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रेलवे सुरंग में बेखौफ घूमता दिखा तेंदुआ, लोको पायलट की सतर्कता से टला बड़ा हादसा

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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में बिलासपुर-कटनी रेलमार्ग के खोंगसरा-भनवारटंक रेलखंड की एक रेलवे सुरंग में तेंदुआ दिखाई देने से रेल कर्मचारियों और आसपास के लोगों में हलचल मच गई। सुरंग के भीतर रेलवे ट्रैक पर तेंदुए के बेखौफ घूमने का वीडियो भी सामने आया है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

जानकारी के अनुसार, तेंदुआ रेलवे ट्रैक के बीचों-बीच चलता हुआ सुरंग के अंदर जाता दिखाई दिया। इसी दौरान रेलकर्मियों की नजर उस पर पड़ी। बाद में वहां से गुजर रहे लोको पायलट ने भी तेंदुए को देखा और सावधानी बरतते हुए ट्रेन की गति कम कर दी। इस सतर्कता के चलते वन्यजीव के साथ संभावित टक्कर टल गई।

सुरंग में तेंदुए की मौजूदगी से बढ़ी चिंता

वन क्षेत्र से सटे इस रेलमार्ग पर जंगली जानवरों की आवाजाही कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन रेलवे ट्रैक और विशेषकर सुरंग के भीतर तेंदुए की मौजूदगी ने वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रेन और वन्यजीव के बीच अचानक आमना-सामना होने की स्थिति दोनों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।

सामने आए वीडियो में तेंदुआ रेलवे पटरी के बीच आराम से चलता हुआ दिखाई दे रहा है। वीडियो सामने आने के बाद रेल कर्मचारियों तथा आसपास के लोगों के बीच इस घटना को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

लोको पायलट की सूझबूझ से बची वन्यजीव की जान

घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू लोको पायलट की सतर्कता रही। तेंदुए को ट्रैक पर देखकर ट्रेन की रफ्तार कम करना वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। तेज रफ्तार ट्रेन की चपेट में आने से वन्यजीव की मौत हो सकती थी, लेकिन समय रहते सावधानी बरते जाने से संभावित दुर्घटना टल गई।

रेलवे और वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत

यह घटना एक बार फिर बताती है कि जंगलों और वन्यजीव क्षेत्रों से गुजरने वाले रेलमार्गों पर अतिरिक्त सतर्कता की आवश्यकता है। ऐसे संवेदनशील रेलखंडों पर वन्यजीवों की गतिविधियों की निगरानी, ट्रेन चालकों को सतर्क करने की व्यवस्था और रेलवे तथा वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय से ऐसी घटनाओं में वन्यजीवों और यात्रियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

तेंदुए का सुरंग में दिखाई देना जहां प्रकृति और वन्यजीवों की मौजूदगी का प्रमाण है, वहीं यह मानव गतिविधियों और वन्यजीव आवास के बीच बढ़ते संपर्क की ओर भी संकेत करता है। ऐसे में विकास के साथ-साथ वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।

संदेश साफ है—रेल की रफ्तार से ज्यादा महत्वपूर्ण है जीवन की सुरक्षा। लोको पायलट की सतर्कता ने न केवल एक संभावित हादसा टाला, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी का भी उदाहरण पेश किया।

भारतीय रेलवे में ट्रैक अवसंरचना को नई मजबूती: सुरक्षा, गति और विश्वसनीयता में ऐतिहासिक सुधार

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भारतीय रेलवे ने पिछले 11 वर्षों में निरंतर निवेश और सशक्त क्रियान्वयन के माध्यम से अपनी ट्रैक अवसंरचना को मजबूत करने और सुरक्षा मानकों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में उल्लेखनीय प्रगति की है। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप देशभर में रेल परिचालन अधिक सुरक्षित, तेज और भरोसेमंद बना है।

वित्तीय वर्ष 2024–25 के दौरान भारतीय रेलवे ने 6,851 ट्रैक किलोमीटर में ट्रैक नवीनीकरण का कार्य पूरा किया। चालू वित्तीय वर्ष 2025–26 में 7,500 किलोमीटर से अधिक ट्रैक नवीनीकरण का कार्य प्रगति पर है। इसके अलावा, 2026–27 में 7,900 ट्रैक किलोमीटर के नवीनीकरण की योजना बनाई गई है, जो परिसंपत्तियों की विश्वसनीयता और यात्री सुरक्षा पर रेलवे के निरंतर फोकस को दर्शाती है।

रेल परिचालन की सुगमता के लिए टर्नआउट नवीनीकरण में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वर्ष 2024–25 में 7,161 थिक वेब स्विच और 1,704 वेल्डेबल सीएमएस क्रॉसिंग उपलब्ध कराई गईं। वहीं 2025–26 में 8,000 से अधिक थिक वेब स्विच और 3,000 से ज्यादा वेल्डेबल सीएमएस क्रॉसिंग प्रदान की जा रही हैं।

ट्रैक की स्थिरता और बेहतर यात्रा अनुभव सुनिश्चित करने के लिए बैलास्ट की मैकेनाइज्ड डीप स्क्रीनिंग पर भी निरंतर कार्य किया गया है। 2024–25 में 7,442 ट्रैक किलोमीटर की डीप स्क्रीनिंग पूरी की गई, जबकि 2025–26 में 7,500 ट्रैक किलोमीटर से अधिक का कार्य जारी है।

मैकेनाइज्ड रखरखाव और उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे ने 2014 के बाद से 1,100 से अधिक आधुनिक ट्रैक मशीनें खरीदी हैं, जिससे रेल नेटवर्क का रखरखाव तेज और अधिक प्रभावी हुआ है।

सुरक्षा को और सुदृढ़ करने के लिए रेलवे ट्रैकों के किनारे फेंसिंग को प्राथमिकता दी गई है। अब तक लगभग 15,000 किलोमीटर ट्रैक पर फेंसिंग की जा चुकी है, जिससे पशु दुर्घटनाओं और अनधिकृत प्रवेश में कमी आई है, विशेषकर उन मार्गों पर जहां ट्रेनें 110 किमी प्रति घंटा से अधिक की गति से चलती हैं।

इन सतत प्रयासों का प्रत्यक्ष परिणाम यह है कि 110 किमी प्रति घंटा या उससे अधिक गति की अनुमति वाले ट्रैक की लंबाई 2014 में 31,445 किलोमीटर (कुल नेटवर्क का लगभग 40 प्रतिशत) से बढ़कर वर्तमान में 84,244 किलोमीटर (लगभग 80 प्रतिशत) हो गई है। इससे यात्रियों को तेज, सुरक्षित और अधिक कुशल रेल सेवाएं उपलब्ध हो रही हैं।

भारतीय रेलवे की यह प्रगति देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और आधुनिक, सुरक्षित तथा विश्वस्तरीय परिवहन व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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