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डॉ. मनसुख मांडविया ने बीएमएस के अखिल भारतीय त्रैवार्षिक सम्मेलन में श्रमिक कल्याण को बताया विकसित भारत की आधारशिला

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केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने आज ओडिशा के पुरी में आयोजित भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) के अखिल भारतीय त्रैवार्षिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। उन्होंने दोहराया कि श्रमिकों का कल्याण, गरिमा और सुरक्षा सरकार की राष्ट्रीय विकास की परिकल्पना के केंद्र में है।

डॉ. मांडविया ने कहा,

“मुझे श्रम शक्ति और युवा शक्ति के लिए कार्य करने का सौभाग्य मिला है। ये दोनों शक्तियाँ भारत की प्रगति की आधारशिला हैं और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाएँगी।”

मंत्री ने कहा कि बीएमएस न केवल भारत का सबसे बड़ा ट्रेड यूनियन है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े संगठनों में भी शामिल है। उन्होंने कहा कि बीएमएस ने श्रमिकों के कल्याण, देश के श्रमबल को न्याय दिलाने और उन्हें राष्ट्रीय विकास व आर्थिक वृद्धि में भागीदार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

यह जोर देते हुए कि आर्थिक विकास के लिए श्रमिक और उद्योग—दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, मंत्री ने कहा कि एक मजबूत और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए दोनों के बीच सामंजस्य और सहयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इसी संतुलन को मजबूत करने, श्रमिकों के लिए कल्याण और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने तथा उद्योगों के लिए अनुपालन को सरल बनाने के उद्देश्य से श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) को लागू किया है।

उन्होंने कहा,

“मैं बीएमएस को बधाई देता हूँ कि उसने 15 अन्य केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ श्रम संहिताओं का स्वागत किया, श्रमिकों में जागरूकता फैलाई और दुष्प्रचार का मुकाबला किया। यह जिम्मेदार और रचनात्मक नेतृत्व को दर्शाता है, जिसमें संगठनात्मक हितों से ऊपर श्रमिकों के हितों को रखा गया है।”

श्रम संहिताओं के सक्षम प्रावधानों पर प्रकाश डालते हुए मंत्री ने अनिवार्य नियुक्ति पत्र, पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अवसर, वार्षिक स्वास्थ्य जांच तथा खतरनाक उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का उल्लेख किया।

सामाजिक सुरक्षा पहलों का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि सरकार ने लगातार कवरेज बढ़ाने और श्रमिकों के लिए संस्थागत समर्थन को मजबूत करने का कार्य किया है। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार लगभग 94 करोड़ लोग अब सामाजिक सुरक्षा के अंतर्गत आ चुके हैं और वर्ष 2026 तक 100 करोड़ लोगों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने का लक्ष्य है।

उन्होंने आगे कहा कि ईएसआईसी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में अब श्रमिकों के बच्चों के लिए मेडिकल शिक्षा में आरक्षण की सुविधा दी जा रही है, जिससे वित्तीय बोझ कम होगा और उच्च शिक्षा की उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने में सहायता मिलेगी।

डॉ. मांडविया ने कहा कि बीएमएस ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की वेतन सीमा बढ़ाने, न्यूनतम मजदूरी (फ्लोर वेज) पर निर्णय लेने तथा ईपीएस-95 के अंतर्गत न्यूनतम पेंशन बढ़ाने से संबंधित प्रतिवेदन प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि इन सभी विषयों पर श्रमिकों के हित में गंभीरता से विचार किया जाएगा और शीघ्र निर्णय लिए जाएंगे।

उन्होंने कहा,

“देश की प्रगति श्रमिकों के कल्याण से अलग नहीं की जा सकती। जब श्रमिक समृद्ध होते हैं, तब देश समृद्ध होता है।”

‘नया भारत’ के निर्माण में श्रमिकों की भूमिका को रेखांकित करते हुए मंत्री ने कहा कि सरकार श्रमिक कल्याण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाकर आगे बढ़ती रहेगी। उन्होंने यह भी दोहराया कि सरकार उन संगठनों का निरंतर समर्थन करेगी जो ईमानदारी से श्रमिकों के कल्याण, सशक्तिकरण और संरक्षण के लिए कार्य करते हैं।

डॉ. मांडविया ने सभी हितधारकों से ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना के साथ विकसित भारत के विजन को साकार करने के लिए मिलकर कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा,
“हमें सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने होंगे, हर श्रमिक को आगे बढ़ाना होगा और उन्हें अपनी पूरी क्षमता को साकार करने के लिए सशक्त बनाना होगा।”

इस सम्मेलन ने श्रम सुधारों, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक सशक्तिकरण पर संवाद के लिए एक मंच प्रदान किया, जिसमें देशभर से श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

उद्घाटन सत्र में कई गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया, जिनमें हिरणमय पंड्या, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बीएमएस; रविंद्र हिमते, राष्ट्रीय महामंत्री, बीएमएस; सर्गेई चेर्नोगायेव, अध्यक्ष, एफएनपीआर, रूस; मा. भागैया, अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, आरएसएस; तथा युकी ओत्सुजी, वर्कर स्पेशलिस्ट, दक्षिण एशिया एवं कंट्री ऑफिस, आईएलओ, नई दिल्ली शामिल थे।


डॉ. मनसुख मंडाविया ने गोवा में दो दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन का वर्चुअल उद्घाटन किया, श्रम संहिताओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर

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केंद्रीय श्रम एवं रोजगार और युवा मामले एवं खेल मंत्री, डॉ. मनसुख मंडाविया, ने 7 जनवरी 2026 को गोवा में दो दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन का वर्चुअल उद्घाटन किया।

यह सम्मेलन छह क्षेत्रीय सम्मेलनों की श्रृंखला में पहला है, जिन्हें श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित किया जाएगा। इन सम्मेलनों का उद्देश्य चार श्रम संहिताओं के सुचारू क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC), कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PMVBRY) से संबंधित मुद्दों पर विचार-विमर्श करना है।

केंद्रीय मंत्री डॉ. मंडाविया ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने राज्यों की सराहना की, जिन्होंने चार श्रम संहिताओं के प्रावधानों के अनुरूप अपने मौजूदा श्रम कानूनों में संशोधन करने का उत्साहपूर्वक प्रयास किया। यह सुधार 21 नवंबर 2025 से लागू हुए हैं और इसमें वार्षिक स्वास्थ्य जांच, जोखिमपूर्ण गतिविधियों में लगे श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, नियुक्ति पत्र जारी करना अनिवार्य, और ग्रेच्युटी की पात्रता अवधि घटाकर एक वर्ष करना जैसी प्रगतिशील प्रावधान शामिल हैं। मंत्री ने कहा कि आगे केंद्र और राज्य सहनशील समन्वय के माध्यम से कोड्स का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करेंगे, जिससे श्रमिकों के कल्याण और लाभ में समानता और निष्पक्षता बढ़ेगी। इन श्रम सुधारों को अंतरराष्ट्रीय मीडिया जैसे Global Times और The Economist से भी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है।

सम्मेलन में सचिव, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, वंदना गुरनानी ने बताया कि चार श्रम संहिताओं का उद्देश्य 29 मौजूदा श्रम कानूनों को समेकित और सरल बनाकर श्रमिक कल्याण को मजबूत करना है। इन संहिताओं में वेब-आधारित निरीक्षण प्रणाली और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा कवरेज जैसे कई प्रगतिशील उपाय शामिल हैं। केंद्रीय सरकार ने 30 दिसंबर 2025 को ड्राफ्ट नियमों को पूर्व-प्रकाशित किया है, जबकि नियमों की आवश्यकता न होने वाले प्रावधान 21 नवंबर 2025 से लागू हैं। उन्होंने राज्यों से कहा कि वे अपने संबंधित नियमों को शीघ्र अधिसूचित करें और इसके लिए कानून विभाग की सलाह लें।

सरलीकृत क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए, मंत्रालय ने FAQs हैंडबुक जारी की, V.V. गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान (VVGNLI) के माध्यम से क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू किए, ड्राफ्ट निरीक्षण योजना साझा की और डिजिटल हस्तक्षेपों के लिए श्रम सुविधा और समाधान पोर्टल्स पर API इंटीग्रेशन किया। राज्यों को PMVBRY के तहत आउटरीच, दुकानों और प्रतिष्ठानों अधिनियमों के साथ ओवरलैप, और ESIC कवरेज के विस्तार का लाभ उठाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है, जिसमें गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों, संविदा और आउटसोर्सेड श्रमिकों को शामिल करना भी शामिल है।

सम्मेलन नियमों और विनियमों पर विचार-विमर्श, अंतराल और असमानताओं की पहचान, सांविधिक अधिसूचनाओं का त्वरित प्रावधान, बोर्डों और फंडों के गठन और संबंधित संस्थागत तंत्रों पर चर्चा के लिए मंच के रूप में कार्य करेगा। इसमें चार श्रम संहिताओं के तहत योजनाओं, आईटी सिस्टम और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के कार्यान्वयन, क्षेत्रीय स्तर के अधिकारियों की क्षमता निर्माण और राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों तथा अन्य हितधारकों के बीच जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

सम्मेलन में मंत्रालय और राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे और सक्रिय भागीदारी की।


पेट्रोलियम उद्योग में बड़ा बदलाव: श्रम संहिताओं से सुरक्षा और कल्याण को नई दिशा

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मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • ओएसएचडब्ल्यूसी कोड, 2020 (OSHWC Code) पेट्रोलियम यूनिट्स, रिफ़ाइनरी से लेकर फ़्यूल डिपो तक सभी को एक एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचे के अंतर्गत लाता है।

  • अनिवार्य मेडिकल सर्विलांस, कौशल-आधारित प्रशिक्षण व प्रमाणन, आधुनिक सुरक्षा मानक, और आपातकालीन तैयारी के माध्यम से श्रमिक सुरक्षा को और मजबूत किया गया है।

  • सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 ESIC कवरेज का विस्तार करता है और डिजिटल, सरल अनुपालन प्रक्रिया लागू करता है, जिससे पेट्रोलियम क्षेत्र में कल्याणकारी प्रावधानों और प्रशासन में सुधार होता है।

परिचय (Introduction)

भारत सरकार ने चार श्रम संहिताओं —

  1. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियाँ संहिता 2020 (OSHWC),

  2. सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020,

  3. औद्योगिक संबंध संहिता 2020,

  4. वेतन संहिता 2019 —
    के माध्यम से श्रम क़ानूनों में ऐतिहासिक सुधार किए हैं।

ये सुधार औद्योगिक प्रतिष्ठानों में सुरक्षा, कार्य परिस्थितियों और सामाजिक सुरक्षा के लिए एक समग्र, समन्वित एवं आधुनिक ढाँचा स्थापित करते हैं। पेट्रोलियम उद्योग, जो उच्च-जोखिम वाले पदार्थों का संचालन करता है, इस एकीकृत ढाँचे से विशेष रूप से लाभान्वित होगा।

नई श्रम संहिताओं के लागू होने के साथ, पेट्रोलियम उद्योग विखंडित और निरीक्षक-प्रधान व्यवस्था से निकलकर एकीकृत, अनुपालन-उन्मुख और तकनीक-सक्षम प्रणाली की ओर बढ़ रहा है। यह संहिताएँ पेट्रोलियम के पूरे मूल्य-श्रृंखला — अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम तक — को कवर करती हैं।

पेट्रोलियम उद्योग के विनियामक ढाँचे में परिवर्तन

पेट्रोलियम उद्योग देश के सबसे खतरनाक एवं सुरक्षा-संवेदी क्षेत्रों में से है। यहाँ अत्यधिक ज्वलनशील हाइड्रोकार्बन, हाइड्रोजन सल्फ़ाइड जैसे विषैले गैस, बेंजीन वाष्प, LNG, LPG, उच्च तापमान वाले प्रोसेस फ्लुइड्स आदि लगातार संभाले जाते हैं, जिससे थर्मल रेडिएशन और एक्सपोज़र संबंधी बीमारियों का खतरा रहता है।

पहले सुरक्षा व्यवस्था का आधार मुख्यतः फ़ैक्टरी अधिनियम, 1948 पर था, जो आधुनिक पेट्रोलियम जोखिमों के लिए पर्याप्त नहीं था। इसमें:

  • सीमित मेडिकल निगरानी,

  • बिखरी हुई आपातकालीन आवश्यकताएँ,

  • धीमी और अप्रभावी प्रवर्तन प्रणाली,

  • कागज़-आधारित रिकॉर्ड,

  • बहु-विभागीय अनुमतियाँ

जैसी समस्याएँ थीं। पाइपलाइनों, रिटेल आउटलेट्स, स्टोरेज हब आदि के लिए अलग-अलग विभागों से अनुमतियाँ लेनी पड़ती थीं।

OSHWC कोड, 2020 के प्रमुख प्रावधान

OSHWC कोड, 2020 पेट्रोलियम उद्योग के लिए एकीकृत, जोखिम-आधारित और राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचा स्थापित करता है। सभी पेट्रोलियम यूनिट्स एक ही सुरक्षा प्रणाली के अंतर्गत आती हैं।

1. अनिवार्य जोखिम आकलन और परिचालन अनुमोदन

  • जोखिम पहचान और HIRA आधारित अनुमोदन।

  • खतरनाक कार्य शुरू करने से पहले सरकारी अनुमति अनिवार्य।

  • भंडारण, परिवहन, संचालन आदि के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा मानक।

  • डिजिटल अनुपालन, जोखिम-आधारित निरीक्षण और आधुनिक सुरक्षा ऑडिट।

2. बेहतर श्रमिक सुरक्षा

  • जाँच केवल समय-समय पर नहीं, बल्कि

    • नियुक्ति-पूर्व,

    • आवधिक,

    • एक्सपोज़र के बाद मेडिकल परीक्षण अनिवार्य।

  • खतरनाक कार्य में लगे श्रमिकों के लिए वार्षिक मुफ्त स्वास्थ्य परीक्षण।

3. कौशल-आधारित प्रशिक्षण और आधुनिक सुरक्षा उपकरण

  • पेट्रोलियम/रसायन संभालने से पहले प्रमाणित प्रशिक्षण अनिवार्य।

  • सुरक्षा उपकरणों के मानक आधुनिक और बाध्यकारी बनाए गए।

  • सतत-प्रक्रिया संयंत्रों में 8 घंटे की शिफ़्ट सीमा लागू।

4. आपातकालीन तैयारी और श्रमिक अधिकार

  • ऑन-साइट इमरजेंसी प्लान अब कागज़ी औपचारिकता नहीं, बल्कि कानूनी रूप से लागू प्रणाली।

  • नियमित मॉक ड्रिल अनिवार्य।

  • श्रमिकों को खतरनाक कार्य से इनकार करने का अधिकार।

  • गर्भवती महिलाओं और किशोरों के लिए विशेष सुरक्षा प्रावधान।

5. निरीक्षण की बजाय सुविधा-आधारित प्रवर्तन

  • “इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर” मॉडल।

  • एकल-खिड़की अनुमतियाँ और डिजिटल सबमिशन।

  • उद्योग-अनुकूल, पारदर्शी प्रवर्तन तंत्र।

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधान

1. विस्तृत कल्याण लाभ

  • पेट्रोलियम क्षेत्र में अधिक कर्मियों को ESIC कवरेज।

  • चिकित्सा, चोट मुआवजा, विकलांगता लाभ, निर्भर लाभ, मातृत्व लाभ।

  • व्यावसायिक रोगों और दुर्घटनाओं के लिए संरक्षण।

2. पारदर्शिता और सरल अनुपालन

  • डिजिटल स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा रिकॉर्ड।

  • लाभों की पोर्टेबिलिटी और तेज़ वितरण।

निष्कर्ष

OSHWC कोड एक आधुनिक, एकीकृत, सक्रिय सुरक्षा प्रणाली बनाता है, जिससे:

  • पेट्रोलियम प्रतिष्ठान अधिक सुरक्षित,

  • आपातकालीन क्षमता मजबूत,

  • कार्यकर्ता अधिक स्वस्थ,

  • संचालन अधिक विश्वसनीय व वैश्विक मानकों के अनुरूप होते हैं।

वहीं, सामाजिक सुरक्षा संहिता व्यापक कल्याण और अनुपालन सुधार सुनिश्चित करती है।

दोनों संहिताएँ मिलकर पेट्रोलियम उद्योग की सुरक्षा प्रणाली को:

  • प्रतिक्रिया-आधारित से रोकथाम-आधारित,

  • जटिल से सरल,

  • कागज़ आधारित से डिजिटल,

  • निरीक्षक-प्रधान से गवर्नेंस-प्रधान

मॉडल में परिवर्तित करती हैं।

इन प्रावधानों का परिणाम है:

  • अधिक अनुशासित संचालन,

  • कुशल और स्वस्थ कार्यबल,

  • कम बाधाएँ और दुर्घटनाएँ,

  • उच्च उत्पादकता,

  • बेहतर वैश्विक अनुपालन।

सामूहिक रूप से, यह भारत के पेट्रोलियम क्षेत्र में मजबूत सुरक्षा संस्कृति और औद्योगिक स्थिरता का निर्माण करता है।


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