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मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव, 100 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल

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ईरान-अमेरिका संघर्ष से वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल, भारत समेत तेल आयातक देशों की बढ़ी चिंता

नई दिल्ली- मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिखाई देने लगा है। ईरान और अमेरिका के बीच लगातार बढ़ रहे संघर्ष तथा प्रमुख समुद्री तेल मार्गों पर हमलों की आशंका के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड करीब 102 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था।

होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ी चिंता

मौजूदा संकट में सबसे ज्यादा नजर होर्मुज जलडमरूमध्य पर है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है और युद्ध से पहले वैश्विक तेल एवं गैस आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता था।

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते हमलों के कारण इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। बुधवार को होर्मुज जलडमरूमध्य से केवल सात जहाजों के गुजरने की जानकारी सामने आई, जो पिछले दिनों के औसत से काफी कम है।

कच्चे तेल की कीमतों में करीब 30 फीसदी उछाल

बाजार में जारी तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत अगस्त की शुरुआत के निचले स्तर से करीब 30 फीसदी बढ़ चुकी है। निवेशकों को डर है कि अगर संघर्ष लंबे समय तक जारी रहा तो खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति और निर्यात पर और दबाव पड़ सकता है। इससे वैश्विक बाजार में तेल की कमी बढ़ने और कीमतों के और ऊपर जाने का खतरा है।

भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

तेल की बढ़ती कीमत भारत के लिए खास तौर पर चिंता का विषय है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारत के तेल आयात बिल पर पड़ सकता है। इसके अलावा महंगा कच्चा तेल रुपये की विनिमय दर, परिवहन लागत और महंगाई पर भी दबाव बढ़ा सकता है।

अगर तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रहती है, तो इसका असर पेट्रोल-डीजल से लेकर माल ढुलाई, विमानन और उत्पादन लागत तक दिखाई दे सकता है।

सिर्फ होर्मुज ही नहीं, लाल सागर में भी बढ़ा खतरा

ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता सिर्फ होर्मुज तक सीमित नहीं है। लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में भी सुरक्षा स्थिति खराब हुई है। ईरान समर्थित हूती समूह की गतिविधियां बढ़ने से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर भी दबाव बढ़ा है।

इसका मतलब है कि मध्य पूर्व से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक तेल पहुंचाने वाले एक से अधिक प्रमुख समुद्री मार्ग जोखिम में हैं।

दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर

अगर कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर से ऊपर लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा।

महंगे तेल से:

  •  परिवहन और माल ढुलाई महंगी हो सकती है

  •  विमानन क्षेत्र की लागत बढ़ सकती है

  •  उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है

  •  वैश्विक महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है

  •  तेल आयात करने वाले देशों की मुद्राओं पर दबाव पड़ सकता है

  •  वैश्विक आर्थिक विकास की रफ्तार प्रभावित हो सकती है

तेल की बढ़ती कीमतों ने पहले ही वैश्विक बाजारों में महंगाई को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

भारत ऊर्जा सुरक्षा पर दे रहा जोर

बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के विकल्पों पर भी जोर दे रहा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए जैव ईंधन और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।

आगे क्या होगा?

अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि ईरान-अमेरिका संघर्ष कितना लंबा चलता है और होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल की आवाजाही कब सामान्य होती है।

अगर संघर्ष और बढ़ता है तथा खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति और कम होती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। वहीं, यदि तनाव कम होता है और समुद्री मार्गों पर आवाजाही सामान्य होती है, तो बाजार में कीमतों का दबाव कुछ कम हो सकता है।


आरबीआई ने रेपो रेट में नहीं किया कोई बदलाव, नीतिगत ब्याज दरें यथावत

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नई दिल्ली- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अपनी ताज़ा समीक्षा बैठक में रेपो रेट सहित सभी प्रमुख नीतिगत ब्याज दरों को यथावत रखने का निर्णय लिया है।

आरबीआई के इस फैसले के बाद शेयर बाजार में सकारात्मक रुख देखने को मिला और प्रमुख सूचकांक मामूली बढ़त के साथ बंद हुए।

आरबीआई ने कहा कि देश में महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने के प्रयास जारी हैं, हालांकि ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव अभी भी मुद्रास्फीति के लिए एक प्रमुख जोखिम बना हुआ है। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया कि भविष्य की मौद्रिक नीति के निर्णय आर्थिक वृद्धि, महंगाई के रुझान और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का आकलन करने के बाद ही लिए जाएंगे।

वैश्विक बाजारों की नजर केंद्रीय बैंकों और महंगाई के आंकड़ों पर

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दुनियाभर के वित्तीय बाजार इस समय प्रमुख केंद्रीय बैंकों के अधिकारियों के भाषणों और आने वाले महंगाई (इन्फ्लेशन) के आंकड़ों पर नजर बनाए हुए हैं। निवेशकों को उम्मीद है कि इन संकेतों से भविष्य में ब्याज दरों को लेकर महत्वपूर्ण फैसलों का अंदाजा मिलेगा।

निवेशकों का ध्यान विशेष रूप से Federal Reserve, European Central Bank और Bank of England जैसे प्रमुख केंद्रीय बैंकों की नीतियों पर है। हाल के आर्थिक आंकड़ों ने मिश्रित संकेत दिए हैं, जिसके कारण बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महंगाई के आंकड़े यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को ऊंचा बनाए रखेंगे या फिर उनमें कटौती की दिशा में कदम बढ़ाएंगे। यदि महंगाई अपेक्षा से अधिक रहती है, तो ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो सकती है। वहीं, महंगाई में कमी आने पर राहत मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है।

इस अनिश्चितता के बीच वैश्विक शेयर बाजार, बॉन्ड बाजार और मुद्रा बाजारों में सतर्क कारोबार देखने को मिल रहा है। निवेशक हर नए आर्थिक संकेत और केंद्रीय बैंक अधिकारियों की टिप्पणियों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष की दूसरी छमाही में महंगाई और ब्याज दरों से जुड़े फैसले ही वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों की दिशा तय करेंगे।

RBI द्वारा आगे ब्याज दरों में कटौती के संकेत

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भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में नीतिगत ब्याज दरों में और नरमी की जा सकती है। हाल ही में जारी मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के विवरण (मिनट्स) में यह बात सामने आई है कि आर्थिक वृद्धि की गति में संभावित सुस्ती और महंगाई के अपेक्षाकृत नियंत्रित रहने की स्थिति को देखते हुए भविष्य में ब्याज दरों पर पुनर्विचार किया जा सकता है।

RBI के अनुसार, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, घरेलू मांग में उतार-चढ़ाव और निवेश को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विकासोन्मुख नीति अपनाई जा सकती है। ब्याज दरों में संभावित कटौती से कर्ज सस्ता होने, उद्योगों को राहत मिलने और उपभोक्ता खर्च को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

हालांकि, RBI ने यह भी स्पष्ट किया है कि आगे के फैसले पूरी तरह से महंगाई के आंकड़ों, आर्थिक गतिविधियों और वैश्विक परिस्थितियों के आकलन पर निर्भर करेंगे। केंद्रीय बैंक का फोकस मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक विकास को समर्थन देने पर रहेगा।

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