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लाफिनकला में तीजा महोत्सव की धूम: पारंपरिक खेलों में दिखा नारियों का उत्साह, विजेताओं पर हुई पुरस्कारों की बौछार

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महासमुंद- ग्राम लाफिनकला में 5वां तीजा महोत्सव हर्षोल्लास और अपार उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस उत्सव के दौरान महिलाओं के लिए कई पारंपरिक और मनोरंजक खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया, जिसमें ग्रामीण महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। कार्यक्रम में महिलाओं ने मटका फोड़, फुगड़ी, कुर्सी दौड़, लोटा दौड़, रस्सा खींच और खो-खो जैसे खेलों में अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन कर तीजा महोत्सव को यादगार बना दिया। इस आयोजन से एक ओर जहां ग्रामीण संस्कृति और पारंपरिक खेलों को बढ़ावा मिला, वहीं दूसरी ओर महिलाओं को आपसी मेलजोल और मनोरंजन का बेहतरीन अवसर भी प्राप्त हुआ।

विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं के विजेता खिलाड़ी 

​मटका फोड़: दिव्या पटेल ने पहला स्थान हासिल किया।

​फुगड़ी: खिलेश्वरी साहू ने प्रथम, किरण निषाद ने द्वितीय और मीना निषाद ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।

​लोटा दौड़: भूमिका निषाद प्रथम, मनीषा साहू द्वितीय और रेखा साहू तृतीय स्थान पर रहीं।

​खो-खो: भूमिका की टीम ने प्रथम तथा चंदा की टीम ने द्वितीय स्थान हासिल किया।

​रस्सा खींच:

​प्रथम स्थान (विजेता टीम): चंदा निषाद, क्षमा निषाद, श्यामा साहू, लुके निषाद, रेशमा साहू, तारा साहू एवं रोशनी पटेल।

​द्वितीय स्थान (उपविजेता टीम): रीतु साहू, इन्द्राणी साहू, तोमेश्वरी साहू, रुक्मणी साहू, उषा निषाद, फेकन निषाद एवं राधा निषाद।

​कुर्सी दौड़: नीलम साहू (प्रथम), करिश्मा मानिकपुरी (द्वितीय), गैन्दी पटेल (तृतीय), रितु साहू (चतुर्थ), उषा निषाद (पंचम), जानकी पटेल (षष्टम), गीता साहू (सप्तम), नीरा निषाद (अष्टम), प्रमिला साहू (नवम) और लक्ष्मी साहू ने दशम स्थान प्राप्त किया।

​आयोजन समिति द्वारा सभी विजेता एवं प्रतिभागी महिलाओं को आकर्षक उपहार व नगद राशि देकर सम्मानित किया गया।

​तीजा महोत्सव के इस 5वें वर्ष के सफल आयोजन में ग्राम समिति लाफिनकला के अध्यक्ष रामकुमार साहू, केतन साहू, तोष कुमार साहू, ग्राम पंचायत लाफिन कला के सरपंच राधेश्याम साहू, बाल समाज लीला एवं रामायण मंडली का विशेष योगदान रहा। इसके साथ ही कमलेश कुमार साहू, गोवर्धन प्रसाद साहू, धर्मेंद्र साहू, टिकेश्वर साहू, नीलकमल साहू, नेतन पटेल, हरिराम साहू, रामजी साहू, नाथूराम साहू, महेंद्र पटेल, पवन साहू, ओमप्रकाश पटेल एवं लोकेश साहू का सराहनीय सहयोग मिला।

विशेष लेख-छत्तीसगढ़ का लोक-पर्व: हरेली तिहार

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छत्तीसगढ़ी संस्कृति में लोक-त्योहारों की एक समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें प्रकृति, कृषि और जीव-जंतुओं के प्रति गहरा सम्मान झलकता है। इन्हीं त्योहारों में सबसे पहला और प्रमुख त्यौहार है — हरेली तिहार। सावन माह की अमावस्या (हरियाली अमावस्या) को मनाया जाने वाला यह पर्व छत्तीसगढ़ के लोक-जीवन, कृषि परंपरा और पर्यावरण-प्रेम का प्रतीक है। छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ उसकी प्रकृति नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराएँ भी हैं।

छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में पर्व और त्यौहारों की बहुलता है। प्रत्येक माह कोई न कोई त्यौहार यहाँ लोक मानस को अपने रंग में रंग लेता है। ये त्यौहार जहॉं लोक जीवन में हंसी-खुशी के अवसर उपलब्ध कराती हैं, वहीं खेल और मनोरंजन के अनुकूल साबित होते हैं। प्रकति का यह हरापन छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में भी पूरी समाहित है। हरेली, भोजली, जँवारा हो या बसंत पंचमी सभी पर्वों में प्रकृति का मनोरम और इसका अप्रतिम सौंदर्य झलकता है। इस रूप-सौंदर्य में जीवन की चारों अवस्थाओं का उल्लास और उत्साह विविध रंगों में बिखरा हुआ है।

शायद ‘हरेली’ का हरापन हमारी परंपराओं में हमारे संस्कारों में और हमारे लोक जीवन में प्राकृतिक हरीतिमा का ज्यादा एहसास कराता है। हरेली का यह हरापन सबके जीवन में बिखरे और निखरे यही कामना है। यह भी कामना है कि भौतिकता की चकाचौंध से परे हमारी खेल परंपराएँ जीवित रहे ताकि माटी से जुड़े ग्रामीणजन शारीरिक और मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ रहें। माटी की सोंधी-सोंधी महक हमारे लोक गीतो से आती रहे और खेल परंपरा की यह अविरल धारा निरंतर गतिमान रहे।

हरेली शब्द का अर्थ और महत्व

'हरेली' शब्द 'हरियाली' से बना है। सावन के महीने में जब चारों तरफ़ खेतों और मैदानों में हरी-भरी फसलें और हरियाली लहलहाने लगती है, तब किसान इस पर्व को उल्लासपूर्वक मनाते हैं। इसे छत्तीसगढ़ का पहला तिहार माना जाता है, जहाँ से राज्य के प्रमुख लोक-पर्वों की श्रृंखला शुरू होती है।

कृषि उपकरणों और पशुधन की पूजा

हरेली का दिन मुख्य रूप से कृषकों और कृषि से जुड़े साधनों का धन्यवाद ज्ञापित करने का दिन है:

•कृषि यंत्रों की पूजा:-  हरेली की जड़ें छत्तीसगढ़ क्षेत्र की कृषि विरासत में गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह एक उत्सव होने के साथ-साथ एक आध्यात्मिक भेंट भी है, लोगों के लिए प्रकृति, बारिश और अपने कृषि कार्य को सम्पन्न करने के बाद किसान अपने औजार, हल, फावड़ा, कुदाल, कुदाली, कुम्हड़ी, बिन्धना, बसुला, हथौड़ी, आरी,असिया, पैसुल, छूरा, खुर्पी आदि को धोकर स्वच्छ मिट्टी (मुरमी) का आसन से सजाकर किसान-किसानिन पूजा सामग्री रखकर धुले हुए चांवल आटे से हाथा लगाकर चन्दन, फूल, धुप-दीप व चीला रोटी से भोग लगाकर श्रीफल अर्पित करते हैं एवं भाव विभोर हो प्रार्थना करते हैं - ‘हे बलराम रूपी हल प्रचण्ड शक्ति के प्रतीक धारापति, आपने कंधा के रूप में माता को संवारा एवं सेवा करने में हमारी सहायता की कृषि कार्य बोनी ब्यासी रोपा के होते ही चहूओर हरियाली छाई इसके लिए कोटिशः धन्यवाद आपका कार्य सम्पन्न हुआ विश्राम करे। हमने आपको बड़ा कष्ट दिया, काम लिया, हमें क्षमा करें। आपकी दया हम पर सदैव बनी रहे, इसी प्रकार अन्य औजारों का कार्यानुसार निवेदन करते गेड़ी की पूजा कर शरीर के सामर्थ पैरो की रक्षा की कामना करते हैं।

•पशुधन का सत्कार: पशुधन किसानों की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में किसान मिश्रित कृषि प्रणाली अपनाते हैं, जिसमें फसल और पशुधन का संयोजन होता है। छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में लोग कम पढ़े-लिखे और अकुशल होने के कारण अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं।  बैल छत्तीसगढ़ कृषि की रीढ़ हैं। किसान, विशेषकर सीमांत और लघु किसान, जुताई, ढुलाई और उत्पादन और इनपुट दोनों के परिवहन के लिए बैलों पर निर्भर रहते हैं।

•खेती-किसानी के सच्चे साथी यानी गाय और बैलों की विशेष सेवा की जाती है। उन्हें नहला-धुलाकर आरती उतारी जाती है तथा 'गहूंता' (आटा, नमक और जड़ी-बूटी से बना पौष्टिक मिश्रण) खिलाया जाता है, ताकि वे रोगों से मुक्त रहें। जड़ी बुटियों से तैयार औषधि को गौठान में ले जाकर अन्डी एवं खम्हार के पत्तों में नमक, चावल या गेहूँ के गोला के साथ दवा डाल कर पशुओं को खिलाया जाता है। अरण्ड, खम्हार का पत्ता औषधि है, जो वायुजनित रोगों को दूर करता है। नमक उत्प्रेक्षण का कार्य करता है, चावल या गेहूँ के कारण दवा अधिक असरकारक बन जाती है। इससे पशु धन निरोग हो जाता है यह एक प्रकार टीकाकरण ही है।

परंपराएं एवं रीति-रिवाज

•गेड़ी चढ़ने का आनंद:- इस पर्व में गेंड़ी का काफी महत्व है बांस के मोटे डंडो एवं बांस के पहुये को विशेष विधि से कस कर बांधा जाता है। गेड़ी का उदारण हमें पुराणों में मिलता है। बलदाऊ-कृष्ण अपने सखाओं के साथ गेड़ी चढ़ा करते थे। कृष्ण लीला प्रसंग में इसका उदाहरण मिलता है तथा खेलों का आयोजन भी होते रहे हैं, जिसमें गेड़ी दौड़, पानी पिलाना, एक पैर में खड़े होना, एक पैर में कूदना आदि अनेक खेल का आयोजन प्राचीन काल से अब तक होते आ रहे हैं। बारिश के मौसम में कीचड़ और पानी से भरे रास्तों पर चलने के साधन के रूप में शुरू हुई यह परंपरा आज एक मनोरंजक खेल बन चुकी है। 

•विभिन्न प्रतियोगिता का आयोजन:- हरेली में गाँव व शहरों में नारियल फेंक प्रतियोगिता भी होती है। सुबह पूजा-अर्चना के बाद गाँव के चौक-चौराहों पर युवाओं की टोली जुटती है और नारियल फेंक प्रतियोगिता का आयोजन की जाती है। नारियल हारने और जीतने का यह सिलसिला देर रात तक चलता है। गाँव-गाँव में गेड़ी दौड़ का आयोजन होता है। कहीं खो-खो तो कहीं फुगड़ी, कहीं बिल्लस, कहीं अत्ती-पत्ती, डंडा पचरंगा खेल का आयोजन होते आ रहे हैं। गाँव का गौठान हो या स्कूल का मैदान, गाँव के बाहर सड़क हो या चौबट्टा लगता है सारे लोग रंग-बिरंगे परिधानों में सजे रहते हैं।

•टोटका और सुरक्षा का विधान:- मान्यतानुसार, इस दिन गाँव को बुरी नज़र और रोगों से बचाने के लिए घर के मुख्य दरवाजों पर नीम की पत्तियाँ बांधी जाती हैं। लोहार द्वारा घरों के चौखट पर नीम की शाखाएं और लोहे की कीलें लगाई जाती हैं। स्थानीय मान्यता है कि इससे घर को बुरी शक्तियों और बीमारियों से सुरक्षा मिलती है। यह प्रथा नीम के ज्ञात औषधीय गुणों और ग्रामीण स्वास्थ्य संबंधी पारंपरिक मान्यताओं में इसकी भूमिका से प्रेरित है।

•हरेली तिहार में बनाए जाने वाले ब्यंजन:- मुख्य रूप से गुड़ के चीला, अईरसा, चौसेला और बोबरा जैसे पारंपरिक पकवान बनाए और बांटे जाते हैं। गुलगुला भजिया, गुड़हा चीला, सोहारी, बड़ा, ठेठरी, खुरमी और बोबरा जैसे पारंपरिक छत्तीसगढ़ी पकवान बनाए जाते हैं। इन व्यंजनों का भोग कृषि औजारों और गोधन को लगाया जाता है। इस दिन छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का विशेष आनंद लिया जाता है। 

सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश

हरेली तिहार केवल एक धार्मिक या लोक-अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानव का प्रकृति के साथ अटूट संबंध दर्शाता है। यह पर्व सिखाता है कि जो प्रकृति और पशुधन हमें जीवन और भोजन देते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा परम कर्तव्य है।आज के समय में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा हरेली पर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर और 'छत्तीसगढ़िया क्रांति' के तहत पारंपरिक खेलों (जैसे गेड़ी दौड़) को बढ़ावा देकर इस लोक-सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का सराहनीय कार्य किया जा रहा है।

Kharod News : वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू की स्मृति में खरौद में तीसरे वर्ष हुआ ‘छत्तीसगढ़ी कबि सम्मेलन’, कवियों ने बांधा समां

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खरौद- धार्मिक नगरी, छग की काशी के नाम से विख्यात खरौद में वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू की स्मृति में लक्ष्मणेश्वर मंदिर के सामने 'छत्तीसगढ़ी कबि सम्मेलन' का आयोजन किया गया. आयोजन का यह तीसरा वर्ष रहा और काव्य रसिकों, नगरवासियों, क्षेत्रवासियों में काफी उत्साह दिखा. इस 'छत्तीसगढ़ी कबि सम्मेलन' में राजनांदगांव के हास्य कवि पद्मलोचन शर्मा 'मुंहफट', बेमेतरा के हास्य कवि रामानंद त्रिपाठी, कोरबा की श्रृंगार कवियित्री संतोषी 'श्रद्धा', साजा के ओज कवि ईश्वर साहू 'आरुग', बालोद के हास्य कवि कैलाश कुंवारा शामिल हुए,  वहीं छत्तीसगढ़ी कबि सम्मेलन का संचालन बिलाईगढ़ के कवि ( हास्य-व्यंग्य-गीत ) शशिभूषण सनेही ने किया. यहां सभी कवियों ने गीत, हास्य और ओज के स्वर में 3 घण्टे तक समां बांधे रखा. 

आपको बता दें, छग में खरौद पहली जगह है, जहां 'छत्तीसगढ़ी कबि सम्मेलन' का आयोजन होते आ रहा है. यहां छतीसगढ़ी में सभी कवियों ने शानदार प्रस्तुति दी, जिसे उपस्थित काव्य रसिकों ने खूब सराहा और उनमें खासा उत्साह दिखा. 

'छत्तीसगढ़ी कबि सम्मेलन' की शुरुआत मां सरस्वती, भगवान लक्ष्मणेश्वर और वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू के तैलचित्र के समक्ष पूजा-अर्चना से हुई, फिर सुमधुर स्वर की स्वामिनी कोरबा की कवियत्री संतोषी 'श्रद्धा' ने वंदना प्रस्तुत किया. यहां बालोद से आए हास्य व्यंग्य के कवि कैलाश कुंवारा ने खूब ठहाके लगवाए. साथ ही, सामाजिक कुरीतियों पर तंज कसे, वहीं साजा से आए ओज कवि ईश्वर साहू 'आरुग' ने राष्ट्रवादी कविताओं के साथ छत्तीसगढ़ी माटी, महतारी के सम्मान में ठेठ छत्तीसगढ़ी अंदाज में काव्यपाठ कर मंच को ऊंचाई दी. इसके पुनः संतोषी 'श्रध्दा' के द्वारा काव्यपाठ किया गया, जिसमें उन्होंने विशुद्ध प्रेम श्रृंगार की पंक्तियों से समां बांधते हुए काव्यांजलि दी. राजनांदगांव से पधारे वरिष्ठ कवि पद्मलोचन शर्मा 'मुंहफट' ने हास्य पैरोडी से जबरदस्त माहौल बनाया. साथ ही वरिष्ठ पत्रकार स्व. कुंजबिहारी साहू के प्रति अपनी श्रध्दा प्रकट करते हुए बातें रखी. फिर बेमेतरा से आए हास्य कवि रामानंद त्रिपाठी ने भी शानदार प्रस्तुति दी और अपने हास्य अंदाज से सबको खूब गुदगुदाया. अंत में, संचालन कर रहे बिलाईगढ़ से पहुंचे कवि शशिभूषण सनेही ने भाई, मां, परिवार पर संदेशपरक एवं मार्मिक मानवीय संवेदनाओं की कविताओं से सबको भाव-विभोर करते हुए प्रस्तुति दी. 'छत्तीसगढ़ी कबि सम्मेलन' में बौद्धिक जनमानस ने रात्रि 2:30 तक रचनाओं का रसपान करते हुए पूरी तन्मयता से खूब आनंद लिया. कार्यक्रम का समापन, कवियों को स्मृति चिन्ह भेंटकर किया गया. 

कार्यक्रम का संचालन कोमल साहू और आभार प्रदर्शन आयोजन समिति के संयोजक राजकुमार साहू ने किया. इस मौके पर बिलासपुर से पहुंचे मोनू कश्यप, वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल बहेराडीह के संचालक दीनदयाल यादव, नपं खरौद के उपाध्यक्ष महेश्वर यादव, पार्षद डॉ. हरेकृष्ण साहू, नीलम यादव, हुलाश साहू, नागरिकगण सुबोध शुक्ला, पुष्कर साहू, टालूराम साहू, ओमप्रकाश शर्मा, रवि यादव, इंदलदेव सेवा समिति के कृष्णकुमार आदित्य, फिरत आदित्य, हेमंत साहू, लव सोनी, श्रवण आदित्य, कैलाश थवाईत, दिनेश यादव, जांजगीर के शम्भू सिंह, मोरिनबाई साहू, गीता देवी साहू, हिमांशु साहू, कविता साहू, उषाकिरण साहू, चाम्पा के अजय अग्रवाल, सिवनी ( चाम्पा ) के रामाधार देवांगन, बहेराडीह के बाबूलाल यादव, रामायण सिंह कंवर, उर्मिला यादव, पुष्पा यादव, साधना यादव, कोसमन्दा के विकास साहू समेत अन्य काव्य प्रेमी मौजूद थे.

किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव का हुआ सम्मान 

बहेराडीह गांव में देश का पहला किसान स्कूल संचालित है, जिसके संचालक दीनदयाल यादव हैं. इन्होंने खरौद निवासी वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू के नाम में किसान स्कूल का 'नामकरण' किया है, इसलिए जनप्रतिनिधियों के साथ नगरवासियों ने दीनदयाल यादव का सम्मान किया. यहां जनप्रतिधियों और नगरवासियों ने दीनदयाल यादव की पहल और प्रयास की सराहना की.


लोरिक नगर गढ़ रीवा में गूंजी चंदैनी की स्वर लहरियां

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कलमकारों ने चंदैनी लोकनाट्य की महत्ता पर दिया व्याख्यान

आरंग- छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू और गौरवशाली लोक परंपराओं को सहेजने के उद्देश्य से 'लोरिक नगर' के नाम से विख्यात ग्राम गढ़ रीवा में प्रथम 'लोरिक चंदा (चंदैनी) लोकनाट्य महोत्सव' का ऐतिहासिक आयोजन  हुआ। स्वयंसेवी संस्था पीपला वेलफेयर फाउंडेशन और समस्त ग्रामवासियों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में लोक संस्कृति की ऐसी छटा बिखरी कि हजारों की संख्या में मौजूद जनसैलाब मंत्रमुग्ध हो उठा।

छत्तीसगढ़ ​महतारी की आरती से भव्य आगाज 

​महोत्सव का शुभारंभ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार डॉ. के.के. पाटिल द्वारा रचित 'छत्तीसगढ़ महतारी की आरती' के साथ हुआ। भक्ति और संस्कृति के इस संगम ने पूरे आयोजन को गरिमामय बना दिया। कार्यक्रम में कलमकारों ने चंदैनी लोकनाट्य की बारीकियों पर प्रकाश डालते हुए इसे छत्तीसगढ़ की अस्मिता का प्रतीक बताया।

 ​नामचीन लोगों की उपस्थिति ने बढ़ाया उत्साह 

​महोत्सव में राजनीति, पत्रकारिता और कला जगत की प्रमुख हस्तियों ने शिरकत की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष मोना सेन, मंत्री व आरंग विधायक गुरु खुशवंत साहेब के प्रतिनिधि के रूप में निज सचिव जीतेंद्र साहू, निज सहायक यशवंत टंडन एवं जिला पंचायत सदस्य वतन चंद्राकर,जनपद सदस्य कृष्णा महेश साहू उपस्थित रहे।

साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकार डॉ. कृष्ण कुमार पाटिल, वरिष्ठ पत्रकार व पीपला फाउंडेशन के संरक्षक आनंदराम पत्रकारश्री,पायलेट ओंकार तिवारी, ग्राम समिति अध्यक्ष द्वारिका साहू,

जिला ग्रामीण साहू संघ अध्यक्ष देवनाथ साहू,धीवर समाज परगना अध्यक्ष रामानंद धीवर, सरपंच घसियाराम साहू, उपसरपंच सूरज साहू, वरिष्ठ पत्रकार पवन साहू, आकाशवाणी-दूरदर्शन के एंकर शशांक खरे, सामाजिक कार्यकर्ता महेन्द्र कुमार पटेल और सुरेंद्र नशीने ने भी अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराई।

विलुप्त होती कला को सहेजने की कवायद 

​आयोजन का मुख्य केंद्र बिंदु आधुनिकता की चकाचौंध में ओझल हो रही 'चंदैनी' लोककला को पुनर्जीवित करना था। वक्ताओं ने कहा कि गढ़ रीवा जैसे ऐतिहासिक स्थल पर इस तरह का आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करेगा। महोत्सव की सफलता इस बात में रही कि इसमें किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि सर्वसमाज और जनप्रतिनिधियों का भरपूर सहयोग मिला।

इनकी रही सक्रिय भूमिका 

​महोत्सव के सफल क्रियान्वयन में पीपला फाउंडेशन से महेंद्र कुमार पटेल, कोमल लाखोटी, पोखराज साहू, अशोक साहू, प्रतीक टोंड्रे, ईश्वरी साहू और सीताराम साहू ने सक्रिय भूमिका निभाई। वहीं, ग्राम पंचायत के सरपंच घसियाराम साहू, उपसरपंच सूरज साहू ,समस्त पंचों के साथ हनी डांस ग्रुप के सदस्यों व चंडी मंदिर समिति के सदस्यों का विशेष योगदान रहा।

​कार्यक्रम का सुव्यवस्थित और प्रवाहपूर्ण क्रमिक संचालन संतोष साहू, अशोक साहू और महेंद्र पटेल ने किया। रात भर चले इस आयोजन में हजारों की संख्या में ग्रामीण डटे रहे, जो लोक कला के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा को दर्शाता है।

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