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पीयूष गोयल ने जलवायु वित्त पर विकसित देशों से जवाबदेही की मांग की

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भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बर्लिन में जलवायु वित्त (Climate Finance) के मुद्दे पर विकसित देशों की प्रतिबद्धताओं को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकसित देशों को विकासशील देशों से किए गए वित्तीय वादों को पर्याप्त रूप से पूरा करना चाहिए।

इस मुद्दे का महत्व इसलिए है क्योंकि विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने, प्रदूषण कम करने, जलवायु आपदाओं से निपटने और पर्यावरण-अनुकूल बुनियादी ढाँचा विकसित करने के लिए बड़े निवेश की जरूरत होती है।

समाचार की मुख्य बातें

1. विकसित देशों से सालाना 100 अरब डॉलर के वादे पर सवाल

पीयूष गोयल ने 22 अक्टूबर 2026 को बर्लिन में आयोजित Berlin Global Dialogue के दौरान कहा कि विकसित देशों ने विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सालाना 100 अरब अमेरिकी डॉलर जुटाने का वादा किया था, लेकिन उनके अनुसार इस सहायता को लेकर किए गए वादे पर्याप्त रूप से पूरे नहीं हुए हैं।

2. भारत के उत्सर्जन और आबादी का मुद्दा उठाया

गोयल ने कहा कि भारत दुनिया की लगभग 17% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसका हिस्सा 3% से कम है। उन्होंने यूरोप के प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की तुलना भारत से करते हुए जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी को अधिक न्यायसंगत तरीके से बाँटने की मांग की। ये आँकड़े उनके भाषण में दिए गए दावे हैं।

3. विकासशील देशों को किस तरह की मदद चाहिए?

जलवायु वित्त का उद्देश्य विकासशील देशों को इन क्षेत्रों में सहायता देना है:

  • सौर और पवन ऊर्जा जैसी स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाएँ।

  • बाढ़, सूखा, चक्रवात और अन्य जलवायु आपदाओं से निपटने की तैयारी।

  • उद्योगों और परिवहन में कार्बन उत्सर्जन कम करना।

  • पर्यावरण-अनुकूल तकनीक और हरित बुनियादी ढाँचे में निवेश।

  • छोटे द्वीपीय और कमजोर देशों को जलवायु जोखिमों से निपटने में मदद।

4. यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स पर भी चिंता

गोयल ने यूरोपीय संघ के Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) पर भी सवाल उठाए। यह व्यवस्था कुछ आयातित वस्तुओं, जैसे स्टील, के उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन पर लागत लागू करती है। भारत की चिंता है कि ऐसी व्यवस्थाएँ विकासशील देशों के निर्यातकों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव डाल सकती हैं।

5. भारत का रुख क्या है?

भारत का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी सभी देशों की है, लेकिन ऐतिहासिक उत्सर्जन, आर्थिक क्षमता और विकास की जरूरतों को भी ध्यान में रखना चाहिए। भारत स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करना चाहता है, साथ ही बड़ी आबादी की ऊर्जा, भोजन और आर्थिक विकास की जरूरतों को भी पूरा करना चाहता है।

निष्कर्ष

बर्लिन में पीयूष गोयल का संदेश था कि जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक कार्रवाई केवल लक्ष्य तय करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। विकसित देशों को विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग की अपनी प्रतिबद्धताओं पर भी ठोस प्रगति दिखानी चाहिए।


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