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जेलों में बढ़ती मौतों पर हाईकोर्ट सख्त, प्रशासन से मांगा जवाब

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रायपुर- छत्तीसगढ़ में जेलों के भीतर हो रही मौतों को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। एक वर्ष के भीतर राज्य की विभिन्न जेलों में 33 कैदियों की मौत होने के मामले को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने चिंता जताई है।

सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि कई मामलों में अब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार नहीं हुई है या लंबित पड़ी है, जिससे मौत के कारणों पर सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट ने इसे बेहद गंभीर लापरवाही मानते हुए संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी व्यक्त की।

हाईकोर्ट ने जेल विभाग के महानिदेशक (DG) और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कैदियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्रशासन की है, और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि सभी लंबित पोस्टमार्टम रिपोर्ट को जल्द से जल्द पूरा किया जाए और प्रत्येक मौत की विस्तृत जांच रिपोर्ट पेश की जाए। साथ ही, भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश भी दिए गए हैं।

इस मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों और रिपोर्ट की समीक्षा करेगा।

NHRC, भारत का 32वां स्थापना दिवस मनाया गया और कैदियों के मानवाधिकार पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), भारत ने आज विज्ञान भवन, नई दिल्ली में अपने 32वें स्थापना दिवस के अवसर पर ‘कैदियों के मानवाधिकार’ विषय पर एक कार्यक्रम और राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। आयोग की स्थापना 12 अक्टूबर 1993 को हुई थी।

मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए भारत के पूर्व राष्ट्रपति,राम नाथ कोविंद ने कहा कि मानवाधिकारों की आधुनिक व्याख्या से बहुत पहले ही हमारे ऋषि-महर्षियों और शास्त्रों में धर्म की रक्षा करने, करुणा के साथ कार्य करने और न्याय सुनिश्चित करने का संदेश था। यह नैतिक आधार आज भी हमारा मार्गदर्शन करता है। यह याद दिलाता है कि मानवाधिकारों की सुरक्षा केवल कानूनी दायित्व नहीं बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक आवश्यकता है, जो भारतीय जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा है।

राम नाथ कोविंद ने कहा कि भारत ने मानवाधिकारों का एक मजबूत और व्यापक ढांचा तैयार किया है। 1993 से अब तक NHRC ने स्वयं को विश्व के सबसे सम्मानित मानवाधिकार संस्थानों में विकसित किया है। 32वें स्थापना दिवस का आयोजन केवल एक संस्थागत मील का पत्थर नहीं, बल्कि संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के शाश्वत मूल्यों के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता की पुष्टि का अवसर है। आयोग की जांच, सलाह, हस्तक्षेप और वकालत के माध्यम से उसने समाज के सबसे कमजोर लोगों की आवाज़ को सुना और मानवाधिकार के मुद्दों को शासन के केंद्र में लाया।

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले तीन दशकों में हुई प्रगति का जश्न मनाते हुए, हमें आधुनिक समय की जटिल चुनौतियों को भी पहचानना चाहिए। तकनीकी, पर्यावरणीय और सामाजिक बदलाव के इस युग में असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों जैसे ड्राइवर, सफाई कर्मचारी, निर्माण श्रमिक और प्रवासी मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। ये लोग हमारे शहर और समाज को चलाए रखते हैं, लेकिन अक्सर असुरक्षित कार्य परिस्थितियों, अस्थिर आय और सामाजिक सुरक्षा की अनुपस्थिति का सामना करते हैं। उनके श्रम की सुरक्षा और गरिमा हमारी प्रगति का मापदंड होना चाहिए।

राम नाथ कोविंद ने जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों और इससे होने वाले मानवाधिकार प्रभाव, जैसे पलायन और विस्थापन, पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति, चाहे उसकी स्थिति कैसी भी हो, पहचान, सुरक्षा और मूलभूत सेवाओं तक पहुंच का हकदार है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य को भी मानवाधिकार के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता पर बल दिया और NHRC की सलाहों की सराहना की।

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि कैदियों के मानवाधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। समाज के मूल्य का असली परीक्षण यह है कि यह सबसे कमजोर लोगों, विशेष रूप से हिरासत में रखे गए लोगों के साथ कैसे व्यवहार करता है। जेल अधिकारियों का पवित्र दायित्व है कि हर कैदी के साथ मूलभूत शिष्टाचार के साथ व्यवहार किया जाए। उन्होंने खुशी व्यक्त की कि आयोग ‘कैदियों के मानवाधिकार’ पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन कर रहा है, ताकि हमारी जेलें केवल बंदी गृह न होकर सुधार, पुनर्वास और आशा के केंद्र बनें। उन्होंने सभी हितधारकों और विशेष रूप से जेल अधिकारियों से आग्रह किया कि वे ऐसा वातावरण तैयार करें जिसमें हर कैदी को समाज में पुनः एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में शामिल होने का अवसर मिले।

राम नाथ कोविंद ने सरकारों के प्रयासों की भी सराहना की, जिन्होंने sanitation, electricity, healthcare, education और housing जैसी सुविधाओं के माध्यम से नागरिकों, विशेष रूप से समाज के निचले हिस्से में रहने वालों के जीवन में सुधार किया। उन्होंने पुराने कानूनों को हटाने और जीवन को आसान बनाने के लिए प्रक्रियाओं को सरल बनाने की पहल की भी सराहना की। मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017 और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम, 2019 जैसी ऐतिहासिक पहलें यह दर्शाती हैं कि भारत हर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा और संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है।

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि हमारा संविधान हमें याद दिलाता है कि अधिकारों के साथ कर्तव्य भी आते हैं। स्वतंत्रता का प्रयोग समाज के कल्याण के साथ संतुलित होना चाहिए। इसी दृष्टि से, मानवाधिकारों की रक्षा केवल NHRC का दायित्व नहीं बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने NHRC के स्थापना दिवस पर सभी से आग्रह किया कि हम एक अधिक मानवीय, न्यायपूर्ण और समावेशी भारत बनाने के अपने संकल्प को दोहराएं।

इससे पहले, NHRC के अध्यक्ष, न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने आयोग के पिछले 32 वर्षों के कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आयोग ने अब तक 23 लाख से अधिक मामलों को देखा और लगभग 2,900 स्वयं संज्ञान मामले दर्ज किए। आयोग ने पीड़ितों को 263 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय राहत दी। पिछले एक वर्ष में लगभग 73,000 शिकायतें और 100 से अधिक स्वयं संज्ञान मामले दर्ज किए गए। इस दौरान 63 स्थल जांच की गई, 38,000 से अधिक मामले निपटाए गए और 200 मामलों में 9 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय राहत की सिफारिश की गई।

न्यायमूर्ति रामासुब्रमणियन ने कहा कि NHRC ने 12 मुख्य समूहों का गठन किया है, जो विभिन्न मानवाधिकार विषयों पर विशेषज्ञ, NGO और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ काम कर रहे हैं। इन समूहों ने सरकार की योजनाओं के मूल्यांकन और सुधार के लिए सिफारिशें तैयार की हैं।

NHRC सचिवालय, भरत लाल ने कहा कि आयोग ने भारतीय लोकतंत्र में मानवाधिकारों का रक्षक बनने का प्रयास किया है। आयोग की सबसे बड़ी ताकत इसकी नैतिक और नैतिक नेतृत्व क्षमता है। नागरिकों को शिकायत दर्ज करने और उनके प्रगति की ऑनलाइन जांच करने की सुविधा से न्याय प्रणाली और अधिक समावेशी और सुलभ बन गई है।

भरत लाल ने कहा कि NHRC का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सक्रिय योगदान है। आयोग ने Global Alliance of NHRIs, Asia Pacific Forum और Commonwealth Forum of NHRIs में भाग लिया है। भारत को हाल ही में मानवाधिकार परिषद के लिए सातवीं बार निर्विरोध चुना गया है, जो भारत की मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता और वैश्विक प्रतिष्ठा को दर्शाता है।

कार्यक्रम में NHRC के सदस्य, न्यायमूर्ति (डॉ.) विद्युत रंजन सरंगी और विजय भारती सायनी, DG (I) आनंद स्वरूप, रजिस्ट्रार (कानून) जोगिंदर सिंह, संयुक्त सचिव समीर कुमार, राज्य मानवाधिकार आयोगों और अन्य आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्य, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, शैक्षणिक संस्थान, NGO, मानवाधिकार कार्यकर्ता, शोधकर्ता और वरिष्ठ जेल अधिकारी उपस्थित थे। आयोग ‘कैदियों के मानवाधिकार’ पर एक दिन का राष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित कर रहा है।


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