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NCB और DTU के बीच समझौता, सीमेंट व निर्माण क्षेत्र में शोध सहयोग को मिलेगा बढ़ावा

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राष्ट्रीय सीमेंट और भवन निर्माण सामग्री परिषद (NCB) ने दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (DTU) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जो भारत के सीमेंट और निर्माण क्षेत्र में शोध एवं अकादमिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इस सहयोग का उद्देश्य सीमेंट और कंक्रीट प्रौद्योगिकी में संयुक्त अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना, छात्रों, पेशेवरों और हितधारकों के लिए प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करना तथा कौशल विकास और क्षमता निर्माण को सुदृढ़ करना है। इसके साथ ही, यह साझेदारी अकादमिक जगत और उद्योग के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा देगी, जिससे श्रेष्ठ प्रथाओं और तकनीकी विशेषज्ञता का प्रसार संभव होगा।

यह साझेदारी देश में टिकाऊ और मजबूत बुनियादी ढांचे के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगी और बेहतर तकनीकी क्षमताओं तथा संस्थागत सहयोग के माध्यम से भारत के निर्माण क्षेत्र को सशक्त बनाएगी।

यह समझौता 30 मार्च 2026 को नई दिल्ली स्थित डीटीयू में एनसीबी के महानिदेशक डॉ. एल. पी. सिंह और डीटीयू के रजिस्ट्रार श्री बिनोद डोले द्वारा हस्ताक्षरित किया गया। इस अवसर पर डीटीयू के कुलपति प्रोफेसर प्रतीक शर्मा, एनसीबी के संयुक्त निदेशक एवं सचिव डॉ. एस. के. चतुर्वेदी, महाप्रबंधक एवं प्रमुख (ETS) डॉ. संजय मुंद्रा तथा महाप्रबंधक एवं प्रमुख (CME) डॉ. कपिल कुकरेजा भी उपस्थित रहे।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर सीएसआईआर-सीआरआरआई और एएमएनएस इंडिया के बीच अनुसंधान समझौता

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राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर सीएसआईआर–केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI) और इस्पात क्षेत्र की प्रमुख कंपनी आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया (AMNS India) के बीच एक अनुसंधान एवं विकास (R&D) समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते का उद्देश्य सड़क निर्माण में आयरन ओअर टेलिंग्स (Iron Ore Tailings) के उपयोग की संभावनाओं का अध्ययन करना है।

इस अवसर पर सीएसआईआर की महानिदेशक और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी ने कहा कि सड़क निर्माण में आयरन ओअर टेलिंग्स का उपयोग “खनन अपशिष्ट से हरित सड़कें (Mine Waste to Green Roads)” बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। उन्होंने बताया कि देश में ओडिशा, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में स्थित विभिन्न आयरन ओअर बेनिफिशिएशन संयंत्रों से हर वर्ष लगभग 18–20 मिलियन टन आयरन ओअर टेलिंग्स उत्पन्न होते हैं। इन टेलिंग्स को आमतौर पर बड़े बांधों में संग्रहित किया जाता है और इन्हें स्लाइम्स भी कहा जाता है, जो पर्यावरण और आर्थिक दृष्टि से चुनौतियां पैदा करते हैं।

इस R&D समझौते का उद्देश्य आयरन ओअर टेलिंग्स के प्रबंधन की समस्या का समाधान करना और सड़क निर्माण में प्राकृतिक एग्रीगेट्स की मांग को कम करना है। इस पहल के अंतर्गत CSIR-CRRI के वैज्ञानिक प्रयोगशाला परीक्षण, सामग्री का विश्लेषण और पेवमेंट डिज़ाइन अध्ययन करेंगे, ताकि सड़क की विभिन्न परतों में आयरन ओअर टेलिंग्स की उपयोगिता का आकलन किया जा सके।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. अरविंद बोधंकर, मुख्य सततता अधिकारी (Chief Sustainability Officer), AMNS इंडिया थे। उन्होंने कहा कि उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) और टिकाऊ अवसंरचना के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह साझेदारी औद्योगिक उप-उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देकर देश के विकास में योगदान देगी।

सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. च. रवि शेखर ने कहा कि संस्थान अगली पीढ़ी की टिकाऊ सड़क प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि AMNS इंडिया के साथ यह सहयोग सड़क निर्माण में आयरन ओअर टेलिंग्स के वैज्ञानिक परीक्षण और फील्ड प्रदर्शन को संभव बनाएगा, जिससे भारत सतत पेवमेंट प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी अग्रणी भूमिका और मजबूत करेगा।

इस पहल का नेतृत्व सीएसआईआर-सीआरआरआई के फ्लेक्सिबल पेवमेंट डिवीजन के प्रमुख श्री सतीश पांडे कर रहे हैं, जो स्टील स्लैग रोड टेक्नोलॉजी के आविष्कारक भी हैं। उन्होंने कहा कि अनुसंधान और प्रयोगशाला विश्लेषण के माध्यम से आयरन ओअर टेलिंग्स को सड़क निर्माण में अच्छी मिट्टी और प्राकृतिक एग्रीगेट्स के विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह के दौरान सतत परिवहन अवसंरचना से संबंधित कई नवीन तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया। इनमें कृषि अपशिष्ट आधारित बायो-बिटुमेन, स्टील स्लैग आधारित ECOFIX त्वरित गड्ढा मरम्मत तकनीक, स्लैग और फ्लाई ऐश आधारित TERASURFACING तकनीक, तथा वेस्ट प्लास्टिक आधारित मॉड्यूलर जियोसेल जैसी तकनीकें शामिल हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य सड़क निर्माण में परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के सिद्धांतों को बढ़ावा देना है।

कार्यक्रम में AMNS इंडिया के वरिष्ठ अधिकारियों, CSIR-CRRI के वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों, नीति-निर्माताओं और सड़क एवं इस्पात क्षेत्र से जुड़े कई हितधारकों ने भाग लिया। इस आयोजन ने भारत में सतत अवसंरचना विकास के लिए विज्ञान आधारित समाधानों के बढ़ते महत्व को रेखांकित किया।

भारत ने ‘फार्म रिसिड्यू से रोड तक’ बायो-बिटुमेन तकनीक का सफल तकनीकी हस्तांतरण किया, स्वच्छ और हरित हाईवे की दिशा में कदम

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“आज का दिन भारत के इतिहास में दर्ज हो जाएगा, क्योंकि देश ‘स्वच्छ, हरित हाईवे’ के युग में प्रवेश कर रहा है, इसके साथ ही CSIR‑सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टिट्यूट (CSIR-CRRI), नई दिल्ली और CSIR‑इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पेट्रोलियम, देहरादून (CSIR-IIP) द्वारा विकसित “Bio-Bitumen via Pyrolysis: फॉर्म रिसिड्यू से सड़क तक” तकनीक का सफलतापूर्वक तकनीकी हस्तांतरण हुआ।”

यह बात आज केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और CSIR उपाध्यक्ष, डॉ. जितेंद्र सिंह ने “Bio-Bitumen via Pyrolysis: फॉर्म रिसिड्यू से सड़क तक” तकनीकी हस्तांतरण समारोह को संबोधित करते हुए कही।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह दिन ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में याद रखा जाएगा। उन्होंने बताया कि भारत के हाईवे अब जीव-आधारित, पुनर्योजी और सर्कुलर इकोनॉमी समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। इस तकनीक से निर्मित सड़कें कम बजट में तैयार होंगी, अधिक टिकाऊ होंगी और पर्यावरणीय प्रदूषण से मुक्त होंगी।

उन्होंने इस पहल को “साइंस, सरकार और समाज का संयुक्त प्रयास” बताया, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विकसित भारत के लिए सुझाए गए Whole-of-Nation दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है।

मंत्री ने कहा कि बायो-बिटुमेन जैसी तकनीकें यह दर्शाती हैं कि वैज्ञानिक अनुसंधान सीधे राष्ट्रीय मिशनों जैसे स्वच्छता, आत्मनिर्भर भारत और आर्थिक स्वावलंबन में योगदान दे सकता है। उन्होंने कहा कि नवाचार को सही ढंग से संप्रेषित किया जाना चाहिए, ताकि इसे सभी हितधारक समझ सकें और अपनाएं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने आगे बताया कि CSIR की 37 प्रयोगशालाओं में कई सफलता की कहानियाँ हैं, और पिछले दशक में विज्ञान को नागरिकों, उद्योगों और राज्यों तक खुला करने पर जोर दिया गया है। उन्होंने बताया कि बायो-बिटुमेन कई चुनौतियों का समाधान एक साथ करता है – खेत की भूसी प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और आयात में कमी। वर्तमान में भारत अपनी बिटुमेन की लगभग 50% आवश्यकता आयात करता है, और बायो-बिटुमेन जैसी तकनीकें आयात पर निर्भरता कम करके घरेलू क्षमताओं को मजबूत करेंगी।

इस कार्यक्रम में फार्म रिसिड्यू के पायरोलिसिस से बायो-बिटुमेन का औद्योगिक स्तर पर तकनीकी हस्तांतरण प्रदर्शित किया गया। प्रक्रिया में धान की कटाई के बाद की भूसी का संग्रह, पैलेटाइजेशन, पायरोलिसिस के माध्यम से बायो-ऑइल का उत्पादन और फिर इसे पारंपरिक बिटुमेन के साथ मिश्रित करना शामिल है। विस्तृत प्रयोगशाला परीक्षणों में यह पाया गया कि पारंपरिक बिटुमेन का 20–30% सुरक्षित रूप से प्रतिस्थापित किया जा सकता है।

तकनीक का भौतिक, रियोलॉजिकल, रासायनिक और यांत्रिक परीक्षण किया गया, जिसमें रटिंग, क्रैकिंग, नमी से नुकसान और रेसिलिएंट मॉड्यूलस शामिल हैं। मेघालय के जोराबत–शिलांग एक्सप्रेसवे (NH-40) पर पहले ही 100 मीटर का ट्रायल स्ट्रेच सफलतापूर्वक बिछाया जा चुका है। इस तकनीक के लिए पेटेंट दायर किया गया है और कई उद्योगों को वाणिज्यिक कार्यान्वयन के लिए शामिल किया गया है।

मंत्री ने CSIR टीम को बधाई देते हुए बायो-बिटुमेन नवाचार को वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि इससे हर साल 25,000–30,000 करोड़ रुपये के बिटुमेन आयात को प्रतिस्थापित करने की आर्थिक क्षमता है। उन्होंने क्षेत्र-विशेष और संसाधन आधारित अनुसंधान पर भी जोर दिया।

मंत्री ने यह भी साझा किया कि उन्होंने सड़क निर्माण में स्टील स्लैग, वेस्ट प्लास्टिक और बायो-फ्यूल जैसी वैकल्पिक सामग्रियों के उपयोग का अनुभव किया है। उन्होंने कहा कि सिद्ध तकनीक, आर्थिक व्यवहार्यता, कच्चा माल उपलब्धता और बाज़ार योग्यता का सम्मिलन सफल विस्तार के लिए आवश्यक है। उन्होंने राष्ट्रीय हाईवे मानकों में बायो-बिटुमेन के समावेश के लिए पूर्ण संस्थागत समर्थन का आश्वासन दिया।

CSIR के महानिदेशक एवं DSIR सचिव, एन. कलाइसेल्वी ने कहा कि यह भारतीय विज्ञान के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने बताया कि भारत दुनिया का पहला देश बन गया है, जिसने बायो-बिटुमेन तकनीक को उसी वर्ष औद्योगिक और वाणिज्यिक स्तर पर ले जाने में सफलता प्राप्त की।

उन्होंने बताया कि बायोमास का पायरोलिसिस कई मूल्य श्रृंखलाएं उत्पन्न करता है – रोड के लिए बायो-बाइंडर, ऊर्जा-कुशल गैसीय ईंधन, बायो-पेस्टिसाइड फ्रैक्शन और बैटरियों, जल शुद्धिकरण और उन्नत सामग्री के लिए उच्च-ग्रेड कार्बन। यह प्रक्रिया उत्सर्जन-मुक्त, लागत-कुशल और भविष्य-तैयार है। उन्होंने नीति स्तर पर बायो-बिटुमेन के मिश्रण का सुझाव दिया ताकि इसे संपूर्ण भारत में लागू किया जा सके।

समारोह में CSIR-CRRI और CSIR-IIP के वरिष्ठ नेतृत्व, पूर्व निदेशक, वैज्ञानिक, उद्योग भागीदार और मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित थे, जो विज्ञान, सरकार और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी को दर्शाता है। यह तकनीकी हस्तांतरण कार्यक्रम भारत की सतत अवसंरचना, स्वदेशी नवाचार और बायो-आधारित आर्थिक भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूती से स्थापित करता है, और देश को स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर हाईवे की दिशा में अग्रसर करता है।


DPIIT ने विशेष अभियान 5.0 सफलतापूर्वक संपन्न किया, स्वच्छता और कार्यक्षमता में 100% लक्ष्य प्राप्त

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नई दिल्ली-भारत सरकार के उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) और इसकी संबद्ध संस्थाओं ने विशेष अभियान 5.0 को सफलतापूर्वक संपन्न किया, जिसे प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) के समग्र मार्गदर्शन में लागू किया गया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य स्वच्छता के सिद्धांतों को संस्थागत बनाना और सभी कार्यालयों में लंबित मामलों का समय पर निपटान सुनिश्चित करना था।

इस अभियान के दौरान, DPIIT के अंतर्गत भारतीय रबर मटेरियल रिसर्च इंस्टिट्यूट (IRMRI) ने “Waste to Wealth” पहल को लागू किया। इस पहल में पुराने रबर स्क्रैप का उपयोग करके एक सड़क खंड और एक्सेस रोड का निर्माण किया गया। क्रम्ब रबर सीमेंट कंक्रीट (CRCC), जो सीमेंट कंक्रीट में 10–15% अपशिष्ट रबर कण मिलाकर तैयार किया गया, का उपयोग किया गया। इस नवाचारी मिश्रण ने सड़क की स्थायित्व और टिकाऊपन बढ़ाया और टायर निपटान की चुनौती का समाधान किया। सड़क के प्रदर्शन की मजबूती, लोच और टिकाऊपन वैज्ञानिक रूप से निगरानी की गई। यह पर्यावरण-हितैषी दृष्टिकोण सतत अवसंरचना के लिए दोहराने योग्य मॉडल प्रस्तुत करता है और अभियान की नवाचार और सर्कुलर अर्थव्यवस्था में प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

DPIIT ने अपने स्वच्छता लक्ष्यों में 100 प्रतिशत सफलता प्राप्त की, देशभर में 70 स्थानों पर फैले 500 स्वच्छता लक्ष्य इकाइयों (CTUs) पर अभियान चलाया। हर चिन्हित स्थल को सफलतापूर्वक कवर किया गया, जिससे विभाग की साफ-सुथरे और कुशल कार्यस्थलों के प्रति प्रतिबद्धता उजागर हुई।

स्वच्छता अभियान के अतिरिक्त, DPIIT ने अन्य महत्वपूर्ण मापदंडों में भी उल्लेखनीय प्रगति की। विभाग ने 1,572 भौतिक फाइलों की समीक्षा की (लक्ष्य का 100%), और 1,119 फाइलें हटा दीं, जिससे 11,235 वर्ग फुट कार्यालय स्थान मुक्त हुआ और ₹17,69,569 की आय स्क्रैप निपटान से प्राप्त हुई। सार्वजनिक शिकायत निवारण, अपील, ई-फाइल और भौतिक फाइलों की समीक्षा, और स्वच्छता अभियानों के मापदंडों में DPIIT ने लगभग 100% लक्ष्य पूर्णता हासिल की, जो जवाबदेही और प्रभावी रिकॉर्ड प्रबंधन पर विभाग की निरंतर प्राथमिकता को दर्शाता है। इसके साथ ही, कर्मचारियों की सुविधा और उत्पादकता बढ़ाने के लिए कार्यालय पर्यावरण में सुधार पर भी ध्यान केंद्रित किया गया।

अभियान 2 से 31 अक्टूबर 2025 तक आयोजित किया गया, जबकि 15 से 30 सितंबर 2025 तक इसकी तैयारी की गई थी। इस अवधि के दौरान DPIIT के प्रयासों ने स्वच्छता, व्यवस्थित रिकॉर्ड प्रबंधन और लंबित मामलों के त्वरित निपटान के प्रति जागरूकता बढ़ाई। लक्ष्यों की लगभग पूर्णता सुनिश्चित करके, DPIIT ने सरकारी कार्य में कुशलता, जवाबदेही और स्वच्छता की संस्कृति को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।

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