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केशव चंद्र ने खान मंत्रालय के सचिव का पदभार संभाला

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नई दिल्ली- भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के 1995 बैच के AGMUT कैडर के अधिकारी केशव चंद्र ने आज भारत सरकार के खान मंत्रालय (Ministry of Mines) के सचिव के रूप में पदभार ग्रहण किया।

पदभार संभालने के तुरंत बाद सचिव ने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की और मंत्रालय की प्रमुख योजनाओं एवं चल रही गतिविधियों की समीक्षा की।

बैठक के दौरान अधिकारियों ने उन्हें खनिज अन्वेषण (Mineral Exploration), खनिज ब्लॉकों की नीलामी एवं संचालन, महत्वपूर्ण एवं रणनीतिक खनिज (Critical & Strategic Minerals) तथा खनन एवं खनिज क्षेत्र से जुड़ी अन्य प्रमुख पहलों की विस्तृत जानकारी दी।

इस अवसर पर सचिव, खान ने भारत के खनिज क्षेत्र को और अधिक सशक्त बनाने के लिए मंत्रालय की प्रमुख योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन तथा सभी संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश की बढ़ती औद्योगिक और आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने में खनिज क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है, इसलिए योजनाओं को समयबद्ध और प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक है।

सरकार का उद्देश्य खनिज संसाधनों के विकास, पारदर्शी नीलामी प्रक्रिया और महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित कर 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्य को मजबूत करना है।

भारत में महत्वपूर्ण खनिजों के अन्वेषण और घरेलू क्षमता निर्माण पर जोर: केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह

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केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा, “भारत महत्वपूर्ण खनिजों के अन्वेषण को तेजी से बढ़ाने, स्टार्टअप-प्रधान खनन पारिस्थितिकी तंत्र बनाने और आयात निर्भरता कम करने के लिए मजबूत घरेलू मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण कर रहा है।”




यह बात उन्होंने “नेशनल मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट” (NMET) के संचालन निकाय की बैठक में जीपीओए कॉम्प्लेक्स में कही। बैठक की सह-अध्यक्षता कोल और खनन मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री एवं NMET के संचालन निकाय के अध्यक्ष जी. किशन रेड्डी ने की। बैठक में खनन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, CSIR–इंस्टीट्यूट ऑफ मिनरल्स एंड मैटीरियल्स टेक्नोलॉजी (CSIR–IMMT) के निदेशक, एटॉमिक मिनरल्स डायरेक्टोरेट के निदेशक, परमाणु ऊर्जा विभाग के प्रतिनिधि, अन्वेषण एजेंसियों के अधिकारी और राजस्थान, तेलंगाना और महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि विशेष रूप से लिथियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के अन्वेषण की गति को वैश्विक मांग और भारत की रणनीतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रखना जरूरी है। उन्होंने राजस्थान के सिवाना बेल्ट और जम्मू एवं कश्मीर के सलाल–हाइमना ब्लॉक में चल रहे कार्यों का उल्लेख किया और अधिक संभावित क्षेत्रों में स्वदेशी अन्वेषण प्रयासों को बढ़ाने का आह्वान किया।

मंत्री ने कहा कि भारत में कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए खनन और महत्वपूर्ण खनिज क्षेत्र में प्रवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाना आवश्यक है। उन्होंने बायोटेक्नोलॉजी स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की सफलता का हवाला देते हुए कहा कि इसी तरह की संस्थागत मदद, लक्षित प्रोत्साहन और मार्गदर्शन खनन तकनीकों और अन्वेषण विधियों में नवाचार को सक्षम कर सकते हैं।

डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि निजी अन्वेषण एजेंसियों में क्षमता निर्माण दीर्घकालिक विकास के लिए अनिवार्य है। उन्होंने नोटिफाइड प्राइवेट एक्सप्लोरेशन एजेंसियों (NPEAs) की भूमिका को मजबूत करने, तकनीक और वित्त तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करने और परियोजना अनुमोदन प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया।

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मंत्री ने आगे कहा कि तेजी से अनुमोदन, बेहतर खरीद प्रणालियाँ और समय पर प्री-एक्सप्लोरेशन क्लियरेंस अन्वेषण गतिविधियों में गति बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि कई परियोजनाओं में वन स्वीकृतियों से संबंधित मुद्दे समयसीमा पर प्रभाव डालते हैं और इन्हें हल करने के लिए समन्वित प्रयासों की जरूरत है।

स्थानीय भागीदारी पर उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में अन्वेषण चल रहा है, वहां निर्वाचित प्रतिनिधियों जैसे सांसद और विधायक को जोड़ा जा सकता है। इससे स्थानीय समुदाय में जागरूकता बढ़ेगी और परियोजनाओं के सुचारू क्रियान्वयन में मदद मिलेगी।

डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि आयात पर निर्भरता कम करने के लिए एंड-टू-एंड घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं का विकास आवश्यक है, जिसमें प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन शामिल हैं। उन्होंने महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात में प्रसंस्करण क्षमता स्थापित करने के प्रयासों का उल्लेख किया, जो भारत की वैश्विक खनिज आपूर्ति श्रृंखला में स्थिति को मजबूत करेंगे।

मंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से उन्नत तकनीकों और विशेषज्ञता तक पहुँच बनाई जा सकती है, जबकि CSIR–IMMT और परमाणु ऊर्जा विभाग जैसी संस्थाओं के माध्यम से स्वदेशी तकनीक विकास पर ध्यान बनाए रखना चाहिए।

बैठक के दौरान NMET की कार्यप्रणाली की समीक्षा की गई। डॉ. जितेन्द्र सिंह ने वार्षिक योजनाओं, परियोजना अनुमोदन, वित्तीय सहायता और संस्थागत तंत्र पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि NMET को नवाचार का समर्थन जारी रखना चाहिए, अन्वेषण एजेंसियों को सक्षम बनाना चाहिए, राज्यों को प्रोत्साहित करना चाहिए और महत्वपूर्ण खनिजों की वसूली के लिए पायलट परियोजनाओं को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों में जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है ताकि वे खनिज विकास के दीर्घकालिक लाभ को समझ सकें।

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इस अवसर पर जी. किशन रेड्डी ने कहा कि महत्वपूर्ण खनिज भारत के विकास में अहम भूमिका निभाएंगे और उनके अन्वेषण को प्राथमिकता देने, तेज नीलामी प्रक्रिया सुनिश्चित करने और राज्यों व निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता है।

खनन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने NMET की गतिविधियों की प्रगति, स्टार्टअप पहल, परियोजना अनुमोदन तंत्र और समन्वय व दक्षता बढ़ाने के उपायों की जानकारी दी।

जीएसआई की 65वीं केंद्रीय भूवैज्ञानिक कार्यक्रम बोर्ड (CGPB) बैठक 21 जनवरी को नई दिल्ली में आयोजित

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नई दिल्ली- खनिज मंत्रालय के अंतर्गत भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण भारत (GSI) 21 जनवरी 2026 को नई दिल्ली के ICAR, पुसा स्थित ए. पी. शिंदे सिम्पोजियम हॉल में 65वीं केंद्रीय भूवैज्ञानिक कार्यक्रम बोर्ड (CGPB) की बैठक का आयोजन करेगा। यह महत्वपूर्ण बैठक केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों, उद्योग, अकादमिक संस्थानों और खनन क्षेत्रों के प्रमुख हितधारकों को एक साथ लाकर भूवैज्ञानिक प्रगति, खनिज अन्वेषण रणनीतियों और स्वच्छ ऊर्जा, भू-जोखिम तथा सतत विकास से संबंधित चुनौतियों के समाधान पर चर्चा करने का अवसर प्रदान करेगी।


CGPB का उद्देश्य और महत्व

केंद्रीय भूवैज्ञानिक कार्यक्रम बोर्ड (CGPB) भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण भारत (GSI), खनिज मंत्रालय का एक महत्वपूर्ण मंच है, जहां GSI के वार्षिक फील्ड सीजन प्रोग्राम (FSP) पर चर्चा की जाती है और कार्यों के दोहराव को रोकने के उपाय किए जाते हैं। CGPB के सदस्य और अन्य हितधारक जैसे राज्य सरकारें, केंद्रीय/राज्य खनिज अन्वेषण एजेंसियां, PSU और निजी उद्यमी GSI के साथ सहयोगात्मक कार्यों के लिए प्रस्ताव रखते हैं। भारत सरकार द्वारा निर्धारित प्राथमिकताओं और प्रस्तुत प्रस्तावों की महत्वता व तात्कालिकता के आधार पर आगामी वित्तीय वर्ष के लिए GSI के सर्वेक्षण, मानचित्रण, अन्वेषण, अनुसंधान एवं विकास, सामाजिक परियोजनाओं तथा प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का वार्षिक कार्यक्रम अंतिम रूप दिया जाता है।

65वीं CGPB बैठक का नेतृत्व और सहभागिता

65वीं CGPB बैठक की अध्यक्षता खनिज मंत्रालय के सचिव पीयूष गोयल करेंगे, जबकि GSI के महानिदेशक असित साहा और खनिज मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव संजय लोइया की गरिमामयी उपस्थिति में बैठक आयोजित होगी। बैठक में खनिज मंत्रालय, GSI, राज्य भूवैज्ञानिक विभागों, PSU और निजी अन्वेषण/खनन कंपनियों के वरिष्ठ प्रतिनिधि भी उपस्थित रहेंगे।

बैठक में चर्चा के प्रमुख विषय

बैठक में देश के खनिज क्षेत्र द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों पर विचार किया जाएगा, जिनमें प्रमुख हैं:

  • लिथियम, REEs, ग्रेफाइट, PGE, वैनाडियम, स्कैंडियम, सीज़ियम आदि जैसे महत्वपूर्ण खनिजों का अन्वेषण, जो ऊर्जा संक्रमण और आत्मनिर्भर भारत की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़े हैं।

  • AI/ML आधारित डेटा एकीकरण, भू-भौतिक सर्वेक्षण, हाइपरस्पेक्ट्रल रिमोट सेंसिंग, डीप ड्रिलिंग और मिनरल सिस्टम अध्ययन जैसे आधुनिक अन्वेषण उपकरणों को अपनाना।

  • महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों के लिए प्री-प्रतिस्पर्धात्मक डेटा साझा करने और सहयोगात्मक अन्वेषण मॉडल, ताकि राष्ट्रीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो, कार्यों का दोहराव कम हो और अन्वेषण से नीलामी-योग्य ब्लॉक्स तक की प्रक्रिया तेज हो।

  • हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों में भू-भूस्खलन खतरा जोनिंग और ढलान स्थिरता अध्ययन, ताकि आपदा जोखिम में कमी लाई जा सके।

बैठक में GSI का वार्षिक कार्यक्रम FS 2026-27 भी प्रस्तुत किया जाएगा, जिसमें पृथ्वी-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में 1,068 परियोजनाएं शामिल हैं, जिनमें प्रमुख जोर खनिज अन्वेषण पर है। यह कार्यक्रम नवाचार और सततता पर केंद्रित है, जिसमें महत्वपूर्ण खनिजों, कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन अध्ययन, अपतटीय अन्वेषण और सार्वजनिक भलाई से जुड़ी भू-विज्ञान को प्राथमिकता दी गई है। बैठक में GSI की प्रमुख प्रकाशनों का विमोचन और रणनीतिक एवं महत्वपूर्ण खनिज अन्वेषण के क्षेत्र में GSI की गतिविधियों का प्रदर्शन करने वाली प्रदर्शनी भी आयोजित होगी।

राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़ाव

CGPB बैठक राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक प्राथमिकताओं को वैश्विक सततता लक्ष्यों के साथ संरेखित करने, नवाचार और संसाधन सुरक्षा के भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए सहयोगात्मक और समन्वयात्मक मंच के रूप में कार्य करेगी।

175 वर्षों की गौरवशाली यात्रा: GSI जयपुर में आयोजित करेगा अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, दुनिया भर के वैज्ञानिक होंगे शामिल

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भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) अपनी 175वीं वर्षगांठ को ऐतिहासिक रूप में मना रहा है। इस अवसर पर GSI, खनन मंत्रालय, भारत सरकार 20–21 नवंबर 2025 को राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (RIC), जयपुर में एक भव्य अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कर रहा है। संगोष्ठी का विषय है — “Unearthing the Past, Shaping the Future: 175 Years of GSI”, जिसका उद्देश्य भू-विज्ञान के भविष्य, नई तकनीकों, और उभरती वैश्विक चुनौतियों पर व्यापक चर्चा करना है।

केंद्रीय मंत्री करेंगे उद्घाटन

उद्घाटन समारोह में केंद्रीय कोयला एवं खनन मंत्री जी. किशन रेड्डी मुख्य अतिथि होंगे। कार्यक्रम में खनन सचिव पीयूष गोयल और राजस्थान सरकार के खनन एवं पेट्रोलियम विभाग के प्रधान सचिव टी. रवीकांत भी उपस्थित रहेंगे। संगोष्ठी का नेतृत्व GSI महानिदेशक असित साहा और ADG विजय वी. मुगल करेंगे।

दुनिया के बड़े वैज्ञानिक एक मंच पर

दो दिवसीय इस आयोजन में भारत और विदेशों के शीर्ष संस्थानों के वैज्ञानिक हिस्सा लेंगे। इनमें शामिल हैं:

  • ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे (BGS)

  • यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (USGS)

  • जियोसाइंस ऑस्ट्रेलिया

  • यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास और यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन (USA)

  • लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी (UK)

  • इटालियन नेशनल रिसर्च काउंसिल

कार्यक्रम में 9 प्लेनरी, 19 विशेष व्याख्यान, और 300 से अधिक वैज्ञानिक एवं पोस्टर प्रस्तुतियाँ होंगी।

प्रदर्शनी और MoUs होंगे मुख्य आकर्षण

संगोष्ठी के दौरान एक प्रमुख प्रदर्शनी भी आयोजित होगी, जिसमें अत्याधुनिक जियोस्पेशियल तकनीक, सर्वेक्षण उपकरण और नवाचारों का प्रदर्शन किया जाएगा।
इसके साथ ही GSI IIT बॉम्बे और IIT खड़गपुर के साथ महत्वपूर्ण MoU भी साइन करेगा, जिससे अत्याधुनिक भू-विज्ञान शोध और क्षमता निर्माण को नई दिशा मिलेगी।

175 साल की विरासत, भविष्य का विज़न

1851 में स्थापित GSI ने भारत में खनिज अन्वेषण, भू-आपदा अध्ययन, सामरिक खनिज खोज, और भू-वैज्ञानिक मानचित्रण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। यह संगोष्ठी GSI की 175 वर्ष की यात्रा को सलाम करते हुए, भविष्य के भू-विज्ञान को आकार देने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

यह आयोजन न केवल भारत की भू-विज्ञान क्षमताओं को विश्व स्तर पर प्रदर्शित करेगा, बल्कि वैश्विक सहयोग और ज्ञान-विनिमय को भी मजबूत करेगा।

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