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भारत सरकार ने समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाए, अंडमान-निकोबार को ब्लू इकोनॉमी हब बनाने की दिशा में पहल

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भारत सरकार अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह को ब्लू इकोनॉमी के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती और समुद्री मत्स्य पालन को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रही है। इस दिशा में वैज्ञानिक तथा संस्थागत स्तर पर कई महत्त्वपूर्ण पहल की जा रही हैं।

परिषद् वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान (CSIR) के अंतर्गत केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (CSMCRI) द्वारा “अंडमान तट पर व्यावसायिक समुद्री शैवाल की पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन एवं पायलट स्तर पर खेती” परियोजना को लागू किया गया है। इस परियोजना के तहत समुद्री शैवाल खेती के लिए 25 विभिन्न स्थानों का विस्तृत अध्ययन किया गया, जिससे सर्वाधिक अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों और पोषक तत्वों वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सके।

इस अध्ययन के अंतर्गत Gracilaria edulis, Gracilaria debilis, Gracilaria salicornia तथा Kappaphycus alvarezii प्रजातियों का परीक्षण फ्लोटिंग बांस राफ्ट, ट्यूब नेट, नेट बैग और मोनो-लाइन जैसी तकनीकों से किया गया। इसके परिणामस्वरूप हाठी टापू (दक्षिण अंडमान), मायाबंदर (मध्य अंडमान) और दिगलीपुर (उत्तर अंडमान) में Gracilaria edulis और Kappaphycus alvarezii के साथ व्यावसायिक समुद्री शैवाल खेती सफलतापूर्वक स्थापित की गई है।

इसके अतिरिक्त, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) ने अंडमान सागर में पहली बार खुले समुद्र में समुद्री मत्स्य पालन और गहरे पानी में समुद्री शैवाल खेती की परियोजना प्रारंभ की है। साथ ही, CSIR द्वारा शुरू किए गए “सीवीड मिशन” का उद्देश्य समुद्री शैवाल खेती को लाभकारी, पर्यावरण-अनुकूल, टिकाऊ और बड़े पैमाने पर अपनाने योग्य बनाना है।

सीवीड मिशन के अंतर्गत तमिलनाडु में 800 से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने Kappaphycus की खेती को आजीविका के रूप में अपनाया है। इस शोध एवं विकास के परिणामस्वरूप एक नया समुद्री शैवाल उद्योग विकसित हुआ है, जिससे रोजगार के नए अवसर और अतिरिक्त आय के स्रोत सृजित हुए हैं। समुद्री शैवाल आधारित तकनीकों को 12 कंपनियों को व्यावसायीकरण के लिए हस्तांतरित किया गया है। अब तक लगभग 5,000 मछुआरों को तमिलनाडु, गुजरात और आंध्र प्रदेश में विभिन्न योजनाओं के तहत प्रशिक्षण दिया जा चुका है।

सरकार ने महिलाओं के नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने के लिए लक्षित वित्तीय और संस्थागत सहायता उपलब्ध कराई है। राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) के माध्यम से प्रशिक्षण, प्रदर्शन, मूल्य संवर्धन, स्थानीय प्रसंस्करण और विपणन के लिए सहायता दी जा रही है। मत्स्य विभाग (DoF) द्वारा बीज/रोपण सामग्री के आयात और उत्पादन से संबंधित तकनीकी दिशानिर्देश भी जारी किए गए हैं, जिनमें मछुआर परिवारों और महिला SHGs को प्राथमिक लाभार्थी के रूप में मान्यता दी गई है।

सरकार ने वर्ष 2030 तक समुद्री शैवाल उत्पादन को 11.2 लाख टन तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसे मुख्यतः प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत लागू किया जा रहा है। इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए ₹194.09 करोड़ का निवेश किया गया है, जिसमें तमिलनाडु में बहुउद्देशीय सीवीड पार्क और दमन एवं दीव में सीवीड ब्रूड बैंक की स्थापना शामिल है। इसके तहत 46,095 सीवीड राफ्ट और 65,330 मोनो-लाइन ट्यूब नेट की स्वीकृति दी जा चुकी है।

केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI), मंडपम केंद्र को समुद्री शैवाल खेती के लिए उत्कृष्टता केंद्र और नाभिकीय प्रजनन केंद्र (Nucleus Breeding Centre) के नोडल संस्थान के रूप में नामित किया गया है। इससे 20,000 से अधिक किसानों को लाभ और 5,000 से अधिक रोजगार अवसर सृजित होने की संभावना है। पिछले पाँच वर्षों में CMFRI द्वारा 5,268 राफ्ट और 112 मोनो-लाइन ट्यूब नेट स्थापित किए गए तथा 14,000 से अधिक हितधारकों के लिए 169 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।

यह जानकारी पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने 5 फरवरी 2026 को राज्यसभा में दी।

भारत की ब्लू इकॉनमी को नई उड़ान: अंडमान सागर में देश की पहली ओपन-सी मरीन फिश फार्मिंग परियोजना का शुभारंभ

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डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज अंडमान सागर से भारत की पहली ओपन-सी मरीन फिश फार्मिंग परियोजना का शुभारंभ किया। यह परियोजना अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के नॉर्थ बे, विजयपुरम में खुले समुद्र में आयोजित एक फील्ड कार्यक्रम के दौरान लॉन्च की गई।

इस अवसर पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा परिकल्पित ब्लू इकॉनमी को साकार करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम है। उन्होंने कहा कि भारत के महासागर, हिमालय और मुख्य भूमि संसाधनों की तरह ही अपार आर्थिक संभावनाओं से भरपूर हैं, लेकिन दशकों तक इन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

मंत्री ने बताया कि स्वतंत्रता के बाद लगभग 70 वर्षों तक भारत के समुद्री संसाधन largely अनछुए रहे, लेकिन वर्ष 2014 के बाद राष्ट्रीय सोच में एक बुनियादी परिवर्तन आया है। अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि भारत का समुद्री क्षेत्र भी आर्थिक विकास के समान अवसर प्रदान करता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत के पश्चिमी, दक्षिणी और पूर्वी समुद्री तटों की अपनी-अपनी विशिष्टताएं हैं, जो देश के विकास में अलग-अलग योगदान दे सकती हैं।

यह परियोजना पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, उसकी तकनीकी इकाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी (NIOT) तथा अंडमान एवं निकोबार प्रशासन के सहयोग से क्रियान्वित की जा रही है। पायलट परियोजना के अंतर्गत खुले समुद्र की प्राकृतिक परिस्थितियों में मरीन फिनफिश और समुद्री शैवाल (सीवीड) की खेती की जा रही है, जिससे वैज्ञानिक नवाचार के साथ-साथ स्थानीय आजीविका को भी बढ़ावा मिलेगा।

फील्ड विजिट के दौरान दो प्रमुख आजीविका आधारित पहलें शुरू की गईं। समुद्री वनस्पति घटक के तहत स्थानीय मछुआरा समुदायों को खुले समुद्र में सीवीड खेती के लिए बीज प्रदान किए गए। वहीं समुद्री जीव घटक के अंतर्गत फिनफिश के बीज वितरित किए गए, जिन्हें NIOT द्वारा विकसित विशेष ओपन-सी केज सिस्टम के माध्यम से पाला जाएगा।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि फिलहाल ये परियोजनाएं सरकारी सहयोग से संचालित की जा रही हैं, लेकिन भविष्य में इनके अनुभव और व्यवहार्यता के आधार पर पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के माध्यम से इन्हें बड़े स्तर पर विस्तारित किया जा सकता है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और भारत की ब्लू इकॉनमी को मजबूती मिलेगी।

अपने दौरे के दौरान मंत्री ने वांडूर के पास स्थित महात्मा गांधी मरीन नेशनल पार्क का भी भ्रमण किया। वर्ष 1983 में स्थापित यह देश के पहले समुद्री पार्कों में से एक है, जो 15 द्वीपों में फैला हुआ है। यहां उन्होंने प्रवाल भित्तियों, मैंग्रोव, कछुओं और विविध समुद्री जीवों से युक्त समृद्ध और आत्मनिर्भर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का अवलोकन किया।

नॉर्थ बे से इस परियोजना का शुभारंभ इस बात का प्रतीक है कि भारत सरकार विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सीधे जमीनी स्तर तक ले जाकर तटीय और द्वीपीय समुदायों को देश के महासागर-आधारित आर्थिक विकास का सक्रिय भागीदार बना रही है।

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