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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 जनवरी 2026 को पिपरहवा बुद्ध अवशेषों की ऐतिहासिक प्रदर्शनी का करेंगे उद्घाटन

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संस्कृति मंत्रालय द्वारा हाल ही में भारत वापस लाए गए पिपरहवा अवशेषों, अवशेष पात्रों (रिलिक्वेरीज़) और रत्न अवशेषों को प्रदर्शित करने के लिए राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर में एक ऐतिहासिक प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 3 जनवरी 2026 को प्रातः 11.00 बजे किया जाएगा।

यह ऐतिहासिक अवसर 127 वर्षों बाद भगवान बुद्ध के पिपरहवा रत्न अवशेषों के पुनः एकत्रीकरण का प्रतीक है, जिन्हें पिपरहवा स्थल पर 1898 तथा बाद में 1971–1975 के उत्खननों में प्राप्त अवशेषों, रत्न अवशेषों और अवशेष पात्रों के साथ एक साथ प्रदर्शित किया जा रहा है।

“द लाइट एंड द लोटस: द रिलिक्स ऑफ द अवेकेंड वन” शीर्षक से आयोजित यह प्रदर्शनी संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत विभिन्न सांस्कृतिक संस्थानों से संबंधित प्रासंगिक पुरावशेषों और कलाकृतियों को विषयगत रूप से प्रस्तुत करती है। ये अवशेष भगवान बुद्ध से संबद्ध सबसे व्यापक संग्रह का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो गहन दार्शनिक अर्थ, उत्कृष्ट शिल्पकला और वैश्विक आध्यात्मिक महत्व के प्रतीक हैं। प्रदर्शनी में छठी शताब्दी ईसा पूर्व से वर्तमान काल तक की अवधि के 80 से अधिक वस्तुएं प्रदर्शित की जा रही हैं, जिनमें मूर्तियां, पांडुलिपियां, थंका चित्र और अनुष्ठानिक वस्तुएं शामिल हैं।

यह अभूतपूर्व आयोजन जुलाई 2025 में संस्कृति मंत्रालय द्वारा पिपरहवा अवशेषों की सफल स्वदेश वापसी को स्मरण करता है, जिसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से और सॉथबीज़, हांगकांग में प्रस्तावित नीलामी को रोकते हुए संभव बनाया गया। 1898 के उत्खनन के बाद पहली बार, इस प्रदर्शनी में निम्नलिखित को एक साथ प्रस्तुत किया जा रहा है:

  • 1898 के कपिलवस्तु उत्खनन से प्राप्त अवशेष

  • 1972 के उत्खननों से प्राप्त निधियां

  • भारतीय संग्रहालय, कोलकाता से अवशेष पात्र और जड़ाऊ रत्न

  • पेप्पे परिवार के संग्रह से हाल ही में स्वदेश लौटाए गए अवशेष

  • वह एकाश्म पत्थर का संदूक, जिसमें मूल रूप से रत्न अवशेष और अवशेष पात्र पाए गए थे

पवित्र बुद्ध अवशेषों की खोज 1898 में विलियम क्लैक्टन पेप्पे द्वारा प्राचीन कपिलवस्तु स्तूप में की गई थी। खोज के पश्चात इनका एक हिस्सा सियाम (वर्तमान थाईलैंड) के राजा को भेंट किया गया, एक हिस्सा इंग्लैंड ले जाया गया और तीसरा हिस्सा भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में संरक्षित रहा। 2025 में, संस्कृति मंत्रालय के निर्णायक हस्तक्षेप और विश्वभर के बौद्ध समुदायों के समर्थन से पेप्पे परिवार के पास रहे अवशेषों को भारत वापस लाया गया।

यह प्रदर्शनी बौद्ध धर्म की जन्मभूमि के रूप में भारत की भूमिका को रेखांकित करती है और वैश्विक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक नेतृत्व में उसकी स्थिति को और सुदृढ़ करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक सहभागिता में उसकी सभ्यतागत और आध्यात्मिक विरासत का विशेष महत्व उभरकर सामने आया है। अब तक 642 पुरावशेषों की भारत में वापसी हो चुकी है, जिनमें पिपरहवा अवशेषों की वापसी एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

उद्घाटन समारोह में केंद्रीय मंत्रीगण, राजदूत एवं राजनयिक समुदाय के सदस्य, वंदनीय बौद्ध भिक्षु, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, विद्वान, विरासत विशेषज्ञ, कला जगत की प्रतिष्ठित हस्तियां, कला प्रेमी, बौद्ध धर्म के अनुयायी और छात्र भाग लेंगे।

यह प्रदर्शनी विरासत संरक्षण और सांस्कृतिक नेतृत्व के प्रति संस्कृति मंत्रालय की प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि करती है तथा भारत की आध्यात्मिक विरासत और बुद्ध धम्म की जन्मभूमि के रूप में उसके वैश्विक महत्व का उत्सव मनाती है। यह भारत की उस सतत प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है, जिसके तहत वह अपनी सभ्यतागत धरोहर को संरक्षित कर विश्व के साथ साझा करता रहा है।


भारत 8-13 दिसंबर को नई दिल्ली में यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर समिति का 20वां सत्र आयोजित करेगा

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भारत सरकार 8 से 13 दिसंबर 2025 तक नई दिल्ली में यूनेस्को इंटरगवर्नमेंटल कमिटी फॉर सेफगार्डिंग ऑफ द इंटैन्जिबल कल्चरल हेरिटेज (ICH) के 20वें सत्र की मेज़बानी करेगी। ऐतिहासिक लाल किला परिसर, जो स्वयं यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, इस सत्र का स्थल चुना गया है, जो भारत की मूर्त और अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के संगम का प्रतीक है।

यह पहली बार होगा जब भारत ICH समिति सत्र की मेज़बानी कर रहा है। बैठक की अध्यक्षता भारत के स्थायी प्रतिनिधि डॉ. विशाल वी. शर्मा करेंगे। यह आयोजन भारत द्वारा 2003 में अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण सम्मेलन के अनुमोदन के बीसवें वर्ष के अवसर पर हो रहा है, जो भारत की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

यूनेस्को के अनुसार, अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर में वे प्रथाएँ, ज्ञान, अभिव्यक्तियाँ, वस्तुएँ और स्थान शामिल हैं जिन्हें समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानते हैं। यह पीढ़ियों से पीढ़ियों तक हस्तांतरित होती है और सांस्कृतिक पहचान व विविधता की सराहना को मजबूत करती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा के लिए यूनेस्को ने 2003 का सम्मेलन 17 अक्टूबर 2003 को पेरिस में अपनी 32वीं महासभा में अपनाया। सम्मेलन ने यह सुनिश्चित किया कि मौखिक प्रथाएँ, प्रदर्शन कला, सामाजिक रीतियाँ, ज्ञान प्रणाली और शिल्प जैसे जीवंत सांस्कृतिक तत्व वैश्वीकरण, सामाजिक परिवर्तन और सीमित संसाधनों से प्रभावित न हों।

सम्मेलन ने समुदायों, विशेषकर आदिवासी और स्थानीय समुदायों, और व्यक्तिगत कारीगरों को संरक्षण प्रयासों के केंद्र में रखा। यह मूर्त और अमूर्त धरोहर के बीच अंतर्संबंध, वैश्विक सहयोग की आवश्यकता और युवा पीढ़ियों में जागरूकता बढ़ाने का महत्व रेखांकित करता है। सम्मेलन ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग, सहायता और मान्यता के लिए संरचनाओं की नींव रखी, जिसने यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूचियों और इंटरगवर्नमेंटल समिति के काम की आधारशिला तैयार की।

सम्मेलन के उद्देश्य:

  1. अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा करना।

  2. संबंधित समुदायों, समूहों और व्यक्तियों की धरोहर का सम्मान सुनिश्चित करना।

  3. स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना।

  4. वैश्विक सहयोग और सहायता सुनिश्चित करना।

अंतर-सरकारी समिति के कार्य

Intergovernmental Committee for Safeguarding of the Intangible Cultural Heritage 2003 के सम्मेलन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है और सदस्य राज्यों में इसके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करती है। समिति:

  • 2003 सम्मेलन के उद्देश्यों को बढ़ावा और निगरानी देती है।

  • संरक्षण के सर्वोत्तम अभ्यास पर मार्गदर्शन प्रदान करती है।

  • ICH फंड के उपयोग के लिए मसौदा योजना तैयार करती है।

  • फंड के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाती है।

  • सम्मेलन के क्रियान्वयन के लिए संचालन निर्देश प्रस्तावित करती है।

  • राज्यों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों की समीक्षा करती है।

  • ICH सूचियों में तत्वों के नामांकन और अंतरराष्ट्रीय सहायता की मंजूरी देती है।



20वां सत्र

सांस्कृतिक मंत्रालय और संगीत नाटक अकादमी (SNA) इस सत्र के लिए लाल किले, नई दिल्ली को नोडल एजेंसी के रूप में संचालित करेंगे। 17वीं सदी का यह किला अपने भव्य वास्तुकला, महलों, बागों और संग्रहालयों के लिए जाना जाता है और स्वयं यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

मुख्य एजेंडे:

  • भारत के राष्ट्रीय ICH संरक्षण मॉडल को साझा करना।

  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संयुक्त संरक्षण पहलों को बढ़ावा देना।

  • भारत की अमूर्त धरोहर को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करना।

  • घरेलू संरक्षण प्रयासों को प्रोत्साहित करना।

  • सांस्कृतिक कूटनीति के लिए प्लेटफ़ॉर्म प्रदान करना।

  • धरोहर संरक्षण और सतत विकास के बीच लिंक मजबूत करना।

भारत की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर: एक राष्ट्रीय और वैश्विक संपत्ति

  • सांस्कृतिक पहचान: भाषाई, जातीय, क्षेत्रीय, आदिवासी और धार्मिक पहचान का संरक्षण।

  • आजीविका और शिल्प अर्थव्यवस्था: पारंपरिक शिल्प, प्रदर्शन कला और सांस्कृतिक पर्यटन से ग्रामीण और कमजोर समुदायों को रोजगार।

  • शिक्षा और ज्ञान हस्तांतरण: पारंपरिक ज्ञान, लोककथाएँ, शिल्प तकनीकें और रीति-रिवाज।

  • सांस्कृतिक कूटनीति और सॉफ्ट पावर: भारतीय विविधता और सांस्कृतिक गहराई को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करना।

  • वैश्विक नेतृत्व: यूनेस्को के तहत वैश्विक धरोहर संरक्षण में भारत की सक्रिय भूमिका।

भारत का योगदान

भारत ने 2003 के सम्मेलन के तहत अपनी जिवंत सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाई है। अब तक 15 भारतीय तत्व यूनेस्को की ICH प्रतिनिधि सूची में शामिल हैं।

इस वर्ष, भारत ने छठ महापर्व और दीपावली को यूनेस्को की ICH सूची के लिए नामांकित किया है।

इन नामांकनों से समुदाय की भागीदारी, दस्तावेज़ीकरण, प्रशिक्षण और हस्तांतरण के माध्यम से विविध सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की सुरक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता भी प्रदर्शित होती है। इनमें कुटियाट्टम, छाऊ जैसे प्रदर्शन कला, वैदिक और बौद्ध जप, रामलीला, राममन और संकीर्तन जैसी सामुदायिक परंपराएँ शामिल हैं। योग, दुर्गा पूजा और गरबा जैसे आधुनिक सांस्कृतिक तत्व भी भारत की जीवंत सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं।

निष्कर्ष

भारत का 20वां ICH सत्र आयोजित करना एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह भारत के संरक्षण मॉडल को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और वर्तमान व भविष्य की पीढ़ियों के लिए अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अवसर प्रदान करता है।

इस सत्र की सफलता यूनेस्को, भारत सरकार और भारत की सांस्कृतिक परंपराओं के लिए सकारात्मक प्रभाव डालेगी। भारत की धरोहर इसके लोगों के माध्यम से जीवित है — इसकी भाषाओं, कला, अनुष्ठान, त्योहारों और विश्वास प्रणालियों में। इस सत्र की मेज़बानी से भारत की सांस्कृतिक विरासत को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की निरंतर प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है।


जनजातीय स्वतंत्रता विद्रोहों पर बने भव्य स्मारक सह-संग्रहालय जल्द लोगों के लिए होगा समर्पित

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राज्योत्सव पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे देश के पहले डिजीटल संग्रहालय का लोकार्पण

आदिवासियों के 14 विद्रोहों और जंगल सत्याग्रह एवं झंडा सत्याग्रह के दृश्य का जीवंत प्रदर्शन

रायपुर- नवा रायपुर अटल नगर के आदिवासी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान परिसर में छत्तीसगढ़ के जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के विद्रोहों पर बन रहे स्मारक सह-संग्रहालय जल्द ही लोगों के लिए समर्पित किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्योत्सव के मौके पर देश के पहले डिजीटल संग्रहालय का लोकार्पण करेंगे। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज निर्माणाधीन संग्रहालय स्थल का निरीक्षण कर लोकार्पण की तैयारियों का जायजा लिया एवं अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

गौरतलब है कि राज्य सरकार इस वर्ष छत्तीसगढ़ निर्माण के 25 वर्ष पूर्ण होने पर रजत जयंती के रूप में मना रहा हैं। नवा रायपुर में बन रहे शहीद वीर नारायण सिंह आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मारक सह-संग्रहालय के निर्माण कार्यों का निरीक्षण के दौरान मुख्य मंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि आगंतुकों एवं पर्यटकों के हिसाब से संग्रहालय में आडियो-विडीयो विजुवल की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि आगंतुक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संबंध में भंलिभांति परिचित हो सके। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की परिकल्पना का परिणाम है कि जल्द ही छत्तीसगढ़ में जनजातीय वर्गों के ऐतिहासिक गौरव गाथा, शौर्य और बलिदान का प्रतीक स्मारक सह-संग्रहालय धरातल पर दिखाई देगा। यह निर्माणाधीन संग्रहालय सदियों के लिए आने वाली नई पीढ़ियों को पुरखों का याद दिलाता रहेगा। उन्होंने कहा कि यह संग्रहालय न सिर्फ आदिवासी वर्गों के लिए बल्कि सभी वर्गों सहित देश-विदेश के लोगों के लिए भी प्रेरणाप्रद बनेगा।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि इस जीवंत संग्रहालय के माध्यम से लोगों में बड़ी से बड़ी ताकतों के अन्याय, अत्याचार के खिलाफ विद्रोह करने का साहस पैदा होगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदृष्टि सोच का परिणाम है कि आज प्रदेश का पहला संग्रहालय है जो छत्तीसगढ़ के आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शौर्य गाथा एवं बलिदान को समर्पित है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्थल निरीक्षण कर तैयारियों का लिया जायजा

मुख्यमंत्री साय ने आगामी राज्योत्सव के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा प्रस्तावित उद्घाटन के मद्देनजर सभी आवश्यक तैयारियां व निर्माण कार्य पूर्ण करने के निर्देश दिए। उन्होंने संग्रहालय में डिजीटलीकरण कार्य, पार्किंग व्यवस्था, सॉवेनियर शॉप, गार्डनिंग, वॉटर सप्लाई की स्थिति की जानकारी ली।

प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को संग्रहालय में निर्माणाधीन 14 गैलरियों सहित झंडा सत्याग्रह, जंगल सत्याग्रह, जनजातीय संस्कृतियों पर बने गैलरियों आदि के संबंध में विस्तार से जानकारी दी।

निरीक्षण के दौरान उनके साथ वन एवं जलवायु परिर्वतन मंत्री केदार कश्यप, मुख्य सचिव विकासशील, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध सिंह, मुख्यमंत्री के सचिव राहुल भगत, रायपुर संभाग के कमिश्नर महादेव कावरे, आदिम जाति विकास विभाग के आयुक्त डॉ. सारांश मित्तर, मुख्यमंत्री के संयुक्त सचिव एवं जनसंपर्क विभाग के आयुक्त डॉ रवि मित्तल, कलेक्टर गौरव सिंह, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. लाल उमेद सिंह, टीआरटीआई संचालक हिना अनिमेष नेताम सहित  अन्य विभागीय अधिकारी उपस्थित थे।   

वीएफएक्स टेक्नोलॉजी और प्रोजेक्शन वर्क से तैयार हो रहा है संग्रहालय

गौरतलब है कि यह स्मारक सह- संग्रहालय छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बारिकी के साथ अध्ययन व रिसर्च के बाद वीएफएक्स टेक्नोलॉजी और प्रोजेक्शन वर्क के साथ तैयार किया रहा है। संग्रहालय देखने वाले आगंतुकों को आदिवासी विद्रोह का वर्णन स्टैच्यू के पास ही लगे डिजिटल बोर्ड पर उपलब्ध रहेगा। आगंतुक संग्रहालय में आदिवासी विद्रोह को जीवंत महसूस कर सकेगा। वहीं आगंतुक प्रत्येक गैलरी में बनाई गई जीवंत प्रस्तुति के सामने स्कैनर से मोबाईल द्वारा स्कैन कर संबंधित जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकेंगे।  

16 गैलेरियों में तैयार हो रहा है संग्रहालय

उल्लेखनीय है कि शहीद वीर नारायण सिंह संग्रहालय में स्वतंत्रता आंदोलन के समय छत्तीसगढ़ में हुए विभिन्न आदिवासी विद्रोहों जैसे - हल्बा विद्रोह, सरगुजा विद्रेाह, भोपालपट्टनम विद्रोह, परलकोट विद्रोह, तारापुर विद्रोह, लिंगागिरी विद्रोह, कोई विद्रोह, मेरिया विद्रोह, मुरिया विद्रोह, रानी चौरिस विद्रोह, भूमकाल विद्रोह, सोनाखान विद्रोह, झण्डा सत्याग्रह एवं जंगल सत्याग्रह के वीर आदिवासी नायकों के संघर्ष एवं शौर्य के दृश्य का जीवंत प्रदर्शन 14 गैलेरियों में किया जा रहा है। वहीं जंगल सत्याग्रह और झंडा सत्याग्रह पर एक-एक गैलेरियों का भी निर्माण किया जा रहा है।


देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर में जैन अध्ययन केंद्र का उद्घाटन, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के समर्थन से

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भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय (Ministry of Minority Affairs) देशभर के विश्वविद्यालयों को प्रधान मंत्री जन विकास कार्यक्रम (PMJVK) के तहत विरासत और शास्त्रीय भाषाओं के संवर्धन और संरक्षण के लिए उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) स्थापित करने में समर्थन प्रदान कर रहा है।

इस पहल के तहत, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV), इंदौर ने “जैन धर्म और भारतीय ज्ञान प्रणाली” पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया, जो इसके जैन अध्ययन केंद्र (Centre for Jain Studies) के उद्घाटन का अवसर था। इस केंद्र को अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा PMJVK के अंतर्गत ₹27.16 करोड़ की लागत से स्वीकृत किया गया है।

कार्यक्रम में मध्य प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के सचिव डॉ. चंद्रशेखर कुमार और संयुक्त सचिव राम सिंह उपस्थित थे।

अपने दौरे के दौरान, डॉ. चंद्रशेखर कुमार ने विश्वविद्यालय परिसर का भ्रमण किया और फैकल्टी सदस्यों के साथ संवाद किया। उन्होंने विश्वविद्यालय से यह अपेक्षा जताई कि जैन अध्ययन केंद्र को वैश्विक उत्कृष्टता का केंद्र बनाया जाए, जिसमें अनुसंधान, प्रलेखन और प्रसार के लिए आधुनिक तकनीक और डिजिटल उपकरणों का समावेश किया जाए। तकनीक की भूमिका पर जोर देते हुए उन्होंने विरासत भाषाओं के संरक्षण, डिजिटलीकरण और संवर्धन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की संभावनाओं को भी रेखांकित किया।

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने पहले ही उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए हैं: मुंबई विश्वविद्यालय – पाली, प्राकृत और अवेस्ता फहलवी अध्ययन के लिए, और गुजरात विश्वविद्यालय – प्राकृत भाषाओं के अध्ययन के लिए। ये केंद्र उन्नत शोध, अनुवाद, पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षाशास्त्र के साथ जोड़ने के उद्देश्य से काम कर रहे हैं।

इस पहल के माध्यम से मंत्रालय भारत की भाषाई और दार्शनिक विरासत की सुरक्षा करने के साथ-साथ देश की विविध समुदायों की बौद्धिक परंपराओं को भी मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।

यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक नीतियां और सतत विकास सम्मेलन MONDIACULT 2025 का समापन समारोह बार्सिलोना में आयोजित

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बार्सिलोना– यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक नीतियां और सतत विकास सम्मेलन – MONDIACULT 2025 का समापन समारोह बार्सिलोना में आयोजित किया गया। समारोह में सांस्कृतिक प्रदर्शन, यूथ फोरम निष्कर्षों का पाठ, नागरिक समाज के हस्तक्षेप, परिणाम दस्तावेज़ को अपनाना, MONDIACULT 2025 की मौखिक रिपोर्ट और अंतिम टिप्पणियाँ शामिल थीं।

भारत का प्रतिनिधित्व  अमीता प्रसाद सरभाई, अतिरिक्त सचिव, संस्कृति मंत्रालय ने किया, जिन्होंने गजेंद्र सिंह शेखावत, संस्कृति मंत्री, भारत सरकार की ओर से भाग लिया। मंत्री ने MONDIACULT 2025 के दौरान एशिया-प्रशांत क्षेत्र के सह-अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।

भारत के संस्कृति मंत्रालय के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया, जिसमें शामिल थे:

  • अमीता प्रसाद सरभाई, अतिरिक्त सचिव, संस्कृति मंत्रालय

  •  प्रियांका चंद्रा, निदेशक, संस्कृति मंत्रालय

  • विशाल गुप्ता, निजी सचिव, संस्कृति मंत्री

  • दीपक शर्मा, अंडर सेक्रेटरी, विदेश मंत्रालय प्रतिनिधित्व

संस्कृति मंत्री ने 29 सितंबर 2025 को MONDIACULT 2025 के उद्घाटन समारोह और मंत्रिस्तरीय सत्र में भाग लिया।

समापन समारोह में,अमीता प्रसाद सरभाई, अतिरिक्त सचिव, संस्कृति मंत्रालय, प्रियांका चंद्रा, निदेशक, संस्कृति मंत्रालय और दीपक शर्मा, अंडर सेक्रेटरी, विदेश मंत्रालय ने नीदरलैंड्स के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की, जिसका नेतृत्व कार्लियन श्रिज़वेरशोफ़, नीदरलैंड्स की यूनेस्को स्थायी उपप्रतिनिधि, और क्रुस्तियाने मैथीज़न, मीडिया की उपमहानिदेशक ने किया। इसके अलावा उन्होंने सिपिरियानो नेमानी, निदेशक, संस्कृति मंत्रालय, फ़िजी से भी मुलाकात की। इन चर्चाओं का उद्देश्य 'छठ महापर्व' को यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर ढांचे के तहत बहुराष्ट्रीय नामांकन के लिए समर्थन प्राप्त करना था।

समापन समारोह ने MONDIACULT 2025 की सफल समाप्ति को चिह्नित किया, जिसमें सदस्य देशों ने संस्कृति को वैश्विक सार्वजनिक कल्याण के रूप में पुनः पुष्टि की और परिणाम दस्तावेज़ को अपनाया, जो सांस्कृतिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सहयोग को मजबूत करने के लिए रोडमैप निर्धारित करता है।


जीएसटी सुधार: हिमाचल की विरासत एवं अर्थव्यवस्था सुदृढ़ीकरण

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 प्रस्तावना

नवीनतम जीएसटी सुधारों ने देश भर में बोझ कम किया है और विभिन्न राज्यों व क्षेत्रों को इसके विविध लाभ मिले हैं। हिमाचल प्रदेशजो अपने समृद्ध पारंपरिक शिल्पविशिष्ट कृषि उपज और बढ़ते उद्योगों के लिए जाना जाता हैमें जीएसटी दरों में हालिया कटौती का गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है।

ये छोटे कारीगरों और बुनकरों के लिए राहतकिसानों और कृषकों के लिए नए अवसर और हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक समूहों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धात्मकता लाएँगे। ये सुधार मिलकर आजीविका को मज़बूत करेंगे और राज्य को निरंतर विकास की ओर अग्रसर करेंगे।

 शॉल तथा ऊनी वस्त्र

हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध हथकरघा उत्पादोंखासकर शॉल और ऊनी वस्त्रों को नए जीएसटी ढांचे में राहत मिलने की उम्मीद है। ये उत्पाद सिर्फ़ स्मृति चिन्ह नहीं हैंये हज़ारों कारीगरों की आजीविका का ज़रिया हैं।

कुल्लू घाटी मेंस्वयं सहायता समूहों से जुड़े 3,000 से ज़्यादा बुनकर चमकीले पैटर्न वालेजीआई-टैग वालेकुल्लू शॉल बनाते हैं। ये बुनकर राज्य भर के अनुमानित 10,000-12,000 हथकरघा कारीगरों का हिस्सा हैंजो इन हस्तशिल्पों से अपनी आजीविका चलाते हैं। पड़ोसी किन्नौर ज़िले के शॉलजो जटिल पौराणिक रूपांकनों से सजे हैंकई हज़ार कारीगरों द्वारा बुने और हाथ से रंगे जाते हैं। जीएसटी 12% से घटकर 5% होने सेउपभोक्ताओं के लिए इन हस्तनिर्मित उत्पादों की लागत में कमी आने की उम्मीद है। यह कदम कारीगरों की प्रतिस्पर्धात्मकता एवं आय को सीधे तौर पर बढ़ावा देता है।

पश्मीना शॉल को भी 12% से बढ़ाकर 5% कर दिए जाने से लाभ हुआ है। हालाँकि इसे अक्सर कश्मीर से जोड़ा जाता हैहिमाचल प्रदेश का अपना उत्पादन लाहौल-स्पीतिकिन्नौरकुल्लूमंडी और शिमला जैसे क्षेत्रों में भी होता है। हथकरघा क्षेत्र के 10,000-12,000 कारीगरों में से कई पश्मीना से जुड़े हैं और शानदार ऊनी शिल्प तैयार करते हैं। कर में कटौती से इस उच्च-मूल्य वाले क्षेत्र में भी राहत मिली हैजिससे कारीगरों को मार्जिन बनाए रखते हुए अपने शॉलों की कीमतें अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिल सकती है।

शॉलों के साथ-साथपारंपरिक हिमाचली टोपियाँजैसे बहुरंगी किन्नौरी टोपियाँ और दस्ताने जैसे अन्य ऊनी सामान भी संशोधित जीएसटी स्लैब से लाभान्वित होंगे। ये वस्तुएँ ऊँचाई वाले ज़िलों के हज़ारों कारीगरों द्वारा हाथ से बुनी जाती हैं। कम कर से उपभोक्ताओं के लिए कीमतों में कुछ हद तक कमी आने की उम्मीद है। इससे कारीगरों और बुनकरों की आजीविका सुरक्षित होगी और पीढ़ियों पुराने शिल्प को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।

 हस्तशिल्प एवं कुटीर उद्योग

वस्त्र उद्योग के अलावाहिमाचल प्रदेश विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों का केंद्र हैऔर इन सभी को जीएसटी के युक्तिकरण से लाभ हुआ है। अधिकांश हस्तशिल्प वस्तुओं पर जीएसटी 12% से घटाकर 5% कर दिया गया हैइसका राज्य भर के कारीगरों पर सीधा प्रभाव पड़ा है।

चंबा रुमाल कढ़ाई

चंबा रुमाल एक जीआई-टैग वालालघु हस्त-कढ़ाई वाला कपड़ा हैजिसे मुख्य रूप से चंबा जिले की महिला कारीगरों द्वारा बनाया जाता है। स्थानीय समूहों की सैकड़ों महिलाएँ इसके उत्पादन में शामिल हैं। अब 5% जीएसटी होने सेखरीदारों के लिए लागत कम हैजिससे इन रुमालों की माँग बढ़ सकती है। कर में कटौती शिल्प के सांस्कृतिक मूल्यों की मान्यता और विरासत कला रूपों के प्रचार का भी प्रतीक है।

चंबा चप्पलें

चंबा की पारंपरिक चमड़े की चप्पलेंसैकड़ों छोटी कुटीर शिल्प इकाइयों द्वारा निर्मित एक और जीआई-टैग्ड उत्पाद हैं। कम जीएसटी दर से इनकी कीमतें मशीन-निर्मित जूतों के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएँगी और स्वदेशी चप्पलों की बिक्री को बढ़ावा मिलेगा। इससे कारीगरों को अपना मुनाफा बढ़ाने में मदद मिलेगी।

लकड़ी के शिल्प

जटिल लकड़ी के दरवाजों और पैनलों से लेकर फर्नीचर तकनक्काशीदार लकड़ी के उत्पाद चंबाकिन्नौर और कुल्लू जैसे क्षेत्रों में बनाए जाते हैं। यह उद्योग हिमाचल प्रदेश के हजारों ग्रामीण कारीगरों को रोजगार देता है। नई जीएसटी दरों ने लकड़ी के सामानों को 5% कर की श्रेणी में डाल दिया हैजिससे स्थानीय स्तर पर बने लकड़ी के फर्नीचर और स्मृति चिन्हों की मांग बढ़ेगी। इससे न केवल ये वस्तुएं सस्ती होंगीबल्कि स्थानीय कारीगरों को भी मदद मिलेगी।

मिट्टी के बर्तन और धातु के बर्तन

हिमाचल में एक मज़बूत पारंपरिक धातु शिल्प उद्योग है और राज्य में सैकड़ों छोटी कारीगर इकाइयाँ इन शिल्पों में लगी हुई हैं। विभिन्न ज़िलों में फैलेकुशल कारीगर अनुष्ठानिक बर्तनआभूषण और मिट्टी के बर्तन बनाते हैं। 5% की संशोधित जीएसटी दरों से स्वदेशी धातु के बर्तनों और मिट्टी के बर्तनों के लिए एक अधिक अनुकूल बाज़ार बनने की उम्मीद है। इससे कारीगरों को अपने धातु के बर्तन और मिट्टी के बर्तन बेचने का बेहतर अवसर मिलेगा।

बाँस की वस्तुएँ

हिमाचल के कुछ हिस्सों में बाँस की वस्तुएँ जैसे टोकरियाँ और अन्य पर्यावरण-अनुकूल शिल्पकलाएँ बनाई जाती हैं। इस उद्योग में सैकड़ों कारीगर काम करते हैंजिनमें से कई हाशिए के समुदायों से आते हैं। इन उत्पादों परजिन पर पहले 12% कर लगता थाअब 5% से कम कर लगता है।

कारीगरों के लिएयह एक स्वागत योग्य बदलाव हैक्योंकि इससे न केवल उनके ग्राहकों के लिए कीमतें कम होंगीबल्कि यह टिकाऊपारंपरिक शिल्पकला के प्रति सरकार के समर्थन को भी दर्शाता है।

 कृषिबागवानी और संबद्ध विकास इंजन

 कृषिबागवानी और संबद्ध विकास इंजन

कृषि कई क्षेत्र-विशिष्ट उत्पादों के माध्यम से हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था को सहारा देती है जो सैकड़ों लोगों को आजीविका प्रदान करते हैं। जीएसटी सुधारों ने इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण लाभ पहुँचाए हैंजिससे न केवल सामर्थ्य बढ़ा हैबल्कि किसानों और श्रमिकों की आय में भी वृद्धि हुई है।

कांगड़ा चाय

पालमपुर और आसपास के इलाकों में स्थित अपने हरे-भरे चाय बागानों के लिए कांगड़ा को "उत्तर भारत की चाय राजधानी" के रूप में जाना जाता है। कांगड़ा में लगभग 5,900 छोटे चाय बागान हैंजहाँ बागानों और कारखानों में हज़ारों मज़दूर चाय उगाते हैं। जीआई टैग वाली यह प्रसिद्ध चाय अब जीएसटी से मुक्त हैऔर खुली चाय पर अब 0% जीएसटी लगता है। नई जीएसटी दरों ने खरीदारों के लिए खुली चाय की पत्तियों को प्रभावी रूप से सस्ता कर दिया है। इससे प्रतिस्पर्धी बाज़ारों में कांगड़ा चाय की बिक्री बढ़ेगी। इस प्रकारकर राहत के माध्यम से सरकारी सहायता न केवल परिवारों के लिए सामर्थ्य लाएगीबल्कि पारंपरिक कृषि क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने में भी मदद करेगी।

काला जीरा

काला जीरा हिमाचल प्रदेश के ऊँचाई वाले ज़िलों में उगाया जाने वाला एक सुगंधित मसाला है। अपनी विशिष्ट सुगंध और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध इस मसाले की खेती इस क्षेत्र के कुछ सौ किसान और संग्राहक करते हैं। जीएसटी में 12% से 5% की कमी से उत्पाद की कीमत कम होने की संभावना हैजिससे माँग में वृद्धि होगी। किसानों को अपनी उपज के लिए ज़्यादा ऑर्डर मिलेंगेऔर इससे खेती का विस्तार करने को प्रोत्साहन मिल सकता है।

चुल्ली तेल (खुबानी गिरी का तेल)

चुल्ली तेलहिमालयी क्षेत्र में निकाला जाने वाला एक पारंपरिक खुबानी गिरी का तेल हैजो अपने चिकित्सीय गुणों के लिए जाना जाता है। जीएसटी दर 5% तक कम होने सेइस क्षेत्र के बाहर के उपभोक्ताओं को भी यह थोड़ा सस्ता लग सकता हैजिससे इस उत्पाद की पहुँच बढ़ सकती है। कुल मिलाकरयह सैकड़ों ग्रामीण उत्पादकों को रोजगार देने वाले स्थानीय उद्योग के लिए एक सहायक कदम है।

सेब के डिब्बों की पैकेजिंग

हिमाचल प्रदेश के बागवानी उत्पादन में सेब का योगदान लगभग 80% है। शिमला और अन्य सेब क्षेत्रों में उगाया जाने वाला यह उद्योग हज़ारों सेब उत्पादकों को प्रभावित करता है। ये उत्पादक अपनी उपज को भारत भर के बाज़ारों में भेजने के लिए डिब्बोंट्रे और अन्य पैकेजिंग सामग्री पर निर्भर करते हैं। ऐसी सामग्रियों पर जीएसटी घटाकर 5% करने से इनपुट लागत कम होने की उम्मीद हैयानी सस्ते डिब्बे उपलब्ध होंगेजिससे उत्पादकों और अन्य स्थानीय पैकेजिंग आपूर्ति इकाइयों को सीधा लाभ होगा।

कृषि इनपुट

जीएसटी सुधारों ने उर्वरकों जैसे कृषि इनपुटों की दरों को घटाकर 5% कर दिया है। इससे कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा मिलेगा और कृषि दक्षता और उत्पादन में सुधार होगा। इसलिएइनपुट कीमतों पर संशोधित दरों से राज्य भर के लाखों किसानों को लाभ होगा।



औद्योगिक एवं विनिर्माण क्षेत्र

खाद्य प्रसंस्करण

हिमाचल के बद्दीबरोटीवाला और नालागढ़ स्थित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को विभिन्न प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर जीएसटी की दर घटाकर 5% करने से लाभ होगा। यह औद्योगिक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये प्रसंस्करण इकाइयाँ क्षेत्र के लगभग 10,000 लोगों को रोजगार देती हैं। खाद्य पदार्थों पर कर कम होने से खुदरा कीमतों में कमी आने की संभावना है जिससे माँग बढ़ेगी और बिक्री में वृद्धि होगी।

चिकित्सा उपकरण

हिमाचल के सोलन ज़िले में स्थित चिकित्सा उद्योगक्षेत्र के लगभग 10,000 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार प्रदान करता है। कई चिकित्सा उपकरणों पर अब 5% कर लगने से इस उद्योग को काफ़ी फ़ायदा होगा।

 अन्य उपभोक्ता वस्तुएँ

विशिष्ट उद्योगों और उत्पादक-केंद्रित बदलावों के अलावाजीएसटी सुधार औसत हिमाचली उपभोक्ता को भी राहत देते हैं। एक उल्लेखनीय बदलाव विभिन्न उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और उपकरणों पर जीएसटी को 28% से घटाकर 18% करना हैजिसका सीधा असर हिमाचल के ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है। उपभोक्ता वस्तुओं की कम कीमतों से ग्रामीण बाज़ारों में मांग बढ़ने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि छोटे शहरों के स्थानीय खुदरा विक्रेताओं की बिक्री बढ़ेगी। दरअसलइलेक्ट्रॉनिक्स पर जीएसटी में कटौती से आधुनिक सुविधाएँ थोड़ी और सस्ती हो जाएँगी।

 निष्कर्ष

जीएसटी दरों में कटौती का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था के सकारात्मक विकास और सामाजिक-आर्थिक कल्याण में दिखाई देगा। हिमाचल प्रदेश के मामले मेंये सुधार यह सुनिश्चित करेंगे कि देवभूमि भी फलते-फूलते बाज़ारों और समृद्ध आजीविकाओं की भूमि बने। राज्य के अनूठे उत्पादों को लाभ होगाचाहे वह कुल्लू का बुनकर होशिमला का सेब उत्पादक होकांगड़ा घाटी का चाय उत्पादक होया बद्दी का कारखाना श्रमिक होये सब मिलकर हिमाचल की अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धात्मकता और अवसरों में वृद्धि की ओर अग्रसर करेंगे।

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