Media24Media.com: #IndianTraditions

Responsive Ad Slot


 

Showing posts with label #IndianTraditions. Show all posts
Showing posts with label #IndianTraditions. Show all posts

प्रधानमंत्री मोदी ने माधवपुर मेले के लिए दी शुभकामनाएँ, बताया संस्कृति में इसका महत्व

No comments Document Thumbnail

प्रधान मंत्री, नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पोर्बंदर में चल रहे माधवपुर मेला के लिए शुभकामनाएँ दी हैं। मोदी ने कहा कि यह जीवंत उत्सव हमारी शानदार संस्कृति को उजागर करता है और साथ ही गुजरात और पूर्वोत्तर के बीच शाश्वत सांस्कृतिक संबंध को भी मजबूत करता है।

“यह त्योहार विविध परंपराओं को एक साथ लाता है, जो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की सच्ची भावना को दर्शाता है। मैं लोगों से इस मेले में आने का आग्रह करता हूँ!” मोदी ने कहा।

प्रधान मंत्री ने अप्रैल 2022 के मन की बात कार्यक्रम में माधवपुर मेले के महत्व और हमारी संस्कृति में इसकी भूमिका के बारे में भी बात की थी।

प्रधान मंत्री ने X (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट किया:

“गुजरात के पोर्बंदर में चल रहे माधवपुर मेले के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
यह जीवंत उत्सव हमारी शानदार संस्कृति को उजागर करता है और साथ ही गुजरात और पूर्वोत्तर के बीच शाश्वत सांस्कृतिक संबंध को भी मजबूत करता है।
यह त्योहार विविध परंपराओं को एक साथ लाता है, जो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की सच्ची भावना को दर्शाता है। मैं लोगों से इस मेले में आने का आग्रह करता हूँ!”

“अप्रैल 2022 के #मनकीबात कार्यक्रम में मैंने माधवपुर मेले के महत्व और हमारी संस्कृति में इसकी भूमिका के बारे में बात की थी। कृपया इसे सुनें…”



डाक विभाग ने ‘भारत की कठपुतलियाँ’ विषय पर 8 स्मारक डाक टिकट जारी किए, देश की समृद्ध लोक कला परंपरा को मिला सम्मान

No comments Document Thumbnail

नई दिल्ली- डाक विभाग ने 13 फरवरी 2026 को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में “पपेट्स ऑफ इंडिया (भारत की कठपुतलियाँ)” विषय पर 8 स्मारक डाक टिकटों का विशेष सेट जारी किया। इन टिकटों का औपचारिक विमोचन डाक विभाग की सचिव सुश्री वंदिता कौल ने प्रतिष्ठित अतिथियों, कलाकारों और सांस्कृतिक जगत के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में किया।

इस अवसर पर सचिव (डाक) ने कहा कि डाक टिकट किसी भी राष्ट्र की विरासत के छोटे राजदूत होते हैं। उन्होंने कहा कि यह विशेष अंक भारत की समृद्ध और विविध कठपुतली परंपराओं का सम्मान करता है, जिन्होंने पीढ़ियों से लोककथाओं, मूल्यों और सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखा है।

भारत की प्राचीन कठपुतली परंपरा

कठपुतली कला भारत की सबसे प्राचीन और जीवंत कहानी कहने की परंपराओं में से एक है। सदियों से कठपुतली कलाकार संगीत, कथावाचन और दृश्य कला के माध्यम से महाकाव्य, लोककथाएं, नैतिक शिक्षाएं और सामाजिक संदेश प्रस्तुत करते रहे हैं।

भारत में कठपुतली कला को मुख्य रूप से चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:

  • डोरी वाली कठपुतलियाँ (String Puppets)

  • दस्ताने वाली कठपुतलियाँ (Glove Puppets)

  • छड़ी कठपुतलियाँ (Rod Puppets)

  • छाया कठपुतलियाँ (Shadow Puppets)

यह कला पारिवारिक परंपरा के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है।

देश के विभिन्न राज्यों की कठपुतली कला को दर्शाते टिकट

इस स्मारक श्रृंखला में भारत के विभिन्न राज्यों की पारंपरिक कठपुतली कला को दर्शाया गया है, जिनमें शामिल हैं:

  • कठपुतली – राजस्थान

  • यक्षगान सूत्रदा गोम्बेयट्टा – कर्नाटक

  • डांगर पुतुल – पश्चिम बंगाल

  • काठी कुंधेई – ओडिशा

  • बेनीर पुतुल – पश्चिम बंगाल

  • पावकथकली – केरल

  • रावणछाया – ओडिशा

  • टोलु बोम्मलट्टा – आंध्र प्रदेश

प्रत्येक टिकट संबंधित क्षेत्र की विशिष्ट पोशाक, शैली और प्रस्तुति कला को दर्शाता है।

डिज़ाइन और फिलेटेलिक उत्पाद

डाक टिकटों, प्रथम दिवस आवरण (FDC), ब्रोशर, मिनिएचर शीट और विशेष कैंसलेशन का डिज़ाइन संखा समंता द्वारा किया गया है। इन टिकटों के लिए कलात्मक संदर्भ और सामग्री संगीत नाटक अकादमी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दरिचा फाउंडेशन और प्रसिद्ध कठपुतली कलाकार दादी पुदुमजी द्वारा प्रदान की गई।

  • टिकट मूल्य: 500 पैसे (8 टिकटों का सेट)

  • ये टिकट और अन्य फिलेटेलिक उत्पाद देशभर के फिलेटेलिक ब्यूरो और epostoffice.gov.in पर उपलब्ध हैं।


दो दिवसीय राजा मोरध्वज आरंग महोत्सव आज से, भव्य आयोजन के लिए सजा नगर

No comments Document Thumbnail

आरंग-  दो दिवसीय (15 एवं 16 जनवरी को) आयोजित होने वाले राजा मोरध्वज आरंग महोत्सव को लेकर नगर सहित अंचल में उत्साह  है। महोत्सव के लिए नगर को आकर्षक रोशनी, बैनर-पोस्टर से दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है। प्रचार वाहन नगर एवं आसपास के क्षेत्रों में भ्रमण कर महोत्सव का संदेश पहुँचा रहे हैं।

कार्यक्रम की तैयारियों को लेकर प्रशासन भी अलर्ट मोड में है। वहीं आयोजन की सतत निगरानी स्वयं कैबिनेट मंत्री गुरु खुशवंत साहेब द्वारा की जा रही है।

दो दिवसीय कार्यक्रम की रूपरेखा

पहले दिन 15 जनवरी को

महोत्सव के पहले दिन सुप्रसिद्ध सैंड आर्टिस्ट हेमचंद साहू द्वारा महोत्सव स्थल पर रेत कलाकृति से राम और श्याम की प्रतिकृति का निर्माण किया जाएगा। इसके पश्चात बाबा बागेश्वरनाथ मंदिर से कार्यक्रम स्थल तक शोभायात्रा निकाली जाएगी।  मंच पर बाबा बागेश्वरनाथ महादेव की पूजा-अर्चना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ होगा।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में सुवा नृत्य (कोसमखुटा) एवं पंथी पार्टी (कुटेशर) की प्रस्तुति होगी।

इतिहासकारों एवं शिक्षाविदों के व्याख्यान के क्रम में आरंग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आयोजन की सार्थकता पर पटकथा लेखक आनंदराम साहू, वरिष्ठ इतिहासकार एवं पुराविद प्रो. आर.एन. विश्वकर्मा, वरिष्ठ पुराविद जी.एल. रायकवार, शिक्षाविद मुरली मनोहर देवांगन का वक्तव्य होगा।

इसके अलावा स्वरांजलि डांस ग्रुप की प्रस्तुति, राजा मोरध्वज की झांकी का मंचन, समाज प्रमुखों का सम्मान तथा सुनील सोनी स्टार नाइट का रंगारंग कार्यक्रम आयोजित होगा। 

दूसरे दिन मुख्यमंत्री और कुमार विश्वास का कार्यक्रम

महोत्सव के दूसरे दिन 16 जनवरी को सुबह वेदमाता गायत्री यज्ञ-हवन एवं पूजन होगा। इसके बाद स्कूली छात्र-छात्राओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति होगी। लोरिक-चंदा (देउर गाँव, साजा) की प्रस्तुति आकर्षण का केंद्र रहेगी।

धमतरी से आई राजा मोरध्वज की जीवंत झांकी, अतिथियों का स्वागत एवं उद्बोधन के पश्चात राजा मोरध्वज अलंकरण सम्मान समारोह  होगा। अलग-अलग क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को मोरध्वज अलंकरण से विभूषित किया जाएगा। 

महोत्सव के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, मंत्रिमंडल के सदस्य, विधायक एवं जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति रहेगी। 

कवि डॉ. कुमार विश्वास सहित अन्य प्रतिष्ठित कवियों द्वारा काव्यपाठ के साथ ही महोत्सव संपन्न होगा। आयोजन को लेकर समूचे नगर में विशेष उत्साह एवं उल्लास का माहौल  है।

मकर संक्रांति और पोंगल: भारत की सांस्कृतिक एकता और समृद्धि का पर्व

No comments Document Thumbnail

भारत विविधताओं का देश है, जहाँ अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही समय पर विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ पर्व मनाए जाते हैं। मकर संक्रांति और पोंगल ऐसे ही प्रमुख पर्व हैं, जो फसल, प्रकृति और नई शुरुआत का उत्सव माने जाते हैं। ये त्योहार न केवल धार्मिक आस्था से जुड़े हैं, बल्कि किसानों के परिश्रम, सूर्य उपासना और सामाजिक एकता का प्रतीक भी हैं।

मकर संक्रांति: सूर्य की उत्तरायण यात्रा का पर्व

मकर संक्रांति हर वर्ष 14 या 15 जनवरी को मनाई जाती है। इस दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुरुआत होती है। इसे शुभ काल माना जाता है।
उत्तर भारत में इस दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य और खिचड़ी का विशेष महत्व है। गुजरात और राजस्थान में पतंग उड़ाने की परंपरा है, वहीं महाराष्ट्र में तिल-गुड़ बांटकर “तिलगुल घ्या, गोड गोड बोला” कहा जाता है। यह पर्व आपसी सौहार्द और भाईचारे का संदेश देता है।

पोंगल: दक्षिण भारत का प्रमुख फसल उत्सव

पोंगल तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत में चार दिनों तक मनाया जाने वाला प्रमुख फसल पर्व है। यह मुख्य रूप से धान की नई फसल के स्वागत का त्योहार है।

  • भोगी पोंगल: पुराने सामान को त्यागकर नई शुरुआत का प्रतीक

  • सूर्य पोंगल: सूर्य देव को धन्यवाद देने का दिन

  • मट्टू पोंगल: पशुधन, विशेषकर बैलों की पूजा

  • कानुम पोंगल: पारिवारिक मेल-मिलाप और सामाजिक उत्सव

इस अवसर पर घरों को सजाया जाता है, रंगोली (कोलम) बनाई जाती है और दूध-चावल से बनी विशेष मिठाई पोंगल पकाई जाती है।

कृषि, संस्कृति और एकता का संदेश

मकर संक्रांति और पोंगल दोनों ही पर्व कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को दर्शाते हैं। ये त्योहार बताते हैं कि भारत की विविध संस्कृतियाँ अलग-अलग होते हुए भी एक साझा भावना से जुड़ी हैं—किसानों का सम्मान, प्रकृति की पूजा और समाज में सकारात्मकता।

आज के समय में भी ये पर्व हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने, पर्यावरण का सम्मान करने और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। यही कारण है कि मकर संक्रांति और पोंगल केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक हैं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बस्तर की कला, संस्कृति और परंपराओं को समर्पित बस्तर पंडुम 2026 के लोगो एवं थीम गीत का विमोचन

No comments Document Thumbnail

बस्तर पंडुम हमारी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोकपरंपराओं, कला और विरासत का जीवंत मंच - मुख्यमंत्री साय

बस्तर पंडुम 2026 बनेगा विश्व–स्तरीय सांस्कृतिक आयोजन

रायपुर- बस्तर अंचल की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, कला, लोकपरंपराओं और विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से ‘बस्तर पंडुम’ का आयोजन वर्ष 2026 में भी गत वर्ष की भांति भव्य एवं आकर्षक रूप में किया जाएगा। 

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दंतेवाड़ा में माँ दंतेश्वरी के आशीर्वाद के साथ मंदिर प्रांगण में बस्तर पंडुम का लोगो एवं थीम गीत का विमोचन किया। 

इस अवसर पर मुख्यमंत्री साय ने नववर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि बस्तर पंडुम बस्तर की  सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने का  सशक्त मंच है। उन्होंने कहा कि आज माँ दंतेश्वरी के इस पावन प्रांगण से बस्तर पंडुम 2026 का शुभारंभ हो रहा है। यहाँ बस्तर पंडुम 2026 का लोगो और थीम गीत का विमोचन किया गया है। बस्तर पंडुम केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा है। यह हमारी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोकपरंपराओं, कला और विरासत का जीवंत मंच है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ की असली पहचान हमारी आदिवासी परंपराओं में है। हम नृत्य, गीत, शिल्प, व्यंजन, वन-औषधि और देवगुडि़यों के माध्यम से इन परंपराओं और संस्कृति को जीते हैं। पिछले वर्ष हमने बस्तर पंडुम की शुरुआत की थी। समापन अवसर पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी हम सबके बीच आए थे। इस वर्ष हम राष्ट्रपति , केंद्रीय गृहमंत्री, केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री तथा भारत में नियुक्त विभिन्न देशों के राजदूतों को भी आमंत्रित कर रहे हैं। पिछली बार बस्तर पंडुम को लेकर बस्तरवासियों का जो उत्साह और जोश देखने को मिला, वह अभूतपूर्व था। इस बार हम इसे और अधिक भव्य बना रहे हैं, ताकि यहाँ की धरोहर राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सके।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस वर्ष बस्तर पंडुम की प्रतिस्पर्धाओं में विधाओं की संख्या सात से बढ़ाकर बारह कर दी गई है। इनमें जनजातीय नृत्य, गीत, नाट्य, वाद्ययंत्र, वेशभूषा, आभूषण, पूजा-पद्धति के साथ ही शिल्प, चित्रकला, पारंपरिक व्यंजन-पेय, आंचलिक साहित्य और वन-औषधि को भी शामिल किया गया है। इस बार बस्तर पंडुम प्रतियोगिता का आयोजन तीन चरणों में किया जाएगा।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि हमारी सरकार का संकल्प है कि बस्तर की संस्कृति को सहेजते हुए नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। बस्तर अब केवल संस्कृति का केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि शांति, समृद्धि और पर्यटन के माध्यम से विकास का भी प्रतीक बनेगा।  उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में डबल इंजन की सरकार बस्तर को नई ऊँचाइयों पर ले जा रही है। यह उत्सव बताता है कि बस्तर अब संघर्ष से नहीं, बल्कि सृजन और उत्सव से पहचाना जाएगा।

उन्होंने बस्तरवासियों एवं सभी कलाकार भाई-बहनों से आग्रह किया कि वे अपनी कला के माध्यम से बस्तर का गौरव बढ़ाएँ और अधिक से अधिक संख्या में बस्तर पंडुम के अंतर्गत आयोजित प्रतियोगिताओं में भाग लें। 

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि ‘पंडुम’ का अर्थ पर्व होता है। बस्तर में खुशियों को बढ़ाने के लिए समय-समय पर विभिन्न पर्व (पंडुम) मनाए जाते हैं। किसी भी पर्व की शुरुआत माता के आशीर्वाद से करने की परंपरा रही है। इसी तारतम्य में बस्तर पंडुम की शुरुआत माँ दंतेश्वरी के मंदिर परिसर से की जा रही है। बस्तर समृद्ध संस्कृति से परिपूर्ण है। यहाँ निवास करने वाली जनजातियों की कला, शिल्प, नृत्य, संगीत और खानपान को समाहित कर बस्तर पंडुम 2026 का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि  बस्तर में शांति स्थापना के प्रयास सफल हो रहे हैं। मार्च 2026 तक लाल आतंक समाप्त होकर रहेगा।

वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि बस्तर की कला, संस्कृति और परंपरा गर्व का विषय है। इस समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का प्रयास बस्तर पंडुम के माध्यम से किया जा रहा है। पौराणिक काल में भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान दंडकारण्य क्षेत्र में समय व्यतीत किया था। ऐसे पावन क्षेत्र में सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करने की पहल सरकार ने की है। 

संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध बस्तर क्षेत्र की विभिन्न विधाओं को बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए सरकार लगातार दूसरे वर्ष बस्तर पंडुम का आयोजन कर रही है। इस वर्ष बारह विधाओं में प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री साय ने मंदिर प्रांगण में ही संभाग के वरिष्ठ मांझी, चालकी, गायता, पुजारी, आदिवासी समाज के प्रमुखजनों तथा पद्म सम्मान से अलंकृत कलाकारों के साथ संवाद किया। कार्यक्रम को बस्तर सांसद महेश कश्यप एवं दंतेवाड़ा विधायक चैतराम आटमी ने भी संबोधित किया। इस दौरान बस्तर के पारंपरिक नेतृत्वकर्ता मांझियों और समाज प्रमुखों ने भी बस्तर पंडुम के आयोजन के लिए सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया।

उल्लेखनीय है कि बस्तर पंडुम 2026 का आयोजन 10 जनवरी 2026 से 5 फरवरी 2026 तक तीन चरणों में प्रस्तावित है। इसके अंतर्गत बस्तर संभाग में 10 से 20 जनवरी तक जनपद स्तरीय कार्यक्रम, 24 से 29 जनवरी तक जिला स्तरीय कार्यक्रम तथा 2 से 6 फरवरी तक संभाग स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।  जिन विधाओं में प्रदर्शन एवं प्रतियोगिताएँ होंगी, उनमें बस्तर जनजातीय नृत्य, गीत, नाट्य, वाद्ययंत्र, वेशभूषा एवं आभूषण, पूजा-पद्धति, शिल्प, चित्रकला, जनजातीय पेय पदार्थ, पारंपरिक व्यंजन, आंचलिक साहित्य तथा वन-औषधि प्रमुख हैं।इस बार के बस्तर पंडुम में विशेष रूप से भारत में विभिन्न देशों में कार्यरत भारतीय राजदूतों को आमंत्रित किए जाने पर भी चर्चा हुई, ताकि उन्हें बस्तर की अद्वितीय सांस्कृतिक धरोहर, परंपराओं और जनजातीय जीवन से अवगत कराया जा सके। साथ ही बस्तर संभाग के निवासी उच्च पदस्थ अधिकारी, यूपीएससी एवं सीजीपीएससी में चयनित अधिकारी, चिकित्सक, अभियंता, वरिष्ठ जनप्रतिनिधि तथा देश के विभिन्न राज्यों के जनजातीय नृत्य दलों को आमंत्रित करने का भी निर्णय लिया गया है।

प्रतिभागियों के पंजीयन की व्यवस्था इस बार ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से करने का प्रस्ताव है, जिससे अधिकाधिक कलाकारों एवं समूहों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। उल्लेखनीय है कि बस्तर अंचल की कला, शिल्प, त्योहार, खानपान, बोली-भाषा, आभूषण, पारंपरिक वाद्ययंत्र, नृत्य-गीत, नाट्य, आंचलिक साहित्य, वन-औषधि और देवगुडि़यों के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।

इसके तहत बस्तर संभाग के सात जिलों की 1,885 ग्राम पंचायतों, 32 जनपद पंचायतों, 8 नगरपालिकाओं, 12 नगर पंचायतों और 1 नगर निगम क्षेत्र में तीन चरणों में आयोजन होगा। इस आयोजन के लिए संस्कृति एवं राजभाषा विभाग को नोडल विभाग के रूप में नामित किया गया है।

इस अवसर पर सांसद महेश कश्यप, दंतेवाड़ा विधायक चैतराम अटामी, बस्तर आईजी सुंदरराज पी., संस्कृति विभाग के सचिव रोहित यादव, डीआईजी कमलोचन कश्यप, कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव, पुलिस अधीक्षक गौरव राय सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी उपस्थित थे।

गायत्री मंत्र मानव जीवन को ऊर्जावान और संस्कारित बनाते हैं: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

No comments Document Thumbnail

मुख्यमंत्री हसौद में 251 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ में हुए शामिल

मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के अंतर्गत 140 नवविवाहित जोड़ों को दिया आशीर्वाद

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आज सक्ती जिले के ग्राम हसौद में आयोजित भव्य 251 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ में शामिल हुए। मुख्यमंत्री ने इस आयोजन को आध्यात्मिक एकता, सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक गौरव का अद्भुत संगम बताया। उन्होंने कहा कि “मां महामाया की पावन भूमि हसौद में 251 कुंडों में एक साथ सम्पन्न हो रहा यह महायज्ञ छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक परंपरा को नई ऊंचाई देता है।”

मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सनातन संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान मिली है। उन्होंने कहा—“500 वर्षों के बाद अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण हुआ, काशी विश्वनाथ धाम का कायाकल्प हुआ। छत्तीसगढ़ तो स्वयं भगवान श्रीराम का ननिहाल है—माता कौशल्या की पावन भूमि है।” उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार द्वारा सभी वर्गों की उन्नति और कल्याण के लिए अनेक जनकल्याणकारी योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। रामलला दर्शन योजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इसके माध्यम से अब तक 38 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने अयोध्या में प्रभु श्रीरामलला का दर्शन किया है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि गायत्री मंत्र के 24 अक्षर 24 सिद्धियों और शक्तियों के प्रतीक हैं, जो मानव जीवन को ऊर्जा, सदाचार और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करते हैं। कार्यक्रम के दौरान देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शांतिकुंज हरिद्वार के कुलपति डॉ. चिन्मय पण्डया ने मुख्यमंत्री का सम्मान करते हुए उन्हें अभिनंदन पत्र भेंट किया।

इस अवसर पर कौशल विकास एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री गुरु खुशवंत साहेब सहित अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित थे। साथ ही देशभर से आए अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

140 नवविवाहित जोड़ों को दिया आशीर्वाद – कन्या विवाह योजना के अंतर्गत प्रोत्साहन राशि प्रदान

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के अंतर्गत हसौद में परिणय-सूत्र में बंधने वाले 140 नवविवाहित जोड़ों को शुभकामनाएँ और आशीर्वाद दिया। 

जैतखाम में पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि की कामना

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने हसौद प्रवास के दौरान जैतखाम पहुँचकर विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की। उन्होंने प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि, शांति, कल्याण एवं निरंतर प्रगति की कामना की।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बाबा गुरु घासीदास जी के सत्य, अहिंसा, समानता, सामाजिक समरसता तथा ‘मनखे-मनखे एक समान’ के संदेश हमें समाज में सद्भाव और एकता का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने जनसमूह से आह्वान किया कि इन आदर्शों को आत्मसात कर विकसित छत्तीसगढ़ के निर्माण में सक्रिय योगदान दें।

भारत का गौरव: दीपावली अब UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल

No comments Document Thumbnail

भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने UNESCO द्वारा दीपावली को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल किए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की।

उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने इसे हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि दीपावली केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि एक सभ्यतात्मक घटना है जो पूरे राष्ट्र को जोड़ती है और विश्वभर में गूंजती है। यह भारत की बहुसांस्कृतिकता, सामाजिक एकता और बहुलवाद का प्रतीक है, साथ ही अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देती है। उन्होंने सभी देशवासियों को हार्दिक बधाई देते हुए कहा कि यह सम्मान भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और मानवता के लिए इसके सुसंगत संदेश का उत्सव है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी UNESCO की इस घोषणा पर खुशी और गर्व व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि दीपावली हमारे संस्कृति और जीवन मूल्यों से गहरा जुड़ा हुआ है और यह हमारी सभ्यता की आत्मा है। यह प्रकाश और धर्म का प्रतीक है। UNESCO सूची में शामिल होने से दीपावली की वैश्विक लोकप्रियता और बढ़ेगी और इसके आदर्शों को पूरी दुनिया में फैलाने में मदद मिलेगी।

दोनों नेताओं ने यह संदेश साझा किया कि दीपावली का प्रकाश और इसके आदर्श हमें सदैव मार्गदर्शन देते रहें।

भारत 8-13 दिसंबर को नई दिल्ली में यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर समिति का 20वां सत्र आयोजित करेगा

No comments Document Thumbnail

भारत सरकार 8 से 13 दिसंबर 2025 तक नई दिल्ली में यूनेस्को इंटरगवर्नमेंटल कमिटी फॉर सेफगार्डिंग ऑफ द इंटैन्जिबल कल्चरल हेरिटेज (ICH) के 20वें सत्र की मेज़बानी करेगी। ऐतिहासिक लाल किला परिसर, जो स्वयं यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, इस सत्र का स्थल चुना गया है, जो भारत की मूर्त और अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के संगम का प्रतीक है।

यह पहली बार होगा जब भारत ICH समिति सत्र की मेज़बानी कर रहा है। बैठक की अध्यक्षता भारत के स्थायी प्रतिनिधि डॉ. विशाल वी. शर्मा करेंगे। यह आयोजन भारत द्वारा 2003 में अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण सम्मेलन के अनुमोदन के बीसवें वर्ष के अवसर पर हो रहा है, जो भारत की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

यूनेस्को के अनुसार, अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर में वे प्रथाएँ, ज्ञान, अभिव्यक्तियाँ, वस्तुएँ और स्थान शामिल हैं जिन्हें समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानते हैं। यह पीढ़ियों से पीढ़ियों तक हस्तांतरित होती है और सांस्कृतिक पहचान व विविधता की सराहना को मजबूत करती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा के लिए यूनेस्को ने 2003 का सम्मेलन 17 अक्टूबर 2003 को पेरिस में अपनी 32वीं महासभा में अपनाया। सम्मेलन ने यह सुनिश्चित किया कि मौखिक प्रथाएँ, प्रदर्शन कला, सामाजिक रीतियाँ, ज्ञान प्रणाली और शिल्प जैसे जीवंत सांस्कृतिक तत्व वैश्वीकरण, सामाजिक परिवर्तन और सीमित संसाधनों से प्रभावित न हों।

सम्मेलन ने समुदायों, विशेषकर आदिवासी और स्थानीय समुदायों, और व्यक्तिगत कारीगरों को संरक्षण प्रयासों के केंद्र में रखा। यह मूर्त और अमूर्त धरोहर के बीच अंतर्संबंध, वैश्विक सहयोग की आवश्यकता और युवा पीढ़ियों में जागरूकता बढ़ाने का महत्व रेखांकित करता है। सम्मेलन ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग, सहायता और मान्यता के लिए संरचनाओं की नींव रखी, जिसने यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूचियों और इंटरगवर्नमेंटल समिति के काम की आधारशिला तैयार की।

सम्मेलन के उद्देश्य:

  1. अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा करना।

  2. संबंधित समुदायों, समूहों और व्यक्तियों की धरोहर का सम्मान सुनिश्चित करना।

  3. स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना।

  4. वैश्विक सहयोग और सहायता सुनिश्चित करना।

अंतर-सरकारी समिति के कार्य

Intergovernmental Committee for Safeguarding of the Intangible Cultural Heritage 2003 के सम्मेलन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है और सदस्य राज्यों में इसके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करती है। समिति:

  • 2003 सम्मेलन के उद्देश्यों को बढ़ावा और निगरानी देती है।

  • संरक्षण के सर्वोत्तम अभ्यास पर मार्गदर्शन प्रदान करती है।

  • ICH फंड के उपयोग के लिए मसौदा योजना तैयार करती है।

  • फंड के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाती है।

  • सम्मेलन के क्रियान्वयन के लिए संचालन निर्देश प्रस्तावित करती है।

  • राज्यों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों की समीक्षा करती है।

  • ICH सूचियों में तत्वों के नामांकन और अंतरराष्ट्रीय सहायता की मंजूरी देती है।



20वां सत्र

सांस्कृतिक मंत्रालय और संगीत नाटक अकादमी (SNA) इस सत्र के लिए लाल किले, नई दिल्ली को नोडल एजेंसी के रूप में संचालित करेंगे। 17वीं सदी का यह किला अपने भव्य वास्तुकला, महलों, बागों और संग्रहालयों के लिए जाना जाता है और स्वयं यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

मुख्य एजेंडे:

  • भारत के राष्ट्रीय ICH संरक्षण मॉडल को साझा करना।

  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संयुक्त संरक्षण पहलों को बढ़ावा देना।

  • भारत की अमूर्त धरोहर को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करना।

  • घरेलू संरक्षण प्रयासों को प्रोत्साहित करना।

  • सांस्कृतिक कूटनीति के लिए प्लेटफ़ॉर्म प्रदान करना।

  • धरोहर संरक्षण और सतत विकास के बीच लिंक मजबूत करना।

भारत की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर: एक राष्ट्रीय और वैश्विक संपत्ति

  • सांस्कृतिक पहचान: भाषाई, जातीय, क्षेत्रीय, आदिवासी और धार्मिक पहचान का संरक्षण।

  • आजीविका और शिल्प अर्थव्यवस्था: पारंपरिक शिल्प, प्रदर्शन कला और सांस्कृतिक पर्यटन से ग्रामीण और कमजोर समुदायों को रोजगार।

  • शिक्षा और ज्ञान हस्तांतरण: पारंपरिक ज्ञान, लोककथाएँ, शिल्प तकनीकें और रीति-रिवाज।

  • सांस्कृतिक कूटनीति और सॉफ्ट पावर: भारतीय विविधता और सांस्कृतिक गहराई को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करना।

  • वैश्विक नेतृत्व: यूनेस्को के तहत वैश्विक धरोहर संरक्षण में भारत की सक्रिय भूमिका।

भारत का योगदान

भारत ने 2003 के सम्मेलन के तहत अपनी जिवंत सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाई है। अब तक 15 भारतीय तत्व यूनेस्को की ICH प्रतिनिधि सूची में शामिल हैं।

इस वर्ष, भारत ने छठ महापर्व और दीपावली को यूनेस्को की ICH सूची के लिए नामांकित किया है।

इन नामांकनों से समुदाय की भागीदारी, दस्तावेज़ीकरण, प्रशिक्षण और हस्तांतरण के माध्यम से विविध सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता भी प्रदर्शित होती है। इनमें कुटियाट्टम, छाऊ जैसे प्रदर्शन कला, वैदिक और बौद्ध जप, रामलीला, राममन और संकीर्तन जैसी सामुदायिक परंपराएँ शामिल हैं। योग, दुर्गा पूजा और गरबा जैसे आधुनिक सांस्कृतिक तत्व भी भारत की जीवंत सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं।

निष्कर्ष

भारत का 20वां ICH सत्र आयोजित करना एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह भारत के संरक्षण मॉडल को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और वर्तमान व भविष्य की पीढ़ियों के लिए अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अवसर प्रदान करता है।

इस सत्र की सफलता यूनेस्को, भारत सरकार और भारत की सांस्कृतिक परंपराओं के लिए सकारात्मक प्रभाव डालेगी। भारत की धरोहर इसके लोगों के माध्यम से जीवित है — इसकी भाषाओं, कला, अनुष्ठान, त्योहारों और विश्वास प्रणालियों में। इस सत्र की मेज़बानी से भारत की सांस्कृतिक विरासत को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की निरंतर प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है।


आस्था ने छुआ हृदय: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से रामनामी समाज के प्रतिनिधियों की आत्मीय भेंट

No comments Document Thumbnail

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सोशल मीडिया पर साझा किया यह भावनात्मक पल

रायपुर-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रामनामी समाज के बीच आत्मीय संवाद का एक वीडियो देश में तेजी से वायरल हुआ है । इस वीडियो को अपने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट करते हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने इसे भावनात्मक और प्रेरणादायी पल बताया है ।

छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर आयोजित रजत महोत्सव के दौरान एक हृदयस्पर्शी दृश्य उस समय देखने को मिला, जब रामनाम में लीन जीवन जीने वाले रामनामी समाज के प्रतिनिधियों ने माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आत्मीय भेंट की।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बताया कि प्रधानमंत्री जी के रायपुर प्रवास से कुछ ही घंटे पहले मंत्रालय में रामनामी समुदाय के प्रतिनिधियों से उनकी भेंट हुई थी। उन्होंने प्रधानमंत्री जी से मिलने की अपनी प्रबल इच्छा व्यक्त की थी, जिसके अनुरूप इसके लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गईं।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि जब रजत महोत्सव के दौरान रामनामी समुदाय के ये श्रद्धालु प्रधानमंत्री मोदी से मिले, तब उन्होंने बड़े आदर और प्रेम से प्रधानमंत्री जी को अपने पारंपरिक मोर मुकुट से मुख्य मंच पर अलंकृत करने की अभिलाषा प्रकट की। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस सहजता, स्नेह और आत्मीय भाव से उनके इस अनुरोध को स्वीकार किया, वह क्षण वहां उपस्थित सभी लोगों के लिए अत्यंत भावनात्मक और प्रेरणादायी बन गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि रामनाम ही जिनका धर्म, रामभक्ति ही जिनका कर्म - ऐसे अद्भुत और राममय रामनामी समाज के सदस्यों के तन पर अंकित ‘राम’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि समर्पण, तपस्या और अटूट आस्था का प्रतीक है। यह समुदाय अपने तन, मन और जीवन को प्रभु श्रीराम के चरणों में अर्पित कर देता है — यही उनकी जीवन साधना है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की इस आत्मीयता में भक्ति और कर्म का अद्वितीय संगम झलकता है। यह दृश्य इस सत्य को पुष्ट करता है कि रामभक्ति केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पवित्र साधना है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आचरण और जीवन मूल्यों से सार्थक किया है।

करमा महोत्सव हमारी प्राचीन और गौरवशाली परंपरा का प्रतीक: मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

No comments Document Thumbnail

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आज जशपुर जिले में अखिल भारतीय रौतिया समाज विकास परिषद, प्रांतीय शाखा छत्तीसगढ़ द्वारा ग्राम कण्डोरा में आयोजित महासम्मेलन (सोहरई करमा महोत्सव 2025) में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने कुनकुरी में 20 लाख रुपए की लागत से निर्मित रौतिया समाज के सामुदायिक भवन का लोकार्पण किया तथा ग्राम पंचायत कण्डोरा में 50 लाख रुपए की लागत से बनने वाले रौतिया भवन निर्माण का भूमिपूजन किया।

मुख्यमंत्री साय ने समाज की मांग पर ग्राम कण्डोरा में करमा अखरा निर्माण के लिए 50 लाख रुपए तथा रायपुर में रौतिया भवन पहुँच मार्ग के लिए 25 लाख रुपए प्रदान करने की घोषणा की। उन्होंने मंच पर रौतिया समाज के वीर शहीद बख्तर साय और मुण्डल सिंह के छायाचित्रों पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। 

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने संबोधन में कहा कि करमा महोत्सव हमारी प्राचीन और गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है, जिसे सभी समाज मिलजुलकर मनाते हैं। यह पर्व हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ प्रकृति के प्रति आदर और सम्मान का भाव भी सिखाता है। उन्होंने कहा कि एकादशी करमा, दशहरा करमा जैसी परंपराएँ हमारी संस्कृति में गहराई से रची-बसी हैं। ये उत्सव समाज को एक सूत्र में बाँधने का कार्य करते हैं।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि राज्य सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटियों को तीव्र गति से लागू कर रही है। सरकार बनते ही पहली ही कैबिनेट बैठक में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत 18 लाख आवासों की स्वीकृति प्रदान की गई। महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में महतारी वंदन योजना के माध्यम से महिलाओं को प्रतिमाह 1000 रुपए की सहायता दी जा रही है। तेंदूपत्ता संग्राहकों की आमदनी बढ़ाने के लिए सरकार ने प्रति मानक बोरा दर को 5500 रुपए कर दिया है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि विकसित भारत की तर्ज पर वर्ष 2047 तक विकसित छत्तीसगढ़ बनाने के लिए राज्य सरकार संकल्पबद्ध है। उन्होंने लोगों से वोकल फॉर लोकल अपनाने का आग्रह करते हुए कहा कि स्वदेशी वस्तुओं की खरीद से न केवल देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि स्थानीय कारीगरों और उद्यमियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि राज्य सरकार नक्सल उन्मूलन की दिशा में तीव्रता से कार्य कर रही है। दो दिन पूर्व ही 210 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए मेडिकल कॉलेज, प्राकृतिक चिकित्सा एवं फिजियोथेरेपी केंद्र, शासकीय नर्सिंग कॉलेज तथा शासकीय फिजियोथेरेपी कॉलेज की स्थापना की जाएगी, जिससे स्थानीय युवाओं को शिक्षा और रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।

मुख्यमंत्री साय ने माध्यमिक विद्यालय खेल मैदान स्थित आमा बगीचा के करमा पूजन स्थल पर करम वृक्ष की डाली की पारंपरिक रीति से पूजा-अर्चना कर प्रदेश की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। इसके बाद उन्होंने करमा नर्तक दल के साथ गले में मांदर टाँगकर ताल मिलाते हुए करम वृक्ष की डाली के चारों ओर उत्साहपूर्वक नृत्य किया। इस अवसर पर उनकी धर्मपत्नी कौशल्या साय तथा परिवारजन भी उपस्थित थे।

सोहरई करमा महोत्सव: रौतिया समाज की सांस्कृतिक पहचान

सोहरई करमा महोत्सव मूलतः रौतिया समाज द्वारा गोवर्धन पर्व के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला पारंपरिक पर्व है। इस दिन नए फसल को पूरे विधि-विधान से पूजा-पाठ कर घर लाया जाता है। ग्राम कण्डोरा में आयोजित इस भव्य आयोजन में छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के साथ-साथ झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से आए कुल 52 मंडलों के नर्तक दलों ने सहभागिता की। विविध लोक संस्कृतियों और पारंपरिक नृत्यों की रंगारंग प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को उल्लास और उत्सव की भावना से सराबोर कर दिया।

इस अवसर पर सांसद राधेश्याम राठिया, अखिल भारतीय रौतिया समाज विकास परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओ. पी. साय, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दामोदर सिंह, राष्ट्रीय महासचिव आजाद सिंह, केंद्रीय संगठन मंत्री भुनेश्वर केसर, केंद्रीय महिला सदस्य  उमा देवी सहित समाज के अन्य पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में गणमान्यजन उपस्थित थे।

Don't Miss
© Media24Media | All Rights Reserved | Infowt Information Web Technologies.