Media24Media.com: #मोहन भागवत

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आरएसएस शताब्दी वर्ष पर मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा - हिन्दू राष्ट्र का सत्ता से कोई लेना-देना नहीं

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 नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर मंगलवार को विज्ञान भवन, दिल्ली में आयोजित व्याख्यान श्रृंखला ‘संघ की 100 वर्षों की यात्रा : नए क्षितिज’ के उद्घाटन सत्र को संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने संबोधित किया। उन्होंने अपने भाषण में संघ की विचारधारा, उद्देश्यों और वैश्विक भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।


भागवत ने कहा कि “हिंदू राष्ट्र” की अवधारणा को गलत तरीके से राजनीतिक सत्ता से जोड़ा जाता है, जबकि वास्तविकता में इसका सत्ता से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा, “जब हम ‘हिंदू राष्ट्र’ कहते हैं, तो कुछ लोग भ्रमित हो जाते हैं। भारत का राष्ट्रभाव हजारों वर्षों से अस्तित्व में है और यह सत्ता परिवर्तन पर निर्भर नहीं करता।”

संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ है – सभी के लिए न्याय और समरसता, बिना किसी भेदभाव के। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति विविधता में एकता की शिक्षा देती है।

हेडगेवार की सोच पर प्रकाश

मोहन भागवत ने संघ संस्थापक डॉ. केबी हेडगेवार को याद करते हुए कहा कि उन्होंने 1925 से पहले ही संघ की कल्पना कर ली थी। उनका उद्देश्य था कि पूरा हिंदू समाज संगठित हो और प्रत्येक हिंदू अपने को जिम्मेदार नागरिक माने।

भागवत ने कहा, “संघ ने कभी किसी से धन की याचना नहीं की, न ही किसी की संपत्ति पर अधिकार जमाया। विरोध के बावजूद हमने कभी शत्रुता नहीं दिखाई। संघ स्वावलंबन और सेवा भाव से कार्य करता रहा है।”

भारत का वैश्विक योगदान

संघ प्रमुख ने कहा कि भारत का मिशन है विश्व में शांति और समरसता फैलाना। उन्होंने स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत का उद्देश्य विश्वगुरु बनना है। उन्होंने कहा कि “एकता का अर्थ समानता नहीं है, बल्कि विविधता में एकता है। समाज के हर वर्ग को जोड़ना और संगठित करना संघ का कार्य है।”

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