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सरहुल-करमा की थाप पर झूम उठा लोकरंग पर्व, लोकसंस्कृति के रंगों से सजा समापन

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पहली बार लोकरंग पर्व में दिखी सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति की मनमोहक झलक, पंथी और नाचा-गम्मत ने भी मोहा दर्शकों का मन

रायपुर- छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत को मंच प्रदान करने वाले तीन दिवसीय ‘लोकरंग पर्व’ का तीसरा एवं अंतिम दिन सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति के नाम रहा। पहली बार लोकरंग पर्व के मंच पर जशपुर अंचल के सरहुल एवं करमा नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति ने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। पारंपरिक वेशभूषा, लोकधुनों की मधुरता और कलाकारों के ऊर्जावान नृत्य ने पूरे वातावरण को उत्साह और उमंग से भर दिया।

कार्यक्रम में विजय कुमार भगत, जशपुर के दल द्वारा सरहुल एवं करमा नृत्य की प्रस्तुति दी गई। आदिवासी लोकजीवन, प्रकृति और सामुदायिक परंपराओं से जुड़े इन लोकनृत्यों ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों की सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराया। कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति, पारंपरिक लय और आकर्षक वेशभूषा ने कार्यक्रम में विशेष रंग भर दिया।

इसके साथ ही रायपुर के डॉ. रामनारायण नेताम ने आदिवासी लोकगीत एवं नृत्य की प्रस्तुति दी।  नवलदास मानिकपुरी, दुर्ग ने लोकगीत-संगीत से समां बांधा। वहीं आरती बारले, भिलाई ने पंथी नृत्य की ऊर्जापूर्ण प्रस्तुति देकर दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं। रमादत्त जोशी, रायपुर की नाचा-गम्मत की प्रस्तुति ने हास्य, मनोरंजन और लोकनाट्य के रंगों से कार्यक्रम को और जीवंत बना दिया।

लोककलाओं को मंच देना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी : डॉ. कन्नौजे

लोकरंग पर्व के समापन अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सुदूर जनजातीय अंचलों सहित राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से आए स्थानीय कलाकारों ने अपनी-अपनी लोककलाओं की शानदार प्रस्तुतियां दीं। ऐसे आयोजन कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के साथ-साथ प्रोत्साहन और सम्मानजनक मंच उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि लोकरंग पर्व जैसे सांस्कृतिक आयोजन छत्तीसगढ़ की समृद्ध और सुघर लोकसंस्कृति को सहेजने तथा उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम हैं। लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य और पारंपरिक कलाओं के माध्यम से युवा पीढ़ी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ती है। ऐसे आयोजनों से स्थानीय कलाकारों को मंच मिलने के साथ ही विलुप्त होती लोकविधाओं के संरक्षण एवं संवर्धन को भी प्रोत्साहन मिलता है।

लोकविरासत के विविध रंगों का संगम बना लोकरंग

तीन दिनों तक चले लोकरंग पर्व में छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों की लोकसंस्कृति, लोकगायन और लोकनृत्य की विविध परंपराओं को मंच मिला। अंतिम दिन सरहुल, करमा, आदिवासी लोकगीत, पंथी और नाचा-गम्मत जैसी प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविध लोकपरंपराओं में निहित है।

कार्यक्रम में संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, छत्तीसगढ़ के कवि मीर अली मीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार विजय मिश्रा, फिल्म बोर्ड की सदस्य प्रसन्ना अवस्थी तथा समाजसेवी उदयभान चौहान विशेष रूप से उपस्थित रहे।

लोकरंग पर्व का अंतिम दिन दर्शकों के लिए छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की विविधता और जीवंतता को करीब से अनुभव करने का अवसर बना। कलाकारों की प्रस्तुतियों पर दर्शकों ने तालियों के साथ उत्साहवर्धन किया। आयोजन ने एक ओर जहां लोककलाकारों को सम्मानजनक मंच उपलब्ध कराया, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं को सहेजने, संवारने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का सार्थक संदेश दिया।

लोकधुनों और लोकनृत्यों से सजा ‘लोकरंग पर्व’, भरथरी गाथा ने बांधा समां

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तीन दिवसीय आयोजन में छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं का जीवंत प्रदर्शन, नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का संदेश

रायपुर- छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति, लोकगायन और लोकनृत्य की विविध परंपराओं को संरक्षित करने और कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ‘लोकरंग पर्व’ का रविवार को रायपुर स्थित मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में भव्य शुभारंभ हुआ। 6 से 8 सितंबर तक चलने वाले इस आयोजन में प्रदेश की पारंपरिक लोकविधाओं की विविध रंगत देखने को मिल रही है।

कार्यक्रम के पहले दिन मुक्ताकाशी मंच पर छत्तीसगढ़ी लोकधुनों और पारंपरिक लोकगाथाओं ने ऐसा समां बांधा कि दर्शक लोकसंस्कृति की जीवंत दुनिया से जुड़ते नजर आए। आयोजन की शुरुआत भरथरी गाथा की प्रस्तुति से हुई। इसके बाद कलाकारों ने पंडवानी, देवार गीत और भरथरी गाथा सहित विभिन्न लोकविधाओं की प्रभावशाली प्रस्तुतियां दीं।

लोककलाओं की विविधता ने मोहा मन

लोकरंग पर्व में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकविधाओं से जुड़े कलाकारों को अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर दिया जा रहा है। आयोजन में भरथरी गाथा, देवार गीत, करमा नृत्य, सरहुल, लोरिक-चंदा, ददरिया, पंडवानी और पंथी जैसी विविध लोककलाओं की प्रस्तुतियां शामिल हैं।

पहले दिन दुर्गा साहू ने पंडवानी, पूनम तिवारी ने देवार गीत तथा अरुणिमा शर्मा ने भरथरी गाथा की भावपूर्ण प्रस्तुति दी। कलाकारों की प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ की लोकजीवन की संवेदना, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई दी।

स्थानीय कलाकारों को मंच देना आयोजन का प्रमुख उद्देश्य

कार्यक्रम के संचालक एवं संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि स्थानीय मंचों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकविधाओं से जुड़े कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है और उन्हें अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन प्रदेश की ‘सुघर’ संस्कृति, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने के साथ युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की लोककलाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनमें प्रदेश के इतिहास, सामाजिक जीवन, लोकविश्वास और सामुदायिक परंपराओं की गहरी छाप दिखाई देती है। ऐसे आयोजनों के जरिए इन परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

कला-संस्कृति प्रेमियों की रही मौजूदगी

लोकरंग पर्व के शुभारंभ अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, उपसंचालक उमेश मिश्रा, छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवि मीर अली मीर, बॉलीवुड अभिनेत्री श्वेता पड्डा , वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार विजय मिश्रा सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं कला-संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।

8 सितंबर तक जारी रहेगा लोकसंस्कृति का उत्सव

तीन दिवसीय लोकरंग पर्व 8 सितंबर तक चलेगा। आगामी दिनों में भी छत्तीसगढ़ की विभिन्न लोकविधाओं से जुड़े कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। आयोजन के माध्यम से रायपुरवासियों को प्रदेश की पारंपरिक लोककलाओं, लोकसंगीत, लोकगाथाओं और लोकनृत्यों की विविधता को करीब से देखने और सुनने का अवसर मिल रहा है।

मुक्ताकाशी मंच पर सजी यह सांस्कृतिक संध्या छत्तीसगढ़ की उस लोकपरंपरा की तस्वीर प्रस्तुत कर रही है, जिसमें माटी की महक, लोकजीवन की सहजता और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत एक साथ दिखाई देती है।

हरेली त्योहार: छत्तीसगढ़ की हरियाली, संस्कृति और किसान जीवन का उत्सव

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भारत त्योहारों और परंपराओं की भूमि है। यहां मनाया जाने वाला हर त्योहार अपने साथ एक विशेष संस्कृति, परंपरा और जीवन-मूल्य लेकर आता है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकपर्वों में हरेली का विशेष स्थान है। हरेली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, पशुधन और किसान जीवन के प्रति सम्मान प्रकट करने वाला पर्व है। यह त्योहार छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति और लोकजीवन की सुंदर तस्वीर प्रस्तुत करता है।

हरेली का अर्थ और महत्व

‘हरेली’ शब्द का संबंध हरियाली से माना जाता है। सावन के मौसम में जब खेत-खलिहान हरियाली से भर जाते हैं और प्रकृति अपने सुंदरतम रूप में दिखाई देती है, तब हरेली का पर्व मनाया जाता है। यह त्योहार किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि कृषि कार्य में तेजी आने के साथ किसान अच्छी फसल और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

हरेली हमें यह संदेश भी देती है कि मनुष्य का जीवन प्रकृति और कृषि से गहराई से जुड़ा हुआ है। खेतों में लहलहाती फसल, पेड़-पौधे, वर्षा और पशुधन ग्रामीण जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं।

कृषि उपकरणों की पूजा

हरेली के दिन किसान अपने हल, कुदाल, फावड़ा, बैल और अन्य कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं। कृषि उपकरणों को साफ करके उनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। माना जाता है कि इन उपकरणों की सहायता से किसान धरती को उपजाऊ बनाता है और पूरे समाज के लिए अन्न पैदा करता है।

इस दिन कई परिवार अपने घरों और कृषि उपकरणों पर नीम की पत्तियां भी लगाते हैं। नीम को पारंपरिक रूप से स्वास्थ्य और प्राकृतिक सुरक्षा से जोड़ा जाता है।

पशुधन का विशेष महत्व

कृषि प्रधान समाज में पशुधन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसलिए हरेली के अवसर पर गाय-बैल और अन्य पशुओं की भी देखभाल और पूजा की जाती है। उन्हें नहलाया जाता है, सजाया जाता है और विशेष भोजन दिया जाता है।

यह परंपरा हमें सिखाती है कि मनुष्य को केवल अपने हित के बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि उन पशुओं के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए जो उसके जीवन और आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बच्चों के लिए खास होता है हरेली का उत्सव

हरेली का त्योहार बच्चों और युवाओं के लिए भी बहुत उत्साह लेकर आता है। गांवों में इस अवसर पर गेड़ी चढ़ने की परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय है। बच्चे और युवा गेड़ी पर चढ़कर चलते हैं और अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।

गेड़ी केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकसंस्कृति की पहचान भी है। आज भी कई स्थानों पर हरेली के दौरान गेड़ी प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

लोकपरंपराओं और व्यंजनों की खुशबू

हरेली के अवसर पर घरों में पारंपरिक पकवान भी बनाए जाते हैं। परिवार के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और त्योहार की खुशियां साझा करते हैं। गांवों में लोकगीत, पारंपरिक खेल और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियां वातावरण को उत्सवमय बना देती हैं।

इस प्रकार हरेली केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह परिवार, समाज और समुदाय को एक-दूसरे के करीब लाने का अवसर भी बनती है।

प्रकृति संरक्षण का संदेश

आज के समय में जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण विषय बन चुका है, हरेली का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें पेड़-पौधों, मिट्टी, जल, पशुओं और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व की याद दिलाता है।

हरेली हमें प्रेरणा देती है कि हम प्रकृति का सम्मान करें, पेड़ लगाएं, जल बचाएं और पर्यावरण को स्वच्छ एवं सुरक्षित रखने में अपना योगदान दें।

छत्तीसगढ़ की पहचान है हरेली

हरेली छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान है। इस पर्व में किसान का परिश्रम, प्रकृति की सुंदरता, पशुधन के प्रति सम्मान, पारिवारिक प्रेम और लोकपरंपराओं की झलक दिखाई देती है।

समय के साथ त्योहार मनाने के तरीकों में बदलाव जरूर आया है, लेकिन हरेली की मूल भावना आज भी वही है—धरती, प्रकृति और कृषि के प्रति कृतज्ञता।

निष्कर्ष

हरेली हमें अपनी मिट्टी और अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश देती है। यह पर्व बताता है कि हमारे जीवन की खुशियां प्रकृति और किसान के परिश्रम से गहराई से जुड़ी हैं। इसलिए हरेली केवल छत्तीसगढ़ का एक लोकपर्व नहीं, बल्कि हरियाली, मेहनत, प्रकृति प्रेम और समृद्धि का उत्सव है।

हमें अपनी लोकपरंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहिए और हरेली के संदेश—प्रकृति का सम्मान करें, किसान का सम्मान करें और पर्यावरण की रक्षा करें—को अपने जीवन में अपनाना चाहिए।

विशेष लेख-छत्तीसगढ़ का लोक-पर्व: हरेली तिहार

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छत्तीसगढ़ी संस्कृति में लोक-त्योहारों की एक समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें प्रकृति, कृषि और जीव-जंतुओं के प्रति गहरा सम्मान झलकता है। इन्हीं त्योहारों में सबसे पहला और प्रमुख त्यौहार है — हरेली तिहार। सावन माह की अमावस्या (हरियाली अमावस्या) को मनाया जाने वाला यह पर्व छत्तीसगढ़ के लोक-जीवन, कृषि परंपरा और पर्यावरण-प्रेम का प्रतीक है। छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ उसकी प्रकृति नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराएँ भी हैं।

छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में पर्व और त्यौहारों की बहुलता है। प्रत्येक माह कोई न कोई त्यौहार यहाँ लोक मानस को अपने रंग में रंग लेता है। ये त्यौहार जहॉं लोक जीवन में हंसी-खुशी के अवसर उपलब्ध कराती हैं, वहीं खेल और मनोरंजन के अनुकूल साबित होते हैं। प्रकति का यह हरापन छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में भी पूरी समाहित है। हरेली, भोजली, जँवारा हो या बसंत पंचमी सभी पर्वों में प्रकृति का मनोरम और इसका अप्रतिम सौंदर्य झलकता है। इस रूप-सौंदर्य में जीवन की चारों अवस्थाओं का उल्लास और उत्साह विविध रंगों में बिखरा हुआ है।

शायद ‘हरेली’ का हरापन हमारी परंपराओं में हमारे संस्कारों में और हमारे लोक जीवन में प्राकृतिक हरीतिमा का ज्यादा एहसास कराता है। हरेली का यह हरापन सबके जीवन में बिखरे और निखरे यही कामना है। यह भी कामना है कि भौतिकता की चकाचौंध से परे हमारी खेल परंपराएँ जीवित रहे ताकि माटी से जुड़े ग्रामीणजन शारीरिक और मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ रहें। माटी की सोंधी-सोंधी महक हमारे लोक गीतो से आती रहे और खेल परंपरा की यह अविरल धारा निरंतर गतिमान रहे।

हरेली शब्द का अर्थ और महत्व

'हरेली' शब्द 'हरियाली' से बना है। सावन के महीने में जब चारों तरफ़ खेतों और मैदानों में हरी-भरी फसलें और हरियाली लहलहाने लगती है, तब किसान इस पर्व को उल्लासपूर्वक मनाते हैं। इसे छत्तीसगढ़ का पहला तिहार माना जाता है, जहाँ से राज्य के प्रमुख लोक-पर्वों की श्रृंखला शुरू होती है।

कृषि उपकरणों और पशुधन की पूजा

हरेली का दिन मुख्य रूप से कृषकों और कृषि से जुड़े साधनों का धन्यवाद ज्ञापित करने का दिन है:

•कृषि यंत्रों की पूजा:-  हरेली की जड़ें छत्तीसगढ़ क्षेत्र की कृषि विरासत में गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह एक उत्सव होने के साथ-साथ एक आध्यात्मिक भेंट भी है, लोगों के लिए प्रकृति, बारिश और अपने कृषि कार्य को सम्पन्न करने के बाद किसान अपने औजार, हल, फावड़ा, कुदाल, कुदाली, कुम्हड़ी, बिन्धना, बसुला, हथौड़ी, आरी,असिया, पैसुल, छूरा, खुर्पी आदि को धोकर स्वच्छ मिट्टी (मुरमी) का आसन से सजाकर किसान-किसानिन पूजा सामग्री रखकर धुले हुए चांवल आटे से हाथा लगाकर चन्दन, फूल, धुप-दीप व चीला रोटी से भोग लगाकर श्रीफल अर्पित करते हैं एवं भाव विभोर हो प्रार्थना करते हैं - ‘हे बलराम रूपी हल प्रचण्ड शक्ति के प्रतीक धारापति, आपने कंधा के रूप में माता को संवारा एवं सेवा करने में हमारी सहायता की कृषि कार्य बोनी ब्यासी रोपा के होते ही चहूओर हरियाली छाई इसके लिए कोटिशः धन्यवाद आपका कार्य सम्पन्न हुआ विश्राम करे। हमने आपको बड़ा कष्ट दिया, काम लिया, हमें क्षमा करें। आपकी दया हम पर सदैव बनी रहे, इसी प्रकार अन्य औजारों का कार्यानुसार निवेदन करते गेड़ी की पूजा कर शरीर के सामर्थ पैरो की रक्षा की कामना करते हैं।

•पशुधन का सत्कार: पशुधन किसानों की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में किसान मिश्रित कृषि प्रणाली अपनाते हैं, जिसमें फसल और पशुधन का संयोजन होता है। छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में लोग कम पढ़े-लिखे और अकुशल होने के कारण अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं।  बैल छत्तीसगढ़ कृषि की रीढ़ हैं। किसान, विशेषकर सीमांत और लघु किसान, जुताई, ढुलाई और उत्पादन और इनपुट दोनों के परिवहन के लिए बैलों पर निर्भर रहते हैं।

•खेती-किसानी के सच्चे साथी यानी गाय और बैलों की विशेष सेवा की जाती है। उन्हें नहला-धुलाकर आरती उतारी जाती है तथा 'गहूंता' (आटा, नमक और जड़ी-बूटी से बना पौष्टिक मिश्रण) खिलाया जाता है, ताकि वे रोगों से मुक्त रहें। जड़ी बुटियों से तैयार औषधि को गौठान में ले जाकर अन्डी एवं खम्हार के पत्तों में नमक, चावल या गेहूँ के गोला के साथ दवा डाल कर पशुओं को खिलाया जाता है। अरण्ड, खम्हार का पत्ता औषधि है, जो वायुजनित रोगों को दूर करता है। नमक उत्प्रेक्षण का कार्य करता है, चावल या गेहूँ के कारण दवा अधिक असरकारक बन जाती है। इससे पशु धन निरोग हो जाता है यह एक प्रकार टीकाकरण ही है।

परंपराएं एवं रीति-रिवाज

•गेड़ी चढ़ने का आनंद:- इस पर्व में गेंड़ी का काफी महत्व है बांस के मोटे डंडो एवं बांस के पहुये को विशेष विधि से कस कर बांधा जाता है। गेड़ी का उदारण हमें पुराणों में मिलता है। बलदाऊ-कृष्ण अपने सखाओं के साथ गेड़ी चढ़ा करते थे। कृष्ण लीला प्रसंग में इसका उदाहरण मिलता है तथा खेलों का आयोजन भी होते रहे हैं, जिसमें गेड़ी दौड़, पानी पिलाना, एक पैर में खड़े होना, एक पैर में कूदना आदि अनेक खेल का आयोजन प्राचीन काल से अब तक होते आ रहे हैं। बारिश के मौसम में कीचड़ और पानी से भरे रास्तों पर चलने के साधन के रूप में शुरू हुई यह परंपरा आज एक मनोरंजक खेल बन चुकी है। 

•विभिन्न प्रतियोगिता का आयोजन:- हरेली में गाँव व शहरों में नारियल फेंक प्रतियोगिता भी होती है। सुबह पूजा-अर्चना के बाद गाँव के चौक-चौराहों पर युवाओं की टोली जुटती है और नारियल फेंक प्रतियोगिता का आयोजन की जाती है। नारियल हारने और जीतने का यह सिलसिला देर रात तक चलता है। गाँव-गाँव में गेड़ी दौड़ का आयोजन होता है। कहीं खो-खो तो कहीं फुगड़ी, कहीं बिल्लस, कहीं अत्ती-पत्ती, डंडा पचरंगा खेल का आयोजन होते आ रहे हैं। गाँव का गौठान हो या स्कूल का मैदान, गाँव के बाहर सड़क हो या चौबट्टा लगता है सारे लोग रंग-बिरंगे परिधानों में सजे रहते हैं।

•टोटका और सुरक्षा का विधान:- मान्यतानुसार, इस दिन गाँव को बुरी नज़र और रोगों से बचाने के लिए घर के मुख्य दरवाजों पर नीम की पत्तियाँ बांधी जाती हैं। लोहार द्वारा घरों के चौखट पर नीम की शाखाएं और लोहे की कीलें लगाई जाती हैं। स्थानीय मान्यता है कि इससे घर को बुरी शक्तियों और बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। यह प्रथा नीम के ज्ञात औषधीय गुणों और ग्रामीण स्वास्थ्य संबंधी पारंपरिक मान्यताओं में इसकी भूमिका से प्रेरित है।

•हरेली तिहार में बनाए जाने वाले ब्यंजन:- मुख्य रूप से गुड़ के चीला, अईरसा, चौसेला और बोबरा जैसे पारंपरिक पकवान बनाए और बांटे जाते हैं। गुलगुला भजिया, गुड़हा चीला, सोहारी, बड़ा, ठेठरी, खुरमी और बोबरा जैसे पारंपरिक छत्तीसगढ़ी पकवान बनाए जाते हैं। इन व्यंजनों का भोग कृषि औजारों और गोधन को लगाया जाता है। इस दिन छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का विशेष आनंद लिया जाता है। 

सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश

हरेली तिहार केवल एक धार्मिक या लोक-अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानव का प्रकृति के साथ अटूट संबंध दर्शाता है। यह पर्व सिखाता है कि जो प्रकृति और पशुधन हमें जीवन और भोजन देते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा परम कर्तव्य है।आज के समय में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा हरेली पर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर और 'छत्तीसगढ़िया क्रांति' के तहत पारंपरिक खेलों (जैसे गेड़ी दौड़) को बढ़ावा देकर इस लोक-सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का सराहनीय कार्य किया जा रहा है।

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