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डाक विभाग ने ‘भारत की कठपुतलियाँ’ विषय पर 8 स्मारक डाक टिकट जारी किए, देश की समृद्ध लोक कला परंपरा को मिला सम्मान

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नई दिल्ली- डाक विभाग ने 13 फरवरी 2026 को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में “पपेट्स ऑफ इंडिया (भारत की कठपुतलियाँ)” विषय पर 8 स्मारक डाक टिकटों का विशेष सेट जारी किया। इन टिकटों का औपचारिक विमोचन डाक विभाग की सचिव सुश्री वंदिता कौल ने प्रतिष्ठित अतिथियों, कलाकारों और सांस्कृतिक जगत के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में किया।

इस अवसर पर सचिव (डाक) ने कहा कि डाक टिकट किसी भी राष्ट्र की विरासत के छोटे राजदूत होते हैं। उन्होंने कहा कि यह विशेष अंक भारत की समृद्ध और विविध कठपुतली परंपराओं का सम्मान करता है, जिन्होंने पीढ़ियों से लोककथाओं, मूल्यों और सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखा है।

भारत की प्राचीन कठपुतली परंपरा

कठपुतली कला भारत की सबसे प्राचीन और जीवंत कहानी कहने की परंपराओं में से एक है। सदियों से कठपुतली कलाकार संगीत, कथावाचन और दृश्य कला के माध्यम से महाकाव्य, लोककथाएं, नैतिक शिक्षाएं और सामाजिक संदेश प्रस्तुत करते रहे हैं।

भारत में कठपुतली कला को मुख्य रूप से चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:

  • डोरी वाली कठपुतलियाँ (String Puppets)

  • दस्ताने वाली कठपुतलियाँ (Glove Puppets)

  • छड़ी कठपुतलियाँ (Rod Puppets)

  • छाया कठपुतलियाँ (Shadow Puppets)

यह कला पारिवारिक परंपरा के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है।

देश के विभिन्न राज्यों की कठपुतली कला को दर्शाते टिकट

इस स्मारक श्रृंखला में भारत के विभिन्न राज्यों की पारंपरिक कठपुतली कला को दर्शाया गया है, जिनमें शामिल हैं:

  • कठपुतली – राजस्थान

  • यक्षगान सूत्रदा गोम्बेयट्टा – कर्नाटक

  • डांगर पुतुल – पश्चिम बंगाल

  • काठी कुंधेई – ओडिशा

  • बेनीर पुतुल – पश्चिम बंगाल

  • पावकथकली – केरल

  • रावणछाया – ओडिशा

  • टोलु बोम्मलट्टा – आंध्र प्रदेश

प्रत्येक टिकट संबंधित क्षेत्र की विशिष्ट पोशाक, शैली और प्रस्तुति कला को दर्शाता है।

डिज़ाइन और फिलेटेलिक उत्पाद

डाक टिकटों, प्रथम दिवस आवरण (FDC), ब्रोशर, मिनिएचर शीट और विशेष कैंसलेशन का डिज़ाइन संखा समंता द्वारा किया गया है। इन टिकटों के लिए कलात्मक संदर्भ और सामग्री संगीत नाटक अकादमी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दरिचा फाउंडेशन और प्रसिद्ध कठपुतली कलाकार दादी पुदुमजी द्वारा प्रदान की गई।

  • टिकट मूल्य: 500 पैसे (8 टिकटों का सेट)

  • ये टिकट और अन्य फिलेटेलिक उत्पाद देशभर के फिलेटेलिक ब्यूरो और epostoffice.gov.in पर उपलब्ध हैं।


कर्मा पर्व प्रकृति से जुड़ाव और सामूहिक आनंद का उत्सव है: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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कर्मा महोत्सव में लोक कलाकारों ने दी रंगारंग प्रस्तुतियां

नगर पंचायत भटगांव के विकास के लिए एक करोड़ रुपए की घोषणा

सूरजपुर जिले को दी 172.51 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की सौगात

रायपुर- कर्मा महोत्सव को छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक है। ऐसे आयोजन लोक पर्वों को सहेजने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। कर्मा पर्व प्रकृति से जुड़ाव, आपसी भाईचारा और सामूहिक आनंद का उत्सव है। उक्त आशय के विचार मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज सूरजपुर जिले के चुनगुड़ी में आयोजित कर्मा महोत्सव में व्यक्त किए। 

मुख्यमंत्री ने इस मौके पर 172.51 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की सौगात दी। उन्होंने चुनगुड़ी के स्कूल मैदान को मिनी स्टेडियम के रूप में विकसित करने तथा नगर पंचायत भटगांव के विकास हेतु एक करोड़ रुपये की घोषणा की। कार्यक्रम में महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और सांसद चिंतामणि महाराज ने भी सम्बोधित किया।

परंपरा, संस्कृति और उल्लास से परिपूर्ण कर्मा महोत्सव में मांदर की थाप और घुंघरुओं की झंकार के बीच पूरा क्षेत्र कर्मा नृत्य की लय में थिरक उठा। सूरजपुर, सरगुजा, जशपुर, बलरामपुर, कोरिया एवं मनेंद्रगढ़ जिलों से आए 33 कर्मा दलों के लोक कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा में कर्मा नृत्य प्रस्तुत कर सबको लोक संस्कृति के रंगों से भर दिया। 

मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम स्थल पर लगायी गई प्रदर्शनी के स्टॉलों का निरीक्षण कर नाव-जाल एवं आइस बॉक्स, आयुष्मान कार्ड, छत्तीसगढ़ महिला कोष से ऋण वितरण और महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा संचालित छह रेडी-टू-ईट ईकाइयों का शुभारंभ किया और पोषण वितरण कार्य से जुड़ी महिलाओं को शॉल-श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया। इसके अलावा महिलाओं को स्वरोजगार के लिए मुद्रा लोन, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के अंतर्गत बीमा क्लेम तथा प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत खुशियों की चाबी प्रदान की।

कार्यक्रम में विधायक भूलन सिंह मरावी, वन विकास निगम के अध्यक्ष राम सेवक पैकरा, जिला पंचायत अध्यक्ष चंद्रमणि पैकरा, उपाध्यक्ष रेखा राजलाल रजवाड़े सहित अनेक जनप्रतिनिधि सहित समस्त जिलास्तरीय अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित थे।

छत्तीसगढ़ के संस्कृति में रचा बसा है सुआ नृत्य, अंचल में मची सुआ नृत्य की धूम

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आरंग- इन दिनों अंचल के गांव-गांव में सुआ नृत्य की धूम मची है। दीपावली का पर्व पास आते ही बालिकाएं व महिलाएं घर घर व गली मोहल्ले में समूह में पहुंचकर सुआ गीत के साथ नृत्य करती है। जिसमें अनेक धार्मिक और सामाजिक संदेश परक गीत गाकर गोल घेरा में तालियों की थपोलियों बजाकर नृत्य करती है।यह नृत्य समूह में किया जाता है जिसमें किसी भी प्रकार के वाद्ययंत्रों की आवश्यकता नहीं होती।जिसमें कुछ बालिकाएं व युवतियां गीत गाती है जिसे शेष लोग दोहराती हुए नाचती है। सुआ नृत्य के समापन पर सुआ के लिए अन्न धन मांगती है।अन्न धन मिलने पर आशीर्वाद स्वरुप गीत गाकर आशीष देती है। सुआ नृत्य की परंपरा कब से चली आ रही है इसकी कोई लिखित साक्ष्य नहीं है। सुआ एक शाकाहारी पक्षी है जो हू बहू मनुष्य की आवाज निकाल सकती है। कुछ लोगों का कहना है पहले युवतियां अपनी मन की बातों को सुआ पक्षी के सामने प्रकट करती रही होंगी जो आगे चलकर गीत और बाद में नृत्य का रूप ले ली होंगी।

वहीं संस्कृति प्रेमी शिक्षक महेन्द्र पटेल का कहना है,सुआ नृत्य छत्तीसगढ़ की संस्कृति में रचा बसा है। दीपावली समीप आते ही बालिकाएं सुआ नृत्य के लिए काफी उत्साहित रहती है। बालिकाएं व महिलाएं दीपावली के साथ साथ तीजा,पोला,छेरछेरा,शरद पूर्णिमा में भी यह नृत्य विशेष रूप से की जाती है।आजकल गांव गांव में सुआ नृत्य प्रतियोगिता भी आयोजित होने लगी है। शिक्षक महेन्द्र पटेल ने बताया शनिवार को शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला चरौदा में भी बच्चों ने सुआ नृत्य कर अपने संस्कृति का स्मरण किया।




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