पिकअप (करीब 260 कैरेट) नाशपाती का थोक उत्पादन हुआ। प्रति पिकअप 100 से 110 कैरेट की औसत से 500 रुपये प्रति कैरेट की दर पर थोक बाजार में फसल बेची गई, जिससे लगभग 1,30,000 रुपये की आय हुई। इसके अलावा खुले बाजार और पर्यटकों को सीधे फल बेचकर 25 से 30 हजार रुपये कमाए गए। इस तरह इस सीजन में उन्हें कुल 1.5 लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई। मनोज यादव ने बताया कि पिछले वर्ष अनुकूल मौसम के दौरान इसी बागान से उन्हें 2.5 से 3 लाख रुपये की बंपर कमाई हुई थी।

एग्री-टूरिज्म का हॉटस्पॉट बना कुदारीडीह

यह बागान अब केवल फल उत्पादन का जरिया नहीं रहा, बल्कि पर्यटकों के लिए एक बड़ा आकर्षण केंद्र बन चुका है। लालमाटी के नाम से मशहूर इस खूबसूरत स्थान से रायगढ़ क्षेत्र का बेहद मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यहाँ रोजाना करीब 100 से 250 पर्यटक प्राकृतिक खूबसूरती का लुत्फ उठाने पहुँचते हैं। पर्यटक यहाँ आकर न केवल 50 से 100 रुपये प्रति किलो की दर से ताजी नाशपाती खरीदते हैं, बल्कि खुद अपने हाथों से पेड़ों से फल तोड़ने का रोमांचक अनुभव भी लेते हैं। पर्यटकों के इस सीधे जुड़ाव से किसानों को बिचौलियों के बिना सीधे अपनी उपज बेचने का एक बेहतरीन मंच मिल रहा है।

युवाओं और अन्य किसानों के लिए बने मिसाल

प्रगतिशील किसान मनोज यादव ने क्षेत्र के युवाओं और किसानों से अपील की है कि वे अपनी खाली पड़ी अनुपयोगी भूमि पर पारंपरिक खेती के साथ-साथ नाशपाती, लीची और अन्य फलदार पौधों की बागवानी अपनाएं। इससे कम रकबे में भी अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है और पर्यटन क्षेत्रों के पास होने के कारण सीधे उपभोक्ताओं को फसल बेचकर अतिरिक्त लाभ भी लिया जा सकता है।

जिला प्रशासन और उद्यानिकी विभाग द्वारा वनांचल और ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों को फलोद्यान विकास, आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण और उन्नत कृषि पद्धतियों के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास लगातार जारी है। मनोज यादव जैसे किसान इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि वैज्ञानिक मार्गदर्शन और कड़ी मेहनत से बागवानी को एक बेहद मुनाफे वाले व्यवसाय में बदला जा सकता है।


ट्रैवल एंड टूरिज्म फेयर कोलकाता-2026 में ‘बेस्ट डेकोरेशन ऑफ स्टॉल एंड अपीयरेंस’ सम्मान से बढ़ी प्रदेश की प्रतिष्ठा

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21 राज्यों के बीच छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड के अभिनव पवेलियन को मिला राष्ट्रीय सम्मान

 तीन दिवसीय आयोजन में निवेश, पर्यटन साझेदारी और राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मिली नई ऊंचाई

रायपुर- ट्रैवल एंड टूरिज्म फेयर (टीटीएफ) कोलकाता-2026 में छत्तीसगढ़ पर्यटन ने अपनी प्रभावशाली उपस्थिति के साथ राष्ट्रीय स्तर पर एक और उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। तीन दिवसीय इस प्रतिष्ठित पर्यटन आयोजन के सफल समापन पर छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड को देश के 21 राज्यों की सहभागिता के बीच उसके आकर्षक, सृजनात्मक एवं प्रभावशाली पवेलियन के लिए      “बेस्ट डेकोरेशन ऑफ स्टॉल एंड अपीयरेंस” सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जनजातीय जीवन, प्राकृतिक पर्यटन, धार्मिक धरोहरों और आधुनिक पर्यटन दृष्टिकोण को राष्ट्रीय मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के सफल प्रयासों की महत्वपूर्ण पहचान है।

10 से 12 जुलाई तक कोलकाता के विश्व बंगला प्रांगण में आयोजित देश के प्रतिष्ठित पर्यटन व्यापार मेले में छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड का पवेलियन तीनों दिनों तक आगंतुकों, पर्यटन विशेषज्ञों, टूर ऑपरेटर्स और निवेशकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रहा। बस्तर की जनजातीय संस्कृति, चित्रकोट एवं तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, सिरपुर, भोरमदेव, धार्मिक एवं इको-टूरिज्म, पर्यटन रिसॉर्ट्स तथा राज्य के विविध पर्यटन परिपथों को आधुनिक प्रस्तुतीकरण के माध्यम से प्रदर्शित किया गया, जिसे व्यापक सराहना मिली।

आयोजन के दौरान छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड के अध्यक्ष नीलू शर्मा, पर्यटन विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सचिव एस भारतीदासन तथा छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड के प्रबंध संचालक विवेक आचार्य ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय टूर ऑपरेटर्स, ट्रैवल एजेंसियों, होटल समूहों, पर्यटन विशेषज्ञों और निवेशकों के साथ अनेक महत्वपूर्ण बी-टू-बी बैठकों में सहभागिता की। इन बैठकों में पर्यटन निवेश, संयुक्त पर्यटन पैकेजों के विकास, विपणन सहयोग, नए पर्यटन बाजारों तक पहुंच तथा छत्तीसगढ़ में पर्यटकों की संख्या बढ़ाने की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा हुई। इन संवादों से राज्य के पर्यटन क्षेत्र में भविष्य की नई साझेदारियों और निवेश के अवसरों को भी मजबूती मिली।

मेले में छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड के साथ राज्य तथा अन्य राज्यों के लगभग 28 पंजीकृत टूर ऑपरेटर्स, होटल संचालकों, होम-स्टे संचालकों और पर्यटन उद्यमियों ने भी सक्रिय सहभागिता की। इससे राज्य के पर्यटन उत्पादों को राष्ट्रीय पर्यटन उद्योग के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने तथा नए व्यावसायिक संबंध स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ।

आयोजन के उद्घाटन अवसर पर गोवा के पर्यटन मंत्री रोहन ए. खंवटे, उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, पश्चिम बंगाल के पर्यटन मंत्री डॉ. शंकर घोष तथा थाईलैंड की महावाणिज्य दूत सिरीपोर्न तांतीपन्याथेप सहित अनेक विशिष्ट अतिथियों ने छत्तीसगढ़ पवेलियन का अवलोकन किया था। सभी अतिथियों ने राज्य की प्राकृतिक सुंदरता, जनजातीय संस्कृति, धार्मिक विरासत और पर्यटन विकास की संभावनाओं की सराहना करते हुए छत्तीसगढ़ को उभरते हुए पर्यटन गंतव्य के रूप में रेखांकित किया।

छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड के अध्यक्ष नीलू शर्मा ने कहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में राज्य पर्यटन के क्षेत्र में निरंतर नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। उन्होंने कहा कि टीटीएफ जैसे राष्ट्रीय मंच राज्य की पर्यटन संभावनाओं को देश और दुनिया के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इस सम्मान ने यह सिद्ध किया है कि छत्तीसगढ़ आज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, प्राकृतिक वैभव और उत्कृष्ट पर्यटन संसाधनों के बल पर राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

पर्यटन एवं संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सचिव एस भारतीदासन ने कहा कि राज्य सरकार पर्यटन को आर्थिक विकास, स्थानीय रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हुए योजनाबद्ध तरीके से कार्य कर रही है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर छत्तीसगढ़ की प्रभावी सहभागिता से राज्य में पर्यटन निवेश, पर्यटकों की संख्या और निजी क्षेत्र की भागीदारी में सकारात्मक वृद्धि होगी।

इन्फ्लुएंसर मीट से छत्तीसगढ़ पर्यटन को मिलेगी वैश्विक पहचान, डिजिटल मंचों पर गूंजेंगी प्रदेश की खूबसूरती

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पाँच दिवसीय फेम टूर में मैनपाट, सतरेंगा और रामगढ़ महोत्सव का अनुभव ले रहे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, करोड़ों दर्शकों तक पहुंचेगा छत्तीसगढ़ का प्राकृतिक, सांस्कृतिक और जनजातीय वैभव

रायपुर- डिजिटल माध्यमों के जरिए छत्तीसगढ़ पर्यटन को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में छत्तीसगढ़ टूरिज़्म बोर्ड द्वारा 26 से 30 जून 2026 तक पाँच दिवसीय "इन्फ्लुएंसर मीट एवं फेमिलराइजेशन (फेम) टूर" का आयोजन किया जा रहा है। इस अभिनव पहल के तहत राज्य के विभिन्न जिलों से चयनित प्रमुख सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थलों का भ्रमण कराया जा रहा है, ताकि उनके माध्यम से प्रदेश की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन संभावनाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार देश और दुनिया तक पहुंच सके।

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागी प्रदेश के प्रसिद्ध हिल स्टेशन मैनपाट, प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण सतरेंगा तथा ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व के रामगढ़ महोत्सव का भ्रमण कर रहे हैं। इस यात्रा के दौरान इन्फ्लुएंसर्स प्राकृतिक छटा, जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक लोककलाओं, पर्यटन सुविधाओं और सांस्कृतिक आयोजनों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त कर रहे हैं। साथ ही वे विभिन्न डिजिटल मंचों के लिए आकर्षक फोटो, वीडियो और रचनात्मक सामग्री तैयार कर रहे हैं, जिसके माध्यम से छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थलों की विशेषताएं लाखों दर्शकों तक पहुंचेंगी।

मैनपाट अपनी मनोहारी वादियों, तिब्बती संस्कृति, झरनों और प्राकृतिक आकर्षणों के कारण प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में विशेष स्थान रखता है। वहीं सतरेंगा इको-टूरिज्म के क्षेत्र में तेजी से उभरता हुआ गंतव्य है, जहां विशाल जलाशय, प्राकृतिक वातावरण और रोमांचक गतिविधियां पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। इसके साथ ही रामगढ़ महोत्सव के माध्यम से प्रतिभागी छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं, लोक कलाओं और ऐतिहासिक विरासत से भी रूबरू हो रहे हैं।

यह आयोजन पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन, पर्यटन मंडल के अध्यक्ष नीलू शर्मा के नेतृत्व, प्रबंध संचालक विवेक आचार्य के सक्षम संचालन तथा उपमहाप्रबंधक  पूनम शर्मा के निर्देशन में छत्तीसगढ़ टूरिज़्म बोर्ड की टीम द्वारा सुव्यवस्थित रूप से संचालित किया जा रहा है। आयोजन का अंतिम दिन 30 जून को निर्धारित है।

डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर्यटन प्रचार का सबसे प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है। ऐसे में इस इन्फ्लुएंसर मीट के माध्यम से तैयार की जा रही डिजिटल सामग्री छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थलों को देश और दुनिया के करोड़ों लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इससे प्रदेश के पर्यटन स्थलों की लोकप्रियता और दृश्यता बढ़ेगी, पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होगी तथा स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, हस्तशिल्प, लोककला, ग्रामीण पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलेगी।

इस प्रकार के नवाचार आधारित प्रचार अभियान राज्य को देश के अग्रणी पर्यटन गंतव्यों में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आगामी समय में भी पर्यटन के प्रभावी प्रचार-प्रसार के लिए ऐसे अभिनव प्रयास निरंतर किए जाते रहेंगे।

जशपुर-प्रकृति और सुंदर झरनों का आनंद लेने एक बार प्रसिद्ध पर्यटन स्थल रानीदाह का भ्रमण जरूर करें

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जशपुरनगर- छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले की हरी-भरी पहाड़ियों और घने साल के जंगलों के बीच स्थित रानीदाह जलप्रपात जशपुर की प्राकृतिक सुंदरता का एक अद्भुत प्रतीक है। यह झरना जशपुर नगर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहरी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। ख़ूबसूरत सड़कों से होकर जब कोई इस स्थल तक पहुँचता है, तो सामने फैली हरियाली, चट्टानों से गिरता दूधिया जल और पक्षियों की आवाज़ें मिलकर एक अविस्मरणीय दृश्य प्रस्तुत करती हैं। बरसात के मौसम में रानीदाह अपने पूरे वैभव पर होती है, जब पानी कई धाराओं में बँटकर ऊँची चट्टानों से नीचे गिरता है। गर्मी के मौसम में जल प्रवाह भले थोड़ा कम हो जाए, लेकिन आसपास की प्राकृतिक शांति और वातावरण का सौंदर्य हमेशा समान रूप से मनमोहक रहता है।

रानीदाह जलप्रपात केवल प्राकृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी लोककथाओं और रहस्यमयी कहानियों के कारण भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि बहुत समय पहले ओडिशा की एक राजकुमारी, रानी शिरोमणि जशपुर की इन पहाड़ियों में आ पहुँची थीं। जब उसके पिता और पाँच भाई उनका पीछा करते हुए यहाँ पहुँचे, तो रानी ने अपमान और जबरन विवाह से बचने के लिए इसी गहरी खाई में छलांग लगा दी और अपने प्राण त्याग दिए। उसी समय से यह झरना “रानीदाह” के नाम से जाना जाने लगा, जिसका अर्थ है “रानी का जलप्रपात।” कहा जाता है कि झरने के पास स्थित कुछ चट्टानें “पाँच भैया” के नाम से जानी जाती हैं, जो रानी के भाइयों के प्रतीक माने जाते हैं। यह कथा आज भी स्थानीय लोगों के बीच पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती है और इस स्थल को एक रहस्यमयी और भावनात्मक पहचान देती है।

पर्यटकों के लिए रानीदाह जलप्रपात एक शांत और मनोरम पिकनिक स्थल है।

पर्यटन के जरिए नई पहचान गढ़ेगा छत्तीसगढ़ : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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छत्तीसगढ़ की वास्तविक सुंदरता और सांस्कृतिक समृद्धि को दुनिया के सामने लाना हमारा उद्देश्य: मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में निवेश से युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर बनेंगे : मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल से पर्यटन एवं हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में निवेश को मिल रही नई गति

500 करोड़ रुपये से अधिक निवेश के साथ छत्तीसगढ़ के पर्यटन क्षेत्र में नई संभावनाएं: हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में निवेश को लेकर इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड ने दिखाई रुचि

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ अब देश के पर्यटन मानचित्र पर अपनी नई पहचान गढ़ने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पर्यटन को उद्योग का दर्जा मिलने, निवेश अनुकूल नीतियों और राज्य सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण प्रदेश में पर्यटन एवं हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में निवेश की संभावनाएं लगातार मजबूत हो रही हैं। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आज अपने निवास कार्यालय में पर्यटन को बढ़ावा देने, पर्यटक सुविधाओं के विकास एवं विस्तार तथा हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में निवेश को लेकर आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में शामिल हुए। बैठक में देश की प्रतिष्ठित इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड के प्रतिनिधियों सहित शासन के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बैठक में कहा कि छत्तीसगढ़ उत्तर से दक्षिण तक नैसर्गिक विरासत की अमूल्य धरा है, जहां नदियां, पहाड़, घने जंगल, जलप्रपात, समृद्ध आदिवासी संस्कृति और जनजातीय परंपराएं छत्तीसगढ़ को विशिष्ट पहचान प्रदान करती हैं।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य दुनिया को छत्तीसगढ़ की वास्तविक सुंदरता, सांस्कृतिक समृद्धि और प्राकृतिक विविधता से परिचित कराना है। उन्होंने कहा कि पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिए जाने से हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में निवेश की संभावनाएं तेजी से बढ़ी हैं और पर्यटकों के लिए बेहतर ठहराव, परिवहन तथा आधुनिक सुविधाओं के विकास के माध्यम से छत्तीसगढ़ को आकर्षक पर्यटन गंतव्य बनाया जा सकता है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि राज्य में लगातार निवेश प्रस्ताव प्राप्त हो रहे हैं और इसी क्रम में इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड द्वारा छत्तीसगढ़ में निवेश की इच्छा जताई गई है, जो प्रदेश के पर्यटन क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगी। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के निवेश से पर्यटन अधोसंरचना मजबूत होगी और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे।

बैठक के दौरान इंडियन होटल्स कंपनी लिमिटेड के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के समक्ष अपने निवेश प्रस्ताव के महत्वपूर्ण बिंदु साझा किए और बताया कि कंपनी छत्तीसगढ़ में हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में लगभग 500 करोड़ रुपये से अधिक निवेश की योजना पर कार्य कर रही है, जिसे शीघ्र आगे बढ़ाया जाएगा। कंपनी के प्रतिनिधियों ने कहा कि इस निवेश से प्रदेश में पर्यटन अधोसंरचना मजबूत होगी और रोजगार के नए अवसरों का सृजन होगा।

वित्त मंत्री ओ पी चौधरी ने कहा कि राज्य सरकार ने निवेश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया है तथा सभी आवश्यक अनुमतियों की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाया गया है।

बैठक में यह भी बताया गया कि  पर्यटन को उद्योग का दर्जा मिलने के बाद हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में निवेश के रास्ते व्यापक रूप से खुले हैं। राज्य सरकार पर्यटन क्षेत्र को आधुनिक अधोसंरचना, उच्चस्तरीय सुविधाओं और निवेश प्रोत्साहन नीतियों के माध्यम से विकसित करने की दिशा में विशेष पहल कर रही है। प्रदेश की बेहतर मानसूनी परिस्थितियां, समृद्ध प्राकृतिक संपदा और निवेश अनुकूल नीति पर्यटन विकास के लिए मजबूत आधार तैयार कर रही हैं।

बैठक में उद्योग विभाग के अधिकारियों ने निवेश प्रोत्साहन नीति तथा उपलब्ध इंसेंटिव्स की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि यदि कोई निवेशक 500 करोड़ रुपये से अधिक निवेश करता है अथवा 1000 से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है, तो उसे ‘बी-स्पोक पॉलिसी’ के तहत अतिरिक्त प्रोत्साहन एवं विशेष लाभ प्रदान किए जाएंगे। साथ ही पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए आधारभूत संरचना, सड़क संपर्क, आवासीय सुविधाओं तथा पर्यटक सेवाओं को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। 

बैठक में छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अध्यक्ष नीलू शर्मा, मुख्य सचिव विकास शील, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, वित्त सचिव डॉ. रोहित यादव, निवेश आयुक्त ऋतु सेन, मुख्यमंत्री के सचिव राहुल भगत, उद्योग सचिव रजत कुमार, पर्यटन विभाग सचिव डॉ. एस. भारतीदासन सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल से पर्यटन के अंतर्राष्ट्रीय पटल पर उभर रहा है जशपुर

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 जर्मन मेहमानों को जशपुर की जनजातीय संस्कृति ने किया मंत्रमुग्ध

रायपुर-मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की प्रेरणा और राज्य सरकार की पर्यटन संवर्धन नीतियों के अंतर्गत जशपुर अब विश्व पर्यटन मानचित्र पर अपनी जगह बना रहा है। इसकी झलक हाल ही में तब देखने को मिली जब जर्मनी से आए पर्यटक बर्नहार्ड और  फ्रांजिस्का जशपुर की जनजातीय संस्कृति, कला और आत्मीयता से गहराई से प्रभावित हुए।

दोनों पर्यटकों ने क्षेत्रीय स्टार्टअप “ट्रिप्पी हिल्स” के अनुभवात्मक पर्यटन कार्यक्रम के तहत जनजातीय जीवन की बारीकियों को समझा। यात्रा की शुरुआत मलार समुदाय से हुई, जो अपने उत्कृष्ट हस्तनिर्मित आभूषणों और शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध है। इन कारीगरों की रचनात्मकता ने विदेशी मेहमानों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

विशेष पिछड़ी जनजाति पहाड़ी कोरवा के गांव में उन्होंने पारंपरिक जीवनशैली और प्रकृति के साथ गहरे संबंध को महसूस किया। वहीं अगरिया समुदाय के दौरे में लौह गलाने की पारंपरिक तकनीक का जीवंत प्रदर्शन हुआ, जिसने दोनों अतिथियों को आश्चर्यचकित कर दिया। यात्रा का समापन स्थानीय हाट-बाजार में हुआ, जहाँ रंगीन वस्त्र, मिट्टी की खुशबू और पारंपरिक जनजातीय संगीत ने जशपुर की जीवंत सांस्कृतिक धड़कन को अभिव्यक्त किया।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने हमेशा इस बात पर बल दिया है कि जशपुर की जनजातीय संस्कृति केवल धरोहर नहीं, बल्कि पर्यटन विकास का सशक्त माध्यम भी है। उनके नेतृत्व में जशपुर में सड़क, संचार और सुविधाओं के प्रसार से नए पर्यटन मार्ग तैयार हो रहे हैं। “कल्चर देवी” और “अनएक्सप्लॉरड बस्तर” जैसे संगठनों के सहयोग से स्थानीय समुदायों को भी अपने हुनर को दुनिया के सामने लाने का अवसर मिला है। यह अनूठा सांस्कृतिक अनुभव इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति अब वैश्विक आकर्षण का केंद्र बन रही है, जहाँ परंपरा, प्रकृति और आधुनिकता का सुंदर संगम नजर आता है।




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