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मोर गांव-मोर पानी अभियान से ग्रामीण आजीविका को मिली नई उड़ान

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47 आजीविका डबरियां किसानों के लिए बनेंगी संबल, जल संरक्षण के साथ बढ़ेगी आय

विकसित भारत जी राम जी योजना के तहत सिंचाई, मत्स्य पालन और कृषि गतिविधियों को मिलेगा नया आधार

रायपुर- छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शुरू किया गया 'मोर गांव-मोर पानी' महाअभियान ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण को एक बड़ा जनआंदोलन बना रहा है। इसके तहत सोख्ता गड्ढे, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, तालाब गहरीकरण और खेत-पोंड जैसी जल संरचनाएं बनाकर भूजल स्तर को बढ़ाया जा रहा है और ग्रामीणों को रोजगार भी मिल रहा है। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले में 'मोर गांव-मोर पानी' अभियान के तहत 'नवा तरिया आय के जरिया' और अन्य जल संरचनाओं के माध्यम से भूजल संवर्धन और जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दिया जा रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा और महिलाओं के लिए आजीविका के नए अवसर बढ़ रहे हैं।

कृषि एवं मत्स्य पालन के माध्यम से किसानों होंगे आत्मनिर्भर

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा संचालित मोर गांव-मोर पानी अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण, सिंचाई विस्तार और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में प्रभावी पहल साबित हो रहा है। विकसित भारत जी राम जी योजना के अंतर्गत जांजगीर-चांपा जिले में आजीविका आधारित जल संरचनाओं का निर्माण कर किसानों को कृषि एवं मत्स्य पालन के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए जा रहे हैं।

47 आजीविका डबरियों का निर्माण स्वीकृत

जांजगीर-चांपा जिले में अभियान के तहत कुल 47 आजीविका डबरियों का निर्माण स्वीकृत किया गया है, जिनमें से 35 डबरियों का निर्माण पूर्ण हो चुका है। वर्षा जल से भर चुकी इन डबरियों के माध्यम से किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध हो रहा है, जिससे खेती का रकबा बढ़ने के साथ कृषि उत्पादन में भी वृद्धि हो रही है।

14 डबरियों में मत्स्य पालन एवं कृषि आधारित गतिविधियां संचालित

आजीविका डबरियां अब केवल जल संरक्षण का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों के लिए अतिरिक्त आय का सशक्त स्रोत भी बन रही हैं। वर्तमान में 14 डबरियों में मत्स्य पालन एवं कृषि आधारित गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। डबरियों की मेड़ों पर दलहन, तिलहन तथा अन्य फसलों की खेती से किसानों को अतिरिक्त उत्पादन और बेहतर आमदनी प्राप्त हो रही है। जिले में 4 डबरियों का निर्माण कार्य प्रगति पर है। अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन से वर्षा जल संरक्षण, भू-जल स्तर में सुधार तथा सिंचाई सुविधाओं के विस्तार को नई गति मिली है। इससे किसान अब वर्षभर कृषि एवं मत्स्य पालन जैसी आजीविका गतिविधियों से जुड़कर अपनी आय में निरंतर वृद्धि कर रहे हैं।

मोर गांव-मोर पानी अभियान प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण

मोर गांव-मोर पानी अभियान प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, कृषि उत्पादकता बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की दिशा में राज्य सरकार की महत्वपूर्ण पहल के रूप में उभर रहा है। यह अभियान जल संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ते हुए किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और ग्रामीण विकास को नई गति प्रदान कर रहा है।

'मोर गांव, मोर पानी' महाअभियान के तहत विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित

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गौरेला पेंड्रा मरवाही- जिला प्रसाशन, फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी और नवनिर्माण चेतना मंच के संयुक्त तत्वधान में जिला पंचायत के नर्मदा सभा कक्ष में शुक्रवार को “मोर गांव, मोर पानी” महाअभियान के तहत विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह प्रशिक्षण सामुदायिक वन संसाधन अधिकार प्राप्त ग्राम सभाओं—भाडी, देवरीखुर्द, तिलोरा, पथर्रा एवं झिरनापोड़ी के सदस्यों, मेट, सचिव, रोजगार सहायक तथा पंचायत प्रतिनिधियों के लिए आयोजित किया गया। प्रशिक्षक नरेन्द्र यादव ने बताया कि इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य गाँव में जल उपलब्धता बढ़ाने के विभिन्न उपायों की जानकारी देना एवं उस जल के माध्यम से आजीविका संवर्धन, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण तथा सामुदायिक एवं व्यक्तिगत लाभों को समझाना था।


कार्यक्रम में ग्राम सभा सदस्यों, सामुदायिक प्रबंधन समिति, मेट, सचिव, रोजगार सहायक तथा पंचायत प्रतिनिधियों को बताया गया कि मनरेगा एक मांग-आधारित कार्यक्रम है। इसलिए ग्राम सभा में ऐसे सामुदायिक कार्यों की पहचान कर उन्हें कार्ययोजना में शामिल करना आवश्यक है, जिससे संसाधनों का बेहतर प्रबंधन हो सके और जंगल तथा गाँव की समृद्धि बढ़े। प्रतिभागियों को चोटी से घाटी सिद्धांत सरल भाषा में समझाया गया। बताया गया कि यदि भू-जल स्तर बढ़ाना है और मिट्टी कटाव रोकना है, तो पहाड़ी की चोटी से घाटी की ओर योजनाबद्ध तरीके से कार्य चयन करना आवश्यक है, तथा उसी सिद्धांत के अनुरूप ग्राम सभा द्वारा मनरेगा कार्ययोजना में उपयुक्त संरचनाओं की मांग रखना जरूरी है।

प्रतिभागियों को सीएलएआरटी का प्रशिक्षण भी दिया गया। यह  एक जीआईएस आधारित टूल है, जो क्षेत्र के भू-जल और सतही जल की भौगोलिक विशेषताओं का विश्लेषण कर बताता है, कि कहाँ रिचार्ज संरचनाएँ और कहाँ सतही जल संग्रहण के उपाय उपयुक्त होंगे। यह टूल ग्रामवासियों के लिए सरल है और उन्हें स्वयं योजना तथा डिज़ाइन तैयार करने में सक्षम बनाता है। इससे अधिकारियों को मनरेगा अनुमोदन प्रक्रिया तेज करने और योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने में भी सहायता मिलती है। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम स्थानीय समुदाय को अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं सतत प्रबंधन की दिशा में सशक्त बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो रहा है। प्रशिक्षण में नव निर्माण चेतना मंच से चन्द्र प्रताप सिंह, फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी से रामेश्वरी पूरी एवं रंजित पूरी उपस्थित थे।

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