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जशपुर की नाशपाती से बढ़ रही किसानों की आमदनी, 3,500 से अधिक कृषक जुड़े फल उत्पादन से

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3500 हेक्टेयर में हो रही नाशपाती की खेती, देश के कई राज्यों में है जशपुर की नाशपाती की मांग

एक एकड़ से किसानों को हो रही 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय

रायपुर- मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है। जशपुर जिले के किसान नाशपाती की खेती के माध्यम से उल्लेखनीय आय अर्जित कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। प्राकृतिक रूप से अनुकूल जलवायु और उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन के कारण जशपुर आज राज्य के प्रमुख नाशपाती उत्पादक जिलों में शामिल हो चुका है।

जशपुर जिले में लगभग 3,500 से अधिक किसान करीब 3,500 हेक्टेयर क्षेत्र में नाशपाती की खेती कर रहे हैं। जिले में प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख 75 हजार क्विंटल नाशपाती का उत्पादन हो रहा है। इससे हजारों कृषक परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और जिले की पहचान फल उत्पादन के क्षेत्र में लगातार मजबूत हो रही है।

जशपुर की नाशपाती स्वाद, गुणवत्ता और आकर्षक आकार के कारण देश के विभिन्न राज्यों में विशेष रूप से पसंद की जाती है। जिले के सन्ना, पंडरापाठ, कंवई, महुआ, सोनक्यारी, मनोरा, धवईपाई और गीधा जैसे क्षेत्रों से नाशपाती की खेप दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडिशा सहित अन्य राज्यों में भेजी जाती है। फल को सावधानीपूर्वक कैरेट में पैक कर बाजारों तक पहुंचाया जाता है।

नाशपाती की खेती किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है। एक एकड़ क्षेत्र से किसानों को औसतन 1 लाख से 1.50 लाख रुपए तक की वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और किसान आधुनिक उद्यानिकी की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।

उद्यानिकी विभाग तथा नाबार्ड के सहयोग से किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, पौधरोपण, बागवानी प्रबंधन और विपणन संबंधी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत नाशपाती क्षेत्र विस्तार योजना संचालित की जा रही है, जिसके माध्यम से किसानों को अनुदान एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल से जशपुर जिले में उद्यानिकी आधारित कृषि को नई दिशा मिली है। नाशपाती की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि जशपुर को राज्य के एक उभरते हुए फल उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित कर रही है।

PMMSY के तहत सिरसा में खारे पानी की झींगा पालन क्लस्टर की समीक्षा, किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

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सिरसा (हरियाणा)- भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने आज हरियाणा के सिरसा जिले का दौरा कर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत विकसित खारे पानी (Saline Water) एक्वाकल्चर क्लस्टर की प्रगति की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने झींगा (श्रिम्प) और मछली किसानों से संवाद कर जमीनी स्तर पर आने वाली समस्याओं और चुनौतियों को समझा।

डॉ. लिखी ने किसानों को संबोधित करते हुए तकनीक आधारित झींगा पालन, वैज्ञानिक तालाब प्रबंधन और मजबूत बायो-सिक्योरिटी उपायों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सिरसा जैसे खारे पानी वाले क्षेत्र झींगा पालन के लिए बेहद उपयुक्त हैं और इससे किसानों की आय में विविधता, रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। उन्होंने MPEDA को किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन देने और निर्यात से जोड़ने के निर्देश भी दिए। साथ ही, स्थानीय स्तर पर परीक्षण किट की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर बल दिया गया ताकि किसानों को दूर नहीं जाना पड़े।

चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय (CDLU) में आयोजित एक समीक्षा बैठक में PMMSY के तहत क्लस्टर आधारित मत्स्य विकास योजनाओं की प्रगति पर चर्चा की गई। इस बैठक में केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी, ICAR के वैज्ञानिक, NABARD, NFDB, MPEDA, मत्स्य किसान, सहकारी संस्थाएं और देशभर के प्रतिनिधि शामिल हुए। 500 से अधिक प्रतिभागियों ने बैठक में हिस्सा लिया। किसानों ने इस दौरान बिजली की ऊंची लागत, गुणवत्तापूर्ण बीज की कमी और पानी की उपलब्धता जैसी समस्याएं उठाईं और पंचायत भूमि को स्वयं सहायता समूहों को लीज पर देने की मांग की।

डॉ. लिखी ने सिरसा के रघुआना गांव में PMMSY के तहत विकसित एक सफल झींगा फार्म का भी दौरा किया। करीब 3 हेक्टेयर में फैले 7 तालाबों वाले इस फार्म से सालाना 28 टन उत्पादन हो रहा है, जिससे लगभग ₹90 लाख का कारोबार और स्थानीय रोजगार सृजन हो रहा है। उन्होंने कहा कि झींगा पालन के विस्तार के लिए बेहतर बीज, फीड, बुनियादी ढांचा और बाजार तक पहुंच को मजबूत करना जरूरी है।

हरियाणा ने PMMSY के तहत उल्लेखनीय प्रगति की है, जहां ₹760.88 करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ है। राज्य में 456 RAS और बायोफ्लॉक सिस्टम स्थापित किए गए हैं, जबकि 3,766 हेक्टेयर तालाब और 2,204 हेक्टेयर खारे क्षेत्र में विकास कार्य किए जा रहे हैं। इसके अलावा, सिरसा में ₹110 करोड़ का एकीकृत एक्वापार्क स्थापित किया जा रहा है और कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित किया जा रहा है।

भारत का झींगा निर्यात समुद्री उत्पादों का प्रमुख हिस्सा है, जो कुल निर्यात का लगभग 69% है। देश का समुद्री निर्यात पिछले दशक में दोगुना होकर ₹62,408 करोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें झींगा का योगदान ₹43,334 करोड़ है।

देश में 34 मत्स्य क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें सिरसा का खारा पानी क्लस्टर एक प्रमुख उदाहरण है। यह क्लस्टर झींगा, स्कैम्पी और सीबास जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के जरिए किसानों की आय बढ़ाने, रोजगार सृजन और संसाधनों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा दे रहा है।

भारत का अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है, जो कुल उत्पादन का 75% योगदान देता है। 2013-14 से 2024-25 के बीच उत्पादन 61 लाख टन से बढ़कर 153 लाख टन हो गया है। देश के विशाल जल संसाधनों को देखते हुए मत्स्य पालन क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं हैं, जिसे सरकार प्राथमिकता दे रही है।

निष्कर्ष: सिरसा का यह मॉडल दर्शाता है कि सही नीति, तकनीक और सहयोग के जरिए खारे और अनुपयोगी क्षेत्रों को भी आय और रोजगार के मजबूत स्रोत में बदला जा सकता है।

खेती से कमाई, अब आधुनिकता की ओर बढ़ते कदम

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मेहनत से मिली नई उड़ान: किसान प्रदीप पटेल अब खरीदेंगे अपना ट्रैक्टर

रायपुर-सारंगढ़–बिलाईगढ़ जिले के ग्राम गंधराचुवा के युवा एवं मेहनतकश किसान प्रदीप पटेल ने इस खरीफ सीजन में अपनी उपज बेचकर अपने एक बड़े सपने को सच करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

धान खरीदी केन्द्र कनकबीरा में प्रदीप ने करीब 2 एकड़ भूमि से प्राप्त 51.60 क्विंटल धान राज्य सरकार को बेचा है। प्रति क्विंटल 3100 रुपये के समर्थन मूल्य से वे बेहद खुश हैं। उन्होंने बताया कि धान बिक्री से प्राप्त राशि में अपनी जमा पूंजी जोड़कर वे ट्रैक्टर खरीदने का सपना पूरा करेंगे—जो उनके कृषि कार्यों को और भी सरल, तेज़ और आधुनिक बनाएगा।

प्रदीप पटेल ने कहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदी का निर्णय किसानों के लिए बड़ी राहत है। साथ ही उन्होंने टोकन सिस्टम की भी प्रशंसा की। पहले जहाँ टोकन लेने के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ती थी, वहीं अब ऑनलाइन ‘तुंहर टोकन’ सुविधा से किसान अपने मोबाइल में ही टोकन काट पा रहे हैं।

धान खरीदी केन्द्र में पेयजल, गुणवत्तापूर्ण बारदाना और समय पर व्यवस्था मिलने से किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हो रही है—यह बात भी प्रदीप ने खुशी जताते हुए कही।

प्रदीप पटेल की यह सफलता कहानी बताती है कि सरकारी योजनाएँ, तकनीकी सुविधाएँ और किसान की मेहनत मिलकर कैसे जीवन में प्रगति की नई राहें खोलती हैं।

राष्ट्रीय एफपीओ समागम 2025: किसान उद्यमिता, सहयोग और सतत कृषि विकास का उत्सव

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कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा “राष्ट्रीय एफपीओ समागम 2025” का आयोजन 30 और 31 अक्टूबर 2025 को एनसीडीसी और एनसीयूआई परिसर, हौज खास, नई दिल्ली में किया जा रहा है। यह आयोजन 10,000 किसान उत्पादक संगठन (FPO) के गठन और संवर्धन योजना के तहत हुई उल्लेखनीय उपलब्धियों का उत्सव है तथा किसानों के समूहों को सहयोग, प्रौद्योगिकी और मूल्य संवर्धन के माध्यम से सशक्त बनाने का उद्देश्य रखता है।

दो दिवसीय इस कार्यक्रम में 24 राज्यों और 140 जिलों के 500 से अधिक किसान, कार्यान्वयन एजेंसियाँ (IAs), क्लस्टर आधारित व्यावसायिक संगठन (CBBOs) और प्रगतिशील एफपीओ भाग लेंगे। इस दौरान 267 एफपीओ अपने उत्पादों और नवाचारों का प्रदर्शन प्रदर्शनी स्टॉलों के माध्यम से करेंगे।

इनमें से 57 एफपीओ स्टॉल एनसीडीसी परिसर, हौज खास, नई दिल्ली में लगाए जाएंगे, जहाँ अनाज, दालें, मोटे अनाज, मसाले, तिलहन, फल, सब्जियाँ, शहद, चाय, कॉफी, डेयरी और जैविक उत्पादों सहित विभिन्न कृषि और मूल्यवर्धित उत्पाद प्रदर्शित होंगे। प्रदर्शनी में अचार, जैम, गुड़, हर्बल और नेचुरल उत्पाद, मेवे और पारंपरिक हस्तनिर्मित खाद्य पदार्थ भी शामिल होंगे। यह प्रदर्शन “एक भारत – एक कृषि” की भावना को साकार करेगा, जहाँ देशभर के एफपीओ एकजुट होकर एक सशक्त, बाजार उन्मुख कृषि अर्थव्यवस्था के निर्माण में योगदान दे रहे हैं।

कार्यक्रम के दौरान कई तकनीकी सत्र और पैनल चर्चा आयोजित की जाएंगी, जिनमें प्रमुख विषय होंगे —

  • तेलहन उत्पादन और मूल्य संवर्धन

  • जल उपयोग दक्षता और सतत सिंचाई प्रथाएँ (श्रीमती अर्चना वर्मा, अपर सचिव एवं प्रबंध निदेशक, एनडब्ल्यूएम द्वारा)

  • प्राकृतिक खेती और इसके बाजार अवसर (एनएमएनएफ द्वारा आयोजित)

  • कृषि अवसंरचना निधि (AIF) – ऋण तक पहुँच और अवसंरचना विकास

  • शहद उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन (एनबीबी के साथ)

  • डिजिटल कॉमर्स प्लेटफॉर्म और बाजार तक पहुँच (फ्लिपकार्ट द्वारा सत्र)

  • उर्वरक और कीटनाशक प्रबंधन (एचआईएल द्वारा)

  • एगमार्क प्रमाणन प्रक्रिया और लाभ (डीएमआई द्वारा)

  • बीज उत्पादन, पैकेजिंग और विपणन (एनएससी द्वारा)

  • खरीदार–विक्रेता संवाद सत्र (Buyer-Seller Meet) व्यापारिक संबंधों और साझेदारी को बढ़ाने के लिए

इसके अतिरिक्त, उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले एफपीओ, सीबीबीओ और कार्यान्वयन एजेंसियों को किसान सशक्तिकरण, व्यावसायिक प्रदर्शन और डिजिटल सक्षमता में उत्कृष्टता के लिए सम्मानित किया जाएगा। Buyer-Seller Meet के माध्यम से किसानों, कृषि उद्योगों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बीच प्रत्यक्ष बाजार संबंध भी स्थापित किए जाएंगे।

राष्ट्रीय एफपीओ समागम 2025 किसान उद्यमिता का एक ऐतिहासिक मंच है, जो यह दर्शाता है कि सामूहिक प्रयास किस प्रकार ग्रामीण परिवर्तन, डिजिटल समावेशन और सतत कृषि व्यवसाय विकास को गति दे रहे हैं — और सरकार के इस विजन को साकार कर रहे हैं कि किसान केवल उत्पादक नहीं, बल्कि भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में प्रदाता और भागीदार भी हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में कृषि क्षेत्र में नई उपलब्धियाँ: खरीफ 2025 में संतोषजनक बुवाई, ₹38,000 करोड़ की उर्वरक सब्सिडी को मंजूरी

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केंद्रीय कृषि, किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सभी किसानों की ओर से धन्यवाद ज्ञापित किया है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में ₹38,000 करोड़ की उर्वरक सब्सिडी को मंजूरी दी गई है।

शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आयोजित एक समीक्षा बैठक के दौरान यह जानकारी दी गई कि खरीफ 2025 सीजन में बुवाई का कार्य अत्यंत संतोषजनक रहा है। धान की कुल बुवाई का क्षेत्रफल 441.58 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है। इसी प्रकार, तेलहन फसलों का कुल क्षेत्रफल 190.13 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जिसमें सोयाबीन और मूंगफली प्रमुख फसलें हैं। दालों की बुवाई 120.41 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की गई है, जो देश की पोषण सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वहीं गन्ने का क्षेत्रफल 59.07 लाख हेक्टेयर है, जिससे गन्ना किसानों को सीधा लाभ मिलेगा।

इस वर्ष भारत के कृषि क्षेत्र को अनुकूल मानसून, पर्याप्त वर्षा और जलाशयों में बेहतर जल भंडारण का बड़ा लाभ मिला है। साप्ताहिक कृषि प्रगति समीक्षा के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि अधिकांश प्रमुख जलाशयों में जलस्तर सामान्य या उससे अधिक है, जिससे सिंचाई की आवश्यकताएँ पूरी तरह पूरी हो रही हैं और खरीफ फसलों की समय पर बुवाई संभव हो सकी है। पर्याप्त मिट्टी की नमी ने फसल वृद्धि को बढ़ावा दिया है और रबी फसलों के क्षेत्र में विस्तार की संभावना को बल दिया है।

कृषि आयुक्त डॉ. पी.के. सिंह द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में बताया गया कि सिंचाई परियोजनाओं और जलाशयों में जल की उपलब्धता में सुधार हुआ है, जिससे सिंचित क्षेत्रों में कृषि विकास को प्रोत्साहन मिला है। देशभर के 161 जलाशयों में कुल जीवित जल भंडारण 165.58 बिलियन घन मीटर (BCM) है, जो पिछले वर्ष के स्तर का 104.30% और दस वर्ष के औसत का 115.95% है।

बैठक में यह भी बताया गया कि खरीफ फसलों की कटाई कुछ क्षेत्रों में प्रारंभ हो चुकी है, जो कुल खरीफ क्षेत्र के लगभग 27% हिस्से को कवर करती है, जबकि रबी फसलों की बुवाई प्रारंभिक चरण में है। प्याज, आलू और टमाटर फसलों की स्थिति देशभर में संतोषजनक है और चावल व गेहूं का वर्तमान भंडार बफर मानकों से अधिक है।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि देश का कृषि क्षेत्र समय पर और अनुकूल मानसून, पर्याप्त जल संसाधनों, कुशल योजना और डिजिटल नवाचारों के कारण ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल कर रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की किसान हितैषी नीतियाँ किसानों की आय बढ़ाने और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने में सहायक हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार, राज्यों के सहयोग से, आगामी रबी सीजन में दालों और तेलहनों की अधिक बुवाई और रिकॉर्ड उत्पादकता को प्रोत्साहित करने के लिए सभी आवश्यक सहायता प्रदान करेगी।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गोरखपुर में ‘ग्राम चौपाल’ के माध्यम से किसानों से किया संवाद, कृषि एवं ग्रामीण विकास पर साझा किए विचार

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केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के डुमरी खुर्द गांव में आयोजित एक ‘ग्राम चौपाल’ के दौरान ग्रामीण भाई-बहनों से संवाद किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीणों, किसानों, स्वयं सहायता समूह (SHG) सदस्यों और पंचायत प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

शिवराज सिंह चौहान ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किसानों के हित में किए जा रहे संयुक्त प्रयासों की जानकारी दी और कहा कि सरकार लगातार उत्पादन बढ़ाने, बेहतर बीज उपलब्ध कराने और लागत घटाने के लिए कदम उठा रही है। उन्होंने किसानों को आश्वस्त किया कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत फसलों के नुकसान पर क्षतिपूर्ति प्रदान की जाएगी। किसानों से बातचीत के दौरान उन्होंने प्रमुख फसलों, उत्पादन लागत और स्थानीय खाद्य दुकानों की आवश्यकता जैसे मुद्दों पर फीडबैक भी लिया।

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार के ‘दालों में आत्मनिर्भरता मिशन’ के तहत मसूर और चने के उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में पहल की जा रही है और इस पर किसानों से सुझाव भी मांगे गए हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में वृद्धि की गई है, जिससे किसानों को बड़ा लाभ होगा। विशेष रूप से गेहूं, चना, मसूर और सरसों की MSP में हुई बढ़ोतरी का विवरण साझा किया गया।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कृषि यंत्रों पर जीएसटी दरें 12% और 18% से घटाकर 5% कर दी गई हैं, जिससे किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है।

उन्होंने किसानों से पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और बागवानी को कृषि के साथ अपनाने का आग्रह किया और पशुओं के टीकाकरण से संबंधित सरकारी योजनाओं की जानकारी दी।

इस ‘ग्राम चौपाल’ में बड़ी संख्या में किसानों, स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों और पंचायत प्रतिनिधियों ने भाग लिया और अपनी समस्याएं एवं सुझाव केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ साझा किए। कार्यक्रम के अंत में शिवराज सिंह चौहान ने सभी से ग्रामीण विकास और कृषि समृद्धि के लिए सहयोग और सहभागिता की अपील की।


टमाटर की उन्नत खेती से किसानों को हो रहा शुद्ध लाभ, राष्ट्रीय बागवानी मिशन से मिली मदद

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रायपुर- राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत किसानों और कृषि से जुड़े स्टार्टअप्स को वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। इस योजना के तहत फल, सब्जी, फूल, मसाले, औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती के लिए सब्सिडी दी जाती है। इसी योजना का लाभ उठाते हुए जशपुर जिले के मनोरा विकासखण्ड के ग्राम पंचायत टेम्पू के किसान सुनील भगत ने टमाटर की खेती की और कुल लागत घटाने के बाद शुद्ध लाभ अर्जित किया।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे किसानों को उन्नत खेती की जानकारी दें और उन्हें विभिन्न केन्द्रीय और राज्य सरकार की योजनाओं से लाभान्वित करें ताकि वे आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें। इसी दिशा में, सुनील भगत ने देशी किस्म ‘जीके टमाटर’ की खेती की, जिसमें प्रति एकड़ 9 टन उत्पादन हुआ। उन्होंने इसे लगभग ₹85,500 में बेचा, जिससे उन्हें ₹55,500 का शुद्ध लाभ हुआ। किसान अब ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग जैसी उन्नत तकनीक अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

अन्य किसानों पर प्रभाव

खेती की प्रक्रिया को आधुनिक बनाकर राष्ट्रीय बागवानी मिशन का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना है। इसके लिए अत्याधुनिक तकनीक, जैविक उर्वरक, पर्यावरण-अनुकूल कीटनाशक और अन्य उपकरणों का उपयोग करना आवश्यक है, जो किसानों को उत्पादन बढ़ाने में सक्षम बनाते हैं। किसान समूह कृषि उत्पादों की खरीद, बाजार से संपर्क स्थापित करना, इनपुट की आपूर्ति और प्रशिक्षण एवं जानकारी प्रदान करने में सक्रिय हैं। टेम्पू और आसपास के गांवों के किसान सुनील भगत की सफलता से प्रेरित होकर उन्नत खेती करना शुरू कर चुके हैं और विभागीय योजनाओं से लगातार जुड़कर अधिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।


छत्तीसगढ़ में जूट की खेती को बढ़ावा देने की तैयारी

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 जूट की खेती पर एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण सह किसान सम्मेलन आयोजित

रायपुर- छत्तीसगढ़ में जूट की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने हेतु विगत दिवस इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, में एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण सह वैज्ञानिक किसान सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह प्रशिक्षण छत्तीसगढ़ में जूट की उन्नत खेती और उत्पादन विधियों पर आयोजित किया गया। यह प्रशिक्षण जूट की खेती परियोजना के तहत आईबीआईटीएफ द्वारा वित्त पोषित और आईआईटी भिलाई के सहयोग से आयोजित किया गया। 

इस प्रशिक्षण में राष्ट्रीय जूट बोर्ड के वैज्ञानिक डॉ. नीलेन्दु भौमिक और तकनीकी सहायक ने जूट से यांत्रिक फाइबर निष्कर्षण पर व्याख्यान दिया है। उन्होंने बारीक निष्कर्षण को आसान बनाने के लिए एक रिबनर मशीन का प्रदर्शन किया है। आईआईटी भिलाई के निदेशक डॉ. राजीव प्रकाश और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान संचालक डॉ. विवेक त्रिपाठी ने प्रशिक्षण को और अधिक प्रभावी बनाया। डॉ. राजीव प्रकाश ने रेशेदार फसलों के पारिस्थितिक महत्व के बारे में जानकारी देते हुए किसानों को संबोधित किया। उन्होंने रेशे की गुणवत्ता पर रेटिंग प्रक्रिया के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों से छत्तीसगढ़ में पूर्व की तरह जूट की खेती फिर से शुरू करने का आह्वान किया। डॉ. विवेक त्रिपाठी ने किसानों से खरीफ के लिए चावल के अलावा अन्य विकल्पों पर विचार करने को कहा। उन्होंने कहा कि किसान खरीफ में चावल उगाने से पहले ग्रीष्मकालीन फसल के रूप में जूट की खेती कर सकते हैं। इससे किसानों को पारिश्रमिक मिलेगा और उनकी आजीविका में सुधार होगा। 

जूट परियोजना की सह अन्वेषक डॉ. प्रज्ञा पांडे ने जूट की उन्नत खेती की पद्धतियों पर व्याख्यान दिया। डॉ. अरुण उपाध्याय ने एंजाइमेटिक रेटिंग तकनीक पर व्याख्यान दिया। इस सम्मेलन में धमतरी और रायपुर के 30 किसानों ने कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लिया और व्याख्यान, मशीन प्रदर्शन और जूट के अवलोकन के माध्यम से जूट उत्पादन के बारे में जानकारी प्राप्त की। इस खरीफ मौसम में धमतरी जिले में 4 एकड़ भूमि पर जूट की खेती चल रही है। किसानों ने आगामी वर्ष में जूट का क्षेत्र विस्तार करने पर सहमति व्यक्त की।


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