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जैविक खेती, आधुनिक तकनीक और बेहतर बाजार व्यवस्था से बढ़ेगी किसानों की आय : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

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कुनकुरी में जैविक किसान मेला एवं प्राकृतिक खेती कार्यशाला में शामिल हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

औषधीय एवं सुगंधित फसलों के विपणन हेतु हुआ महत्वपूर्ण अनुबंध, किसानों को मिलेगा बेहतर बाजार

रायपुर- किसानों की समृद्धि ही विकसित भारत और विकसित छत्तीसगढ़ की आधारशिला है। आधुनिक कृषि तकनीकों, बेहतर फसल चयन, प्राकृतिक एवं जैविक खेती तथा सुदृढ़ बाजार व्यवस्था के माध्यम से किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसानों को समृद्ध बनाए बिना विकास का लक्ष्य पूर्ण नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज जशपुर जिले के कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, कुनकुरी में आयोजित जैविक किसान मेला एवं खेत बचाओ अभियान अंतर्गत प्राकृतिक एवं जैविक खेती कार्यशाला को संबोधित करते हुए यह बात कही। 

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की उर्वरता तथा मानव स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक एवं जैविक खेती को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि पूर्व में गोबर खाद, ढैंचा एवं अन्य हरी खादों के उपयोग से खेती अधिक टिकाऊ और भूमि अधिक उपजाऊ रहती थी। आज आवश्यकता है कि परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय कर कृषि को अधिक लाभकारी बनाया जाए।

उन्होंने कहा कि वैश्विक परिस्थितियों और उर्वरकों के आयात पर निर्भरता को देखते हुए नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे विकल्प किसानों के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। इनके उपयोग से उत्पादन लागत कम होती है और मिट्टी की गुणवत्ता भी संरक्षित रहती है।

किसानों को मिला आधुनिक तकनीकों से जुड़ने का अवसर

कार्यक्रम में किसानों को प्राकृतिक खेती, जैविक कृषि, आधुनिक कृषि यंत्रों, ड्रोन तकनीक, पशुपालन, मत्स्य पालन एवं उन्नत कृषि पद्धतियों की जानकारी दी गई। मुख्यमंत्री ने विभिन्न कृषि प्रदर्शनों का अवलोकन कर विशेषज्ञों से जानकारी प्राप्त की तथा किसानों से संवाद भी किया।

कार्यक्रम में ड्रोन के माध्यम से खेतों में दवा छिड़काव का लाइव प्रदर्शन आकर्षण का केंद्र रहा। किसानों ने आधुनिक कृषि तकनीकों को प्रत्यक्ष रूप से देखा और उनके उपयोग से होने वाले लाभों की जानकारी प्राप्त की। साथ ही कृषि नवाचारों, जैविक खेती, पशुपालन एवं मत्स्य पालन से संबंधित जीवंत प्रदर्शनी भी आयोजित की गई।

उत्कृष्ट किसानों का हुआ सम्मान

कार्यक्रम में आयोजित किसान प्रतियोगिता के अंतर्गत उत्कृष्ट कार्य करने वाले किसानों को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सम्मानित किया। ग्राम खोंगा (मनोरा) के किसान महेश सिंह को जैविक खेती के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया। ग्राम लाखाझार के किसान सुखराम को 33 किलोग्राम वजन के कटहल उत्पादन तथा ठेठेटांगर के किसान विजय भूषण को ढाई किलोग्राम वजन के आम उत्पादन के लिए सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री ने स्वामित्व योजना के तहत कृषक गुप्तेश्वर को भूमि पट्टा भी प्रदान किया।

औषधीय एवं सुगंधित फसलों को मिलेगा बेहतर बाजार

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री की उपस्थिति में जिला प्रशासन जशपुर एवं सेमिना एग्रो प्राइवेट लिमिटेड के बीच औषधीय एवं सुगंधित फसलों के विपणन के लिए महत्वपूर्ण अनुबंध किया गया। इस पहल से जिले के किसानों को अपने उत्पादों के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध होगा तथा मूल्य संवर्धन और विपणन की नई संभावनाएं विकसित होंगी। इससे किसानों की आय में वृद्धि के साथ स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

किसानों की खुशहाली सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को लाभकारी बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार किसानों से 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीद रही है तथा 21 क्विंटल प्रति एकड़ धान खरीदी की व्यवस्था लागू की गई है। सरकार बनने के तुरंत बाद किसानों को दो वर्षों का लंबित बोनस प्रदान किया गया तथा शून्य प्रतिशत ब्याज पर कृषि ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है।

बगिया दाबयुक्त सिंचाई योजना से बदलेगी खेती की तस्वीरमुख्यमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत चयनित देश की 100 प्रमुख परियोजनाओं में छत्तीसगढ़ की एकमात्र बगिया दाबयुक्त सिंचाई योजना शामिल है। लगभग 119 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना से 14 गांवों के लगभग 5 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा मिलेगी। पाइपलाइन के माध्यम से खेतों तक पानी पहुंचाने वाली इस योजना से भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता भी नहीं होगी।

उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के लिए देश के चयनित 100 जिलों में छत्तीसगढ़ के केवल तीन जिले—दंतेवाड़ा, कोरबा और जशपुर—शामिल किए गए हैं, जिससे जिले के कृषि विकास को नई गति मिलेगी।

सुशासन और डिजिटल सेवाओं से ग्रामीणों को मिल रही सुविधा

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रदेश में सुशासन को और अधिक मजबूत बनाने के लिए गुड गवर्नेंस एवं अभिसरण विभाग का गठन किया गया है। अधिकांश शासकीय कार्य अब ई-ऑफिस प्रणाली के माध्यम से संचालित हो रहे हैं तथा भ्रष्टाचार के मामलों में दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जा रही है।

उन्होंने बताया कि ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल के माध्यम से 400 से अधिक नागरिक सेवाएं उपलब्ध हैं, जिनका लाभ लोग घर बैठे प्राप्त कर रहे हैं। प्रदेश की 6 हजार ग्राम पंचायतों में अटल डिजिटल सेवा केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं, जहां ग्रामीणों को बैंकिंग एवं डिजिटल सेवाएं उपलब्ध होंगी।

मुख्यमंत्री ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 की जानकारी देते हुए कहा कि अब नागरिक अपनी शिकायतें और समस्याएं सीधे दर्ज करा सकते हैं। 24×7 संचालित इस व्यवस्था से 42 विभागों के 8 हजार से अधिक अधिकारी जुड़े हैं और प्रत्येक शिकायत के समयबद्ध निराकरण की निगरानी की जा रही है।

कार्यक्रम में पत्थलगांव विधायक एवं सरगुजा आदिवासी विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष गोमती साय, जशपुर विधायक रायमुनी भगत, अध्यक्ष छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार मंडल रामप्रताप सिंह, छत्तीसगढ़ राज्य अंत्यावसायी सहकारी वित्त एवं विकास निगम के अध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार बेसरा, जिला पंचायत अध्यक्ष सालिक साय, जिला पंचायत उपाध्यक्ष शौर्य प्रताप सिंह जूदेव,  नगर पालिका जशपुर के उपाध्यक्ष यशप्रतापसिंह जूदेव सहित बड़ी संख्या में किसान, जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।

छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय आम महोत्सव का शुभारंभ, मैंगो टूरिज्म और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा पर जोर

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भारतीय संस्कृति, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है आम 

छत्तीसगढ़ में मैंगों टूरिज्म की है अपार संभावनाएं - रमेन डेका

रायपुर- आम केवल एक फल नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। किसानों को पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाकर आम उत्पादों को बडे रूप में विकसित करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।

राज्यपाल रमेन डेका आज इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में आयोजित राष्ट्रीय आम महोत्सव के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समारोह की अध्यक्षता मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने की।

राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि भारत विश्व में आम उत्पादन में अग्रणी है और देश में एक हजार से अधिक किस्मों के आम पाए जाते है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के स्थानीय आमों की विशेषताओें का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदेश के किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों के उत्पादन से अपनी अलग पहचान बनानी चाहिए।

राज्यपाल ने कहा कि इस प्रकार की प्रदर्शनियां और महोत्सव देश के विभिन्न राज्यों से आए आम उत्पादकों को एक-दूसरे की उन्नत खेती पद्धतियों, नई किस्मों और नवाचारों की जानकारी प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि बस्तर, कोण्डागांव, कांकेर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में आम उत्पादन की बहुत संभावनाएं है। महिला स्व-सहायता समूहों के लिए भी इस क्षेत्र में रोजगार और उद्यमिता के व्यापक अवसर मौजूद है। मैंगों टूरिज्म की भी छत्तीसगढ़ में अपार संभावनाएं है।

राज्यपाल ने कहा कि आम उत्पादन के साथ-साथ इसके वैल्यू एडिशन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसके लिए कृषि विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम को मिलकर कार्य करना चाहिए। डेका ने कहा कि हमारे जीवन को ईको फैंडली बनाना आज की आवश्यकता है। जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न उपायों को अपनाना होगा। उन्होंने एक पेड़ मां के नाम पर लगाने और रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर विशेष जोर दिया। 

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि आम फलों का राजा है। आम की पत्तियों और लकड़ियों का भी हमारे जीवन में अत्यधिक महत्व है। हमारे घरों में मांगलिक कार्य होने पर हम आम की पत्तियों से तोरण बनाते है एवं आम की सूखी लकड़ियों का उपयोग हवन एवं पूजा में करते है।

इस महोत्सव में 250 से अधिक किस्मों के आम प्रदर्शित किए गए है। मुख्यमंत्री साय ने प्रदेशवासियोें को इस महोत्सव का लाभ लेने हेतु प्रेरित किया। प्रदर्शनी मे बेर के आकार से लेकर बीजापुर के हाथीझुल जैसे बड़े किस्मों के आम भी उपलब्ध है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी के मंशानुरूप किसानों की आय दुगुनी करने के लिए राज्य सरकार प्रतिबद्ध है और आम की खेती भी इस संकल्प को पूरा करने के लिए सहायक सिद्ध होगी।

आम महोत्सव के उद्घाटन पश्चात राज्यपाल डेका और मुख्यमंत्री साय ने आम उत्पादकों द्वारा लगाए गए प्रदर्शनी में आम के विभिन्न किस्मों का अवलोकन किया । 

इस अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम के अध्यक्ष चंद्रहास चंद्राकर, छत्तीसगढ़ राज्य कृषक कल्याण परिषद के अध्यक्ष सुरेश चंद्रवंशी एवं इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल, निदेशक अनुसंधान सेवाएं डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी सहित अन्य विश्वविद्यालयों के कुलपति, अधिष्ठाता, प्राध्यापकगण, किसान एवं बड़ी संख्या में दर्शकगण उपस्थित थे।

जशपुर की नाशपाती से बढ़ रही किसानों की आमदनी, 3,500 से अधिक कृषक जुड़े फल उत्पादन से

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3500 हेक्टेयर में हो रही नाशपाती की खेती, देश के कई राज्यों में है जशपुर की नाशपाती की मांग

एक एकड़ से किसानों को हो रही 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है। जशपुर जिले के किसान नाशपाती की खेती के माध्यम से उल्लेखनीय आय अर्जित कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। प्राकृतिक रूप से अनुकूल जलवायु और उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन के कारण जशपुर आज राज्य के प्रमुख नाशपाती उत्पादक जिलों में शामिल हो चुका है।

जशपुर जिले में लगभग 3,500 से अधिक किसान करीब 3,500 हेक्टेयर क्षेत्र में नाशपाती की खेती कर रहे हैं। जिले में प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख 75 हजार क्विंटल नाशपाती का उत्पादन हो रहा है। इससे हजारों कृषक परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और जिले की पहचान फल उत्पादन के क्षेत्र में लगातार मजबूत हो रही है।

जशपुर की नाशपाती स्वाद, गुणवत्ता और आकर्षक आकार के कारण देश के विभिन्न राज्यों में विशेष रूप से पसंद की जाती है। जिले के सन्ना, पंडरापाठ, कंवई, महुआ, सोनक्यारी, मनोरा, धवईपाई और गीधा जैसे क्षेत्रों से नाशपाती की खेप दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडिशा सहित अन्य राज्यों में भेजी जाती है। फल को सावधानीपूर्वक कैरेट में पैक कर बाजारों तक पहुंचाया जाता है।

नाशपाती की खेती किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है। एक एकड़ क्षेत्र से किसानों को औसतन 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और किसान आधुनिक उद्यानिकी की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।

उद्यानिकी विभाग तथा नाबार्ड के सहयोग से किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, पौधरोपण, बागवानी प्रबंधन और विपणन संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत नाशपाती क्षेत्र विस्तार योजना संचालित की जा रही है, जिसके माध्यम से किसानों को अनुदान एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल से जशपुर जिले में उद्यानिकी आधारित कृषि को नई दिशा मिली है। नाशपाती की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि जशपुर को राज्य के एक उभरते हुए फल उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित कर रही है।

उत्तर क्षेत्र कृषि सम्मेलन: किसानों की आय बढ़ाने और क्षेत्रीय कृषि विकास पर जोर

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लखनऊ में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा आयोजित उत्तर क्षेत्र कृषि सम्मेलन में कृषि क्षेत्र के लिए नई दिशा, ठोस कार्ययोजना और किसान-केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया। सम्मेलन में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई राज्यों के कृषि मंत्रियों और अधिकारियों ने भाग लिया।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि कृषि विकास का अगला चरण तभी सफल होगा जब वैज्ञानिक शोध सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचे और सरकारी योजनाओं का लाभ छोटे किसानों को प्रभावी ढंग से मिले। साथ ही, प्रत्येक राज्य को अपनी भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के अनुसार स्पष्ट कृषि रोडमैप तैयार करने की आवश्यकता बताई गई।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अब एक ही राष्ट्रीय बैठक के बजाय क्षेत्रीय (जोनल) सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे स्थानीय समस्याओं और संभावनाओं पर गहराई से चर्चा संभव हो रही है। उन्होंने उत्तर भारत के राज्यों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पंजाब और हरियाणा हरित क्रांति के अग्रणी रहे हैं, जबकि उत्तर प्रदेश खाद्यान्न उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और पर्वतीय राज्यों में बागवानी की अपार संभावनाएं हैं।

उन्होंने देश के सामने तीन प्रमुख लक्ष्य रखे—खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, किसानों की आय बढ़ाना और पोषक आहार उपलब्ध कराना। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उत्पादन बढ़ाने, लागत घटाने, उचित मूल्य दिलाने और कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।

सम्मेलन में उर्वरकों के बढ़ते उपयोग पर चिंता जताते हुए संतुलित खाद के प्रयोग, मिट्टी की सेहत सुधारने और प्राकृतिक खेती को अपनाने की बात कही गई। साथ ही नकली बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरूरत पर भी बल दिया गया।

कृषि में गुणवत्ता वाले बीजों के महत्व को रेखांकित करते हुए बदलते मौसम और कम वर्षा की स्थिति के अनुसार खेती की योजना बनाने की आवश्यकता बताई गई। इसके अलावा किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड और किसान आईडी को सुविधाजनक साधन बताते हुए इनके विस्तार पर जोर दिया गया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्षेत्रीय कृषि सम्मेलनों को व्यावहारिक और परिणामोन्मुखी पहल बताया। उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से वैज्ञानिकों और किसानों के बीच संवाद बढ़ा है, जिससे नई तकनीकों का बेहतर उपयोग हो रहा है। उन्होंने कृषि को उत्पादन तक सीमित न रखते हुए आय बढ़ाने, लागत घटाने और बाजार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

सम्मेलन में एकीकृत खेती (इंटीग्रेटेड फार्मिंग) को छोटे किसानों के लिए लाभकारी बताते हुए पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और बागवानी जैसे क्षेत्रों में विस्तार की सलाह दी गई। साथ ही कृषि को खाद्य प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ने पर भी जोर दिया गया।

यह सम्मेलन खरीफ और रबी सीजन के लिए साझा रणनीति तैयार करने का महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ, जिसमें वैज्ञानिकों, प्रगतिशील किसानों और विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने मिलकर कृषि विकास के लिए सामूहिक संकल्प व्यक्त किया।

PMMSY के तहत सिरसा में खारे पानी की झींगा पालन क्लस्टर की समीक्षा, किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

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सिरसा (हरियाणा)- भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने आज हरियाणा के सिरसा जिले का दौरा कर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत विकसित खारे पानी (Saline Water) एक्वाकल्चर क्लस्टर की प्रगति की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने झींगा (श्रिम्प) और मछली किसानों से संवाद कर जमीनी स्तर पर आने वाली समस्याओं और चुनौतियों को समझा।

डॉ. लिखी ने किसानों को संबोधित करते हुए तकनीक आधारित झींगा पालन, वैज्ञानिक तालाब प्रबंधन और मजबूत बायो-सिक्योरिटी उपायों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सिरसा जैसे खारे पानी वाले क्षेत्र झींगा पालन के लिए बेहद उपयुक्त हैं और इससे किसानों की आय में विविधता, रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। उन्होंने MPEDA को किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन देने और निर्यात से जोड़ने के निर्देश भी दिए। साथ ही, स्थानीय स्तर पर परीक्षण किट की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर बल दिया गया ताकि किसानों को दूर नहीं जाना पड़े।

चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय (CDLU) में आयोजित एक समीक्षा बैठक में PMMSY के तहत क्लस्टर आधारित मत्स्य विकास योजनाओं की प्रगति पर चर्चा की गई। इस बैठक में केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी, ICAR के वैज्ञानिक, NABARD, NFDB, MPEDA, मत्स्य किसान, सहकारी संस्थाएं और देशभर के प्रतिनिधि शामिल हुए। 500 से अधिक प्रतिभागियों ने बैठक में हिस्सा लिया। किसानों ने इस दौरान बिजली की ऊंची लागत, गुणवत्तापूर्ण बीज की कमी और पानी की उपलब्धता जैसी समस्याएं उठाईं और पंचायत भूमि को स्वयं सहायता समूहों को लीज पर देने की मांग की।

डॉ. लिखी ने सिरसा के रघुआना गांव में PMMSY के तहत विकसित एक सफल झींगा फार्म का भी दौरा किया। करीब 3 हेक्टेयर में फैले 7 तालाबों वाले इस फार्म से सालाना 28 टन उत्पादन हो रहा है, जिससे लगभग ₹90 लाख का कारोबार और स्थानीय रोजगार सृजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि झींगा पालन के विस्तार के लिए बेहतर बीज, फीड, बुनियादी ढांचा और बाजार तक पहुंच को मजबूत करना जरूरी है।

हरियाणा ने PMMSY के तहत उल्लेखनीय प्रगति की है, जहां ₹760.88 करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ है। राज्य में 456 RAS और बायोफ्लॉक सिस्टम स्थापित किए गए हैं, जबकि 3,766 हेक्टेयर तालाब और 2,204 हेक्टेयर खारे क्षेत्र में विकास कार्य किए जा रहे हैं। इसके अलावा, सिरसा में ₹110 करोड़ का एकीकृत एक्वापार्क स्थापित किया जा रहा है और कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित किया जा रहा है।

भारत का झींगा निर्यात समुद्री उत्पादों का प्रमुख हिस्सा है, जो कुल निर्यात का लगभग 69% है। देश का समुद्री निर्यात पिछले दशक में दोगुना होकर ₹62,408 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें झींगा का योगदान ₹43,334 करोड़ है।

देश में 34 मत्स्य क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें सिरसा का खारा पानी क्लस्टर एक प्रमुख उदाहरण है। यह क्लस्टर झींगा, स्कैम्पी और सीबास जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के जरिए किसानों की आय बढ़ाने, रोजगार सृजन और संसाधनों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा दे रहा है।

भारत का अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है, जो कुल उत्पादन का 75% योगदान देता है। 2013-14 से 2024-25 के बीच उत्पादन 61 लाख टन से बढ़कर 153 लाख टन हो गया है। देश के विशाल जल संसाधनों को देखते हुए मत्स्य पालन क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं हैं, जिसे सरकार प्राथमिकता दे रही है।

निष्कर्ष: सिरसा का यह मॉडल दर्शाता है कि सही नीति, तकनीक और सहयोग के जरिए खारे और अनुपयोगी क्षेत्रों को भी आय और रोजगार के मजबूत स्रोत में बदला जा सकता है।

केंद्रीय बजट 2026 में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र को बड़ी प्राथमिकता: ग्रामीण आजीविका और किसानों की आय बढ़ाने पर ज़ोर

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केंद्रीय बजट 2026 में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र को विशेष महत्व दिया गया है, जिससे सरकार की ग्रामीण आजीविका को सशक्त करने, किसानों की आय बढ़ाने और पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था के सतत विकास के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है। बजट के प्रावधानों का मुख्य फोकस उत्पादकता बढ़ाने, पशु स्वास्थ्य सुधारने और पूरे पशुधन मूल्य श्रृंखला में आधारभूत ढांचे को मज़बूत करने पर है।

उत्पादकता और पशु स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान

बजट में नस्ल सुधार कार्यक्रमों, पशु चिकित्सा सेवाओं के विस्तार और रोग रोकथाम पहलों के लिए अतिरिक्त समर्थन का प्रावधान किया गया है। इससे किसानों की अमूल्य पशुधन संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।

डेयरी क्षेत्र को मज़बूती

डेयरी क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिए दूध संग्रहण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) से जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास पर ज़ोर दिया गया है। साथ ही, डेयरी सहकारी संस्थाओं और पशुधन किसान उत्पादक संगठनों (LFPOs) को विशेष सहयोग देने की बात कही गई है।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम

“आत्मनिर्भर भारत” के विज़न के अनुरूप बजट में पशुपालन क्षेत्र में नवाचार, तकनीक के उपयोग और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है। चारा विकास, फीड सुरक्षा और जलवायु-सहिष्णु पशुपालन प्रथाओं पर केंद्रित पहलें इस क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करेंगी।

रोजगार और पोषण सुरक्षा

बजट 2026 में पशुपालन और डेयरी पर बढ़ा हुआ फोकस रोजगार सृजन, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगा। विभाग ने राज्यों और सभी हितधारकों के साथ मिलकर इन पहलों के प्रभावी क्रियान्वयन का संकल्प दोहराया है।

बजट की प्रमुख घोषणाएँ

1. प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण

पशुधन क्षेत्र कृषि आय में लगभग 16% योगदान देता है, जिसमें गरीब और सीमांत परिवारों की आय भी शामिल है। पशु चिकित्सकों की संख्या 20,000 से अधिक करने के लिए क्रेडिट-लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी योजना शुरू करने का प्रस्ताव है। इसके तहत निजी क्षेत्र में पशु चिकित्सा व पैरा-वेटरनरी कॉलेज, पशु अस्पताल, डायग्नोस्टिक लैब और प्रजनन केंद्र स्थापित किए जाएंगे। भारतीय और विदेशी संस्थानों के बीच सहयोग को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

2. पशुपालन उद्यमिता के लिए क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी

बजट 2026-27 में पशुपालन उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी योजना प्रस्तावित है। इससे पशुपालक, डेयरी और पोल्ट्री उद्यम आधुनिक उपकरण अपनाकर उत्पादकता बढ़ा सकेंगे और ग्रामीण क्षेत्रों में मज़बूत मूल्य श्रृंखलाएँ विकसित होंगी।

3. 20,000 पशु चिकित्सकों का प्रशिक्षण

देशभर में पशु चिकित्सा सेवाओं को मज़बूत करने के लिए 20,000 पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई गई है, जिससे डायग्नोस्टिक्स और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा।

4. ग्रामीण और संबद्ध कृषि पर व्यापक फोकस

  • पशुधन, डेयरी और पोल्ट्री मूल्य श्रृंखलाओं का आधुनिकीकरण और विस्तार

  • AI आधारित कृषि उपकरण, जैसे “भारत विस्तार” प्लेटफॉर्म, जिससे डेयरी और पशुपालकों को बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी

  • डेयरी और पशुपालन किसानों के लिए ऋण और उद्यमिता समर्थन, ताकि ग्रामीण आय में विविधता लाई जा सके

कुल मिलाकर, केंद्रीय बजट 2026 पशुपालन और डेयरी क्षेत्र को विकास की नई ऊँचाइयों पर ले जाने की दिशा में एक मजबूत और दूरदर्शी कदम साबित होगा।

धान से हटकर समृद्धि की राह: जेवरा के किसान दिलीप सिन्हा ने दलहन-तिलहन से कमाए 25 लाख रुपये

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फसल विविधीकरण की प्रेरक कहानी — कम पानी, कम लागत और अधिक लाभ का सफल मॉडल

रायपुर- जिला बेमेतरा के ग्राम जेवरा के प्रगतिशील कृषक दिलीप सिन्हा ने ग्रीष्मकालीन धान की परंपरागत खेती को छोड़कर दलहन-तिलहन फसलों को अपनाकर कृषि क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम की है। वैज्ञानिक खेती, सही फसल चयन और बाजार की समझ के बल पर उन्होंने लगभग 25 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया है।

क्षेत्र में वर्षों से ग्रीष्मकालीन धान की खेती प्रचलित रही है, जिसमें अधिक पानी, बिजली, उर्वरक और श्रम की आवश्यकता होती है। बढ़ती लागत और घटते मुनाफे को देखते हुए सिन्हा ने खेती के स्वरूप में बदलाव का साहसिक निर्णय लिया।

दलहन-तिलहन की ओर कदम

कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में उन्होंने ग्रीष्म ऋतु में धान के स्थान पर मूंग और उड़द (दलहन) तथा सरसों और तिल (तिलहन) की खेती शुरू की। इन फसलों की विशेषता रही — कम पानी में अच्छी पैदावार, कम लागत, रोग-कीट प्रकोप कम और बाजार में बेहतर मूल्य। साथ ही दलहनी फसलों से मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार हुआ।

वैज्ञानिक तकनीकों का प्रभाव

उन्नत किस्मों का चयन, बीज उपचार, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, ड्रिप व स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीक, समय पर निराई-गुड़ाई, फसल सुरक्षा तथा उत्पादन के बाद उचित भंडारण और विपणन ने उनकी सफलता को और मजबूत किया। इन उपायों से जहां लागत में उल्लेखनीय कमी आई, वहीं उत्पादन और आय में भी बड़ा इजाफा हुआ। दिलीप सिन्हा की यह सफलता कहानी दर्शाती है कि फसल विविधीकरण और वैज्ञानिक खेती अपनाकर किसान कम संसाधनों में भी अधिक लाभ कमा सकते हैं। धान के विकल्प के रूप में दलहन-तिलहन की खेती न केवल आर्थिक रूप से फायदेमंद है, बल्कि जल संरक्षण, मिट्टी सुधार और टिकाऊ कृषि की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

धमतरी में रिकॉर्ड रफ्तार से धान खरीदी,किसानों को 409 करोड़ का हुआ भुगतान

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खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 के अंतर्गत धमतरी जिले में समर्थन मूल्य पर धान उपार्जन एवं कस्टम मिलिंग कार्य तेजी और पारदर्शिता के साथ जारी है। प्रशासन की सतत मॉनिटरिंग और व्यवस्थित व्यवस्था के कारण किसानों को सुगम, पारदर्शी और त्वरित सेवाएँ मिल रही हैं।

जिले में 10 दिसंबर तक 1,72,568.60 मी.टन धान खरीदा गया है, जिसके एवज में किसानों को 409.32 करोड़ रुपये का त्वरित भुगतान किया गया है। कुल 37,084 किसानों द्वारा धान विक्रय किए जाने से कृषि समुदाय को मजबूत आर्थिक संबल मिला है।

कस्टम मिलिंग में भी तेज प्रगति

कस्टम मिलिंग हेतु 5,52,336 मी.टन धान की अनुमति प्रदान की गई है, जिनमें से 4,54,272 मी.टन का अनुबंध मिलर्स से किया जा चुका है। अब तक 19,611 मी.टन धान का डी.ओ. जारी होने के साथ समितियों से 7,966 मी.टन धान का उठाव भी पूर्ण किया गया है। समितियों में 1,64,602.60 मी.टन धान शेष है, जिसके त्वरित उठाव के निर्देश दिए गए हैं।

टोकन सिस्टम से पारदर्शी खरीदी

टोकन आधारित व्यवस्था ने खरीदी प्रक्रिया को अधिक सुचारू बनाया है। 10 दिसंबर तक 17,134 टोकन जारी किए गए, जिनसे 1,34,59.92 क्विंटल धान का उपार्जन दर्ज हुआ। इसी अवधि में 3,133 कृषकों ने 86.53 हेक्टेयर रकबे से धान बेचा है। लंबित आवेदन केवल 7 हैं, जिनका शीघ्र निराकरण किया जा रहा है।

अवैध परिवहन पर सख्ती

प्रशासन द्वारा अवैध धान परिवहन के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जा रही है। अब तक 3,652.40 क्विंटल धान एवं 02 वाहन जप्त किए गए हैं, जिनकी कुल कीमत लगभग 28 लाख रुपये आँकी गई है।

फोटो अपलोड एवं सत्यापन 99.68% पूर्ण

धान बेचने वाले 3,133 किसानों में से 3,123 किसानों ने फोटो अपलोड कर दिया है, जो 99.68 प्रतिशत उपलब्धि दर्शाता है।

कृषक श्रेणीवार प्रगति

जिले में सीमांत, लघु और दीर्घ श्रेणी सहित 37,084 किसानों ने धान बेचा है। पंजीकृत 74,611 किसानों में से 18,768 किसानों ने अब तक विक्रय किया है। शेष किसानों को निर्धारित तारीखों के अनुसार टोकन के माध्यम से बुलाया जाएगा।

कमांड सेंटर से की जा रही है सतत निगरानी

कलेक्टर के निर्देशन में कमांड सेंटर द्वारा धान उपार्जन, रकबा समर्पण, शिकायत निवारण और फोटो सत्यापन की निरंतर समीक्षा की जा रही है। प्रशासन का लक्ष्य है कि प्रत्येक पात्र किसान को समय पर टोकन उपलब्ध कराया जाए, खरीदी बिना किसी बाधा के हो और भुगतान शीघ्र किसानों के खातों में पहुँचे। धमतरी जिले में धान खरीदी कार्य पूरी तरह पारदर्शी, व्यवस्थित और किसानहित में निर्बाध रूप से प्रगति पर है।

किसानों के लिए आय में वृद्धि का नया अध्याय पीएम-आशा योजना

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रायपुर- प्रधानमंत्री-अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) योजना के तहत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दलहन एवं तिलहन आत्मनिर्भरता मिशन की शुरुआत की गई,  जिससे किसानों की आय बढ़ाने और दाल उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य है। योजना का उद्देश्य कृषकों से दलहनी तथा तिलहनी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य पर क्रय करना है।

दालों के उत्पादन को बढ़ाकर  किसानों की आमदनी को है बढ़ाना

प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम.आशा) एक व्यापक सरकारी योजना है जिसका उद्देश्य किसानों को उनकी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सुनिश्चित करके लाभकारी मूल्य दिलाना है। इसमें तीन मुख्य घटक शामिल हैं: मूल्य समर्थन योजना (PSS), मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF), और मूल्य घाटा भुगतान योजना (PDPS) है । इसका मुख्य लक्ष्य किसानों की आय को बढ़ाना और उनकी आय के संरक्षण की दिशा में काम करना है। इस योजनांतर्गत राज्य में उत्पादित किये जाने वाली अरहर, उड़द एवं मसूर का शत् प्रतिशत उपार्जन तथा शेष फसलों यथा मूंगफली, सोयाबीन, मूंग, चना, सरसों का राज्य के उत्पादन का 25 प्रतिशत उपार्जन केन्द्र सरकार द्वारा अपनी प्रापण संस्थाओं (प्रोक्योरमेंट एजेंसीज) नाफेड तथा एनसीसीएफ के माध्यम से किया जायेगा। सबसे खास बात यह है कि सरकार न केवल दालों के उत्पादन को बढ़ाकर देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है, बल्कि किसानों की आमदनी को बढ़ाना चाहती है। 

किसानों की आर्थिक सुरक्षा को सशक्त करने की दिशा में एक ठोस कदम

सरकार चाहती है कि दाल उगाने वाले किसानों को उनकी मेहनत का पूरा पैसा मिले और उनकी फसल की समय पर खरीद की जा सके। इसी दिशा में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) शुरू किया गया है, जो किसानों की आर्थिक सुरक्षा को सशक्त करने की दिशा में एक ठोस कदम है। इसके तहत किसानों की फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदी की जाएगी। 

बलौदाबाजार जिले में 5 उपार्जन केन्द्र

पीएम-आशा के अंतर्गत प्राइस सपोर्ट स्कीम (पीएसएस) के तहत जिले में 5 उपार्जन केन्द्रों  विकासखंड बलौदाबाजार जिले में प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति बलौदाबाजार, विकासखंड पलारी में प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति अमेरा, विकासखंड भाटापारा में प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति धुर्राबांधा, विकासखंड कसडोल में प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति कसडोल, विकासखंड सिमगा में प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति सिमगा का नाम शासन द्वारा अधिसूचित किया गया है। 

उपज विक्रय के लिए इच्छुक किसान को अपना पंजीयन एकीकृत किसान पोर्टल पर होगा करना  

योजनांतर्गत उपज विक्रय हेतु इच्छुक कृषक को अपना पंजीयन एकीकृत किसान पोर्टल पर कराना तथा समीपस्थ उपार्जन केन्द्र संबंधित का उल्लेख करना अनिवार्य है। पंजीयन के दौरान चिन्हित उपार्जन केन्द्र के चयन द्वारा विपणन किया जा सकता है। प्रत्येक अधिसूचित फसल की उपार्जन अवधि 90 दिवस निर्धारित होती है। इस योजना के माध्यम से न सिर्फ कृषक द्वारा उसके उत्पाद का उचित मूल्य पर विक्रय किया जा सकता है अपितु प्रतिस्पर्धा विकास के द्वारा बाजार में उपज का अधिक मूल्य भी प्राप्त हो सकता है। यह समस्त स्थिति फसल विविधिकरण के लिए अनुकूल परिस्थितियों निर्मित करने में भी सहायक हो सकती है।

लाख पालन बना ग्रामीण समृद्धि का आधार, किसानों की आमदनी में आई क्रांतिकारी बढ़ोतरी

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 वनमंडल की पहल से पलाश पेड़ बने आजीविका का स्तंभ, 37 गाँवों के 400 किसान जुड़े

रायपुर-छत्तीसगढ़ में पलाश पेड़ों की भरमार है। पलाश पेड़ जिसे छत्तीसगढ़ी में परसा कहा जाता है, वो खेतों के मेड़ों में अक्सर पाए जाते हैं। इसके बावजूद इसका कोई व्यावसायिक उपयोग नहीं हो पा रहा था। परंतु अब मनेंद्रगढ़ वनमंडल ने इस दिशा में एक अनूठी पहल की है। पलाश के पेड़ लाख पालन के लिए अत्यंत उपयुक्त होते हैं क्योंकि इनमें रंगीनी लाख का पालन किया जा सकता है। अगर इन पलाश के पेड़ों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह किसानों को खेती के अलावा अतिरिक्त आय का साधन प्रदान कर सकता है। 

लाख पालन से बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था

मनेंद्रगढ़ जिले के गांवों में पलाश पेड़ों की पर्याप्त उपलब्धता है। यहां पूर्व में लाख पालन कार्य होता रहा है, लेकिन समय के साथ मौसम की प्रतिकूलता और वैज्ञानिक पद्धतियों के अभाव में यह कार्य बंद हो गया था। ग्रामीणों से चर्चा करने पर ग्राम भौता, नारायणपुर, छिपछिपी और बुंदेली के कृषकों ने लाख पालन के प्रति गहरी उत्सुकता दिखाई। इस उत्साह को देखते हुए अक्टूबर-नवंबर 2023-24 में पहली बार भौता समिति के अंतर्गत भौता, नारायणपुर, छिपछिपी और बुंदेली गांवों में तथा जनकपुर के चांटी और जरडोल गांव के आसपास के क्षेत्रों में 34 कृषकों को 2.54 क्विंटल लाख बीहन (बीज) वितरित किए गए, जिनका 276 पेड़ों में संचरण कराया गया। इसके पश्चात जून-जुलाई 2024-25 में भौता और बेलबहरा समितियों के तीन ग्रामों में 0.74 क्विंटल बीहन 4 कृषकों के 80 पेड़ों में लगवाया गया।

जिले की हर गांव में फैल रही लाख की लहर

अक्टूबर 2024-25 में 5 प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों ने भौता, बेलबहरा, माड़ीसरई, जनकपुर और जनुवा के अंतर्गत 9 ग्रामों के 126 कृषकों ने 3117 पलाश पेड़ों में बीहन लाख का संचरण किया। इसके बाद जुलाई 2025 में 10 प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों के 27 ग्रामों के 205 कृषकों द्वारा 2037 पलाश पेड़ों में 25.50 क्विंटल बीहन लाख का संचरण किया गया, जिसमें से 20.45 क्विंटल बीहन लाख जिले के ही कृषकों द्वारा उत्पादित किया गया, जबकि शेष 4.05 क्विंटल बलरामपुर से लाया गया। अक्टूबर 2025 तक यह प्रयास और बड़ा रूप ले चुका था, अब 37 ग्रामों के 400 कृषकों ने कुल 6 हजार पेड़ों में 60 क्विंटल बीहन लाख का संचरण किया। गौर करने योग्य बात यह है कि इस बार संपूर्ण बीहन लाख का उत्पादन मनेंद्रगढ़ के ही किसानों ने किया।

मनेंद्रगढ़ बनेगा छत्तीसगढ़ का लाख हब

इस अभियान का लक्ष्य हर वर्ष उत्पादन को तीन गुना बढ़ाना है, जिससे अगले वर्ष तक यह पूरे ज़िले में फैल जाएगा। लाख पालन की सबसे बड़ी चुनौती बीहन लाख की उपलब्धता होती है, क्योंकि इसे दूसरे क्षेत्रों से लाकर लगाना कठिन कार्य है। लेकिन जिस गति से मनेंद्रगढ़ लाख उत्पादन में आगे बढ़ रहा है, भविष्य में यह संभव है कि पूरे छत्तीसगढ़ को बीहन लाख की सप्लाई यहीं से हो। वर्तमान में लाख उत्पादन में झारखंड पहले और छत्तीसगढ़ दूसरे स्थान पर है, वहीं छत्तीसगढ़ में मनेंद्रगढ़ जिला इस क्षेत्र में पहले स्थान पर है।

लाख से बढ़ता मुनाफा और आत्मनिर्भर किसान

अगर इसका कॉस्ट- बेनिफिट एनालिसिस देखा जाए, तो जितना लाख बीज के रूप में पेड़ों में लगाया जाता है, उसका लगभग 2.5 गुना तक उत्पादन हो जाता है। इसका मतलब है कि किसानों को लगभग डेढ़ गुना का शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। कई किसान इस पहल से 30 से 40 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।

सफलता की मिसाल बनी - केस स्टडी

प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति भौता के ग्राम छिपछिपी के कृषक सर्वजीत सिंह ने 2023 के अक्टूबर-नवंबर में 40 किलो बीहन 45 वृक्षों में लगाया, जिसकी लागत 10,000 रुपए थी। 2024 के अक्टूबर-नवंबर में उन्होंने 150 किलो बीहन लाख 37,500 रुपए में बेचा और 2025 के जुलाई में 125 किलो लाख 31,250 रुपये में बेचा। दो साल में उनका कुल नेट प्रॉफिट 58,000 रुपए रहा। इसी प्रकार समिति भौता के ग्राम नारायणपुर के कृषक उदयनारायण ने 2024 के अक्टूबर-नवंबर में 60 किलो बीहन 70 वृक्षों में 15,000 रुपये की लागत से लगाया और 2025 के जुलाई में 150 किलो बीहन लाख 37,500 रुपये में विक्रय किया। एक वर्ष में ही उन्होंने 22,500 रुपए का नेट प्रॉफिट कमाया।


राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं मधु मिशन (NBHM): ‘मीठी क्रांति’ की दिशा में भारत की अग्रणी पहल

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परिचय

राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं मधु मिशन (National Beekeeping and Honey Mission – NBHM) एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना (Central Sector Scheme) है, जिसे भारत सरकार ने वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन के समग्र विकास और गुणवत्तापूर्ण शहद एवं अन्य मधु उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया है। इस योजना को राष्ट्रीय मधु बोर्ड (National Bee Board – NBB) द्वारा लागू किया जा रहा है।

NBHM की घोषणा आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत की गई थी, जिसके लिए ₹500 करोड़ का बजटीय प्रावधान किया गया था। प्रारंभ में इसे वित्त वर्ष 2020–21 से 2022–23 तक लागू किया गया था, जिसे अब वित्त वर्ष 2025–26 तक बढ़ा दिया गया है, और शेष ₹370 करोड़ की राशि के साथ इसे जारी रखा गया है।

मधुमक्खी पालन एक कृषि-आधारित गतिविधि है, जो किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के भूमिहीन श्रमिकों के लिए आजीविका का प्रमुख स्रोत है। यह फसलों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ता है और किसानों की आय में वृद्धि होती है। साथ ही, यह शहद, मोम, परागकण, प्रोपोलिस, रॉयल जेली और मधु विष जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पादों का उत्पादन करता है, जो ग्रामीण समुदायों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करते हैं।

भारत के विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियाँ (agro-climatic conditions) मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल हैं। इस क्षेत्र के महत्व को पहचानते हुए, सरकार ने ‘मीठी क्रांति (Sweet Revolution)’ के तहत NBHM की शुरुआत की, ताकि वैज्ञानिक, संगठित एवं टिकाऊ मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देकर किसानों की आय में वृद्धि की जा सके।

NBHM के अंतर्गत उप-योजनाएँ (Sub-Schemes / Mini Missions)

NBHM को तीन मिनी मिशनों (Mini Missions) के माध्यम से लागू किया जा रहा है:

  1. मिनी मिशन–I:
    फसल उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि के लिए वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन और परागण को बढ़ावा देना।

  2. मिनी मिशन–II:
    मधुमक्खी उत्पादों के फसलोपरांत प्रबंधन — संग्रह, प्रसंस्करण, भंडारण, विपणन, मूल्यवर्धन आदि — पर ध्यान केंद्रित करते हुए आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना।

  3. मिनी मिशन–III:
    विभिन्न क्षेत्रों और कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुसार अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास पर केंद्रित रहना।

मुख्य उद्देश्य (Objectives of NBHM)

  • मधुमक्खी पालन उद्योग के समग्र विकास के माध्यम से आय एवं रोजगार सृजन को बढ़ावा देना।

  • गुणवत्तापूर्ण मधुमक्खी कॉलोनी और पोस्ट-हार्वेस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे हनी प्रोसेसिंग प्लांट, कोल्ड स्टोरेज और विपणन केंद्र विकसित करना।

  • क्षेत्रीय और जिला स्तर पर क्वालिटी कंट्रोल लैब्स की स्थापना कर शहद की गुणवत्ता सुनिश्चित करना।

  • ‘मधुक्रांति पोर्टल (Madhukranti Portal)’ के माध्यम से शहद स्रोत की ऑनलाइन पंजीकरण और ट्रेसबिलिटी प्रणाली विकसित करना।

  • हनी कॉरिडोर विकसित करना और कृषि-उद्यमियों एवं स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देना।

  • महिलाओं का सशक्तिकरण और FPOs, SHGs के माध्यम से सामूहिक संस्थागत ढांचा विकसित करना।

  • नवीनतम प्रौद्योगिकियों और कौशल विकास को बढ़ावा देना ताकि शहद और अन्य मधु उत्पादों का उत्पादन और निर्यात बढ़ाया जा सके।

NBHM की उपलब्धियाँ (Progress and Achievements)

  • वर्ष 2024 में भारत ने लगभग 1.4 लाख मीट्रिक टन (MT) प्राकृतिक शहद का उत्पादन किया।

  • FY 2023–24 में भारत ने लगभग 1.07 लाख MT शहद का USD 177.55 मिलियन मूल्य का निर्यात किया।

  • भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शहद निर्यातक है (2020 में 9वें स्थान से उछाल)।

  • 6 विश्वस्तरीय हनी टेस्टिंग लैब्स, 47 मिनी लैब्स, 26 प्रोसेसिंग यूनिट्स और 18 ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग यूनिट्स की स्थापना मार्च 2025 तक की गई है।

  • IIT रुड़की में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन उत्कृष्टता केंद्र (National Centre of Excellence in Beekeeping) की स्थापना की गई है।

  • मधुक्रांति पोर्टल पर 14,859 मधुमक्खी पालक, 269 सोसायटी, 150 फर्म्स और 206 कंपनियाँ पंजीकृत हैं (अक्टूबर 2025 तक)।

  • TRIFED, NAFED, NDDB को 100 मधुमक्खीपालक FPOs गठित करने का कार्य सौंपा गया, जिनमें से 97 FPOs मार्च 2025 तक बन चुके हैं।

मुख्य शहद उत्पादक राज्य एवं निर्यात (Honey Production & Export)

भारत में प्रमुख शहद उत्पादक राज्य हैं —उत्तर प्रदेश (17%), पश्चिम बंगाल (16%), पंजाब (14%), बिहार (12%) और राजस्थान (9%)

भारत से निर्यातित प्रमुख शहद प्रकार हैं —रेपसीड/सरसों शहद, यूकेलिप्टस शहद, लीची शहद, सूरजमुखी शहद आदि।

मुख्य निर्यात गंतव्य हैं —अमेरिका, यूएई, सऊदी अरब, क़तर और लीबिया।

सफलता की कहानियाँ (Success Stories)

मेघालय के नोंगथाइमाई गाँव में पारंपरिक मधुमक्खी पालन अब एक लाभदायक व्यवसाय में बदल गया है।
स्टीवेंसन शदाप ने सरकारी प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने शौक को व्यवसाय में बदला और अब प्रतिवर्ष ₹1–2 लाख की आमदनी कर रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में सरकार ने 2,000 कॉलोनियाँ 40% सब्सिडी पर उपलब्ध कराई हैं और ₹25 लाख का हनी प्रोसेसिंग एवं बॉटलिंग प्लांट स्थापित किया है।
यहाँ के युवा अब “कुपवाड़ा हनी” ब्रांड के अंतर्गत जैविक शहद का उत्पादन और विपणन कर रहे हैं, जिससे क्षेत्र का वार्षिक कारोबार ₹3 करोड़ तक पहुँच गया है।

निष्कर्ष (Conclusion)

राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं मधु मिशन (NBHM) भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी और बहुआयामी पहल है, जो देश में ‘मीठी क्रांति’ को गति दे रही है। यह पारंपरिक मधुमक्खी पालन को वैज्ञानिक, तकनीक-आधारित और संगठित उद्योग में परिवर्तित कर रहा है, जिससे ग्रामीण आजीविका, महिला सशक्तिकरण, कृषि उत्पादन, और निर्यात क्षमता — सभी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

NBHM भारत को वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

एकीकृत कोल्ड चेन एवं मूल्य संवर्धन अवसंरचना योजना (ICCVAI): कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल

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परिचय

भारत में कटाई के बाद होने वाले नुकसान (Post-harvest losses) अब भी एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं, विशेष रूप से फलों, सब्ज़ियों, डेयरी उत्पादों, मांस, पोल्ट्री और मछली जैसे नाशवंत उत्पादों के लिए। अनुसंधानों से यह स्पष्ट हुआ है कि फसल कटाई, संभालने, परिवहन, भंडारण और प्रसंस्करण की प्रक्रिया के दौरान भारी मात्रा में नुकसान होता है, जिससे किसानों की आय घटती है, उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ती हैं और खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (MoFPI) ने एकीकृत कोल्ड चेन और मूल्य संवर्धन अवसंरचना योजना (Integrated Cold Chain and Value Addition Infrastructure Scheme - ICCVAI) शुरू की है, जिसे प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY) के अंतर्गत “कोल्ड चेन योजना” के रूप में संचालित किया जाता है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य खेत से लेकर खुदरा बाजार तक एक निर्बाध कोल्ड चेन प्रणाली स्थापित करना है ताकि कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सके और किसानों को उनके उत्पादों के बेहतर मूल्य मिल सकें।

यह योजना पहले से ही अस्तित्व में थी, लेकिन वित्तीय वर्ष 2016–17 में इसे पुनर्गठित कर PMKSY के अंतर्गत शामिल किया गया। PMKSY मंत्रालय की एक छत्र योजना है, जिसका लक्ष्य खेत से खुदरा बाजार तक आधुनिक अवसंरचना और कुशल आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन विकसित करना है। कोल्ड चेन योजना को इस छत्र योजना में शामिल करने का उद्देश्य किसानों, प्रसंस्करणकर्ताओं और बाजारों को जोड़ने वाली एक पूर्ण कोल्ड चेन प्रणाली विकसित करना, अपव्यय को कम करना, रोजगार सृजन को बढ़ावा देना और नाशवंत वस्तुओं के क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करना है।

कोल्ड चेन अवसंरचना का महत्व केवल भंडारण तक सीमित नहीं है — इसमें खेतों पर प्री-कूलिंग सुविधाएं, आधुनिक प्रसंस्करण केंद्र, कुशल वितरण केंद्र और तापमान-नियंत्रित परिवहन प्रणाली शामिल हैं, जो आपस में समन्वयित रूप से कार्य करती हैं।

यह योजना कई क्षेत्रों को कवर करती है — जैसे बागवानी (फलों और सब्ज़ियों को छोड़कर, जिन्हें 2022 से एक अलग योजना में शामिल किया गया है), डेयरी, मांस, पोल्ट्री और मत्स्य (श्रिंप को छोड़कर)। इस पुनर्गठन का उद्देश्य सहायता को सुव्यवस्थित करना और दोहराव को रोकना था। फल, सब्ज़ी और श्रिंप क्षेत्र को ऑपरेशन ग्रीन्स योजना के अंतर्गत स्थानांतरित किया गया, जो आपूर्ति श्रृंखला को स्थिर करने पर केंद्रित है।

NABARD कंसल्टेंसी सर्विसेज प्रा. लि. (NABCONS) द्वारा 2020 में किए गए एक मूल्यांकन अध्ययन में पाया गया कि ICCVAI योजना के तहत किए गए हस्तक्षेपों से फलों, सब्ज़ियों, डेयरी और मत्स्य क्षेत्रों में अपव्यय में उल्लेखनीय कमी आई है।

ICCVAI योजना के उद्देश्य

इस योजना के प्रमुख उद्देश्य कोल्ड चेन अवसंरचना के समग्र विकास को सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट रूप से परिभाषित किए गए हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • खेत से बाजार तक निर्बाध कोल्ड चेन विकसित करना

  • कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करना

  • किसानों की आय में वृद्धि करना

  • रोजगार के अवसर पैदा करना

  • नाशवंत उत्पादों की गुणवत्ता और उपलब्धता में सुधार करना

ICCVAI के प्रमुख घटक

इस योजना के तहत आपूर्ति श्रृंखला के विभिन्न स्तरों पर अवसंरचना के निर्माण का समर्थन किया जाता है, जिसमें विशेष रूप से खेत-स्तर की सुविधाओं पर जोर दिया गया है।

22 मई 2025 की दिशानिर्देशों के अनुसार, किसी भी आवेदक को वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए फार्म लेवल इन्फ्रास्ट्रक्चर (FLI) स्थापित करना आवश्यक है, जिसे वितरण केंद्र (Distribution Hub) या रेफ्रिजरेटेड/इंसुलेटेड ट्रांसपोर्ट से जोड़ा जाना चाहिए।


मुख्य घटक हैं:

  • फार्म लेवल प्री-कूलिंग और भंडारण

  • कोल्ड स्टोरेज और नियंत्रित वातावरण (CA) सुविधाएं

  • तापमान-नियंत्रित परिवहन

  • वितरण केंद्र

  • प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन इकाइयाँ

फूड प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने के लिए पात्रता

यह एक मांग आधारित योजना (Demand Driven Scheme) है। इसके तहत विभिन्न पात्र संस्थाएं (Project Implementing Agencies – PIAs) फूड प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित कर सकती हैं।

पात्र संस्थाएं:

  • व्यक्ति (किसानों सहित)

  • किसान उत्पादक संगठन (FPOs), किसान उत्पादक कंपनियां (FPCs),
    गैर-सरकारी संगठन (NGOs),
    सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSUs),
    फर्म, कंपनियां, निगम, सहकारी समितियां और स्वयं सहायता समूह (SHGs)।

मंत्रालय पात्र संस्थाओं से अभिरुचि की अभिव्यक्ति (EOI) के माध्यम से प्रस्ताव आमंत्रित करता है। खाद्य उत्पादों के भंडारण के लिए राज्यों की सहमति अनिवार्य नहीं है, लेकिन इकाइयों की स्थापना में उनका सहयोग आवश्यक है।

ICCVAI योजना से संबंधित अन्य सरकारी पहलें

  • बागवानी के एकीकृत विकास मिशन (MIDH)

  • राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB)

  • कृषि अवसंरचना कोष (AIF)

  • ऑपरेशन ग्रीन्स योजना

वित्तीय सहायता

PMKSY के तहत बजटीय आवंटन में वृद्धि (2025)
जुलाई 2025 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने PMKSY के लिए ₹1,920 करोड़ की अतिरिक्त राशि को मंजूरी दी, जिससे कुल आवंटन बढ़कर ₹6,520 करोड़ हो गया (15वीं वित्त आयोग अवधि तक, 31 मार्च 2026 तक)। इसमें ICCVAI योजना के तहत 50 मल्टी-प्रोडक्ट फूड इर्रेडिएशन यूनिट्स स्थापित करने के लिए ₹1,000 करोड़ का प्रावधान शामिल है।

सामान्य क्षेत्रों में पात्र परियोजना लागत का 35% और कठिन क्षेत्रों (जैसे पूर्वोत्तर राज्य, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जनजातीय क्षेत्र आदि) में 50% तक की अनुदान सहायता प्रदान की जाती है। प्रत्येक परियोजना को अधिकतम ₹10 करोड़ तक सहायता मिल सकती है।

उपलब्धियां और प्रगति

जून 2025 तक, 395 एकीकृत कोल्ड चेन परियोजनाएं अनुमोदित की जा चुकी हैं, जिनमें से 291 परियोजनाएं पूरी होकर चालू हो चुकी हैं।
इनसे 25.52 लाख मीट्रिक टन (LMT) की संरक्षण क्षमता और 114.66 LMT की प्रसंस्करण क्षमता विकसित हुई है, साथ ही लगभग 1,74,600 रोजगार सृजित हुए हैं।

2016–17 के बाद से इस योजना में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। 2016–17 से अब तक ₹1535.63 करोड़ की राशि 269 परियोजनाओं के लिए जारी की जा चुकी है, जिनमें से 169 परियोजनाएं पूरी होकर चालू हैं।

प्रमुख संशोधन और नीतिगत अपडेट

  • जून 2022 संशोधन: फलों और सब्ज़ियों से संबंधित कोल्ड चेन परियोजनाओं को योजना से हटाकर ऑपरेशन ग्रीन्स के अंतर्गत स्थानांतरित किया गया।

  • अगस्त 2024 दिशानिर्देश: मल्टी-प्रोडक्ट फूड इर्रेडिएशन यूनिट्स की स्थापना के लिए दिशानिर्देश जारी किए गए, जिनका उद्देश्य खाद्य पदार्थों की शेल्फ लाइफ बढ़ाना और नुकसान घटाना है।

  • मई 2025 संशोधन: नवीनतम दिशानिर्देशों ने पूरे आपूर्ति श्रृंखला में संरक्षण और मूल्य संवर्धन को सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित किया है।

निष्कर्ष

यह योजना अनुकूल शासन (Adaptive Governance) का उदाहरण है।
2022 में क्षेत्रीय पुनर्संरचना, 2025 में बजट वृद्धि, और नई तकनीकों जैसे इर्रेडिएशन सुविधाओं को शामिल करना सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

इस योजना का वित्तीय ढांचा इसे छोटे किसानों से लेकर बड़े कॉर्पोरेट तक सभी के लिए व्यवहार्य बनाता है। साथ ही, IoT आधारित निगरानी, ऊर्जा-कुशल प्रणालियाँ और AI-आधारित लॉजिस्टिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों का एकीकरण इसकी दक्षता को और बढ़ा सकता है।

कृषि विपणन सुधारों से जोड़कर यह योजना किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य क्षेत्र में स्थायी विकास सुनिश्चित करने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खरीफ 2025–26 के लिए दलहन और तिलहन खरीद योजना को दी मंजूरी; ₹15,095 करोड़ से अधिक की राशि से लाखों किसानों को मिलेगा लाभ

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश राज्यों में खरीफ 2025–26 सीजन के लिए दलहन और तिलहन की खरीद योजना को मंजूरी दी है। इन राज्यों के लिए कुल स्वीकृत खरीद राशि ₹15,095.83 करोड़ निर्धारित की गई है, जिससे संबंधित राज्यों के लाखों किसानों को सीधा लाभ मिलेगा।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने यह मंजूरी प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की अन्य योजनाओं के तहत दी। यह निर्णय कृषि मंत्रियों और राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आयोजित उच्च-स्तरीय वर्चुअल बैठक में लिया गया।

विस्तृत विचार-विमर्श के बाद, मंत्री चौहान ने तेलंगाना में मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत ₹38.44 करोड़ की लागत से 4,430 मीट्रिक टन मूंग (हरी दाल) की खरीद को मंजूरी दी, जो राज्य के कुल उत्पादन का 25% है। इसके अलावा, उड़द की 100% खरीद और सोयाबीन की 25% खरीद की भी स्वीकृति दी गई। इसी प्रकार, ओडिशा में मूल्य समर्थन योजना के तहत ₹147.76 करोड़ की लागत से अरहर (तुअर दाल) की 18,470 मीट्रिक टन खरीद की मंजूरी दी गई, जो राज्य के कुल उत्पादन का 100% है।

महाराष्ट्र में, केंद्रीय मंत्री ने 33,000 मीट्रिक टन मूंग, 3,25,680 मीट्रिक टन उड़द और 18,50,700 मीट्रिक टन सोयाबीन की खरीद को मंजूरी दी। ये खरीद मूल्य समर्थन योजना के तहत क्रमशः ₹289.34 करोड़, ₹2,540.30 करोड़ और ₹9,860.53 करोड़ की लागत से की जाएंगी। वहीं, मध्य प्रदेश में खरीफ 2025–26 सीजन के दौरान मूल्य हानि भुगतान योजना (PDPS) के तहत 22,21,632 मीट्रिक टन सोयाबीन की खरीद ₹1,775.53 करोड़ की लागत से की जाएगी।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इन मंजूरियों का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना, उनकी आय की सुरक्षा सुनिश्चित करना और बाजार की अस्थिरता से बचाव करना है — यह आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता किसानों की आय और सम्मान की सुरक्षा करना है। खरीफ 2025–26 सीजन में इन राज्यों में दलहन और तिलहन की रिकॉर्ड खरीद कृषि उत्पादन को बढ़ावा देगी, किसानों को निश्चित आय सुनिश्चित करेगी और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करेगी।

मंत्री चौहान ने यह भी बताया कि सरकार ने नेफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) के माध्यम से तुअर, उड़द और मसूर की 100% खरीद की व्यवस्था की है, जिससे देश दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि खरीद का लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे और इसके लिए सख्त निगरानी सुनिश्चित की जाए।

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