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भारतीय वैज्ञानिकों ने बिना बाहरी सहायता के स्वयं-उपचार करने वाले ऑर्गेनिक क्रिस्टल की खोज की

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भारतीय वैज्ञानिकों ने हाल ही में परतदार संरचना वाले ऑर्गेनिक क्रिस्टल में एक अनोखी स्वयं-उपचार (Self-Healing) क्षमता की खोज की है, जिसमें किसी भी बाहरी उत्तेजना की आवश्यकता नहीं होती। यह खोज ऐसे उन्नत पदार्थों के विकास में सहायक हो सकती है, जो तकनीकी उपयोगों में ऊर्ध्वाधर भार (Vertical Load) को सहन कर सकें।

वर्तमान में उपलब्ध अधिकांश स्वयं-उपचार तकनीकें प्रकाश, ताप या किसी रासायनिक माध्यम जैसे बाहरी कारकों पर निर्भर करती हैं, जिससे उनका उपयोग सीमित हो जाता है, विशेषकर उन परिस्थितियों में जहां बाहरी हस्तक्षेप संभव नहीं होता। स्वायत्त (Autonomous) स्वयं-उपचार के लिए आमतौर पर पॉलिमर, हाइड्रोजेल और कॉम्पोजिट्स में क्रॉस-लिंकिंग या हीलिंग एजेंट्स का उपयोग किया जाता है, लेकिन क्रिस्टलीय पदार्थों में यह प्रभावी नहीं होता क्योंकि उपचार के बाद उनकी संरचना (क्रिस्टैलिनिटी) को पुनः स्थापित करना अत्यंत आवश्यक होता है।

आईआईटी इंदौर (भौतिकी विभाग, प्रो. राजेश कुमार के नेतृत्व में), आईआईटी हैदराबाद (रसायन विज्ञान विभाग, प्रो. सी. मल्ला रेड्डी के नेतृत्व में) और विद्युत अभियांत्रिकी विभाग (प्रो. वरुण रघुनाथन के नेतृत्व में) के वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि परतदार संरचना वाले लचीले ऑर्गेनिक क्रिस्टल में माइक्रोन स्तर की बड़ी दरारें कुछ ही मिलीसेकंड में स्वतः ठीक हो सकती हैं। यह प्रक्रिया माइक्रोस्ट्रक्चर स्तर पर “सिमेट्री ब्रेकिंग” नामक एक नई प्रणाली के माध्यम से होती है, जिसकी पुष्टि रमन स्पेक्ट्रो-माइक्रोस्कोपी तकनीक से की गई। यह सुविधा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की FIST योजना के अंतर्गत समर्थित है।

इस शोध में रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी ने उपचार प्रक्रिया के सटीक तंत्र को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कार्य डॉ. ईशिता घोष, डॉ. रबीन्द्र बिस्वास, डॉ. मनुश्री तनवर, डॉ. सुरोजित भुनिया, डॉ. कौस्तव दास और डॉ. अमित मोंडल सहित शोधकर्ताओं के सहयोग से किया गया, जिसे वर्ष 2026 में ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित किया गया है।

यह अध्ययन जीवित ऊतकों में होने वाली स्वयं-उपचार प्रक्रियाओं को समझने और उनके आधार पर स्मार्ट मैटेरियल विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

NMDC Limited और Indian Institute of Technology Hyderabad के बीच MoU, खनन एवं धातु क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को मिलेगा बढ़ावा

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भारत के खनन एवं धातु क्षेत्र के भविष्य को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए NMDC Limited के आर एंड डी केंद्र, “Responsible Miner”, ने Indian Institute of Technology Hyderabad (IITH) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता NMDC के कार्यकारी निदेशक (आर एंड डी) संजीव साहि और IIT हैदराबाद के डीन (स्पॉन्सर्ड रिसर्च एंड कंसल्टेंसी) द्वारा, IIT हैदराबाद के निदेशक प्रो. बी. एस. मूर्ति की उपस्थिति में संपन्न हुआ। इसका उद्देश्य खनिज प्रसंस्करण एवं संबद्ध क्षेत्रों में स्वदेशी तकनीकों को आगे बढ़ाना है।

यह साझेदारी क्षेत्रीय विशेषज्ञता और अकादमिक उत्कृष्टता का सशक्त संगम है। NMDC और IIT हैदराबाद मिलकर लौह अयस्क परिष्करण (beneficiation) एवं एग्लोमरेशन, हरित इस्पात निर्माण तकनीक, स्वदेशी कच्चे माल से वैकल्पिक लौह निर्माण, तथा खनन और धातुकर्म प्रक्रियाओं के उन्नत मॉडलिंग एवं सिमुलेशन पर अनुसंधान को बढ़ावा देंगे। इसके साथ ही, प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों से महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ मृदा खनिजों के निष्कर्षण के नए मार्ग भी विकसित किए जाएंगे, जिससे भारत की खनिज सुरक्षा और संसाधन आत्मनिर्भरता को मजबूती मिलेगी।

खनन क्षेत्र में तेजी से हो रहे डिजिटल परिवर्तन के अनुरूप, यह MoU स्वायत्त वाहन संचालन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), माइनिंग 4.0 ढांचे, तथा ड्रोन आधारित सर्वेक्षण और निगरानी जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान और पायलट परियोजनाओं को प्रोत्साहित करेगा। परिचालन क्षमता और अनुसंधान-आधारित नवाचार के समन्वय से यह सहयोग टिकाऊ, प्रौद्योगिकी-आधारित समाधान विकसित करेगा, जो दक्षता, उत्पादकता और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देंगे।

इस अवसर पर NMDC के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक अमितावा मुखर्जी ने कहा, “IIT हैदराबाद के साथ यह समझौता उद्योग–शिक्षा सहयोग के माध्यम से नवाचार के प्रति NMDC की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है। IIT हैदराबाद की शोध उत्कृष्टता और NMDC की क्षेत्रीय विशेषज्ञता का लाभ उठाकर यह साझेदारी खनन, खनिज प्रसंस्करण और उभरते क्षेत्रों में स्वदेशी तकनीकों को आगे बढ़ाएगी तथा सतत विकास और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के दृष्टिकोण में योगदान देगी।”

यह साझेदारी नवाचार-आधारित विकास के प्रति NMDC की प्रतिबद्धता और औद्योगिक अनुप्रयोगों में शोध को रूपांतरित करने में IIT हैदराबाद की भूमिका को रेखांकित करती है। उल्लेखनीय है कि यह सहयोग ऐसे समय में हुआ है जब NMDC का आर एंड डी केंद्र भारत की खनिज विकास यात्रा में अपने 50 वर्ष पूरे कर रहा है, जो अनुसंधान उत्कृष्टता और तकनीकी प्रगति की उसकी विरासत को और सुदृढ़ करता है।

DST और IIT हैदराबाद सहयोग से विकसित हुआ पर्यावरण-हितैषी, सीसा-रहित सेल्फ-पावर्ड फोटोडिटेक्टर

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उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक निगरानी, सुरक्षा प्रणालियों और बायोमेडिकल इमेजिंग के लिए एक नवीन, सीसा-रहित और पर्यावरण-हितैषी फोटोडिटेक्टर जो स्वयं-संचालित (Self-Powered) है और मजबूत व स्थिर प्रदर्शन प्रदान करता है, अत्यंत उपयोगी हो सकता है।

आधुनिक कैमरे, पर्यावरण संवेदक और स्मार्ट वियरेबल्स फोटोडिटेक्टरों पर निर्भर करते हैं, जो प्रकाश को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करते हैं। वर्तमान में उच्च प्रदर्शन वाले कई फोटोडिटेक्टर सीसा आधारित पेरोव्स्काइट का उपयोग करते हैं, जिनमें विषाक्तता की समस्याएँ होती हैं और ये वास्तविक दुनिया की परिस्थितियों में आसानी से degrade हो जाते हैं।

इस चुनौती का समाधान करते हुए अंतर्राष्ट्रीय उन्नत अनुसंधान केंद्र फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मटीरियल्स (ARCI, हैदराबाद), जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का स्वायत्त संस्थान है, ने IIT हैदराबाद के सहयोग से डबल पेरोव्स्काइट Cs₂AgBiBr₆ आधारित एक सीसा-रहित, पर्यावरण-हितैषी फोटोडिटेक्टर विकसित किया है, जो मजबूत और स्थिर प्रदर्शन प्रदान करता है।

पारंपरिक डिज़ाइन में अक्सर महंगे धातु संपर्क और अतिरिक्त होल-ट्रांसपोर्ट लेयर (HTL) की आवश्यकता होती है, जिन्हें ग्लोवबॉक्स या वैक्यूम निर्माण उपकरण की मदद से बनाना पड़ता है। इसके विपरीत, यह डिवाइस HTM-फ्री है, कम लागत वाले कार्बन इलेक्ट्रोड का उपयोग करता है और सिर्फ एक चरण वाले कोटिंग मेथड से कमरे के तापमान पर निर्मित किया जाता है। डिवाइस संरचना स्वाभाविक रूप से प्रभावी चार्ज पृथक्करण का समर्थन करती है, जिससे बाहरी वोल्टेज के बिना ही सेल्फ-पावर्ड संचालन संभव होता है।

Cs₂AgBiBr₆ फोटोडिटेक्टर दृश्य प्रकाश के प्रति मजबूत प्रतिक्रिया दिखाता है और वास्तविक संचालन परिस्थितियों में उत्कृष्ट विश्वसनीयता प्रदर्शित करता है। उपकरण 60 दिनों तक संग्रहण के बाद भी अपने प्रदर्शन का 90% से अधिक बनाए रखता है। इन मापों को सामान्य कमरे की स्थितियों (25-35°C और 35-50% सापेक्ष आर्द्रता) में किया गया। प्रदर्शन वक्रों का 60 दिनों बाद भी लगभग समान रहना इसकी दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता की पुष्टि करता है।

सीसा-रहित सामग्री प्रणाली, सरल पर्यावरण-प्रक्रिया निर्माण, कम लागत वाले घटक और मजबूत संचालन स्थिरता का संयोजन इस तकनीक को उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, औद्योगिक निगरानी, सुरक्षा प्रणाली और बायोमेडिकल इमेजिंग के लिए अत्यंत आकर्षक बनाता है। यह भारत के सतत सामग्री विकास, ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग और अगली पीढ़ी की इलेक्ट्रॉनिक्स में आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों के साथ भी संरेखित है।

इस काम का समर्थन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार ने किया है, और यह Solar Energy (Elsevier) में प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है:
“Ambient-processed lead-free Cs2AgBiBr6 photodetector with long-term environmental stability and self-powered operation.”


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