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मुस्कुराता बस्तर कार्यशाला में बच्चों की कला ने बिखेरे रंग

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कार्टून और कैरिकेचर के माध्यम से बस्तर की सकारात्मक पहचान को मिलेगी नई दिशा

रायपुर- बस्तर की समृद्ध संस्कृति, प्राकृतिक सुंदरता और सकारात्मक पहचान को कला के माध्यम से नई पहचान देने के उद्देश्य से जगदलपुर में आयोजित ‘मुस्कुराता बस्तर’ कार्टून कैनवास कार्यशाला में स्कूली बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। बच्चों ने अपनी कल्पनाओं को कैनवास पर उतारकर रचनात्मक प्रतिभा का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।

विशेषज्ञों ने सिखाईं कार्टून और कैरिकेचर की तकनीकें

कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से आए वरिष्ठ कार्टूनिस्टों और कला विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों को कार्टून और कैरिकेचर बनाने की बुनियादी तकनीकें सिखाईं। उन्होंने बताया कि किसी भी चित्र की अच्छी शुरुआत सही सर्किल बनाने से होती है। इसके साथ ही रफ स्केच, आउटलाइन, रंगों के चयन और चेहरे के भावों को प्रभावी ढंग से चित्रित करने के तरीके भी बच्चों को सरल भाषा में समझाए गए।

प्रशिक्षण से बढ़ा बच्चों का आत्मविश्वास

स्वामी आत्मानंद स्कूल के छात्र वंश साहू ने बताया कि इस प्रशिक्षण से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और कला के प्रति उनकी रुचि और मजबूत हुई है।

चरणबद्ध मार्गदर्शन से आसान हुई चित्रकला

सेजेस शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-2 की छात्राएं भारती पांडे और पूनम ध्रुव ने कहा कि पहले उन्हें चित्र बनाने की सही शुरुआत की जानकारी नहीं थी, लेकिन विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से अब वे आसानी से कार्टून और कैरिकेचर बना पा रही हैं।

कल्पनाशीलता को मिली नई दिशा

सेजेस नानगुर की छात्राएं अंजलि नाग और नैना मरकाम तथा सेजेस जगदलपुर की छात्रा अक्षिता बाजपेई ने बताया कि वरिष्ठ कलाकारों का मार्गदर्शन उनकी कल्पनाशीलता को नई दिशा देगा और कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा।

बस्तर की सकारात्मक छवि को मिलेगा नया मंच

यह कार्यशाला बच्चों की प्रतिभा को निखारने के साथ-साथ कला के माध्यम से बस्तर की शांतिपूर्ण, रचनात्मक और मुस्कुराती हुई पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई। इससे बस्तर की सकारात्मक छवि को व्यापक मंच मिलने की उम्मीद है।


सावन: शिव भक्ति, हरियाली और भारतीय संस्कृति का उत्सव

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"रिमझिम बरसती फुहारें, मिट्टी की सौंधी खुशबू, पेड़ों पर झूलों की मस्ती और 'हर-हर महादेव' के जयघोष..." यही है सावन की पहचान। श्रावण मास केवल हिंदू धर्म का एक पवित्र महीना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, प्रकृति और लोकजीवन का जीवंत उत्सव है।


बरसात की पहली बूंद जब धरती को स्पर्श करती है, तो सूखी वसुंधरा हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। खेतों में नई फसल की उम्मीद अंकुरित होती है, नदियां और तालाब जीवन से भर उठते हैं और प्रकृति अपनी अनुपम छटा बिखेर देती है। यही कारण है कि सावन को नवजीवन, समृद्धि और उल्लास का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। तब से सावन का महीना भगवान भोलेनाथ की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। श्रद्धालु शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि तथा विश्व कल्याण की कामना करते हैं। सावन के सोमवार और कांवड़ यात्रा इस आस्था को और अधिक प्रगाढ़ बनाते हैं।

सावन भारतीय लोक संस्कृति का भी सबसे रंगीन अध्याय है। गांवों में पेड़ों पर झूले पड़ते हैं, महिलाएं और युवतियां हरे परिधानों में सजकर कजरी और सावनी गीत गाती हैं। हरियाली तीज, नाग पंचमी और रक्षाबंधन जैसे पर्व सामाजिक सौहार्द, पारिवारिक प्रेम और सांस्कृतिक परंपराओं को नई ऊर्जा देते हैं। यह महीना रिश्तों में अपनापन और जीवन में सकारात्मकता का संदेश लेकर आता है।

आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है, तब सावन हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। हरियाली तभी बचेगी, जब हम पेड़ लगाएंगे, जल स्रोतों का संरक्षण करेंगे और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। भगवान शिव स्वयं प्रकृति के देवता माने जाते हैं, इसलिए पर्यावरण की रक्षा करना भी उनकी सच्ची आराधना है।

सावन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का महीना नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, सेवा, प्रेम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। आइए, इस पावन मास में भगवान शिव से यही प्रार्थना करें कि हमारे जीवन में शांति, समाज में सद्भाव और प्रकृति में सदैव हरियाली बनी रहे।

हर-हर महादेव! जय भोलेनाथ!

कचना धुरवा मंदिर – आस्था, इतिहास और वीरता का अद्भुत संगम

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कचना धुरवा मंदिर छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का एक अत्यंत प्रसिद्ध, ऐतिहासिक और पूजनीय देवस्थल है। यह मंदिर रायपुर–गरियाबंद राष्ट्रीय मार्ग पर बारूका (छुरा प्रवेश मार्ग) के समीप मुख्य सड़क के किनारे स्थित है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह स्थान केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी लोकगाथाओं, आदिवासी संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के कारण भी विशेष पहचान रखता है। प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए पहुँचते हैं और अपनी मनोकामनाएँ लेकर कचना धुरवा देव के चरणों में शीश नवाते हैं।

कचना धुरवा – आदिवासी समाज के आराध्य देव

कचना धुरवा को आदिवासी समाज एवं स्थानीय ग्रामीण अपने इष्टदेव, वन देवता और रक्षक देव के रूप में पूजते हैं। सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि इस क्षेत्र के घने जंगलों, पहाड़ियों और दुर्गम रास्तों से यात्रा करने वाले लोग सबसे पहले कचना धुरवा मंदिर में माथा टेककर सुरक्षित यात्रा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से कचना धुरवा देव की पूजा करता है, उसकी यात्रा सफल होती है तथा जीवन की अनेक बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसी आस्था के कारण आज भी राहगीर और वाहन चालक यहाँ रुककर पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर परिसर में सफेद घोड़े पर सवार वीर राजा धुरवा की भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा उनके शौर्य, साहस, न्यायप्रियता और जनकल्याणकारी व्यक्तित्व का प्रतीक मानी जाती है। दूर से ही यह प्रतिमा श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है और मंदिर की विशेष पहचान बन चुकी है।

अमर प्रेम और वीरता की लोकगाथा

कचना धुरवा मंदिर का इतिहास केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमर प्रेम, त्याग और अदम्य वीरता की लोककथा से भी जुड़ा हुआ है।

लोकमान्यताओं के अनुसार बिंद्रानवागढ़ के वीर राजकुमार धुरवा अपनी वीरता और पराक्रम के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। कहा जाता है कि उनके पिता की हत्या शत्रु राजा द्वारा कर दी गई थी। अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए राजकुमार धुरवा ने दुश्मन राजा के विरुद्ध लगातार संघर्ष किया।

कहा जाता है कि उन्होंने अपने शत्रु से 46 बार युद्ध किया और हर बार असाधारण साहस का परिचय दिया। उनकी वीरता की चर्चा पूरे अंचल में होने लगी। किंतु जब युद्ध में विजय प्राप्त करना कठिन हो गया, तब शत्रु राजा ने छल का सहारा लिया।

लोककथा के अनुसार अंतिम युद्ध के दौरान राजकुमार धुरवा अपने सफेद घोड़े पर सवार होकर नदी पार कर रहे थे। उसी समय उनके घोड़े का एक पैर जल (नदी) में तथा दूसरा पैर थल (भूमि) पर था। इसी अवसर का लाभ उठाकर शत्रु ने धोखे से उन पर प्रहार कर दिया। इस विश्वासघाती हमले में राजकुमार धुरवा वीरगति को प्राप्त हुए।

उनके बलिदान से पूरा क्षेत्र शोक में डूब गया। लोगों ने उनकी वीरता, न्यायप्रियता और जनसेवा को अमर बनाने के लिए उन्हें देवतुल्य मानकर पूजा आरंभ कर दी। समय के साथ विभिन्न स्थानों पर उनके स्मृति-स्थल और मंदिर स्थापित किए गए, जिनमें गरियाबंद का कचना धुरवा मंदिर सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध माना जाता है।

राजकुमारी कचना और अमर प्रेम की कथा

स्थानीय लोककथाओं में राजकुमार धुरवा के साथ राजकुमारी कचना का भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि दोनों का प्रेम त्याग, निष्ठा और समर्पण का अद्भुत उदाहरण था। धुरवा की वीरगति के बाद राजकुमारी कचना ने भी अपने प्रेम और समर्पण की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जिसे आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाता है।

इसी कारण इस देवस्थल को "कचना धुरवा" के नाम से जाना जाता है। यह स्थान प्रेम, विश्वास, साहस और बलिदान का प्रतीक माना जाता है।

अखंड ज्योति एवं नवरात्रि का भव्य मेला

कचना धुरवा मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, लेकिन चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि के अवसर पर यहाँ का वातावरण अत्यंत भव्य और आध्यात्मिक हो जाता है।

इन पावन दिनों में मंदिर परिसर में अखंड ज्योति कलश स्थापित किए जाते हैं। श्रद्धालु पूरे नौ दिनों तक माता और कचना धुरवा देव की आराधना करते हैं। मंदिर परिसर दीपों की रोशनी, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों से गूंज उठता है।

नवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों सहित पड़ोसी राज्यों से भी हजारों श्रद्धालु पहुँचते हैं। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मंदिर परिसर में नारियल बाँधते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।

मंदिर परिसर में स्थित अन्य देवी-देवताओं के मंदिर

कचना धुरवा मंदिर परिसर केवल एक देवस्थल नहीं, बल्कि अनेक देवी-देवताओं की आराधना का प्रमुख केंद्र भी है। यहाँ श्रद्धालुओं को एक ही स्थान पर कई देवस्थलों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

मुख्य मंदिर के अतिरिक्त परिसर में निम्नलिखित देवस्थल स्थित हैं—

  • ग्राम देवी रूपई माता मंदिर

  • बंजारी माता मंदिर

  • सोनई माता मंदिर

इन सभी देवी-देवताओं की पूजा स्थानीय ग्रामीण एवं श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ करते हैं।

लोक आस्था और मान्यताएँ

कचना धुरवा मंदिर के संबंध में अनेक लोकमान्यताएँ प्रचलित हैं। लोगों का विश्वास है कि—

  • सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है।

  • यात्रा प्रारंभ करने से पहले यहाँ दर्शन करने से यात्रा सुरक्षित रहती है।

  • मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु नारियल, ध्वज और प्रसाद अर्पित करते हैं।

  • संकट और कठिनाइयों से मुक्ति के लिए लोग विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।

  • यह स्थान वन, प्रकृति और मानव के बीच गहरे आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक माना जाता है।

प्राकृतिक सौंदर्य

मंदिर चारों ओर से हरियाली, पहाड़ियों और प्राकृतिक वातावरण से घिरा हुआ है। शांत वातावरण, शुद्ध हवा और धार्मिक आस्था का संगम इस स्थान को और भी आकर्षक बनाता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि प्रकृति की गोद में आध्यात्मिक शांति का भी अनुभव करते हैं।

सांस्कृतिक महत्व

कचना धुरवा मंदिर आदिवासी संस्कृति, लोकपरंपरा और छत्तीसगढ़ की गौरवशाली विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है। यहाँ आयोजित धार्मिक अनुष्ठान, लोकगीत, लोकनृत्य और मेले इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखते हैं। यह मंदिर आने वाली पीढ़ियों को वीरता, त्याग, प्रेम और लोकआस्था की प्रेरणा देता है।

निष्कर्ष

कचना धुरवा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि वीरता, प्रेम, त्याग, लोकविश्वास और आदिवासी संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यहाँ की ऐतिहासिक लोकगाथाएँ, सफेद घोड़े पर विराजमान वीर धुरवा की प्रतिमा, नवरात्रि का विशाल मेला, अखंड ज्योति, प्राकृतिक वातावरण और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था इस स्थान को छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण देवस्थलों में शामिल करती हैं।

जो भी श्रद्धालु इस पवित्र धाम में श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुँचता है, वह आध्यात्मिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और कचना धुरवा देव का आशीर्वाद लेकर लौटता है। यही कारण है कि गरियाबंद जिले का यह पावन देवस्थल आज भी लाखों लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

गोंचा पर्व की तैयारियों में तुपकी निर्माण से बढ़ी आजीविका, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का भी बन रहा माध्यम

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महतारी वंदन योजना से मिली आर्थिक संबल की राशि, बस्तर की परंपरा और महिलाओं की आत्मनिर्भरता को मिल रही नई ताकत

रायपुर- महतारी वंदन योजना महिलाओं को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं दे रही, बल्कि उनकी पारंपरिक आजीविकाओं और स्थानीय संस्कृति को भी नई ऊर्जा प्रदान कर रही है। प्रदेश के बस्तर अंचल में इसका एक प्रेरक उदाहरण देखने को मिला है, जहां बस्तर जिला के जगदलपुर विकासखंड के ग्राम मांझीगुड़ा की चंदा ने योजना से प्राप्त राशि का उपयोग गोंचा पर्व में उपयोग होने वाली पारंपरिक तुपकी के निर्माण में किया है। इससे न केवल उनके परिवार की आय बढ़ने की उम्मीद है, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिल रही है।

बस्तर का प्रसिद्ध गोंचा पर्व धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। पर्व की तैयारियों के बीच चंदा अपने पति चिगडू और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर बड़ी संख्या में तुपकी तैयार कर रही हैं। गोंचा पर्व के दौरान इन तुपकियों की विशेष मांग रहती है, जिससे परिवार को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

तुपकी बांस से बनाया जाने वाला बस्तर का पारंपरिक यंत्र है, जिसमें मलाग्नी वृक्ष के बीज (पेंगू) का उपयोग कर बन्दूक जैसी ध्वनि उत्पन्न की जाती है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के दौरान श्रद्धालु इसी तुपकी से पारंपरिक सलामी देते हैं। यह परंपरा वर्षों से बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रही है और आज भी पूरे उत्साह एवं श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

चंदा बताती हैं कि महतारी वंदन योजना से प्रत्येक माह मिलने वाली राशि ने उन्हें आर्थिक आत्मविश्वास दिया। इसी सहायता से उन्होंने तुपकी निर्माण के लिए आवश्यक बांस और अन्य सामग्री खरीदी। अब पूरा परिवार इस कार्य में जुटा है और गोंचा पर्व के दौरान अच्छी आय होने की उम्मीद है।

उनका कहना है कि महतारी वंदन योजना महिलाओं के लिए केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और अपनी पारंपरिक कला एवं कौशल को आजीविका से जोड़ने का अवसर भी है। इससे परिवार की आय बढ़ रही है और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी हो रहा है।

गौरतलब है कि योजना के प्रारंभ से अब तक 29 किस्तों के माध्यम से 18 हजार 805 करोड़ रुपये से अधिक की राशि महिलाओं को सीधे उनके खातों में उपलब्ध कराई जा चुकी है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में योजना के लिए 8,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को मिलेगा मंच, वार्षिक आयोजनों के लिए कलाकारों से आवेदन आमंत्रित

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15 जुलाई तक कर सकते हैं आवेदन, शास्त्रीय संगीत, लोककला, नाट्य एवं वाद्ययंत्र प्रस्तुतियों के लिए होगा चयन

रायपुर- छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को नई पहचान देने और लोक एवं शास्त्रीय कलाओं को व्यापक मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालनालय संस्कृति एवं राजभाषा, छत्तीसगढ़ ने वर्ष 2026-27 के वार्षिक सांस्कृतिक आयोजनों के लिए कलाकारों एवं    सांस्कृतिक दलों से आवेदन आमंत्रित किए हैं। विभाग द्वारा आयोजित इन प्रतिष्ठित आयोजनों के माध्यम से प्रदेश के प्रतिभाशाली कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करने का अवसर मिलेगा, वहीं विलुप्त होती लोक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन को भी नई गति मिलेगी।

संस्कृति विभाग प्रतिवर्ष प्रदेशभर में विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों का आयोजन करता है, जिनमें शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य, लोकसंगीत, लोकनृत्य, नाट्य प्रस्तुतियां तथा पारंपरिक वाद्ययंत्रों की प्रस्तुतियां शामिल रहती हैं। इसी क्रम में वर्ष 2026-27 के लिए पावस प्रसंग (शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य), रंगतरंग वाद्ययंत्र संगम, रंगपरब नाट्य श्रृंखला तथा लोकरंग पर्व के लिए कलाकारों का चयन किया जाएगा।

विशेष रूप से लोकरंग पर्व के अंतर्गत छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककलाओं एवं लोकविधाओं से जुड़े कलाकारों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके लिए भरथरी, पंडवानी, ढोलामारू, लोरिकचंदा, नाचा, गम्मत, सुआ, करमा, पंथी, बांसगीत, देवारगीत, ददरिया, जसगीत, संस्कार गायन सहित अन्य पारंपरिक लोकविधाओं में दक्ष कलाकार आवेदन कर सकते हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य प्रदेश की  लोक-सांस्कृतिक धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और कलाकारों को सशक्त मंच उपलब्ध कराना है।

आवेदन करने वाले कलाकारों एवं सांस्कृतिक दलों का चिन्हारी पंजीकरण होना आवश्यक है तथा समूह प्रस्तुति के इच्छुक कलाकार निर्धारित प्रारूप में आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। आवेदन संचालनालय संस्कृति एवं राजभाषा, द्वितीय तल, छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल व्यवसायिक परिसर, सेक्टर-27, नवा रायपुर स्थित कार्यालय में जमा किए जा सकते हैं। निर्धारित ई-मेल Sanskriti.rajbhasha@gmail.com के माध्यम से भी आवेदन भेजने की सुविधा उपलब्ध कराई गई है।

संस्कृति विभाग ने आवेदन प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 15 जुलाई 2026 निर्धारित की है। विभाग ने प्रदेश के पात्र कलाकारों एवं सांस्कृतिक दलों से निर्धारित समय-सीमा के भीतर आवेदन प्रस्तुत कर इन महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों में सहभागिता सुनिश्चित करने तथा छत्तीसगढ़ की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की अपील की है।

रामगढ़ संस्कृति, इतिहास, साहित्य और पर्यटन का अद्भुत संगम : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

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जोगीमारा गुफा शिलालेख एवं हाथीपोल का किया अवलोकन

हमारी सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य विरासत - मुख्यमंत्री साय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आज सरगुजा जिले के उदयपुर विकासखंड अंतर्गत ऐतिहासिक एवं रामवनगमन पर्यटन परिपथ से जुड़े रामगढ़ में आयोजित दो दिवसीय "रामगढ़ महोत्सव-2026" के समापन समारोह में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने विश्व की प्राचीनतम नाट्यशाला के रूप में विख्यात सीताबेंगरा गुफा का अवलोकन किया तथा इसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं स्थापत्य विशेषताओं की जानकारी प्राप्त की। मुख्यमंत्री ने इसके साथ ही जोगीमारा गुफा के प्राचीन शिलालेख, भित्तिचित्रों तथा क्षेत्र की अनूठी प्राकृतिक धरोहर हाथीपोल का भी अवलोकन किया। इस अवसर पर कृषि मंत्री रामविचार नेताम, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि रामगढ़ सरगुजा की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक चेतना, कला, आस्था और गौरवशाली इतिहास का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि विश्व की प्राचीनतम नाट्यशाला के रूप में विख्यात यह स्थल संस्कृति, इतिहास, साहित्य एवं पर्यटन का अद्भुत संगम है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती केवल प्राकृतिक संपदा से ही समृद्ध नहीं है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक विरासत भी विश्व स्तर पर विशिष्ट पहचान रखती है। रामगढ़ जैसी धरोहरें हमारी ऐतिहासिक अस्मिता और सांस्कृतिक गौरव की अमूल्य निधि हैं, जिनका संरक्षण और संवर्धन हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इन धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन तथा पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए निरंतर कार्य कर रही है, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें और स्थानीय लोगों को भी रोजगार एवं आजीविका के नए अवसर प्राप्त हों।

उल्लेखनीय है कि रामगढ़ पर्वत की पश्चिमी ढलान पर स्थित सीताबेंगरा एवं जोगीमारा गुफाएँ भारतीय इतिहास, स्थापत्य, शिलालेख एवं चित्रकला की अनुपम धरोहर मानी जाती हैं। मान्यता है कि महाकवि कालिदास ने इन्हीं पहाड़ियों में अपनी कालजयी कृति "मेघदूतम्" की रचना की थी, जिसका आरंभ "आषाढस्य प्रथमदिवसे" से होता है। इसी ऐतिहासिक एवं साहित्यिक स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष आषाढ़ के प्रथम दिवस पर रामगढ़ महोत्सव का आयोजन किया जाता है। लगभग 44 फीट लंबी सीताबेंगरा गुफा में निर्मित प्राकृतिक रंगमंच, जोगीमारा गुफा में तीसरी-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की भित्तिचित्र परंपरा तथा यहाँ प्राप्त प्राचीन अभिलेख इस क्षेत्र को विश्व स्तर पर विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।

रामगढ़ की एक अन्य महत्वपूर्ण पहचान "हाथीपोल" नामक प्राकृतिक सुरंग है। लगभग 180 फीट लंबी तथा 15 से 20 फीट ऊँची यह प्राकृतिक सुरंग अपनी अनूठी संरचना के कारण पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। माना जाता है कि वर्षों तक जल प्रवाह के कारण इसका वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ। सुरंग के दूसरे छोर पर स्थित सीताबेंगरा एवं जोगीमारा गुफाएँ इस सम्पूर्ण क्षेत्र को और अधिक रहस्यमयी, आकर्षक एवं ऐतिहासिक महत्व प्रदान करती हैं। रामगढ़ पर्वत के निचले शिखर पर स्थित इन कलात्मक गुफाओं का संबंध रामायणकालीन परंपराओं से भी जोड़ा जाता है, जिसके कारण यह स्थल धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

यात्रा वृत्तांत से सजीव होती है इतिहास और संस्कृति की तस्वीर- मुख्यमंत्री साय

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मुख्यमंत्री ने 'मोदी के राज्य से लौटकर' पुस्तक का किया विमोचन

छत्तीसगढ़ की महिला पत्रकारों के गुजरात भ्रमण पर आधारित निशा द्विवेदी की पुस्तक

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आज यहां छत्तीसगढ़ विधानसभा स्थित अपने कार्यालय के सभा कक्ष में युवा पत्रकार निशा द्विवेदी की पुस्तक 'मोदी के राज्य से लौटकर' का विमोचन किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि यात्रा वृत्तांत से पाठकों के लिए इतिहास और संस्कृति की तस्वीर सजीव हो जाती है। पुस्तक में निशा द्विवेदी ने एक पत्रकार की नजर से गुजरात यात्रा का वर्णन किया है जो बहुत सराहनीय है। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि जनसेवा के क्षेत्र में कार्य कर रहे नेतागण और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ हमारे पत्रकार साथियों के जीवन में यह एक समानता है कि दोनों ही अपने कार्यक्षेत्र में हमेशा व्यस्त रहते हैं। सक्रिय पत्रकारिता के बीच यात्रा वृत्तांत जैसी रचना के लिए समय निकाल पाना जरूर कठिन रहा होगा। ये बहुत सुखद है कि द्विवेदी ने अध्ययन भ्रमण के अनुभवों को किताब के रूप में हम सभी के सामने लेकर आई हैं। 

मुख्यमंत्री ने कहा कि विगत वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पत्रकार बहनों से मिलना हुआ था। मुलाकात में महिला पत्रकारों के अध्ययन भ्रमण के विषय में भी चर्चा हुई। ये बहुत खुशी की बात है कि पहली बार छत्तीसगढ़ की 26 महिला पत्रकारों का दल गुजरात राज्य के भ्रमण पर गया। भ्रमण से लौटने के बाद मैंने मुख्यमंत्री निवास में पत्रकार बहनों से मुलाकात की। उसी समय मैंने उन्हें यह सुझाव दिया था कि वे अपनी यात्रा के अनुभवों को जरूर लिखें। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा इस वर्ष के बजट में भी हमने पत्रकारों के एक्सपोजर विजिट का प्रावधान किया है। हमारे पत्रकार साथी बड़े परिश्रम से सामाजिक सरोकार का कार्य करते हैं। हमारी सरकार हर स्तर पर पत्रकार साथियों को प्रोत्साहित कर रही है। अभी तक पत्रकारों के विविध दल महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, राजस्थान जैसे अनेक राज्यों में हुए हैं। 

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि गुजरात भ्रमण का उद्देश्य महिला पत्रकारों को विकास के मॉडल को देखने, समझने और उससे सीखने का अवसर देना था। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी इच्छा थी कि इस यात्रा को कोई महिला पत्रकार पुस्तक के रूप में लिखे, और यह पुस्तक उसी भावना का परिणाम है।

इस अवसर पर महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े, विधायक सुशांत शुक्ला, मुख्यमंत्री के सचिव राहुल भगत, जनसंपर्क आयुक्त डॉ रवि मित्तल, रायपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष मोहन तिवारी सहित अनेक पत्रकारगण उपस्थित रहे।

मुख्यमंत्री ने किया शंकर पांडे की पुस्तक ’’छत्तीसगढ़ अतीत से अब तक’’ का विमोचन

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रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राजधानी रायपुर स्थित अपने निवास कार्यालय में वरिष्ठ पत्रकार  शंकर पांडे की पुस्तक छत्तीसगढ़ अतीत से अब तक का विमोचन किया। मुख्यमंत्री ने इस पुस्तक में छत्तीसगढ़ के अतीत को समेटने के प्रयास की सराहना करते हुए उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दीं।

मुख्यमंत्री साय को पांडे ने बताया कि छत्तीसगढ़ पर केंद्रित यह उनकी 6वीं पुस्तक है जिसमें छत्तीसगढ़ के महापुरुषों, पर्यटन स्थल, प्राचीन इतिहास, राज-परिवार, मंदिरों के इतिहास से सम्बंधित जानकारियां संकलित की गयी हैं। उन्होंने बताया कि पुस्तक में छत्तीसगढ़ के कई अनछुए पहलुओं सहित राज्य के सभी मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रमुख राजनीतिक घटनाओं, राजनेताओं व साहित्यकारों का भी उल्लेख है। इस अवसर पर प्रियंका कौशल,विशाल यादव सहित स्नेहा पांडे तथा मास्टर अंश पांडे भी उपस्थित थे।

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