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CSIR-NIScPR ने ‘विज्ञान संचार और उभरते रुझान’ पर दो दिवसीय कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया

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सीएसआईआर-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR), नई दिल्ली ने 4–5 अगस्त 2026 को CSIR इंटीग्रेटेड स्किल इनिशिएटिव (फेज-III) के अंतर्गत ‘विज्ञान संचार और उभरते रुझान’ विषय पर दो दिवसीय कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया।

संस्थान के प्रशिक्षण प्रभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों, मीडिया और उद्योग जगत से 30 प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रशिक्षण को अनुभव-आधारित (Experiential Learning) बनाया गया, जिसमें विशेषज्ञ व्याख्यान, संवादात्मक चर्चाएं और व्यावहारिक सत्रों के माध्यम से आधुनिक विज्ञान संचार और उभरती प्रौद्योगिकियों की व्यापक जानकारी दी गई।

विज्ञान संचार में जिम्मेदारी और एआई की बढ़ती भूमिका पर जोर

कार्यक्रम का उद्घाटन CSIR-NIScPR की निदेशक डॉ. गीता वाणी रायसम ने किया। उन्होंने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि संस्थान लंबे समय से देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने और विज्ञान संचार को मजबूत करने के लिए कार्य कर रहा है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जिम्मेदार विज्ञान संचार, डिजिटल प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की भूमिका लगातार बढ़ रही है, जिससे वैज्ञानिक जानकारी को अधिक विश्वसनीय, प्रभावी और व्यापक बनाया जा सकता है।

विज्ञान और समाज के बीच सेतु है विज्ञान संचार

CSIR-NIScPR के प्रशिक्षण प्रभाग के प्रमुख मुकेश ए. पुंड ने स्वागत भाषण में कहा कि विज्ञान संचार वैज्ञानिक अनुसंधान और समाज के बीच की दूरी को कम करने का प्रभावी माध्यम बन चुका है।

कार्यक्रम की नोडल प्रधान अन्वेषक (PI) मीताली भारती ने प्रशिक्षण के उद्देश्यों से प्रतिभागियों को अवगत कराया और पूरे कार्यक्रम का संचालन किया। वहीं पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. परमानंद बर्मन ने प्रशिक्षण की रूपरेखा प्रस्तुत की तथा शैक्षणिक सत्रों का संचालन किया।

आधुनिक विज्ञान संचार के विभिन्न पहलुओं पर हुआ प्रशिक्षण

दो दिवसीय प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को विज्ञान संचार के विभिन्न समकालीन विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई। इनमें—

  • विज्ञान संचार की मूल अवधारणाएं एवं विभिन्न प्रारूप

  • श्रोताकेंद्रित संचार रणनीतियां

  • व्यवहारिक विज्ञान (Behavioural Insights)

  • सोशल मीडिया प्रबंधन

  • पॉडकास्ट निर्माण

  • इन्फोग्राफिक्स और लघु वीडियो तैयार करना

  • विज्ञान संचार में एआई आधारित ऐप्स का उपयोग

  • नैतिकता एवं पेशेवर जिम्मेदारियां

  • विज्ञान संचार में उभरते करियर अवसर

जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल रहे।

विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव

कार्यक्रम में डॉ. हेमांसी और प्रियंका (अशोका विश्वविद्यालय), डॉ. परमानंद बर्मन, डॉ. वी. वी. बिनॉय (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़, बेंगलुरु), डॉ. एच. एस. सुधीरा (निदेशक, गुब्बी लैब्स), डॉ. मेहर वान तथा CSIR-NIScPR के संकाय सदस्यों ने विशेषज्ञ व्याख्यान दिए।

प्रशिक्षण की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए प्रतिभागियों की अपेक्षाओं, सीखने के परिणामों और अनुभवों का मूल्यांकन पूर्व एवं पश्चात प्रशिक्षण सर्वेक्षण के माध्यम से किया गया।

प्रतिभागियों को प्रदान किए गए प्रमाणपत्र

समापन सत्र में मुकेश ए. पुंड और मीताली भारती ने प्रतिभागियों को सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूरा करने पर बधाई दी और उनसे अपने-अपने संस्थानों में साक्ष्य-आधारित एवं जिम्मेदार विज्ञान संचार को बढ़ावा देने के लिए अर्जित ज्ञान और कौशल का उपयोग करने का आह्वान किया।

CSIR इंटीग्रेटेड स्किल इनिशिएटिव के सह-प्रधान अन्वेषक सलीम अंसारी ने प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वय किया। कार्यक्रम के सफल समापन पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।


विज्ञानिका: विज्ञान साहित्य महोत्सव 2025 का सफल आयोजन

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CSIR–नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस कम्युनिकेशन एंड पॉलिसी रिसर्च (CSIR–NIScPR), नई दिल्ली ने विज्ञान भारती (VIBHA), इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीट्रोलॉजी (IITM), पुणे और पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के सहयोग से 8–9 दिसंबर 2025 को विज्ञानिका: विज्ञान साहित्य महोत्सव 2025 का सफल आयोजन किया। यह दो दिवसीय महोत्सव इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल (IISF) 2025 का अभिन्न हिस्सा था। इस महोत्सव ने विज्ञान, साहित्य, भाषा और रचनात्मक संचार के संगम का उत्सव मनाया और देशभर के प्रमुख विज्ञान संवादकों, वैज्ञानिकों, संपादकों, विद्वानों और विज्ञान कवियों को एक मंच पर लाया। कार्यक्रम का उद्देश्य बहुभाषिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध विज्ञान संचार के माध्यम से वैज्ञानिक दृष्टिकोण और चेतना को मजबूत करना था।

उद्घाटन सत्र

8 दिसंबर को “भारतीय विज्ञान विमर्श में साहित्य और संचार माध्यमों की भूमिका” विषयक उद्घाटन सत्र हुआ। इस सत्र में साहित्य और संचार प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से भारतीय वैज्ञानिक विमर्श में योगदान पर चर्चा की गई।

  • डॉ. परमानंद बरमन, CSIR-NIScPR ने विज्ञानिका का अवलोकन प्रस्तुत किया।

  • डॉ. नील सरोवर भावेश, VIBHA ने भारतीय संदर्भ में विज्ञान संचार के महत्व पर प्रकाश डाला।

  • विवेकानंद पाई, महासचिव VIBHA ने मुख्य भाषण देते हुए भारतीय विज्ञान कथा और योगदान की महत्ता पर चर्चा की।

  • प्रो. अरुण कुमार ग्रोवर, पूर्व कुलपति, पंजाब यूनिवर्सिटी ने भारत के विज्ञान संस्थानों और विज्ञान संचार के इतिहास पर विचार साझा किए।

  • डॉ. गीता वानी रायसम, निदेशक, CSIR–NIScPR ने विज्ञान संचार में भारतीय संदर्भ के महत्व और CSIR-NIScPR के योगदान पर प्रकाश डाला।

  • डॉ. रश्मि शर्मा, प्रमुख, NCSTC, DST ने आधुनिक विज्ञान संचार दृष्टिकोण पर अपने विचार व्यक्त किए।

  • डॉ. अतुल कुमार श्रीवास्तव, IITM ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

विज्ञान कवि सम्मेलन

उसी दिन विज्ञान कवि सम्मेलन में कविता और विज्ञान का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया गया। प्रमुख विज्ञान कवियों में प्रो. मनोज कुमार पतारिया, प्रो. राजेश कुमार, मोहन सागोरिया, राधा गुप्ता, प्रो. नीरा राघव, यशपाल सिंह ‘यश’, टीएसआरएस संदीप, और डॉ. अनुराग गौर शामिल थे। उनके काव्य ने विज्ञान के जटिल विचारों को सरल और रचनात्मक रूप में आम जनता तक पहुँचाने की शक्ति दिखाई।

दूसरा दिन – वैज्ञानिक सत्र

दूसरे दिन का सत्र “विज्ञान से समृद्धि – आत्मनिर्भर भारत के लिए” पर केंद्रित रहा। इसमें पारंपरिक ज्ञान संचार और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता में इसके योगदान पर चर्चा हुई। प्रमुख वक्ताओं में

  • डॉ. अरविंद राणडे, निदेशक, NIF ने पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा और IP फ्रेमवर्क पर जोर दिया।

  • डॉ. विश्वजानी जे. सत्तिगेरी, प्रमुख, CSIR-TKDL ने पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण और नीति कार्यान्वयन पर चर्चा की।

  • डॉ. एन. श्रीकांत, DDG, CCRAS ने पारंपरिक ज्ञान के वैज्ञानिक आधार और मूल्य संवर्द्धन पर प्रकाश डाला।

  • डॉ. कणुप्रिया वशिष्ठ, वरिष्ठ प्रोग्राम ऑफिसर, DBT-BIRAC ने जीवन विज्ञान और बायोटेक नवाचार पर विचार साझा किए।

भारतीय भाषाओं में विज्ञान संचार

“अपनी भाषा, अपना विज्ञान” पैनल चर्चा में भारतीय भाषाओं में विज्ञान संचार के महत्व पर जोर दिया गया। पैनल में प्रो. अरुण कुमार ग्रोवर, देबोब्रत घोष, डॉ. मनीष मोहन गोरे, डॉ. एच. एस. सुथिरा और डॉ. नानौचा शर्मा शामिल थे। उन्होंने बताया कि मातृभाषा में विज्ञान संचार अधिक समावेशी, समझने योग्य और प्रभावशाली होता है।

समापन सत्र

“Engaging and Creative Ways of Communicating Science” सत्र में शैक्षिक कहानियों, ऑडियो-वीज़ुअल मीडिया, फील्ड एंगेजमेंट और वैज्ञानिक कथाओं के माध्यम से विज्ञान संचार की नवीनतम विधियों पर चर्चा हुई। प्रमुख वक्ताओं में कोलेगल शर्मा, जी. हरिकृष्णन, डॉ. सौरभ शर्मा, और पूजा राठौड़ शामिल थे।

निष्कर्ष

IISF 2025 के हिस्से के रूप में विज्ञानिका ने विज्ञान और समाज के बीच पुल बनाने के अपने उद्देश्य को सफलतापूर्वक पूरा किया। साहित्य, कला, भारतीय भाषाओं और रचनात्मक माध्यमों के माध्यम से इस महोत्सव ने यह दिखाया कि सांस्कृतिक रूप से समृद्ध विज्ञान संचार समाज में वैज्ञानिक चेतना और भागीदारी को बढ़ावा देने में कितना प्रभावशाली हो सकता है।


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