Media24Media.com: #गणेश जी की प्रतिमा विसर्जन

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देखिये Video: क्यों विसर्जित करते हैं गणेश जी की प्रतिमा को, जानिए पौराणिक और धार्मिक कारण

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 इन दिनों गणेश जी की प्रतिमा विसर्जन को लेकर तरह-तरह के रिल्स, एआई जेनरेटेड फोटो और वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर देखने को मिल रहा है। तब यह सवाल मन में स्वाभाविक रूप से आता है कि गणेश जी की स्थापना के बाद उनकी मूर्ति को विसर्जित क्यों किया जाता है? इसके पीछे की पौराणिक कथा या धार्मिक मान्यता क्या है? यह परंपरा क्यों है?


इन सवालों का जवाब जानने के लिए पढ़िए पूरी खबर-

गणेश जी की प्रतिमा को 11वें (अनंत चतुर्दशी) दिन विसर्जित करने की परंपरा के पीछे धार्मिक, पौराणिक और सांकेतिक कारण हैं, जिसमें प्रमुख मान्यता गणेश जी की यात्रा और जीवन-चक्र का प्रतीकात्मक संदेश है.


पौराणिक कारण

महाभारत की कथा के अनुसार, वेदव्यास जी ने 10 दिनों तक गणेश जी से अखंड लेखन कराया और अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश जी का शरीर बहुत गर्म हो गया तो उन्होंने सरोवर में स्नान कराकर उन्हें शीतल किया.
इसलिए प्रतिमा का विसर्जन जल में किया जाता है, यह उसी घटनाक्रम का प्रतीक है.

सांकेतिक अर्थ

विसर्जन उत्पत्ति और विलय का चक्र दर्शाता है—माटी की मूर्ति बनकर भगवान घर-घर आते हैं और फिर जल में विलीन होकर निराकार परम सत्ता में लीन हो जाते हैं. यह उसी प्रकार है, जैसे हमारा पंच तत्वों से बना यह शरीर। जब जीवन चक्र पूरा होता है, आत्मा शरीर छोड़ देती है। तब शरीर को विसर्जित (जलाया या दफनाया) किया जाता है। वैसे ही हवन यज्ञ के बाद मूर्तियों को विसर्जित करने का विधान है।

यह प्रक्रिया “आओ, पूजो, फिर विदा करो” की भावना को दर्शाती है; जैसा किसी प्रिय का सम्मानपूर्वक विदा करना होता है.

विसर्जन काल में भक्त अपने विकार (अहम, लालसा, क्रोध) गणेश जी को अर्पित करते हैं, प्रतीक रूप में उन विकारों का विसर्जन भी होता है.

धार्मिक मान्यता

देवी-देवताओं का आह्वान कर हम निर्धारित समय तक पूजा करते हैं, पुनः प्रतिमा को विसर्जित कर परम तत्व में विलीन कर देते हैं.
गणेश चतुर्थी पर विराजित गणेश जी के विसर्जन का अद्भुत संबंध है, जिसमें भक्त गणेश जी से अगले वर्ष फिर आने की कामना करते हैं. इसलिए जयघोष किया जाता है कि-
गणपति बप्पा मोरया
अगले बरस तू जल्दी आ...

इस तरह से गणेश प्रतिमा का 11वें दिन विसर्जन जीवनचक्र की पुनरावृत्ति, पौराणिक कथाओं के स्मरण, हमारे विकारों का क्षय तथा परम सत्ता में विलय का संदेश देता है.

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