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मार्च 2027 तक पूरे होंगे छत्तीसगढ़ के दो बड़े भारतमाला हाईवे प्रोजेक्ट, सड़क संपर्क और व्यापार को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

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रायपुर- छत्तीसगढ़ में भारतमाला परियोजना के तहत निर्माणाधीन दो महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं को मार्च 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इन परियोजनाओं के पूर्ण होने से राज्य में सड़क संपर्क बेहतर होगा, माल परिवहन तेज होगा और व्यापार एवं औद्योगिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी।

सरकार के अनुसार, दोनों हाईवे परियोजनाएं छत्तीसगढ़ को पड़ोसी राज्यों से बेहतर ढंग से जोड़ेंगी, जिससे यात्रियों के साथ-साथ मालवाहक वाहनों की आवाजाही भी अधिक सुगम और सुरक्षित होगी। इससे यात्रा का समय कम होगा, परिवहन लागत में कमी आएगी और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था अधिक प्रभावी बनेगी।

इन परियोजनाओं के पूरा होने से उद्योग, कृषि और खनिज क्षेत्रों को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है। बेहतर सड़क नेटवर्क के कारण किसानों और उद्यमियों को अपने उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में आसानी होगी, जबकि औद्योगिक इकाइयों के लिए कच्चे माल और तैयार उत्पादों का परिवहन भी तेज और किफायती होगा।

भारतमाला परियोजना के तहत विकसित हो रहा यह सड़क नेटवर्क क्षेत्रीय विकास, निवेश आकर्षित करने और रोजगार के नए अवसर सृजित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियां निर्धारित समय-सीमा के भीतर परियोजनाओं को पूरा करने के लिए निर्माण कार्य में तेजी ला रही हैं।

इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद छत्तीसगढ़ की राष्ट्रीय राजमार्ग कनेक्टिविटी और मजबूत होगी तथा राज्य के आर्थिक विकास को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर सीएसआईआर-सीआरआरआई और एएमएनएस इंडिया के बीच अनुसंधान समझौता

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राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर सीएसआईआर–केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI) और इस्पात क्षेत्र की प्रमुख कंपनी आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया (AMNS India) के बीच एक अनुसंधान एवं विकास (R&D) समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते का उद्देश्य सड़क निर्माण में आयरन ओअर टेलिंग्स (Iron Ore Tailings) के उपयोग की संभावनाओं का अध्ययन करना है।

इस अवसर पर सीएसआईआर की महानिदेशक और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी ने कहा कि सड़क निर्माण में आयरन ओअर टेलिंग्स का उपयोग “खनन अपशिष्ट से हरित सड़कें (Mine Waste to Green Roads)” बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। उन्होंने बताया कि देश में ओडिशा, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में स्थित विभिन्न आयरन ओअर बेनिफिशिएशन संयंत्रों से हर वर्ष लगभग 18–20 मिलियन टन आयरन ओअर टेलिंग्स उत्पन्न होते हैं। इन टेलिंग्स को आमतौर पर बड़े बांधों में संग्रहित किया जाता है और इन्हें स्लाइम्स भी कहा जाता है, जो पर्यावरण और आर्थिक दृष्टि से चुनौतियां पैदा करते हैं।

इस R&D समझौते का उद्देश्य आयरन ओअर टेलिंग्स के प्रबंधन की समस्या का समाधान करना और सड़क निर्माण में प्राकृतिक एग्रीगेट्स की मांग को कम करना है। इस पहल के अंतर्गत CSIR-CRRI के वैज्ञानिक प्रयोगशाला परीक्षण, सामग्री का विश्लेषण और पेवमेंट डिज़ाइन अध्ययन करेंगे, ताकि सड़क की विभिन्न परतों में आयरन ओअर टेलिंग्स की उपयोगिता का आकलन किया जा सके।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. अरविंद बोधंकर, मुख्य सततता अधिकारी (Chief Sustainability Officer), AMNS इंडिया थे। उन्होंने कहा कि उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) और टिकाऊ अवसंरचना के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह साझेदारी औद्योगिक उप-उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देकर देश के विकास में योगदान देगी।

सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. च. रवि शेखर ने कहा कि संस्थान अगली पीढ़ी की टिकाऊ सड़क प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि AMNS इंडिया के साथ यह सहयोग सड़क निर्माण में आयरन ओअर टेलिंग्स के वैज्ञानिक परीक्षण और फील्ड प्रदर्शन को संभव बनाएगा, जिससे भारत सतत पेवमेंट प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी अग्रणी भूमिका और मजबूत करेगा।

इस पहल का नेतृत्व सीएसआईआर-सीआरआरआई के फ्लेक्सिबल पेवमेंट डिवीजन के प्रमुख श्री सतीश पांडे कर रहे हैं, जो स्टील स्लैग रोड टेक्नोलॉजी के आविष्कारक भी हैं। उन्होंने कहा कि अनुसंधान और प्रयोगशाला विश्लेषण के माध्यम से आयरन ओअर टेलिंग्स को सड़क निर्माण में अच्छी मिट्टी और प्राकृतिक एग्रीगेट्स के विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह के दौरान सतत परिवहन अवसंरचना से संबंधित कई नवीन तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया। इनमें कृषि अपशिष्ट आधारित बायो-बिटुमेन, स्टील स्लैग आधारित ECOFIX त्वरित गड्ढा मरम्मत तकनीक, स्लैग और फ्लाई ऐश आधारित TERASURFACING तकनीक, तथा वेस्ट प्लास्टिक आधारित मॉड्यूलर जियोसेल जैसी तकनीकें शामिल हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य सड़क निर्माण में परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के सिद्धांतों को बढ़ावा देना है।

कार्यक्रम में AMNS इंडिया के वरिष्ठ अधिकारियों, CSIR-CRRI के वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों, नीति-निर्माताओं और सड़क एवं इस्पात क्षेत्र से जुड़े कई हितधारकों ने भाग लिया। इस आयोजन ने भारत में सतत अवसंरचना विकास के लिए विज्ञान आधारित समाधानों के बढ़ते महत्व को रेखांकित किया।

सड़क निर्माण में गुणवत्ता से समझौता नहीं होगा : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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निर्माण के दौरान ही फील्ड में जाकर नियमित निरीक्षण करें अधिकारी, लापरवाही पर कार्रवाई और ठेकेदार होंगे ब्लैकलिस्ट

टेंडर से अवॉर्ड तक पूरी प्रक्रिया की समय-सीमा तय करने के निर्देश

आधुनिक डिजाइन और तकनीक से हों शासकीय भवनों का निर्माण

रायपुर- प्रदेश में सड़क निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और समयबद्धता को लेकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि सड़क निर्माण में किसी भी प्रकार की लापरवाही या गुणवत्ताहीन कार्य को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि कहीं भी निर्माण कार्य में कमी पाई गई तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी और दोषी ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा। मुख्यमंत्री साय ने यह निर्देश आज मंत्रालय महानदी भवन में लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के कार्यों और गतिविधियों की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान दिए। बैठक में उप मुख्यमंत्री एवं लोक निर्माण मंत्री अरुण साव  उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री साय ने अधिकारियों से कहा कि सड़क निर्माण के बाद निरीक्षण करने के बजाय निर्माण के दौरान ही नियमित रूप से फील्ड में जाकर गुणवत्ता की निगरानी की जाए। उन्होंने कहा कि सड़कों का निर्माण केवल तकनीकी कार्य नहीं बल्कि आमजन की सुविधा से जुड़ा हुआ महत्वपूर्ण अधोसंरचनात्मक कार्य है और इससे सरकार की छवि भी बनती है। यदि सड़क बनने के कुछ वर्षों के भीतर ही खराब हो जाए तो इससे सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

बैठक में बागबहार–कोतबा सड़क की खराब स्थिति पर मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि यह सड़क कुछ वर्ष पहले ही बनी थी, लेकिन उसकी स्थिति तेजी से खराब हो गई है। यदि सड़क चार वर्ष भी नहीं चले तो इसका कोई औचित्य नहीं रह जाता। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि इस सड़क के निर्माण में हुई कमियों की गंभीरता से जांच की जाए और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो इसके लिए निर्माण के दौरान ही गुणवत्ता की सख्त निगरानी की जाए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण कार्य हो रहे हैं, लेकिन आमजन को इन कार्यों की जानकारी नहीं मिल पाती जिससे सकारात्मक नैरेटिव नहीं बनता। उन्होंने निर्देश दिए कि बड़ी सड़क परियोजनाओं के शिलान्यास और भूमिपूजन मुख्यमंत्री और मंत्रियों के हाथों से कराए जाएं तथा उन्हें व्यापक रूप से आमजन के सामने प्रस्तुत किया जाए।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि सड़क निर्माण के टेंडर जारी होने से लेकर कार्य आवंटन (अवॉर्ड) तक की पूरी प्रक्रिया के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की जाए। उन्होंने कहा कि कई ठेकेदार बहुत कम दर यानी बिलो रेट पर टेंडर प्राप्त कर लेते हैं, जिसके कारण कार्य समय पर और गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरा नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में संबंधित ठेकेदार की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। यदि ठेकेदार बिलो रेट पर टेंडर लेता है तो यह उसकी जिम्मेदारी होगी कि वह कार्य को निर्धारित गुणवत्ता और समय-सीमा में पूरा करे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और समयबद्धता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नियमावली तैयार करने की आवश्यकता है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि अन्य राज्यों में लागू बेहतर व्यवस्थाओं का अध्ययन कर छत्तीसगढ़ में भी उपयुक्त प्रावधान लागू किए जाएं। साथ ही टेंडर और डीपीआर जैसे तकनीकी कार्यों के लिए एक अलग इकाई बनाने पर भी गंभीरता से विचार किया जाए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में लगभग 300 ऐसे गांव चिन्हित किए गए हैं, जहां बरसात के दौरान संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। ऐसे गांवों तक पहुंचने के लिए लोगों को कई बार बीमार मरीजों को खाट में उठाकर ले जाना पड़ता है, जो अत्यंत चिंता का विषय है। खाद्य विभाग से प्राप्त सूची के आधार पर चिन्हित इन गांवों को सड़कों और पुल-पुलियों के माध्यम से जोड़ने का कार्य प्राथमिकता के साथ किया जाए।

मुख्यमंत्री साय ने लैलूंगा–कुंजारा–तोलगेपहाड़–मिलूपारा–तमनार मार्ग के निर्माण की आवश्यकता पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में बड़ी आबादी निवास करती है और यहां सड़क का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। इस मार्ग के कुछ हिस्से में वन स्वीकृति की आवश्यकता होगी, लेकिन शेष हिस्सों में निर्माण कार्य शीघ्र प्रारंभ किया जाए।

बैठक में मनेंद्रगढ़–सूरजपुर–अंबिकापुर–पत्थलगांव–कुनकुरी–जशपुर–झारखंड सीमा राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-43 की प्रगति की भी समीक्षा की गई। लगभग 353 किलोमीटर लंबाई वाली इस सड़क परियोजना की स्थिति पर चर्चा की गई।पत्थलगांव-कुनकुरी खंड में भू-अर्जन का मुआवजा दिए जाने की जानकारी भी बैठक में साझा की गई। इसके अलावा अंबिकापुर–सेमरसोत–रामानुजगंज–गढ़वा मार्ग, गीदम–दंतेवाड़ा मार्ग, चांपा–सक्ती–रायगढ़–ओडिशा सीमा मार्ग, रायपुर–दुर्ग मार्ग तथा चिल्फी क्षेत्र की सड़कों सहित कई अन्य परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई। 

बैठक में बस्तर में पुल-पुलिया निर्माण सहित 17 सड़कों के निर्माण एवं उन्नयन पर भी विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही राज्य द्रुतगामी सड़क संपर्क मार्ग की आगामी कार्ययोजना की विस्तृत रूपरेखा भी प्रस्तुत की गई।

मुख्यमंत्री ने भवन निर्माण कार्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि प्रदेश में शासकीय भवनों के डिजाइन बहुत पुराने और एक जैसे दिखाई देते हैं। अब समय आ गया है कि शासकीय भवनों का निर्माण आधुनिक डिजाइन और तकनीक के आधार पर किया जाए। उन्होंने कहा कि भवनों का डिजाइन उनकी उपयोगिता के अनुरूप होना चाहिए और भूमि के बेहतर उपयोग के लिए हॉरिजॉन्टल की जगह वर्टिकल संरचना को बढ़ावा दिया जाए। मुख्यमंत्री ने राजभवन में बन रहे गेस्ट हाउस को भी आधुनिक और गरिमामय स्वरूप में तैयार करने के निर्देश दिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सड़कें आमजन के जीवन से सीधे जुड़ी होती हैं और लोग सड़क की गुणवत्ता को बहुत महत्व देते हैं। अन्य कई विकास कार्य भले दिखाई न दें, लेकिन सड़कें सीधे लोगों को दिखाई देती हैं और सरकार की छवि भी उसी के आधार पर बनती है। इसलिए लोक निर्माण विभाग एक अत्यंत महत्वपूर्ण विभाग है और इसमें होने वाले कार्यों को समयबद्धता और गुणवत्ता के साथ पूरा किया जाना अनिवार्य है।

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि ऐसा तंत्र विकसित किया जाए जिससे सड़कों में बनने वाले गड्ढों की जानकारी समय पर मिल सके और उन्हें तुरंत ठीक किया जा सके।

बैठक में मुख्य सचिव विकास शील, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, लोक निर्माण विभाग के सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह, मुख्यमंत्री के सचिव मुकेश बंसल, मुख्यमंत्री के सचिव राहुल भगत तथा लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

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