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पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्शदात्री समिति की बैठक में मानव–वन्यजीव संघर्ष पर विस्तृत चर्चा

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नई दिल्ली में आज पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संसदीय परामर्शदात्री समिति की बैठक केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में आयोजित हुई। बैठक का मुख्य विषय मानव–वन्यजीव संघर्ष (Human–Wildlife Conflict - HWC) तथा इसकी रोकथाम, शमन और मानव एवं वन्यजीवों के बीच दीर्घकालिक सह-अस्तित्व को सुदृढ़ करने के उपायों पर विचार-विमर्श था।

बैठक में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह, समिति के सदस्य सांसद, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न राज्यों के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCFs) और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (Chief Wildlife Wardens) उपस्थित रहे।

समिति को 18 दिसंबर 2025 को आयोजित पिछली बैठक में दिए गए निर्देशों पर हुई अनुवर्ती कार्रवाई की जानकारी दी गई। इसमें संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों के सांसदों के साथ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा किए गए परामर्श शामिल थे।

बैठक में बताया गया कि मानव–वन्यजीव संघर्ष का स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग है। कई राज्यों में मानव–हाथी संघर्ष प्रमुख है, जबकि अन्य स्थानों पर बाघ, तेंदुआ, भालू, गैंडा, जंगली सूअर, गौर, बंदर तथा अन्य वन्यजीवों से जुड़े संघर्षों के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग प्रबंधन रणनीतियों की आवश्यकता है।

समिति को बताया गया कि प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सातवीं बैठक में घोषित मानव–वन्यजीव संघर्ष उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence on Human–Wildlife Conflict) की स्थापना तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित SACON, WII South Centre में की गई है। यह केंद्र वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, नीति निर्माण, क्षमता विकास तथा समुदाय-केंद्रित उपायों के माध्यम से मानव–वन्यजीव संघर्ष के प्रभावी प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय संस्थान के रूप में कार्य करेगा।

इसके अलावा, 10 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष पोर्टल शुरू किए जाने की जानकारी दी गई। यह पोर्टल संघर्ष की घटनाओं के रिकॉर्ड, डेटा प्रबंधन, ज्ञान साझा करने तथा निर्णय समर्थन के लिए एकीकृत डिजिटल मंच उपलब्ध कराएगा। साथ ही दक्षिण भारत के लिए हाथी संरक्षण क्षेत्रीय कार्ययोजना (Regional Action Plan on Elephant Conservation) को भी मंजूरी दिए जाने की जानकारी दी गई।

बैठक में असम, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ने अपने-अपने राज्यों में मानव–वन्यजीव संघर्ष की स्थिति, अपनाए गए समाधान, सामुदायिक भागीदारी, तकनीकी नवाचार तथा भविष्य की रणनीतियों पर प्रस्तुतियां दीं। इन प्रस्तुतियों में परिदृश्य आधारित योजना, त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली, आवास सुधार, वन्यजीव गलियारों का संरक्षण, वैज्ञानिक निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक सहभागिता तथा अंतरराज्यीय समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया।

राज्यों की प्रमुख पहलें

1. असम

  • हाथी, बाघ, तेंदुआ, गैंडा, जंगली भैंसा और जंगली सूअर से जुड़े संघर्षों के लिए परिदृश्य आधारित रणनीति प्रस्तुत की।

  • क्षेत्रवार कार्ययोजनाओं के लिए जोनल मानव–वन्यजीव संघर्ष जोखिम न्यूनीकरण समितियों का गठन किया।

  • आवास पुनर्स्थापन, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और वैकल्पिक आजीविका पर विशेष ध्यान दिया।

2. कर्नाटक

  • इंजीनियरिंग उपायों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), कमांड सेंटर, त्वरित प्रतिक्रिया दल, सामुदायिक स्वयंसेवक नेटवर्क और e-Parihara डिजिटल मुआवजा प्रणाली पर आधारित छह-स्तंभीय मॉडल प्रस्तुत किया।

  • राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष मिशन, समान एसओपी (SOP), गलियारों की बहाली और अंतरराज्यीय समन्वय का सुझाव दिया।

3. केरल

  • मानव–वन्यजीव संघर्ष को राज्य-विशिष्ट आपदा घोषित करने, त्वरित प्रतिक्रिया दल, 273 संघर्ष प्रभावित पंचायतों की पहचान तथा जना जागरथा समितियों और SARPA स्वयंसेवी कार्यक्रम जैसी सामुदायिक पहलों की जानकारी दी।

  • वन्यजीव गलियारों की बहाली, आवास प्रबंधन, जिम्मेदार पर्यटन और तकनीक आधारित निगरानी पर जोर दिया।

4. मध्य प्रदेश

  • 'प्रिवेंशन फर्स्ट' मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें AI आधारित निगरानी, GPS ट्रैकिंग, ड्रोन, गजरक्षक, त्वरित प्रतिक्रिया दल, प्रजाति-विशिष्ट एसओपी, समयबद्ध मुआवजा तथा बाघ मित्र, हाथी मित्र और इको-डेवलपमेंट समितियों के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी शामिल है।

  • संघर्षकारी वन्यजीवों के वैज्ञानिक प्रबंधन और स्थानांतरण (Translocation) पर भी प्रकाश डाला।

5. उत्तराखंड

  • एकीकृत कमांड एवं कंट्रोल सेंटर, 24×7 हेल्पलाइन 1926, ई-निगरानी, GPS ट्रैकिंग, जैविक बाड़, समयबद्ध मुआवजा तथा गांव-स्तरीय स्वयंसेवक नेटवर्क की जानकारी दी।

  • 'लिविंग विद लेपर्ड्स/टाइगर्स' पहल के तहत दीर्घकालिक सह-अस्तित्व रणनीति प्रस्तुत की।

6. उत्तर प्रदेश

  • बताया कि राज्य में अधिकांश मानव–वन्यजीव संघर्ष तेंदुओं से संबंधित हैं और तराई आर्क लैंडस्केप सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है।

  • त्वरित प्रतिक्रिया दल, चार बचाव केंद्र, सौर बाड़, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, स्वयंसेवी कार्यक्रम तथा वैज्ञानिक निगरानी पर आधारित रणनीति प्रस्तुत की।

बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि मानव–वन्यजीव संघर्ष का प्रभावी समाधान पारिस्थितिक संरक्षण, मानव जीवन और आजीविका की सुरक्षा को साथ लेकर चलने वाली समन्वित रणनीति से ही संभव है। आधुनिक तकनीकों जैसे GIS, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ड्रोन, रेडियो टेलीमेट्री और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स के उपयोग के साथ-साथ वन कर्मियों की क्षमता बढ़ाने, मुआवजा व्यवस्था में सुधार, जनजागरूकता और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने पर विशेष बल दिया गया।


बैठक के अंत में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने राज्यों द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि मानव–वन्यजीव संघर्ष की चुनौती का समाधान वैज्ञानिक प्रबंधन, संस्थागत समन्वय, तकनीक आधारित निगरानी और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानव–वन्यजीव संघर्ष पोर्टल और उत्कृष्टता केंद्र राज्यों को डेटा आधारित रणनीति बनाने, अनुभव साझा करने और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने में महत्वपूर्ण सहयोग देंगे।

बैठक की शुरुआत में पर्यावरण राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने सुझाव दिया कि विभिन्न आवास क्षेत्रों की धारण क्षमता (Carrying Capacity) का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि संबंधित पारिस्थितिकी तंत्र वन्यजीवों का कितना भार वहन कर सकता है। इससे संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने की रणनीति बनाने में सहायता मिलेगी।

बैठक का समापन सांसदों द्वारा मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने और भारत की समृद्ध वन्यजीव विरासत के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर आवश्यक उपायों पर विस्तृत चर्चा के साथ हुआ।

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मातृत्व वन प्रकृति के प्रति भावनात्मक जुड़ाव का सशक्त प्रतीक है - मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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मुख्यमंत्री साय ने जशपुर सर्किट हाउस में मातृत्व वन का किया लोकार्पण

एक पेड़ माँ के नाम अभियान से जुड़ा जनभावना और पर्यावरण संरक्षण का संदेश: लगभग 2 एकड़ क्षेत्र में 400 से अधिक पौधे रोपित

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज जशपुर सर्किट हाउस परिसर में विकसित मातृत्व वन का लोकार्पण किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री साय ने कहा कि मातृत्व वन न केवल हरित क्षेत्र के रूप में विकसित होगा, बल्कि यह प्रकृति के प्रति भावनात्मक जुड़ाव का एक सशक्त प्रतीक भी है और आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण एवं जागरूकता का केंद्र बनेगा।

उल्लेखनीय है कि जशपुर मंडल द्वारा विकसित मातृत्व वन में लगभग 2 एकड़ क्षेत्र में 400 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के पौधों का रोपण किया गया है, जो पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक संवेदनाओं के अद्वितीय समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस अवसर पर ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत जिले के जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी माताओं के नाम पर पौधरोपण किया गया, जिससे प्रकृति और परिवार के बीच भावनात्मक संबंध को और अधिक सुदृढ़ करने का संदेश दिया गया।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने संबोधन में कहा कि माँ हमारे जीवन की प्रथम गुरु होती हैं और उनका स्थान सर्वोच्च होता है। ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के माध्यम से हम माँ के प्रति सम्मान को प्रकृति से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास कर रहे हैं। यह पहल आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करेगी। उन्होंने कहा कि मातृत्व वन जैसी पहल न केवल हरित क्षेत्र के विस्तार में सहायक होगी, बल्कि समाज में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना को भी मजबूत करेंगी।

मातृत्व वन के अंतर्गत पर्यावरणीय एवं औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण पौधों का चयन कर उनका रोपण किया गया है। इनमें टिकोमा, झारुल, सीताअशोक, गुलमोहर, लक्ष्मीतरु, आंवला, बीजा, सिन्दूर, नागकेसरी, अर्जुन एवं जामुन जैसी प्रजातियाँ प्रमुख हैं। ये पौधे न केवल पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक होंगे, बल्कि भविष्य में औषधीय उपयोग एवं जैव विविधता के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

मातृत्व वन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना, माताओं के प्रति सम्मान को प्रकृति के माध्यम से अभिव्यक्त करना तथा नई पीढ़ी में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना है। यह पहल ‘हर घर एक पेड़, हर पेड़ में माँ की ममता’ के संदेश को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे समाज और पर्यावरण के लिए प्रेरणादायक बताया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल के अध्यक्ष रामप्रताप सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष सालिक साय, नगर पालिका अध्यक्ष अरविंद भगत, नगर पालिका उपाध्यक्ष यश प्रताप सिंह जूदेव, जिला पंचायत उपाध्यक्ष  शौर्य प्रताप सिंह जूदेव, जनपद पंचायत अध्यक्ष गंगाराम भगत, विजय आदित्य सिंह जूदेव सहित जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।

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