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पत्थरों में दर्ज इतिहास: जहाँ हर पत्थर कहती है एक कहानी

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के जांजगीर नगर में स्थित विष्णु मंदिर, जिसे स्थानीय रूप से ‘नकटा मंदिर’ भी कहा जाता है, प्रदेश की महत्वपूर्ण पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक धरोहरों में गिना जाता है। महानदी अंचल की ऐतिहासिक भूमि पर निर्मित यह मंदिर अपनी अधूरी संरचना के कारण सदियों से जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

कलचुरी काल की स्थापत्य विरासत

इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी में कलचुरी शासकों के काल में प्रारंभ हुआ था। उस समय छत्तीसगढ़ क्षेत्र कला, स्थापत्य और धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। मंदिर की संरचना नागर शैली में निर्मित है, जिसमें ऊँचा शिखर, अलंकृत गर्भगृह तथा सुसज्जित मंडप की परिकल्पना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। हालांकि निर्माण कार्य किसी अज्ञात कारण से अधूरा रह गया, किंतु जो संरचना आज विद्यमान है, वह उस युग की समृद्ध कला और स्थापत्य कौशल का जीवंत प्रमाण प्रस्तुत करती है।

अद्वितीय शिल्पकला और सूक्ष्म नक्काशी

मंदिर की दीवारों, स्तंभों और आधार भागों पर की गई बारीक नक्काशी अत्यंत आकर्षक है। इनमें विभिन्न पौराणिक प्रसंग, देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ, गंधर्व, अप्सराएँ और अलंकारिक रूपांकन उकेरे गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मूर्तियों के अनुपात, भाव-भंगिमा और अलंकरण शैली से तत्कालीन शिल्पियों की उच्च कोटि की दक्षता का परिचय मिलता है। प्रत्येक आकृति मानो किसी कथा का दृश्य रूपांतरण हो, जो भारतीय धर्म और संस्कृति की गहराई को अभिव्यक्त करता है।

अधूरापन: रहस्य और किंवदंती

मंदिर के अधूरे रह जाने को लेकर कई मत प्रचलित हैं। कुछ इतिहासकार इसे राजनीतिक अस्थिरता या सत्ता परिवर्तन से जोड़ते हैं, जबकि स्थानीय लोककथाओं में इसे दैवीय संकेत या अलौकिक कारणों से संबंधित बताया जाता है। यद्यपि सटीक कारणों का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है, किंतु यही अधूरापन इस मंदिर को विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। यह अधूरी रचना भी पूर्ण सौंदर्य का अनुभव कराती है और दर्शकों को इतिहास के उस कालखंड में ले जाती है, जब कला और आस्था का अद्भुत संगम हुआ करता था।

आस्था और पर्यटन का प्रमुख केंद्र

आज यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का स्थल होने के साथ-साथ पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में इस मंदिर का विशेष स्थान है। पुरातात्विक महत्व के कारण इसे संरक्षित स्मारक के रूप में देखा जाता है और प्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर भी यह महत्वपूर्ण पड़ाव है। मंदिर परिसर में खड़े होकर ऐसा प्रतीत होता है मानो समय ठहर गया हो और पत्थरों में इतिहास बोल रहा हो।

विरासत जो अधूरी होकर भी पूर्ण है

जांजगीर का विष्णु मंदिर यह संदेश देता है कि विरासत केवल पूर्ण संरचनाओं में ही नहीं, बल्कि अधूरी कहानियों में भी जीवित रहती है। इसकी भव्यता, शिल्प और रहस्य आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते रहेंगे। अधूरा होकर भी यह मंदिर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना में पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित है, और यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

मड़ई 2025: सांस्कृतिक समागम सहभागियों के लिए आनंद के क्षण : चार दिवसीय युवा महोत्सव मड़ई 2025 का रंगा-रंग समापन

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रायपुर। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में आयोजित चार दिवसीय अंतर महाविद्यालयीन सांस्कृतिक युवा महोत्सव मड़ई 2025 का पुरस्कार वितरण एवं प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा, कुलपति इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के मुख्य आतिथ्य में एवं डॉ. गिरीश चंदेल, कुलपति इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेता कॉलेज टीम्स तथा विद्यार्थियों को अतिथियों द्वारा पुरस्कृत किया गया। 

मड़ई 2025 युवा महोत्सव का ओवर ऑल चैम्पियन कृषि महाविद्यालय रायपुर को घोषित किया गया। कृषि महाविद्यालय अम्बिकापुर मड़ई 2025 का ओवर ऑल रनरअप रहा। शोभा यात्रा में प्रस्तुत झांकियों में कृषि महाविद्यालय राजनांदगांव को प्रथम तथा कृषि महाविद्यालय कांकेर को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ। संगीत स्पर्धाओं में राजनांदगांव विजेता तथा कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय रायपुर उप विजेता रहे। इसी प्रकार नृत्य प्रतियोगिता में कृषि महाविद्यालय रायपुर विजेता तथा कृषि महाविद्यालय कांकेर उप विजेता रहे। इस अवसर पर विभिन्न प्रतियोगिताओं के निर्णायकों, टीम मैनेजर्स तथा विभिन्न आयोजन समितियों को अध्यक्षों एवं सदस्यों को भी सम्मानित किया गया। 

समापन समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा, कुलपति इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ ने कहा कि यह एक चार दिवसीय सांस्कृतिक समागम है जो समस्त सहभागियों के लिए आनंद का अवसर है। उन्होंने इस अवसर पर सस्वर गणेश वंदना का भी प्रस्तुतिकरण किया। कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने कहा कि विद्यार्थियों ने छत्तीसगढ़ की आदिवासी कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। यह सांस्कृतिक प्रदर्शन विद्यार्थी जीवन का एक स्वर्णिम पल है जिसे हर व्यक्ति आजीवन मन में संजोए रहता है। 

यह आयोजन हार या जीत तक सीमित नहीं है परंतु प्रतिभा, व्यक्तित्व विकास एवं टीम के रूप में संगठित कार्य सीखने का सुअवसर है। डॉ. संजय शर्मा, अधिष्ठाता छात्र कल्याण ने कहा कि इस सांस्कृतिक समारोह का मुख्य उद्धेश्य विद्यार्थियों की सृजन एवं अभिव्यक्ति की कला का विकास करना है। कला और कृषि एक-दूसरे के पूरक है क्योंकि हमारे समस्त त्यौहारों का संबंध मूल रूप से कृषि से ही जुड़ा है। डॉ. शर्मा ने मड़ई 2025 के अंतर्गत विगत चार दिनों में आयोजित कार्यक्रम एवं गतिविधियों की जानकारी दी। आयोजन सचिव डॉ सुनील नाग ने अतिथियों एवं सफल आयोजन के लिए सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

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